शनिवार, 26 जुलाई 2014

सविता मिश्रा की लघुकथाएँ

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1....नींव की ईंट

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श्याम बहुत ही होनहार छात्र था, सभी शिक्षक उसकी इतनी तारीफ करते, कि माँ बाप का सीना ख़ुशी से फूल जाता। धीरे धीरे समय बीतता रहा अब श्याम कक्षा नौ में आ गया था। माँ को उस पर बहुत भरोसा था अतः ध्यान ज्यादा नहीं देती राजेश से कहती "बच्चा है खेलने खाने की उम्र है ज्यादा जोर पढाई पर मत दिया करिए"।


पापा तो कक्षा आठ में ही उसके क्लास में टॉप से खुश हो एक मोबाईल उपहार में दे दिए। वह अपनी मेहनत जारी रक्खेगा इस विश्वास पर, वह भटक जायेगा, यह बात दिमाग़ में लाये ही नहीं। अब माँ पापा जब भी कमरे में आते उन्हें श्याम पढ़ते दीखता पर उन्हें क्या पता था कि श्याम तो धोखा दे रहा है। उनकी नजर बचा वह अब ह्वाट्सअप पर चैटिंग और गेम में ही लगा रहता है। उसकी मेहनत से सब आश्वस्त थे इस बार भी टॉप करेगा उनका बेटा।


पर इस बार सब उल्टा हुआ जब रिजल्ट लेने स्कूल पहुंचे शिक्षकों ने शिकायतों का पुलिंदा जैसे तैयार रखा था, एक एक कर सभी ने शिकायत कर डाली और हिदायत दी कि "आप श्याम पर अधिक ध्यान दे बढ़ता हुआ बच्चा है, हाथ से निकल गया तो बहुत मुसीबत होगी, आपके ही भले के लिये कह रहे है, बुरा ना मानियेगा"। हाथ में रिजल्ट जैसे ही आया राजेश के पैरो के नीचे से जैसे जमीं खिसक गयी, माँ को भी काटो तो जैसे खून ही नहीं, दोनों आवक रह गये श्याम सारे विषयों में फेल था।


राजेश को अपनी गलती का अहसास हुआ, उन्होंने शिक्षक से कहा "आप चिंता ना करे अगली बार मेरा यही बेटा, पहले जैसा करके दिखाएगा"। घर पहुँचते ही श्याम को राजेश ने बुलाया श्याम डर गया कि आज तो खैर नहीं पापा बहुत मारेगें, पर राजेश ने कुछ नहीं किया बस समझाया, "कि जिन्दगी राह इसी उम्र में मजबूत होती है,  इस कड़ी को कमजोर कर दोगे तो, भविष्य की राह बहुत कठिन हो जाएगी बेटा"। "यूं समझो की नींव की ईंट है यही समय",।


श्याम की समझ आ गया उसने खुद ही अपना मोबाइल पापा को देते हुए बोला , "पापा भटकाव की जड़ है यह, इसे आप रखिये और जब मैं, पढलिख आप की तरह गजटेड अफसर हो जाऊँगा तो आपसे, इससे भी अच्छा मोबाइल माँगूंगा"। यह कह श्याम अपने कमरे में जाकर अपनी पढ़ाई करने लगा। राजेश उसकी कामयाबी के प्रति आश्वस्त हो नीलू की तरफ देख मुस्करा दिया

 
२..

स्त्रीत्व मरता कब है

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नक्सली लड़कियां जंगलों में भटक भटक थकान से टूट चुकी थी, थोड़ा आराम चाहती थी, तभी संगीत की मधुर आवाज सुन ठिठक गयी। ना चाहते हुए भी वे मधुर आवाज की ओर खींचती चली गयी। गाने की मधुर आवाज की ओर बढ़ते बढ़ते, वह गाँव के बीचोंबीच आ पहुंची, एक सुरक्षित टीले पर चढ़ 'कुछ सुकोमल सुसज्जित लडकियों को देख' ग्लानी से भर उठी।


देश भक्ति गीत पर थिरकती युवतियाँ कितनी सुन्दर लग रही है, बालों में गजरा, सुन्दर साड़ी, चेहरे पर एक अलग ही लालिमा छायी है और हमें देखो बिना शीशा कंघी के कस कर बांधे हुए बाल, लड़कों से लिबास, कंधे पर भारी भरकम राइफल, दमन कारी अस्त्र शस्त्र लादे, जंगल जंगल भटक रहे है। सरगना बोली "हम भी तो इन्हीं की तरह थे सुकोमल अंगी, पर आज देखो कितने कठोर हो गये, समय ने हममें बहुत परिवर्तन कर दिया, एक भी त्रियोचरित्र गुण नहीं रह गया"। दूसरी ने भी हाँ में हाँ मिला कहा "जिसे देखो हमें रौंद आगे बढ़ जाता है, सारे सपने चकनाचूर हो गये, कहने को कोई अपना नहीं इन हथियारों के सिवा"। सबसे छोटी वाली ने कहा "हाँ ये हथियार भी हमारी अस्मिता की रक्षा कहा कर पाए, हा खूनी जरुर बना दिए"।


सभी नक्सली लड़कियां एक दूजे की आँख में देख कर, एक कडा फैसला लेने का निश्चय किया। कठिन निर्णय लेते ही, धीरे धीरे ऐसे स्थान पर आ गयी जहाँ से पोलिस की नजर उन पर पड़ सके। आज शायद १५ अगस्त था, अतः पूरी लाव लस्कर के साए के तले, गाँव वाले जश्न मना रहे थे।


किसी पोलिस वाले की निगाह उन नक्सली लड़कियों पर पड़ गयी जो मग्न थी जश्न देखने में। सभी गाँव वाले और पोलिस वाले मिलकर नक्सली लड़कियों को धर दबोचे। पोलिस अपने कामयाबी पर फूले नहीं समा रही थी और नक्सली लड़कियां मंद मंद मुस्करा त्रियोचरित्र के सपने बुन रही थी। उन चंद क्षणों में हजारों सपने देख डाले होंगे। सभी मुख्यधारा में शामिल होने का, मन ही मन जश्न मनाते हुए, सब एक दूजे की ओर देख ..जैसे कह रही थी "स्त्रीत्व मरता कब है, देखो आज इतने सालों बाद आखिर जाग ही गया"।

 

आज भटकाव के रास्ते से लौट जो आई थी, इसकी ख़ुशी भी उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी।

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Savita Mishra

Khandari,
AGRA 282002

4 blogger-facebook:

  1. कहानी एक सुधार वादी दृष्टिकोण है ! सराहनीय है !
    अच्छे दिन आयेंगे !
    कर्मफल |

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर और सशक्त लघुकथाओं के लिए आपको हार्दिक बधाई सविता जी

    उत्तर देंहटाएं

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