शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

पखवाड़े की लघुकथाएँ

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सुमन पुरोहित

अनसुनी

दिसम्बर की हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में मावठ का दौर दो दिनों से जारी था । रात को जब खिड़की से बाहर देखा तो घर के अहाते में एक बूढा भिखारी घुटनों को छाती में दबाये , फटे कम्बल में स्वयं को ढकने का असफल प्रयास कर रहा था । मन के भीतर से आवाज़ आई कि इसे एक कम्बल दे दू पर आवाज़ अनसुनी कर रजाई में दुबक गई। सुबह दूधवाले ने उसके मरे होने की सूचना दी । म्युनिसिपेलिटी वाले जब लाश लेने आये तो आगे बढकर उसके कफ़न के लिए एक हज़ार रूपये दे दिए । क्या कम्बल कफ़न से महंगा था ? मन के भीतर कोई फुसफुसा कर हँस पड़ा ।
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अशोक बाबू

तांत्रिक का झूठ

गाँव में भूतों का प्रकोप बड़ी तेजी से बढ़ रहा उतनी तादात में तांत्रिक भी लोगों को भ्रम जाल में फँसाकर ढेर सारे पैसे ऐंठ लेते।

कोई भी बीमारी बच्चे ,बूढ़े, जवान को हो जाती बस भूतों के नाम रख दी जाती। गाँव के लोग डरावने अंदर ही अंदर काँपते।

"अरे इसे पीपल वाले भूत ने दबोच लिया है ,यह ऐसे नहीं जायेगा इसके लिए मुझे हवन करवाना पड़ेगा"

तांत्रिक की बात सुनकर गरीब माँ-बाप की आँखें आँसुओं से लद गयीं। बच्चे को चबूतरे पर रखे सोच रहे मन ही मन।

"काका क्यों रो रहे हो क्या बात ?यहाँ इतनी भीड़ क्यों है ?"

"कुछ नहीं डॉक्टर बिटिया अपनी किस्मत पर आँसू बहा रहे हैं।"

"अविनाश ठीक तो है।"

"कहाँ ठीक है ,तांत्रिक बोला है इसे पीपल वाले भूत ने पकड़ लिया है ,इसके लिए हवन करवाना पड़ेगा।"

डॉक्टर बिटिया ने अविनाश का हाथ पकड़ा,सिर पर हाथ रखा किसी गंभीर बीमारी ने घेर लिया था।

"ऐसा करो काका मेरे साथ चलो अविनाश को लेकर अस्पताल।"

अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टरों ने इलाज शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में अविनाश ठीक हो गया। गाँव वालों ने तांत्रिक को दबोच लिया मारा पीटा गाँव से दूर भगा दिया।

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बेटी हो तो ऐसी

पत्नी के देहांत के बाद मनोहर आधे अधूरे चिंताओं से घिरे रहते. बूढ़ा शरीर बीमारियों से भरा हुआ. किनसे आस लगाए किनसे नहीं एक गिलास पानी के लिए.बड़ा बेटा शराबी गाँव की गलियों में आवारा घूमता,छोटी बेटी थी जो खयाल रखती. मनोहर बेटी पर बोझ नहीं बनना चाहते.

"बेटा एक गिलास पानी लाना मुझे दवाई खानी है". मनोहर ने आवाज लगाते कहा.

बेटा अंदर से बाहर आया "खड़े नहीं हो सकते थोडा बहुत हाथ पैर भी हिला लिया करो,एक गिलास पानी के लिए परेशान करते हो". झुँझलाते बोला.

मनोहर सिमटकर ढेर हो गए आँखों में आँसुओं के चार कतरे भी आ गए.

"ये लीजिए पापा जी".अनु पानी का गिलास थमाते बोली. मनोहर की आँखें आँसुओं से लद गईं फफकते हुए बोले-"एक तू है बेटी जो अपने बाप का खयाल रखती है,एक वो है जो मुझे सीधे होकर आँखें दिखाता है".

घर की परेशानियों को देख अनु बार बार चिंतित होती क्या करे? एक बार उसके मन में फ़ैक्ट्री में काम करने की इच्छा जगी क्योंकि आसपास की सारी औरतें वहाँ जाती आराम से पाँच हजार महीना कमा लेती?

"पापा जी मैं फ़ैक्ट्री में काम करने जाऊँगी. हम कब तक उधार पैसे लेते रहेंगे. आपकी दवाई भी करना जरुरी है". अनु ने नम स्वर में कहा.

