शनिवार, 26 जुलाई 2014

एस. के. पाण्डेय की 3 लघुकथाएँ – मेहनत, तीन बातें तथा पुरानी सोच

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मेहनत

हेमा ने कहा सर हमने अलजेब्रा की चार-पाँच किताबें खरीद लिया है। फिर भी अलजेब्रा बिल्कुल समझ में नहीं आती। मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा यूनिवर्सिटी रोड पर जो पुस्तक सदन है उसके पास चार-पाँच नहीं अलजेब्रा की पचासों किताबें हैं। फिर भी उसको अलजेब्रा नहीं आती। यदि किताब रखने से ही अलजेब्रा समझ में आ जाती तो वह दुकान बंद करके कहीं अलजेब्रा पढ़ा रहा होता। जरूरत है मेहनत करने की। यदि पढ़ न सको तो किताबें इकट्ठा करने से क्या फायदा ? बिना मेहनत के जिंदगी में कुछ भी हासिल नहीं होता। यह सुनकर हेमा कुछ गंभीर हो गई। शायद वह और मेहनत करने को सोच रही थी।

 

 

तीन बातें

राजीव ने मुझसे कहा सर मैंने इस विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया है और आज मेरा पहला दिन है। मुझे क्या करना चाहिए जिससे मैं जीवन में सफलता प्राप्त कर सकूँ। मैंने कहा आपको तीनों बातें याद रखनी चाहिए और इन पर अमल करना चाहिए। उसने कहा कृपया बताएँ वो तीन बातें क्या हैं ?

मैंने कहा पहली बात तो यह है कि आपको कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे आपके माता-पिता को कष्ट हो। कुछ भी करना हो तो सोच लिया करो कि हमारे माता-पिता इसके बारे में जानेंगे तो उन्हें बुरा तो नहीं लगेगा। उन्हें दुःख तो नहीं होगा। इससे तुम कभी गलत रास्ते पर नहीं जाओगे। और जिस उद्देश्य के लिए तुम्हें भेजा गया है और तुम आए हो उसे हासिल करने में तुम्हें सहायता मिलेगी।

दूसरी बात यह है कि अपने अध्यापकों का सम्मान करना और वे जो बताएँ, पढाएँ उसे ध्यान से सुनना और दिए गए काम को रोज का रोज पूरा कर लेने की कोशिस करना।

तीसरी और अंतिम बात यह है कि कभी यह मत भूलना कि सफलता सही व अनवरत कठिन परिश्रम से ही मिलती है।

राजीव ने कहा कि ये तीन बातें मैं कभी नहीं भूलूँगा। और सही दिशा में लगातार कठिन परिश्रम करूँगा। ऐसा कहकर वह प्रणाम करके चला गया

 

पुरानी सोच

रसायन विज्ञान के आचार्य ने कहा कि मुझे आज पता चला कि आप बहुत पुरानी सोच के हैं। मैंने कहा सोच अच्छी होनी चाहिए। अपने और दूसरों के लिए भी। फिर चाहे अच्छी हो या पुरानी क्या फर्क पड़ता है ?

वे बोले कि मैंने सुना है कि आप श्यामपट्ट पर हमेशा दाहिनी ओर से लिखना शुरू करते है। इससे तो यही साबित होता है कि आप पुरानी सोच के हैं। क्योंकि पुराने लोग भी दाहिने हाथ अथवा दाहिनी ओर से काम करना शुभ मानते थे। हम लोग तो कुछ भी नहीं मानते कहीं से भी लिखना शुरू कर देते हैं।

मैंने कहा कि यह पुरानी नहीं वैज्ञानिक सोच है। आप ने ज्यादा गणित तो नहीं पढ़ा है फिर भी स्कूल में तो पढ़ा ही होगा। वे बोले पढ़ा तो है। मैंने कहा कि यह भी सुना होगा कि गणित सभी विज्ञानों की माता है। वे बोले यह भी सुना है। मैंने कहा कि जो माता सिखाए उसे तो हर किसी को मानना चाहिए। वे बोले क्या मतलब ?

मैंने कहा स्कूल में जोड़ना आपको दाहिनी ओर से सिखाया गया था कि बायीं ओर से। वे बोले दाहिनी ओर से। मैंने कहा घटाना भी दाहिनी ओर से ही सिखाया गया होगा। वे बोले अब बस करिये हमारी समझ में आ गया गुणा भी दाहिने से ही करते हैं। मैंने कहा गणित में अधिकांश चीजे दाहिनी ओर से ही होती हैं तो दाहिनी ओर से लिखना पुरानी सोच है अथवा वैज्ञानिक। इतना सुनकर वे जाने लगे। जाते-जाते बोले आपने सही कहा सोच सही होनी चाहिए चाहे पुरानी ही क्यों न हो।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/ URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
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