शनिवार, 19 जुलाई 2014

धर्मेन्द्र निर्मल का व्यंग्य - बी पी एल कार्डधारी

बी.पी.एल कार्डधारी
पकी जानकारी के लिए बता दॅू कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। मुट्‌ठी भर लोग ही ऐसे हैं जो शासन प्रशासन और भाषण से संबंध रखते हैं बाकी सब भुक्‍खड़ किसान हैं जो राशन से जुड़े होते हैं और बी. पी. एल. कार्डधारी है। अरे ! आप चौंक गए। क्‍या बी.पी.एल. का मतलब नहीं जानते? वैसे तो बीपीएल के कई मायने है लेकिन मैं जो महत्‍वपूर्ण है उन्‍हीं मायनों को बताए देता हॅू। बी.पी.एल. का पहला मतलब है - भूखे पियासे और लफंगे। ऐसे लोग जो कहीं भी कभी भी खरपतवार की तरह उग आते हैं और कैसे भी करके कार्ड बनवाकर चूहे की भांति देश का अनाज चट करने में लगे रहते हैं। बीपीएल का दूसरा विस्‍तारित रूप बेबस परेशान और लचर है। ऐसे लोगों से ही इस कार्ड और सूची का नाम रोशन है जिससे देश गौरवान्‍वित है। वास्‍तव में यही लोग इस सूची का नाम और अपने जीवन की सच्‍चाई को चरितार्थ करते है। ए देश के किसी भी कोने में रहे भिखमंगों सा बेबस परेशान और लचर जिंदगी ही जीते हैं। इन्‍हें जरूरतों के हिसाब से कहीं भी व्‍यवस्‍थित किया जा सकता है।

तीसरा विस्‍तारित रूप इस सूची के उच्‍चतम पायदान पर स्‍थित , निकटतम शुद्ध पर्यायवाची मान रखने वाला है और वह है बारिश पर लटकने वाले। जैसा कि मैंने पूर्व में बताया है कि मुटठी भर लोगों को छोड़ पूरा भारत किसान है। यहां के लोग निम्‍न वर्ग के होने के कारण बारिश पर आधारित कृषि करते हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन पर देश की अर्थव्‍यवस्‍था टिकी है और ये सारे लोग बरसा पर लटकते रहते हैं। जिस बरस बारिश कम होती है ये सूखे से लटक जाते हैं , जिस बरस अधिक बारिश होती है बाढ़ से लटक जाते हैं और जिस बरस बारिश अच्‍छी हुई उस समय और अन्‍यान्‍य बहुतेरे समयों में कारण-अकारण शासन प्रशासन के हाथों मजे से चिकन कबाब की तरह लटकते पाए जाते हैं। यानि लटकना ही जिनकी नियति होती है। ऐसे लोगों को लटकाने के लिए देश की राजनैतिक दीवारों में योजना नामक खूंटियां जगह जगह मिल जाती हैं। 

चॅूकि मैं किसी पार्टी से जुड़ा हुआ नेतानुमा किसान नहीं हॅू लेकिन थोड़ा मोटा किसान होने के नाते कई किसानों तक मेरी उथली गहरी जो भी समझो पैठ है इसलिए मुझे किसानों से जुड़ी एक खूंटी का अध्‍यक्ष बनाकर लटका दिया गया है ताकि मेरे सहारे बाकी बचे खुचे किसानों को मजबूती और मजबूरी से लटकाया जा सके। अब राजनीति तो गॅूंगे का गुड़ है भाई जो खाए भरपूर रस पाए भले मुंह से कुछ न बोल पाए। हमें भी राजमहल का चस्‍का लग गया सो हम दिन रात राजमहल में सेंध लगाकर घुसने का तरीका देखने ताकने और जुगत पानी में जी जान लगाकर भीड़ गए। ऊपर वाले ने मेरे मन की बात सुन ली। इन्‍द्र के आदेशानुसार सूर्यदेव बादलों को चीर फाड़कर तहस नहस कर दिया। धरती में त्राहि त्राहि मच गयी। जगह जगह दरारें पड़ने लगी। धरतीपुत्र होने के कारण गॅवार किसान भी बात बात पर अचरज से इसी तरह मुंह फाड़ लेते हैं।

