मंगलवार, 8 जुलाई 2014

पुस्तक समीक्षा - आँगन की धूप

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पुस्‍तक ः ‘आँगन की धूप'

कवि ः आचार्य बलवन्‍त

प्रकाशक ः सूर्य प्रकाशन मन्‍दिर, बीकानेर

नेहरू मार्ग, दाउजी रोड, बीकानेर

मूल्‍य ः 150 रूपए

मशहूर जर्मन कवि रिल्‍के ने कहा था, ‘मेरी कविता मेरी आत्‍मा की खुशहाली से उपजती है․' कवि आचार्य बलवन्‍त लिखित कविताओं के संग्रह ‘आँगन की धूप' से गुजरते हुए पाठक वैसा ही महसूस करेंगे जैसा जर्मन कवि रिल्‍के ने कहा था․ यद्यपि हम जानते है कि कवि अपने समय और समाज को ही अपनी कविताओं में चित्रित करता है․ समाज की विसंगतियों से मुठभेड करते हुए कवि आचार्य बलवन्‍त ने सामाजिकता और समाज में व्‍याप्‍त विद्रूपताओं के चित्रों को अपनी कविताओं में उकेरा है․ यह सच है कि कवि समय विशेष की जद में ही लिखता है लेकिन अच्‍छा कवि वो है जो अपने समय को लांघता भी है और भविष्‍य के लिए सोचता है․ आचार्य बलवन्‍त निसंदेह सुखद भविष्‍य की कामना में लिखते है-विसंगतियाँ बदलाव के लिए जवर्दस्‍त माँग है

हवा-पानी की तरह उन्‍हें पलने दो

अंधेरा अवश्‍य मिटेगा, एक दिया तो जलने दो

आचार्य बलवन्‍त की कविताएँ मानवीय संवेदनाओं से संपृक्‍त होने के कारण अपने समय से आगे जाएगी․ दुख-दर्द भरी, करूणा और मार्मिक ‘आँगन की धूप' की कविताएँ खुशहाली रचती है․ कवि के शब्‍द अर्थ बैविघ्‍यता के कई सोपान गुजरे हुए जीवन एवं आने वाले जीवन की खुशहाली की कामना करते हुए लगते है․ जब कवि कहता है-

‘जीवन के इस दुर्गम पथ पर सोच समझ कर कदम बढ़ाना

विश्‍वासों के दीप जलाकर, अंधकार को दूर भगाना '

प्रस्‍तुत संकलन में कविताएँ, ‘कविता का धर्म', कविता के आयाम', आदमी को, आदमी का प्‍यार दो, मुक्‍तक, क्षणिकाएँ कुल मिलाकर बावन शीर्षकों में विभक्‍त है जो कभी अपनी स्‍थूलता से तो कभी अपनी प्रतीकात्‍मकता से जीवन का स्‍पर्श करते रहते हैं․ कविता का धर्म बताते हुए कवि कहता है-‘कविता अपने आप में एक बड़ी तहजीब है

जो चलना सिखाती है․

इस अमानवीय समय में मनुष्‍यता और रिश्‍तों को बचाना हर कवि का धर्म है․ अपने कवि धर्म का निर्वाह करते हुए आचार्य बलवन्‍त कहते है-‘गीत को, गजल को गीत का श्रृंगार दो

आदमी हो, आदमी को, आदमी का प्‍यार दो'

कुल बावन छोटी-बड़ी कविताओं के साथ हिन्‍दी जगत में आचार्य बलवन्‍त का यह प्रथम काव्‍य संग्रह है․ इन कविताओं का अपना संसार है, अपना संस्‍कार है, अपनी धरती और भावना है․ आचार्य बलवन्‍त लोकधर्मी कवि है․ ‘आँगन की धूप' की कविताएँ सादगी और सहजता से अपना वैभव दिखाने में कामयाब रही है, वहीं कवि आचार्य बलवन्‍त ने इस प्रतिकूल समय में कला रूप को सहजता से एक बड़ा प्रतिरोध रचा है․ सुप्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज जी ने कवि आचार्य बलवन्‍त को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देते हुए पुस्‍तक के प्रस्‍तावना में कहते है कि ‘कवि छान्‍दसिक और अछान्‍दसिक दोनों ही प्रकार की कविताएँ लिखने में सिद्धहस्‍त है․ कवि नीरज ने क्षणिकाएँ के संबंध में कहा है कि आचार्य बलवन्‍त की क्षणिकाएं तो सूक्‍तियाँ जैसी है․ दो-तीन बहुत अच्‍छी है जो सोचने के लिए विवश करती है और होंठ पर स्‍वतः बैठ जाती है, जैसे-

‘मैं प्‍यार की परिधि पर ही परिक्रमा करता रहा

उसे पाने के लिए जो केन्‍द्र में थी '

आचार्य बलवन्‍त समकालीन हिन्‍दी काव्‍य संसार में उन थोड़े कवियों में है जो अपने कविता के विस्‍तृत फलक में मनुष्‍य के साथ-साथ बच्‍चों और चिडि़यों को भी समेटने का प्रयास करते है․ इतना ही नहीं कवि जीवन के अनन्‍त चिर परिचित दृश्‍यों में से कविता की संभावना पैदा करने में एक विशेष दक्षता रखते है․ आने वाले दिनों में कवि आचार्य बलवन्‍त हिन्‍दी साहित्‍य के संवर्धन में अपना जीवन समर्पित करते हुए अपनी काव्‍य सरिता के प्रवाह को निरंतरता प्रदान करेंगे․

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह-815301

झारखंड

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