बुधवार, 23 जुलाई 2014

हैंस एण्डरसन की बाल कहानी - मेंढक का किस्सा

मेंढक का किस्सा

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बहुत पुरानी बात है। इतनी पुरानी कि नानी की कहानी से भी ज्यादा पुरानी। मेंढक धरती पर अभी नया-नया ही आया था। अक्ल के नाम पर एक दम फिसड्डी। चलना-फिरना तक तो आता नहीं था उसे। एक ही जगह पड़ा रहता। अपने ऊपर भिनभिनाती मक्खियों तक को नहीं उड़ा पाता था। बड़ी मुश्किल में था मेंढक।
एक दिन ऐसे ही वह एक बड़े पेड़ की छाया के नीचे पड़ा था। अचानक एक गाय उधर से गुजरी। गाय चारे की तलाश में जंगल जा रही थी। मेंढक ने टर्रा-टर्राकर गाय को आवाज दी। गाय रूक गई। अपने चारों पैरों से चलकर मेंढक के पास आई। बोली-''क्या बात है भाई?''

मेंढक बोला-
''टर-टर, टर-टर बोलता,
मेंढक मेरा नाम।
आप कौन हैं बतलाएँ
मेरा लें प्रणाम।

गाय ने कहा-
''गाय मेरा नाम है, मैं जंगल को जाती हूँ।
चार पैर से चलती हूँ, लम्बी पूँछ हिलाती हूँ।।
जंगल में जा चारा चुगती, लौट शाम घर आती हूँ।
बछिया-बछड़ा दो बच्चे हैं, उनको दूध पिलाती हूँ।''

गाय जंगल को चली गई। मेंढक उसे जाते हुए देखता रहा। गाय को देखकर उसे अपने दिमाग में अक्ल आती-सी लगी। वह सोचने लगा-अगर मैं भी गाय की तरह चल सकूँ तो कितना अच्छा हो? अब उसका दिमाग बड़ी तेजी से दौड़ने लगा।

उसने सोचा-अगर गाय मुझे चलना सिखा दे तो मजा आ जाएगा। और भला मैं गाय की तरह चल क्यों नहीं सकता? मेरे भी तो चार पैर हैं। बस, गाय की तरह पूँछ ही तो नहीं है।-कल गाय से चलना सिखाने के लिए कहूँगा, उसने मन-ही-मन तय किया। उसे हैरानी हुई कि उसे अभी तक यह अक्ल क्यों नहीं आई थी।
अगले दिन मेंढक को गाय जंगल में जाती दिखी। वह पेड़ के नीचे से टर्राया-

' 'गाय माता रुक जाओ मेरी भी कुछ सुन जाओ।

गाय मेंढक के पास आ गई बोली-
' 'टर्राते हो दिन और रात
मुझे बताओ क्या है बात?''

मेंढक बोला-
' 'बड़ा दुखी हूँ गऊ माता पड़ा-पड़ा यहाँ टर्राता।
चलना मुझको नहीं आता इसी बात से पछताता।।
चलना मुझे सिखा दो माँ मुझ पर दया दिखा दो माँ।
चलना मुझको आ जाए, मन में रौनक छा जाए।। ''

गाय के मन में दया आ गई। वह मेंढक को चलना सिखाने के लिए मान गई। गाय ने कहा- ' 'देखो, चलने के लिए जरूरी होता है -अपने पैरों पर खड़ा होना। तुम अभी से इसका अभ्यास शुरू कर दो। कुछ दिन में चलना आ जाएगा। '' मेंढक को समझाकर गाय चली गई।

अब मेंढक ने गाय के कहे अनुसार प्रयत्न शुरू किया।
मेंढक पहली बार अपने पैरों पर खड़ा हुआ-फद्द से गिर पड़ा। उसके पैर उसके शरीर का बोझ उठा ही नहीं पाए।
वह बार-बार खड़ा होने का प्रयत्न करता। बार-बार गिर जाता। इस अभ्यास से वह बड़ा परेशान हुआ। खड़े होने और गिरने में शरीर में चोट भी लग जाती। लगभग बीस-पच्चीस दिन में वह अपने चार पैरों से घिसट-घिसटकर  चलना सीख गया।

एक दिन गाय ने उसकी हिम्मत बँधाई- ' 'दो-तीन महीने में अच्छी तरह चलने लगोगे। फिर मैं तुम्हें दौड़ना भी सिखा दूँगी। ''