 मुझे सड़क किनारे एक पण्‍डाल मिल गया। मैं किसानों के हित में अपना हित साधने पण्‍डाल की छांव में धरना देकर बैठ गया। इन्‍द्र का सिंहासन डोल गया। उसने मुझे बुलावा भेजा। जब मैं अपनी धोती संभालते इन्‍द्रलोक पहुंचा ! इन्‍द्र मंत्रालय के चालीस एसी लगे अपने विभागीय कमरे में अपने प्‍यारे पप्‍पी के साथ पापकार्न चबाते हुए बैठे थे। मेरे मुंह सुरसा की तरह फैल गए। मेरी तंद्रा तब टूटी जब पप्‍पी कॅू कॅू करते हुए मेरे पास आकर दुम हिलाने लगा। इन्‍द्र की ओर से वही मेरे स्‍वागत में उठकर आया था। मेरे फटे मुंह को देखकर वे समझ गए कि शायद मैं उनसे पूछ रहा होऊँ - साहब ! पप्‍पी भी। उसने कहा - ऐसे ही ! सोचा, अकेले बैठे बैठे बोर हो जाउॅगा किसी को साथ ले लूं। तुम तो जानते ही हो। आजकल मानुष नाम का प्राणी कितना छुरी धारक रामनामी हो गया है। कब कहां तुम्‍हारी तरह मुंह खोल दे , पता नहीं। मेरा मुंह तुरत बंध गया। वे पप्‍पी को सहलाते हुए बोले - सो मैंने इसे ही साथ रख लिया। ये इतना समझदार है कि जहां दुम हिलाने बोलो वहीं दुम हिलाता है, जहां भोंकने बोलो वही भोंकता है और काटने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। हर्रा लगे न फिटकरी रंग लगे चोखा।

वे आगे बोले - खैर इनका भोंकना काटना छोड़ो। कहो तुम वहां कैसे भौंक रहे थे ? जो बात है यहां बको। मैं गिड़गिड़ाया - माइर्बाप ! धरती फटी जा रही है। खेतों से फसल की जगह बड़े बड़े मकान उग रहे हैं। घर घर दलाल पैदा हो रहे हैं। किसान के बेटे खेत बेच बेचकर दारू पी रहे हैं और आपस में लड़ खप रहे हैं। बारिश का कहीं नामोनिशां नहीं है। वे मुझे एकटक देख कुछ देर मुसकुराते रहे मानो कह रहे हो- वही तो कर रहा हूं। फिर वे पोप्‍पि देखते देखते उब कर अंगड़ाई लेकर चलायमान करते हुए जम्‍हाते हुए बोले - मैंने तो बारिश का प्रस्‍ताव आदेश सहित कब का भेज दिया है अब आसमान से गिरा और खजूर में अटका की भांति बारिश फाइर्लों में अटकी हो उसमें मेरा क्‍या दोष ? मैंने कहा हुजूर आश्‍वासनों से काम नहीं चलेगा , तत्‍काल कार्यवाही चाहिए।

मेरी बात सुनकर वे कुछ देर चुप रहे मानो बढ़ती मंहगाई की तरह बढ़ते अपने गुस्‍से को काबू में करने की कोशिश कर रहा हो। मैं चौक गया। अचानक पप्‍पी के पापा कहां से आ धमका। देखा इन्‍द्र महाशय कुपित हो गए है। वही गुर्रा रहे है - देखो दाउ जी, हम तुमको ऊपर उठाने के लिए तुम्‍हें अध्‍यक्ष क्‍या बनाए तुम तो हमरे सिर पर ही मूतने लगे। किसान हो किसान रहो, राजनीति मत करो। ये हमारा काम है हमें करने दो। मैंने कभी तुम्‍हारे खेतो में जाकर तुम्‍हारी खेती में दंखलअंदाजी की है क्‍या ? नहीं न ! मैंने हामी भरी - नहीं । नहीं तो बारिश होना न होना बाद की बात है। मैं तुम्‍हारे खेत में इतने केकडे़ छोड़वाउॅगा कि चारों तरफ बिल ही बिल नजर आएंगे। केकड़ा समझ रहे हो न। मैं वास्‍तव में केकड़ा को केकड़ा नाम का प्राणी समझ हामी में सिर हिलाने ही वाला था कि वे बोल पड़े - छापा।

 छापा का नाम सुनकर मैं अपना आपा खो बैठा। ठण्‍डे पानी का छींटा देकर मुझे होश में लाया गया। मुझे होश में आया देख इन्‍द्र धीरे से पुचकारते हुए बोले - जाओ , अपना धरना प्रदर्शन खत्‍म करने की घोषणा करो। मैं बच्‍चों की तरह धीरे से उठा और हांफते हुए पण्‍डाल की ओर दौड़ा। मेरे पण्‍डाल पहुंचते तक मेरे साथीगण पण्‍डाल साफ कर चुके थे
 
Dharmendra Nirmal
Kurud Bhilainagar
संपर्क - lakshyadeep1225@gmail.com





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