रविवार, 27 जुलाई 2014

प्रमोद भार्गव का आलेख - भारतीय न्यायपालिका में सड़न

संदर्भःपूर्व न्‍यायमूर्ति काटजू का बयान

न्‍यायपालिका में सिद्धांत से समझौता

प्रमोद भार्गव

विधायिका और कार्यपालिका में सिद्धांत और नैतिकता से समझौते रोजमर्रा के विषय हो गए हैं। यही वजह है कि संसद और विधानसभाओं में दागियों की भरमार है और भ्रष्‍टाचार ने सभी हदें तोड़ दी हैं। ऐसे में एक न्‍यायपालिका ही आमजन के लिए ऐसा भरोसा है, जहां उसे संविधान के इन दो स्‍तंभों की गलतियों से विधि-सम्‍मत निराकरण की अंतिम उम्‍मीद बंधी हुई होती है। लेकिन जब न्‍यायाधीश ही सिद्धांतों की नैतिक इबारत से समझौता करने लग जाएंगे तो व्‍यक्‍ति और समुदाय के मानवाधिकारों की रक्षा के तो सभी रास्‍ते ही बंद हो जाएंगे। इस परिप्रेक्ष्‍य में सर्वोच्‍च न्‍यायालय के पूर्व न्‍यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के अध्‍यक्ष मार्कंडेय काटजू ने तीन प्रधान न्‍यायाधीशों पर एक भ्रष्‍ट जज को मिले अनुचित लाभ की अनदेखी करने के आरोप लगाए हैं। यह बेहद गंभीर मामला है। इस मामले की उच्‍च स्‍तरीय जांच के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए। कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट के दो अन्य पूर्व न्यायाधीशों पर यौन-शोषण संबंधी आरोप भी लगे थे.

 

काटजू के बयान को इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, क्‍योंकि मद्रास उच्‍च न्‍यायालय में जिस कथित अतिरिक्‍त जज सेवारत थे, उसी दौरान काटजू इसी अदालत में मुख्‍य न्‍यायाधीश थे। इस जज पर जिलाधीश रहते हुए भ्रष्‍टाचार के अनेक आरोप चस्‍पा थे। मसलन काटजू स्‍ंवय उस अवैध प्रक्रिया के चश्‍मदीद थे, जिसके तहत भ्रष्‍ट जज का लगातार कार्यकाल बढ़ाया गया, पदोन्‍नत किया गया और आखिर में उसे स्‍थायी भी कर दिया गया। इस घटना की पटकथा 2004 से लिखना शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट के तीन न्‍यायाधीश बदले जाने तक लिखी जाती रही। जाहिर है, न्‍यायपालिका में पसरी अंधेरगर्दी का यह एक ऐसा खुलासा है, जो अंधा बांटे रेवड़ी चीन्‍ह-चीन्‍ह कर देय, कहावत को चरितार्थ करता है।

 

हालांकि काटजू भी इस घटना का एक पक्ष थे, लेकिन उनकी आंखों पर न्‍याय की प्रतीक मूर्ति की तरह पट्‌टी बंधी रही। न्‍याय की तराजू का पलड़ा अन्‍याय की तरफ झुकता रहा और अब जाकर 10 बाद उन्‍होंने इस अन्‍याय की परत से धूल झाड़ी है तो इसे क्‍या कहा जाए, देर आए दुरूस्‍त आए ? या जैसा कि कांग्रेस के प्रवक्‍ता कह रहे हैं कि काटजू का भारतीय प्रेस परिषद के अध्‍यक्ष बने रहने का कार्यकाल पूरा हो रहा है, लिहाजा इस कार्यकाल को बढ़ाने के लिए काटजू झूठा व बेबुनियाद कथन देकर नरेंद्र मोदी सरकार से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश में हैं ? यह सवाल उठना भी इसलिए लाजिमी है, क्‍योंकि बाद में काटजू सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश भी बन गए थे, लेकिन तब भी उनके ओंठ सिले रहे। हो सकता है, यदि वे मुंह खोलते तो उनके भी व्‍यक्‍तिगत हित प्रभावित हो जाते ? सिद्धांत और नैतिकता की यही वह महत्‍वपूर्ण कसौटी है, जिस पर ज्‍यदातर पदाधिकारी खरे नहीं उतरते। नतीजतन दागी अपनी पारी सफलतापूर्वक खेल जाते हैं