मेंढक घिसट-घिसटकर चलने का अभ्यास करता रहा।
एक दिन उसने पंछियों को उड़ते देखा। नीले आसमान में पंछी अपने पंख फैलाए उड़ रहे थे।

उड़ना भी, और वह भी आसमान में? वाह, क्या मजेदार होगा, उसने सोचा। चलने के अभ्यास से वह ऊब गया था। घिसट-घिसटकर चलने से क्या फायदा? वह सोचने लगा- खुले नीले आसमान में अगर उड़ना आ जाए तो बड़ा मजा हो। दिन भर आसमान की सैर करो। शाम को किसी पेड पर सो रहो। एक दिन उसे पेड पर गौरैया दिखाई दी। वह घिसटता हुआ उसके पास जा पहुँचा। गौरैया से बोला-

गौरैया बहन-
' उड़ना मुझे सिखा दो तुम
इतनी दया दिखा दो तुम। ''

गौरैया ने कहा-
' उड़ना तुझे सिखाऊँगी तेरा कष्ट मिटाऊँगी।
गौरैया आगे बोली-
' 'हालांकि,
पंख नहीं तुम्हारे पास फिर भी मुझको पूरी आस।
मन से करे साधना जो पूरी सभी कामना हो।।
पंख भी उग जाएँगे अम्बर में छा जाएँगे। ''

मेंढक बोला- ' 'गौरैया बहन, फिर तो आज से ही सिखाना शुरू कर दो। ''

गौरैया ने उड़ने का पहला पाठ बताया- ' 'उड़ने के लिए सबसे जरूरी होता है-लम्बी छलाँग भरकर शरीर को हवा में उठाना। पहले तुम पिछले पैरों पर जोर उछाल भरने का अभ्यास करो।
 

मेंढक उछलने की कोशिश करने लगा। लेकिन जब भी वह उछाल
भरता, मुँह के बल जमीन पर आ गिरता। शरीर में बड़ी चोट लगती।
गौरैया उसे हिम्मत बँधाती-

' हिम्मत से जो लेते काम पूरे होते उनके काम।
जो हिम्मत को खोते हैं, मूँड पकड़कर रोते हैं।। ''

मेंढक हिम्मत करके लगा रहा-चोट लगने पर वह खुद ही अपने को
दिलासा देता-
' 'धरती पर मैं क्यों रहूं?
जब उड़ने को आकाश है।
एक दिन जरूर उडूँगा मैं
मुझको यह विश्वास है।। ''

गौरैया आती। उसे अभ्यास करते देखती। खुश होकर अपने पंख
फड़फड़ाती। उड़ने के एक-दो नए गुर बताती। इस तरह मेंढक का उड़ने का
अभ्यास जारी रहा।

एक महीने के अन्दर ही वह लम्बी-लम्बी छलाँगें लगाने लगा।
इतने लम्बे अभ्यास से वह ऊब गया। अब वह सोचने लगा-भला यह
भी कोई अभ्यास है, बस छलाँगें लगाते रहो। बेकार की बात। गौरैया ने कहा
था-पंख आ जाएँगे! अभी तक पंख भी नहीं आए।

एक दिन वह छलाँग भरता एक तालाब के किनारे जा पहुँचा। तालाब
में उसने मछली को तैरते हुए देखा। मेंढक बड़े ध्यान से मछली का तैरना
देखता रहा।
उसने सोचा-उड़ने के बजाए तैरना अधिक आसान है। बजाए उड़ने के
तैरना ही क्यों न सीखा जाए। जब मन आए धरती पर घूमो, जब मन आए
तालाब में तैरने लगो। है न कितना मजेदार।

उसने गौरैया से अपना पिण्ड छुड़ाया और जा पहुँचा मछली के पास। बोला-
' 'नमस्कार मछली रानी

कैसा लगता है पानी।
ठण्डा है या शत गरम
मेरे मन में हुआ भरम।। ''

मछली बोली-
' 'ठण्डा है न तीता है,
पानी में क्षत सुभीता है।
पानी क्या है, जीवन है,
मेरे लिए संजीवन है।। ''

मेंढक बोला-
' 'मछली रानी मछली रानी
गुम तो दिखती क्षत सयानी।
गुरू मेरी तुम बन जाओ
मुझे तैरना सिखलाओ।।
धरती पर हूँ बहुत दुखी
जल में रहकर बनूं सुखी। ''

मछली बोली-
' 'तैरना आसान नहीं,
हुमको इतना ज्ञान नहीं! ''