मनोहर शर्म से झुक गए किन्तु फख्र महसूस करते हुए हामी भर दी अपना हाथ अनु के सिर पर रख दिया."जा बेटी संभलकर काम करना,हम लोग बेटियों पर काम नहीं कराते क्या करें घर में इंसान होते हुए लड़कियों को काम पर भेजना अच्छा नहीं लगता". मनोहर उदास मन से बोले.

कुछ ही महीनों में अनु ने घर की स्थिति सुधार दी अब वह दिन रात मेहनत करके खूब पैसे बचा लेती पिताजी का भी इलाज करा देती. भाई जबरन पैसे माँगता शराब के लिए अनु पहले समझाती बाद में पैसे देती.

मनोहर बहुत खुश थे आज उन्हें अहसास हुआ कि लड़कियाँ लड़कों से कम नहीं,वह भी कदम से कदम मिलाकर चलने की हिम्मत रखती है. अपने बूढ़े बाप को कंधे पर रख सकती है. दुनिया की हर चुनौती का सामना कर सकती है.

शाम के समय मनोहर लडके को सामने बिठाकर समझाने लगे "देख बेटा,तेरी बहन अकेली काम पर लगी रहती है और तू आवारा घूमता रहता है,शराब में डूबा रहता है क्यों न तू भी उसी के साथ फ़ैक्ट्री में काम कर ले". लड़का आँखें दिखाकर बाहर निकल गया.

अनु फ़ैक्ट्री जाने वाली थी कि अचानक पिता जी की तबियत खराब हो गई अकेली बेचारी अनु पिता जी को मुश्किल से हॉस्पिटल ले गई तथा भर्ती करा दिए.

अनु सुबह फ़ैक्ट्री जाती शाम होते ही हॉस्पिटल, पिता जी की देखभाल करती. अब तो उसने बड़ी जिम्मेदारी अपने सिर उठा ली. डॉक्टर भी बहुत थे होनहार ऐसी बेटी के लिए. दिन प्रतिदिन उसके चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ने लगी,कालिमा छाने लगी,कमजोर होती जा रही क्या करे आखिर कड़ी मेहनत जो करती,किन्तु परवाह नहीं.

"भैया कभी पिताजी को भी देख लिया करो कितने बीमार है". अनु बोली.

"मैं क्या करूँगा देख के,क्या मेरे देखने से वो ठीक हो जायेंगे`. सामने से जवाब मिला.

अनु चुप हो गई आँखें नम होकर झुक गई करें भी क्या लड़की जाति जो ठहरी. किन्तु हार नहीं मानी हिम्मत और जुटा ली.

"देख ली बेटी नालायक बेटे की करतूत आज अपने बाप को ही भूल गया कितने मुश्किलों के बीच पाला था यह मैं ही जानता हूँ वो नहीं". मनोहर रोते हुए बेटी से बतिआए.

"रोते नहीं पापा सब ठीक हो जायेगा भैया भी एक दिन सुधर जायेंगे". अनु पिताजी के आँसू पोंछते बोली.

अनु फ़ैक्ट्री से शाम के समय लौट रही थी कि अजीब चीख सुनाई दी गन्दी नाली की तरफ,उसे लगा भैया है सहायता के लिए पुकार रहे हैं. अनु दौड़कर पहुँची देखा लहूलुहान भैया कीचड़ में पड़े हैं बस साँसे चल रही हैं शायद नशे में किसी से टकराकर गिर गए. "भैया ...भैया ...ये क्या हो गया कैसे गिर गए, मेरा एक ही भाई हैं" रोती चिल्लाती बोली.

किन्तु अंदर से कोई आवाज नहीं आई उसने मुँह समेट लिया होश नहीं था. अनु जैसे तैसे नाली से निकालकर हॉस्पिटल ले गई भर्ती कराया जो उसने पैसे जमा किए थे आज सारे भाई पर लगा दिए. खुद ऐसे चौराहे पर खड़ी हो गई जहाँ उसे देखने वाला कोई नहीं था.

कुछ घंटों में भाई को होश आया,सामने देखा पलंग के नीचे कोई घुटनों पर सिर रखे बैठा रो रहा हैं. भाई ने आवाज हलके स्वर में लगाई-"अनु मेरी प्यारी बहन" अनु अचानक चौंकी देखा भाई को होश आ गया,दुपट्टे से फटाफट आँसू पोंछकर खड़ी होती बोली-"भैया अब कैसे हो".