 

इस कथा कि अंतकर्था है कि जो भ्रष्‍ट जज थे, उनके कामकाज को संदेह के घेरे में लेते हुए, मद्रास हाइर्कोर्ट के कई न्‍यायाधीशों ने प्रतिकूल टिप्‍पणियां दर्ज की थीं। लेकिन इसी अदालत के कार्यवाहक मुख्‍य न्‍यायाधीश ने पक्षपात बरतते हुए अपनी कलम की ताकत दिखाई और एक झटके में सभी टिप्‍पाणियां खारीज कर दीं और भ्रष्‍ट जज हाइर्कोर्ट के अतिरिक्‍त जज बना दिए गए। राजनीतिक दबाव के चलते ऐसा इसलिए किया गया क्‍योंकि विवादित जज को तमिलनाडु के एक प्रभावित नेता का सर्मथन हासिल था। वह भी इसलिए क्‍योंकि इस जज ने कभी उन्‍हें जमानत दी थी। सब जानते हैं कि यह दल द्रमुक है और राजनीतिक सख्‍शियत एम करूणानिधि हैं।

हालांकि काटजू का कहना है कि वे जब हाइर्कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश बने तो उन्‍होंने तत्‍कालीन प्रधान न्‍यायाधीश रमेशचंद्र लाहोटी से इस मामले की जांच कराने का निवेदन किया। लाहोटी ने आइर्बी से जांच कराई भी। जांच में आरोप सही पाए गए। नतीजतन आरोपी जज को स्‍थायी जज नहीं बनाया गया। तब सप्रंग सरकार को सहयोग दे रहे तमिलनाडु के घटक दल ने सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर दबाव बनाया। यहां तक कि सरकार गिराने की धमकी तक दे डाली। कांग्रेस के बिचौलिए सामने आए। तब लाहोटी ने अपना निर्णय बदला और आरोपी जज को अतिरिक्‍त न्‍यायाधीश बना दिया। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीमकोर्ट के ही न्‍यायमूर्ति सभरवाल ने आरोपी जज की सेवानिवृत्‍ति की उम्र पूरी हो जाने के बावजूद सेवा का विस्‍तार कर दिया। और फिर केजी बालकृष्णन के कार्यकाल में उसे स्‍थायी जज बना दिया गया। यदि काटजू की सुनाई यह रहस्‍य कथा सही है, तो इस संदर्भ में यह सवाल उठना सहज है कि आखिर ऐसे क्‍या कारण थे कि एक साथ तीन प्रधान न्‍यायाधीशों ने एक भ्रष्‍ट जज के नाजायज हितों का सरंक्षण किया ? इस मामले के खुलासे से यह तो साफ है कि दाल में काला जरूर है। इसलिए इसकी सत्‍यता की जांच जरूरी है ? यदि मामला बेबुनियाद साबित होता है तो काटजू के खिलाफ भी अवमानना का मामला बनना चाहिए ? यदि यह मामला केवल मनमोहन सिंह से जुड़ा होता तो यह मानना सहज था कि वे द्रमुक के दबाव में आ गए होंगे ? क्‍योंकि दागियों को सरंक्षण तो वे अपने पूरे 10 साल के कार्यकाल में देते रहे हैं।

 