मेंढक मछली की खुशामद करते हुए बोला-
' मुझे तैरना सिखलाया तो
जीवन भर सम्मान करूँगा।
सारी दुनिया में गा-गाकर
आपका मैं यशगान करूँगा। ''

मछली का दिल पसीज गया। वह सिखाने को तैयार हो गई। लेकिन 0 भी मेंढक को समझाते हुए बोली- ' 'सिखाने की बात है तो जरूर सिखाऊंगी, हाँ सीखने की लगन होना जरूरी है। साथ ही बड़े धीरज और की भी जरूरत पड़ती है। अगर लगन, धीरज और मेहनत ये तीन गुण किसी के भी पास हों तो वह कुछ भी सीख सकता है। दुनिया में ऐसा कोई काम नहीं जो सीखा न जा सके। ''

मेंढक बोला- ' 'मैं अब अपने मुँह से अपनी तारीफ क्या करूँ। आप खुद देख लेना, ये तीन गुण मेरे भीतर कूट-कूटकर भरे हुए हैं। ''

मछली खुश होते हुए बोली- ' 'अगर ऐसा है तो फिर दुनिया की कोई ताकत तुम्हें अच्छा तैराक होने से नहीं रोक सकती। ''

मछली की बात से मेंढक बहुत खुश हुआ।

मछली ने तैरने का पहला गुर सिखाया- ' 'तालाब के किनारे कम पानी है। एक लम्बी साँस लेकर डुबकी लगाओ। शरीर ढीला छोड़ देना। फिर शरीर ढीला करना। धीरे-धीरे हाथ-पैर चलाने का प्रयास करना। ''

मेंढक ने पहली डुबकी लगाई। नाक और मुँह में पानी घुस गया। वह तेजी से बाहर निकला और जोर-जोर से खाँसने लगा। मछली ने हिम्मत बँधाई-

' 'शुरू-शुरू में होती है परेशानी
अच्छे-अच्छे की मर जाती है नानी।
पर, जो हिम्मत से लेता काम
कभी न होता वो नाकाम।।

मेंढक ने कहा- ' 'मैंने अभी हिम्मत कहाँ हारी है, मछली रानी। मैं तो जरा नाक-मुँह में पानी घुस जाने की वजह से बाहर आया था। '' यह कहकर वह फिर तालाब में कूद गया।

अभ्यास चलता रहा। धीरे-धीरे कुछ वक्त के लिए वह पानी के भीतर रुकने में सफल हो गया। शुरू-शुरू में वह तैरने की कोशिश में हाथ-पैर चलाता तो डब्ब-से पानी के ऊपर आ जाता। कुछ दिन के प्रयास के बाद उसका शरीर पानी में सधने लगा।

अब वह आठ-दस फुट दूर तक तैर भी लेता। मछली उसकी प्रगति से बड़ी खुश हुई। मछली बोली- ' 'अब मैं तुम्हें पानी में दाएँ-बाएँ मुड़ना सिखाऊँगी। तुम्हें एक अच्छा तैराक बनाऊँगी। ''

लेकिन मछली क्या जानती थी मेंढक के मन की बात। इतने दिन की कसरत से वह ऊब चुका था। मछली की बात पर एकदम चिहुँक उठा-'नहीं बनना है मुझे तैराक-वैराक।'' '

मछली को बड़ा अचरज हुआ। बोली-''क्यों, आखिर परेशानी क्या हुई तुम्हें?''

''मुश्किल है तैराकी सीखना। मेरी तो जान ही निकल गई।'' मेंढक तालाब से फुदककर किनारे की जमीन पर आ गया।
और बोला-''इससे तो बेहतर है कि मैं उड़ना ही सीखूँ। या फिर चलना सीखना भी आसान होगा।''

और मेंढक ने तैरना सीखना भी छोड़ दिया।

यह बात बहुत पुरानी है। नानी की कहानियों से भी पुरानी। तब सृष्टि बनी ही बनी थी। किसी भी काम में पूरी तरह मन न लगाने से मेंढक कुछ भी नहीं सीख पाया। न चलना, न उड़ना और न ही तैरना।

आज भी वह वैसा ही है-फुदकू!

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साभार - विश्व की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ

सम्पादक – अनुपम अग्रवाल

प्रकाशक – कल्पतरू प्रकाशन, रेवती कुंज हापुड़ – 245101

1 blogger-facebook:

  1. बहुत मजेदार जानकारी देती बाल कहानी

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