रविवार, 13 जुलाई 2014

राकेश जोशी की ग़ज़लें

image

डॉ. राकेश जोशी की आठ ग़ज़लें

1

अब उजालों से कोई आता नहीं है
भीड़ में भी कोई चिल्लाता नहीं है
मैं कभी डरता नहीं हूं भीगने से
सर पे कोई छत नहीं, छाता नहीं है

तुम मुझे कंगाल क्या कर पाओगे

बैंक में मेरा कोई खाता नहीं है

जिन किताबों में गरीबी मिट गई है

उन किताबों से मेरा नाता नहीं है

बिल्लियों के संग वो पाला गया है

शेर होकर भी वो गुर्राता नहीं है

इस जगह तुम ज़िंदगी को ख़त्म समझो

इससे आगे रास्ता जाता नहीं है

2

जो ख़बर अच्छी बहुत है आसमानों के लिए

वो ख़बर अच्छी नहीं है आशियानों के लिए

इस नए बाजार में हर चीज़ महंगी हो गई

बीज से सस्ता ज़हर है पर किसानों के लिए

भूख से चिल्लाए जो वो, खिड़कियाँ तू बंद कर

शोर ये अच्छा नहीं है तेरे कानों के लिए

हक़ की बातें करने वालों के लिए पाबंदियाँ

और सुविधाएं लिखी हैं बेजुबानों के लिए

बैल की हल की कहानी तो पुरानी हो गई

खेत सारे बिक गए हैं अब मकानों के लिए

रोटियाँ मिलती नहीं हैं पेट भरने के लिए

खूब ताले मिल रहे हैं कारखानों के लिए

3

बादल गरजे डर जाते हैं नए-पुराने सारे लोग

गाँव छोड़कर चले गए हैं कहाँ न जाने सारे लोग

खेत हमारे नहीं बिकेंगे औने-पौने दामों में

मिलकर आए हैं पेड़ों को यही बताने सारे लोग

मैंने जब-जब कहा वफ़ा और प्यार है धरती पर अब भी

नाम तुम्हारा लेकर आए मुझे चिढ़ाने सारे लोग

गाँव में इक दिन एक अँधेरा डरा रहा था जब सबको

खूब उजाला लेकर पहुँचे उसे भगाने सारे लोग

भूखे बच्चे, भीख माँगते कचरा बीन रहे हैं पर

नहीं निकलते इनका बचपन कभी बचाने सारे लोग

धरती पर खुद आग लगाकर भाग रहे जंगल-जंगल

ढूँढ रहे हैं मंगल पर अब नए ठिकाने सारे लोग

बम, गोली के दौर में इनको धनुष नहीं मिलते शायद

एक तीर से करते अक्सर कई निशाने सारे लोग

4

अँधेरों में भटकना चाहता हूँ

उजालों को परखना चाहता हूँ

ये अंगारे बहुत बरसा रहा है

मैं सूरज को बदलना चाहता हूँ

हवा ये क्यों अचानक रुक गई है

मैं थोड़ा-सा टहलना चाहता हूँ

कई दिन से तुम्हें देखा नहीं है

मैं तुमसे आज मिलना चाहता हूँ

सड़क पर तो बहुत मुश्किल है चलना

मैं गलियों से निकलना चाहता हूँ

ये रूपया तो फिसलता जा रहा है

मैं गिरकर फिर संभलना चाहता हूँ

5

हर नदी के पास वाला घर तुम्हारा

आसमां में जो भी तारा हर तुम्हारा

बाढ़ आई तो हमारे घर बहे

बन गई बिजली तो जगमग घर तुम्हारा

तुम अभी भी आँकड़ों को गढ़ रहे हो

देश भूखा सो गया है पर तुम्हारा

तुम मदारी क्या तमाशा अब करोगे

छोड़कर तुमको गया बंदर तुम्हारा

ये उजाले झूठ कितना बोलते हैं

झूठ इनमें छुप गया अक्सर तुम्हारा

मैं लगाऊंगा गले से अब भी उसको

आदमी जो बन गया नौकर तुम्हारा

आज तुमसे ढेर-सी बातें करूंगा

मिल गया है अब मुझे नंबर तुम्हारा

6