भ्रष्‍ट जज को इस तरह सरंक्षण देना इस बात का संकेत है कि न्‍यायिक नियुक्‍तियां और पदोन्‍नतियों में शुचिता व ईमानदारी खूंटी पर टांग दी गई है। वर्तमान नियुक्‍ति प्रक्रिया अप्रासांगिक हो चुकी है। इसमें आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। मौजूदा पद्धति में जजों की नियुक्‍ति में कार्यपालिका की प्रत्‍यक्ष भूमिका तो समाप्‍त कर दी गई, लेकिन अप्रत्‍यक्ष तौर से राजनीतिक दबाव की भूमिका प्रभावशील है। केंद्र की मोदी सरकार न्‍यायाधीशों की नियुक्‍ति के लिए एक आयोग बनाने पर विचार कर रही है। यह आयोग कालेजियन प्रणाली की जगह लेकर नियुक्‍ति की प्रक्रिया को बेहतर बनाने का काम करेगा, ऐसा सरकार का दावा है। इस प्रणाली में यह शर्त रखी जाना जरूरी है कि सेवानिवृत्‍ति के बाद पांच साल तक किसी भी न्‍यायाधीश को किसी आयोग या परिषद का अध्‍यक्ष नहीं बनाया जाए। क्‍योंकि यह एक ऐसी खिड़की है, जिसका प्रलोभन पद लोलुपता को उकसाए रखता है और न्‍यायाधीश केंद्र व राज्‍य सरकारों से समझौता करके नैतिक सिद्धांतों की बलि चढ़ा देते हैं। इसके साथ ही न्‍यायिक जवाबदेही विधेयक भी लाया जाना जरूरी है। न्‍याय प्रक्रिया से जुड़े मानहानि के कानून में भी संशोधन की जरूरत है, जिससे न्‍यायिक विंसगतियों को उजागर किया जा सके।

 

न्‍यायालय और न्‍यायाधीशों को सूचना के अधिकार के दायरे में भी लाना जरूरी है। इस बाबत ध्‍यान रहे कि उच्‍चतम न्‍यायालय ने मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें सूचना के अधिकार के तहत न्‍यायाधीशों की पारिवारिक संपत्‍ति की जानकारी ली जा सके। तत्‍कालीन न्‍यायमूर्ति केजी बालकृष्‍णन ने इस याचिका को इस दलील के साथ निरस्‍त कर दिया था कि ‘उनका दफ्‌तर सूचना के दायरे से इसलिए बाहर है, क्‍योंकि वे संवैधानिक पदों पर आसीन हैं।‘ जबकि कार्मिक मंत्रालय ने भी न्‍यायपालिका को सूचना कानून के दायरे में लाने की सिफारिश की सिफारिश की थी। मंत्रालय ने दलील थी कि ‘संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी लोकसेवक हैं। इसलिए सूचना का अधिकार उन पर भी लागू होना चाहिए। यहां विडंबना रही है कि संसद न्‍यायपालिका को कोई दिशा निर्देश दे नहीं सकती और न्‍यायपालिका का विवेक मानता है कि वह सूचना के अधिकार से परे है।

 

यहां गौरतलब है कि जब यह अधिकार संसद और विधानसभाओं पर लागू हो सकता है तो न्‍यायपालिका पर क्‍यों नहीं ? यदि लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में जनता सर्वेसर्वा है, तो देश के नागरिक को न्‍यायपालिका क्षेत्र में भी जानकारी मांगने का अधिकार मिलना चाहिए। काटजू का पर्दाफाश भी इस बात की तस्‍दीक करता है कि यदि न्‍यायपालिका पर गोपनीयता का पर्दा न पड़ा रहता तो भ्रष्‍ट जज के संबंध में लिखी गई प्रतिकूल टिप्‍पणियों का तभी खुलासा हो गया होता ? लिहाजा इस जज के सेवा विस्‍तार, पदोन्‍नति और स्‍थायीकरण की कोशिशों पर भी वहीं विराम लग गया होता। न्‍यायपालिका की विश्‍वसनीयता बनी रहे, इसलिए उसे बदनामी की खुली खिड़कियों से बचाने की जरूरत है ?

 

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49, श्रीराम कालोनी

शिवपुरी म.प्र.

फोन 07492 232007

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

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