रविवार, 20 जुलाई 2014

सुभाष लखेड़ा के 2 व्यंग्य

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व्यंग्य :

                                मेरा सुन्दर सपना टूट गया
                                                                     - सुभाष लखेड़ा
        अखबार पढ़ रहा हूँ। लिखा है चीन और पाकिस्तान शपथ ले रहे हैं कि अब उनकी फौजें कभी भी हमारी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करेंगी। अब दूसरी खबर छपी है कि एक रूपये में दो अमेरिकी डॉलर मिल रहे हैं। बाबा रामदेव की कही बात हो गई। सारा काला धन सरकार को वापस मिल गया और जनता में बाँट दिया गया है। मन खुश हो गया। तीसरी खबर तो और भी चौंकाने वाली है। देश में आज से गरीब की परिभाषा बदल गयी है। प्रति दिन हजार रूपये से कम कमाने वाला व्यक्ति अब गरीब माना जायेगा। खैर, असली खबर तो नीचे छोटे कॉलम में है:  देश में बासमती चावल पांच रूपये किलोग्राम और बाकी खाने- पीने का सामान भी इसी अनुपात में सस्ता हो गया है। कई और भी ख़बरें हैं।

 
      ओबामा ने भारत से वीजा के लिए निवेदन किया है। सभी आतंकवादी देश छोड़कर भाग गए हैं। सभी मंत्रियों और बड़े अफसरों की सुरक्षा में लगे कर्मचारी अब सामान्य लोगों की देखभाल कर रहे हैंs। सरकारी अधिकारी बिना रिश्वत लिए काम कर रहे हैं। सभी तरह का भ्रष्टाचार ख़त्म हो चुका था। फलस्वरूप, अन्ना का समय अब काटे नहीं कट रहा है। केजरीवाल के दिन लद  गए हैं। कहीं कोई अपराध नहीं। मैं ने एक मित्र को फोन पर पूछा - क्या अच्छे दिन आ गए ? उसने बताया - तुम जरूर सो रहे होगे। 


अरे, दिन क्या, अब तो शाम होने वाली है


      तभी पत्नी की आवाज सुनाई दी - क्या अच्छे दिन - अच्छे दिन बड़बड़ा रहे हो ? शाम के छह बज रहे हैं; अभी तक सो रहे हो। लो चाय पियो और मदर डेरी के सब्जी बूथ पर सुना है प्याज आया है। जैसा भी मिले लेते आना !

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    गलतफहमी है तो हर्ज क्या है ?
                                                                                       - सुभाष चन्द्र लखेड़ा       

       जब से होश संभाला, यहां - वहां, इनसे - उनसे, संतों - असंतों  से और अपने अनेक मित्रों से यह सुनते आया हूँ कि मनुष्य को सुखी रहना है तो उसे संतोष का आश्रय लेना चाहिए। दरअसल, रहीमदास जी ने बहुत पहले ही लिख दिया था कि " गो धन, गज धन ,बाजि धन , और रतन धन खान । जब आवे संतोष धन , सब धन धूरि समान। "   रहीम तो कवि थे और उनका अकबरी दरबार  में महत्त्वपूर्ण स्थान था। दरअसल, रहीम इस दोहे के माध्यम से अकबर को समझा रहे होंगे कि अब लड़ाई - झगड़ों से दूर रहो और हमारी कविताएं  सुनते रहो।  कवि को सच्चा सुख  तभी मिलता है, जब कोई उसकी कविता को सुने और हमारे नेताओं को सच्चा सुख तब मिलता है जब पार्टी उनके  उनके  बेटे को भी टिकट देती है। ऐसा ही कुछ सुख अखिलेश यादव को भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को मुअत्तल करने से मिलता है और हुड्डा को उनका स्थानांतरण करने पर। विपक्ष चाहे तो यह परम सुख कांग्रेस को भी मिल सकता है बशर्ते  वे आये दिन कोयले पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकनी छोड़ दें।


       खैर, हम तो रहीमदास की चर्चा कर रहे थे और तब से लेकर आज तक बहुत से लोग इस मुगालते में हैं कि यह बात रहीम ने उनके लिए कही थी। मेरे एक मित्र दफ्तर में पूरे दिन में कोई एक या दो फ़ाइल निपटाते थे। एक बार मैंने उनसे जब इस बात की चर्चा की तो वे मुस्कराते हुए बोले,"  भैय्या, हम तो  बस थोड़े से ही संतुष्ट हो जाते हैं। "  हमारे नेता  भी  लोगों को सलाह देते रहते हैं कि वे संतुष्ट रहें यानी परोक्ष रूप से वे यही कहते हैं कि तुम लोग सोये रहो और हमारे वादों  में खोये रहो।


       दशकों पहले उस शहर में जहाँ मैंने शिक्षा ग्रहण की, मेरे एक मित्र की चाय की छोटी सी दुकान थी किन्तु वह अपने को पूंजीवादी मानता था। उसे खतरा था कि अगर साम्यवादी सत्ता में आ गए तो उसके उन एक दर्जन कप - प्लेटों को छीन लेंगे जो उसने बहुत परिश्रम से जोड़े थे क्योंकि साम्यवादी  निजी सम्पति के खिलाफ हैं। मुझे लगता है  जो लोग गलतफहमियों में जीते हैं, वे सुखी रहते हैं।  बीजेपी इधर  मोदी को लेकर, मुलायम खुद को लेकर  और आसाराम अपने अनुयायियों को लेकर ऐसी ही किसी  गलतफहमी के शिकार दिखते  हैं। अगर ये सभी एक अदद गलतफहमी से खुश हैं तो हर्ज क्या  है ?  दरअसल , गलतफहमी में जीने का भी अपना ही  मजा है !

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- सुभाष लखेड़ा,
सी - 180 , सिद्धार्थ कुंज, सेक्टर - 7, प्लाट नंबर - 17, नई दिल्ली - 110075 .

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