फूल तितली बता क्या करे

अब यहाँ ये हवा क्या करे

जब बिछड़ना मुक़द्दर में था

फिर कोई देवता क्या करे

जिसको बिन मांगे सब मिल गया

वो कोई भी दुआ क्या करे

मर्ज़ ही जब न मालूम हो

फिर कोई भी दवा क्या करे

याद गर न करे आपको

फिर भला वो किया क्या करे

गीत लिखना न आए जिसे

वो भला फिर लिखा क्या करे

7

वो अपना नाम मिट्टी पर ही लिखकर आ गया होगा

वो अपने गाँव के खेतों से मिलकर आ गया होगा

कहीं पर कारखाने में कोई घंटी बजी होगी

कहीं वो भी किसी बस से उतरकर आ गया होगा

उसे माँ की लिखी चिट्ठी अचानक मिल गई होगी

वो जो टूटा हुआ था कल बिख़रकर आ गया होगा

अँधेरों से कहीं पर जंग कल फिर से छिड़ी होगी

अँधेरे रास्तों से वो निकलकर आ गया होगा

बिछड़ते वक़्त उसने फिर कई वादे किए होंगे

वो पेड़ों और पत्तों से लिपटकर आ गया होगा

किसी बच्चे के पैरों में नहीं चप्पल मिले होंगे

वो काँटों और अंगारों पे चलकर आ गया होगा

उसे फिर सभ्यता का पाठ पढ़ना और पढ़ाना है

मुखौटा आज वो फिर से बदलकर आ गया होगा

8

हम कहाँ से हैं अब कहाँ पहुँचे

थे जहां लौटकर वहाँ पहुँचे

हम कहीं पर भी तो नहीं पहुँचे

हर तरफ दर्द के निशां पहुँचे

काश, हम चाँद पर रहें जाकर

और उन तक ये दास्तां पहुँचे

ये करम कर तू दिल में हो मेरे

और तुझ तक मेरी अजां पहुँचे

ये दुआ है कि तेरी महफ़िल में

साथ तारों के आसमां पहुँचे

हम हवन हो गए ख़बर लेकर

तुम तलक राख और धुआँ पहुँचे

लिख दे ‘राकेश’ ऐसा कुछ कि जहां

तू न पहुंचे, तेरा बयां पहुँचे

---

 

डॉ. राकेश जोशी

असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेजी)

राजकीय महाविद्यालय, डोईवाला

देहरादून, उत्तराखंड

--

(चित्र – रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति)

8 blogger-facebook:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 14/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

    उत्तर देंहटाएं
  2. राकेश मेरे प्रिय गज़लकार हैं...
    उनकी ग़ज़लें और ये पेज मैंने फेसबुक पर शेयर कर दिया है
    रचनाकार डॉट काम के रूप में आप बड़ा काम कर रहे हैं

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहतरीन
    सभी रचनाएँ एक से बढ़कर एक

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत खुबसूरत एहसास पिरोये है अपने......

    उत्तर देंहटाएं
  6. राकेश जी का ईमेल से प्राप्त संदेश -

    बहुत से लोगों ने मेरी ग़ज़लें पसंद की हैं. मैं उनको धन्यवाद कहना चाहता हूँ.
    प्रोफाइल बना नहीं पा रहा हूँ. उन तक मेरी बात कैसे पहुंचे? संभव हो तो
    आप सबको मेरी तरफ से धन्यवाद कहें.
    डॉ. राकेश जोशी

    उत्तर देंहटाएं
  7. bahut khoob gazalen kahi hain sir ji badhai,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------