शनिवार, 19 जुलाई 2014

पुस्तक समीक्षा - बरगद का पेड़

पुस्तक-समीक्षा

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        पुस्तक : बरगद का पेड़
         कवि : त्रिपुरारि शरण श्रीवास्तव
       प्रकाशकः किशोर विद्या निकेतन, बी-2/236ए, भदैनी, वाराणसी
         मूल्य : 120/-
वरिष्ठ कवि एवं लेखक त्रिपुरारि शरण श्रीवास्तव किसी तआरूफ के मोहताज नहीं है। समकालीन हिन्दी कविता के वरिष्ठ कवि श्री श्रीवास्तव का काव्य संसार विविधवर्णी और बहुआयामी है। वे हिन्दी के ऐसे कवि है जिन्होंने पिछले पाँच दशकों से निरंतर रचनारत रहकर अपने आत्मीय देसी मुहावरे में कविता को संम्भव किया है। छोटी कविताओं से लेकर अनेक लम्बी और प्रयोगमूल कविताओं तक फैला हुआ उनका काव्य-फलक अत्यंत व्यापक है। कवि श्रीवास्तव की कविताओं में नए जीवन, सपनों का उल्लास,  उत्साह और आमंत्रण है। यत्किंचित आक्रोश, आक्रामकता और भावातिरेक भी, तब भी कवि द्वारा अनुभव किया और रचा गया जीवन हमें आकृष्ट और विमुग्ध करता है। इससे भी कहीं अधिक यह हमें एक ऐसे काव्यलोक में ले जाता है जिसमें परम्परागत हिन्दी-भोजपूरी कविता के संयुक्त मुहावरे एक साथ खड़े दिखाई देते है। नई और आधुनिक कविता जो बहुत तेजी से पश्चिमोन्मुख शहरी मघ्यवर्ग और परदेशी बौद्धिकता के व्यामोह से ग्रस्त हो उठी थी, कवि श्रीवास्तव ने इसे नहीं स्वीकारा है। विपरीत इसके कवि त्रिापुरारि शरण श्रीवास्तव उसी स्वतंत्रा देशी राह पर चलते रहे जिसमें नवनिर्माणकारी सपनों की भरमार और अकूत आत्मबल का सौन्दर्य है। फलस्वरूप पाठकों को एक ऐसी पौरूषवान कविता मिली जिसमें एक गहरा जुझारूपन है। कवि कहते है- एक परिचय के लिए यात्राा हमारी
  आज तक होकर अधूरी रह गई है ।
  साँस की छोटी कहानी जिंदगी है
  मौत भी आधी अधूरी रह गई है ।
श्री श्रीवास्तव के कवि-कर्म के सरोकारों की गहरी छानबीन की जाए तो दो मुख्य प्रस्थान बिन्दु-'मृत्यु बोध' एवं 'दर्शन' चिन्हित होते है। इनकी कविताओं को गहराई से पढ़ने पर उनकी समूची काव्य-यात्रा इन दो प्रस्थान बिन्दुओं को लेकर गहरी छानबीन करती है।
ज्याँ पाल सार्त्र ने कहा था कि ''हर मनुष्य अपनी नियति खुद चुनता है। उसे क्या करना है, क्या बनना है, यह चुनने का हक खुद उसे होना चाहिए, दूसरों को नहीं ।'' इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो त्रिपुरारि शरण श्रीवास्तव के काव्य-पथ के प्रस्थान बिन्दु में 'मृत्युबोध' की तड़प बेहिसाब और बेशुमार है। एक बानगी देखिए-'किस अनोखी अदा से जनम ले गया
                               जो गया आ न पाया कभी लौटकर ।'
मृत्युबोध की तड़प की दूसरी बानगी देखिए-'हम तो जीने की कोशिश में तनहा हुए
                                   एक जलती चिता छोड़ सब चल पड़े ।
                                   जख्म मेरा न देखा किसी ने कभी
                                   राख मेरे ही घर छोड़ सब चल पड़े ।'
कवि श्रीवास्तव की कविताओं में वह करिश्मा है कि उससे गुजरते हुए पाठक अंदर तक भींग जाता है। कवि 'बरगद का पेड़' लिखकर एक साथ कई विचार-द्वार पाठकों के सामने खोल देते है और पाठकगण भौचक्का रह जाता है कि बरगद का पेड़ को रूपक बनाकर 'मृत्युबोध' भी कराया जा सकता है। कवि पुस्तक के प्रस्तावना में कहते हैं कि 'चिताएँ जलती है और बरगद का पेड़ देखता है। देखता है-रोता है-पूछता है-आप उसकी आवाज नहीं सुनते इसलिए नहीं समझते।' 'बरगद का पेड़' की कविताओं से गुजरते पाठकों को बरगद की आवाज भी सुनाई पडेगी और वे आवाज को कविताओं के माध्यम से समझ भी सकेंगे । सुधी पाठकों के लिए आवश्यक है बरगद का पेड़ की कविताओं से गुजरना

                                                       प्रस्तुति -राजीव आनंद

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