शनिवार, 19 जुलाई 2014

रचना व्यास का आलेख - सच्चा धर्म

प्रेक्षा बाफना और वैदेही शर्मा की दोस्ती पूरे कस्बे में प्रसिद्ध है। जन्माष्टमी,शिवरात्रि को दोनों साथ मंदिर में पूजा करती हैं तो आचार्य महाप्रज्ञ की पुस्तकों का पठन-मनन भी करती हैं। किसी जैन संत से प्रतिक्रिया विरति, भावक्रिया ,नि:शेषम् सरीखे विषयों पर चर्चा करना वैदेही को संतुष्टि देता है। दोनों के माता-पिता को भी उनकी आध्यात्मिक ललक से खुशी है| दोनों धर्म के प्रति अपने खुले विचारों के साथ अपने-अपने धर्म को समर्पित हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं 'स्वधर्मों निधनं श्रेय , परधर्मो भयावह।' हर साधक का अपना -अपना इष्ट होता है ।सभी की दृष्टि में अपना-अपना धर्म श्रेष्ठ है । और सही भी है, एक छोटे बच्चे की माँ चाहे साड़ी पहनकर उसे गोद में ले या सलवार कमीज पहनकर उसके सामने आये या अन्य कोई परिधान पहनें। न माँ के प्रेम में कमी आयेगी न ही बच्चे के। बच्चा उसी तरह लपककर माँ की गोद में जायेगा और उसे कसकर पकड़ लेगा। वैसे ही ईश्वर कोई भी रूप धरे हमें उतना ही प्रेम करेंगें। ये हमारी आँखों का सौंदर्यबोध है कि हम उन्हें किस रूप में ज्यादा महसूस करते हैं।

धर्म के सौदागरों द्वारा खड़े किए गए दो प्रश्नों पर अब जन - आंदोलन की सी जरुरत महसूस होती है - पहला, क्या किसी दूसरे धर्म के कुछ सिद्धांतों को अपनाना अपने धर्म/धर्मगुरु के मान को हानि पहुँचाना है ? मेरे विचार से बिल्कुल नहीं | इंसान को छलनी के सदृश होना चाहिए जो सार अपने भीतर रख लेती है और अनुपयोगी को त्याग देती है| जन्मतः आप उस धर्म के नहीं हो पर किसी धर्म विशेष का सिद्धान्त यदि आपका व्यक्तित्व निखारता है , परिमार्जित करता है तो उसके कुछ सूत्र अपनाने का यह अर्थ नहीं है कि आप विधर्मी हो गए हैं।

अब ओशो का ही उदाहरण लें। कोई भी कट्टर सनातनधर्मी उसके विचारों को खुले दिल से स्वीकार नहीं कर सकेगा। उसे ओशो धर्मविद्रोही लगेंगे पर उनके द्वारा विकसित ध्यान पद्धतियाँ वर्तमान पीढ़ी को तनावमुक्त करने में उपयोगी है।

वो धर्म ही क्या जो सीमाओं में बंध जाये? दूसरा, क्या धर्माचारियों और धर्मावलम्बियों द्वारा अन्य धर्म की निंदा समाज द्वारा स्वीकार्य होनी चाहिए? यह व्यक्तिगत मामला है । हो सकता है आप परधर्म के किन्हीं सिद्धान्तों से सहमत न हो पर आपका धर्म आपको इजाजत नहीं देता कि आप अन्य धर्म के प्रति विष वमन करें , उसका विरोध करें। वो धर्माचार्य ही क्या जो अन्य धर्म की निंदा करे? सच्चा धार्मिक अपने धर्म को अपने हृदय में प्रतिष्ठित करता है न कि उसका प्रदर्शन करता है। धर्म तो पीड़ा की दवा है । पर उन्मादी लोगों ने उसे पीड़ित करने का साधन बना लिया है।

तुलसीदासजी ने कृष्ण छवि के दर्शन किये तो उन्हें प्रतीत हुआ उन्होनें धनुष-बाण धारण कर रखा है। ये भक्ति की पराकाष्टा है पर कभी उन्होंने अन्य धर्म की निंदा नहीं की। व्यक्तिशः मुझे साईं की भक्ति करना अभीष्ट नहीं लगा पर कभी मन में ये बात भी नहीं आई कि अन्यजन क्यों करते हैं। उन्हें संविधान द्वारा भी ये अधिकार प्रदत्त है कि वे जो चाहे उस धर्म का पालन करे । मुझे ये भी समझ से परे लगा कि उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों ने रमजान के दौरान मंदिरों के माइक हटवा दिए। वे अपने धर्म के सच्चे अनुयायी होते तो उसमें इतना खो न जाते कि उन्हें खबर ही न रहती कि ये मंदिर की घंटी है। जिसे ईश्वर से प्रेम होगा, उसे इतना समय ही नहीं होगा कि वह परधर्म की निंदा करे। जिस दिन आदमी अपने धर्म का पालन तल्लीनता से करते हुए परधर्मनिन्दा छोड़ देगा उस दिन वो इंसान बन जायेगा

 

नाम : रचना व्यास शिक्षा : एम ए (अंग्रेजी साहित्य एवं दर्शनशास्त्र), एल एल बी , एम बी ए

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