"मेरी प्यारी बहन आ मेरे पास बैठ जा तेरा भाई बुला रहा हैं". भाई बोला.

अनु पास जाकर बैठ गई,भाई फफकते रोने लगा "अनु तूने मुझे बहुत समझाया मैंने एक न मानी अपनी ही चलाई आज मेरी यह हालत हो गई. अगर समय पर तू न पहुँचती शायद ......" जोर जोर से रोने लगा.

अनु दुपट्टे के पल्लू से आँसू पोंछते बोली- "रोते नहीं भैया सब ठीक हो जायेगा,मैं हूँ न".

कुछ ही दिनों में घर की दशा बदल गई खुशियाँ कदम चूमने लगीं अनु के भाई ने शराब छोड़ दी पिता जी के पाँव स्पर्श कर माफी माँगी. मनोहर आज बहुत खुश थे क्योंकि जो पहले कभी न हुआ वो आज हो गया एक बेटी की वजह से. अब मनोहर सभी से कहते `बेटी हो तो ऐसी`.

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अशोक बाबू माहौर

ग्राम-कदमन का पुरा,तहसील-अम्बाह,जिला-मुरैना(म.प्र.)476111

ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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देवेन्द्र सुथार

दोष

'कितना खुशनसीब होगा,वह मर्द जिसकी यह पत्नी बनेगी?' प्लेटफार्म से गुजरती सुन्दर युवती को देखकर मदन बोला था। 'तलाकशुदा है'। मदन की बात सुनकर उसके पास खडा उसका सहकर्मी हरसन बोला। 'क्या'? हरसन की बात सुनकर मदन को आश्चर्य हुआ था। 'इसका नाम हर्षिता है। रेलवे मेँ ड्राईवर रामलाल है,वह उसकी बेटी है। पांच साल पहले इंदौर के एक इंजीनियर लडके से उसकी शादी हुई थी।' हरसन ने हर्षिता के बारे मेँ मदन को बताया था। 'कैसा मूर्ख आदमी था। इतनी खूबसूरत पत्नी को त्याग दिया।' हर्षिता के बारे मेँ जानकर मदन बोला। ''हर पति चाहता है,उसकी पत्नी की देह सुन्दर होने के साथ उपजाऊ भी हो'' तलाक का कारण बताते हुए हरसन बोला,' हर्षिता बांझ है,इसलिए पति ने तलाक दे दिया। मदन सोचने लगा। अगर ईश्वर ने मां बनने की क्षमता प्रदान नहीं की तो उसमेँ हर्षिता का क्या दोष हैँ?

 

 

रमेश लौट आया

रमेश कुछ महीने पहले ही इस काँलोनी मेँ आया था। उसकी पत्नी दीपा गर्भवती थी। डिलीवरी का समय नजदीक आने पर वह पत्नी को मां के पास गांव छोड आया था। एक दिन सीढी उतरते समय दीपा गिर गई। मां का फोन आते ही रमेश छुट्टी लेकर गांव चला गया। सीढियोँ से गिरने की वजह से बच्चा पेट मेँ मर गया था। गांव मेँ बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध न होने के कारण,दीपा को बचाया नहीं जा सका। मैँ दीपा की मृत्यु का समाचार मिलने पर भी शोक प्रकट करने रमेश के गांव नहीँ जा सकी थी। इसलिए लौटने का समाचार मिलते ही उसके घर जा पहुंची। रमेश किसी युवती से बातें कर रहा था। मुझे देखते ही बोला,' आओ आंटी'। मेरे बैठते ही उस युवती का परिचय कराते हुए बोला, 'यह नेहा हैँ'। आपकी नई बहू। रमेश ने दीपा की चिन्ता की आग ठंडी होते ही नेहा से शादी कर ली थी। मेरे समझ मेँ नहीं आ रहा था। शोक प्रकट करुं या बधाई दूं?

-देवेन्द्र सुथार,

बागरा, जालोर, राजस्थान।

2 blogger-facebook:

  1. akhilesh chandra srivastava9:26 am

    sundar atisundar atyant sundar ek se badhkar ek
    marmik prabhavshaali padhte padhte n jaane kitne
    baar AANSOO NIKAL PADE

    Sabhi lekhak badhai aur shabasi ke patr hain

    Meri sabhi ko hardik badhai

    उत्तर देंहटाएं

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