रविवार, 27 जुलाई 2014

सुभाष लखेड़ा के तीन व्यंग्य

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आओहम बाबा बनें !

अफ़सोस सिर्फ यही है कि यह ख्याल मुझे इतनी देर से क्यों आया ? खैर,  देर आयद दुरुस्त आयद ! आखिर, इससे पहले आता

भी तो  मैं चाहते हुए भी बाबा न बन पाता।  दरअसल, आज मैं उम्र के जिस दौर में हूँ, हम बाबा उसी  उम्र में बन सकते हैं, पोते - पोतियों

के भी और नाती - नातिनों के भी। लेकिन मैं आपको जैसा बाबा बनने के लिए कह रहा हूँ, उसके लिए बच्चों के बच्चे नहीं अपितु अक्ल में

कच्चे कुछ ऐसे लोग चाहियें जो बिना  मेहनत किये एक सुखद जिन्दगी की तलाश में रहते हैं। ये लोग अपने देश में करोड़ों में हैं। फलस्वरूप, 

यदि आप मेरे आह्वान पर मेरे साथ बाबा बनते हैं तो लक्ष्मी कब से हमारे पाँव छूने के लिए व्यग्र है और यश कब से हमारे इंतज़ार में जूते

घिस रहा है।  आपको इन नामों से कहीं गलतफहमी न हो जाए, इसलिए आपको यह बताना जरूरी है कि जो लक्ष्मी आप सोच रहे हैं, वह तो  

हमारे पास कुछ समय बाद आयेगी। आखिर, करोड़ों का साम्राज्य कोई साल - दो साल में तो बनेगा नहीं। उसके लिए हमें सत्संग के साथ - साथ

भूमि हथियाने जैसे कुछ दूसरे उपाय भी करने पड़ेंगे। कुछ नेताओं के साथ भी तालमेल बिठाना पड़ेगा।

दरअसल, यह लक्ष्मी तो हमारी गली में रहने वाली वह लड़की है जो  किसी खांटी बाबा के आशीर्वाद से आगामी फिल्म में सलमान की हीरोइन

बनने की इच्छा पाले हुए है।  यश का भी ऐसा ही मामला है।  मैट्रिक में बड़ी मुश्किल से पास होने वाला यश कुछ वर्षों बाद सूबे का मुख्यमंत्री  

बनने के लिए आशीर्वाद चाहता है।  इधर जिन बाबाओं की दुकानें हैं, वे किसी न किसी को आशीर्वाद दे चुके हैं और यश को नए बाबा की तलाश है।

संतान की चाह रखने वाले  ऐसे दम्पतियों से भी संपर्क साधना होगा क्योंकि जो वर्तमान बाबाओं से निराश हो चुके हैं।

बहरहाल, खुशखबरी की बात है कि ऐसे लाखों लक्ष्मियाँ और यश हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। और हाँ ,  मुख्य बाबा तो  मैं रहूँगा और आप

सहायक बाबा की भूमिका में रहेंगे।  आपको प्रारंभ में दिहाड़ी पर कुछ ऐसे लोग रखने हैं जो गली मोहल्लों में जाकर लोगों को बाबा  " चमत्कारी "  

की उन शक्तियों के बारे में बताएँगे जो उन्होंने आठ वर्षों तक हिमालय पर जाकर साधी हैं।  हाँ, बाबा चमत्कारी मेरा ही नाम होगा और एक बार

यह प्रक्रिया शुरू हो गयी तो समझो फिर  अपने आप भक्तों की संख्या में इजाफा होता जाएगा । तो फिर हाँ बोलो और शुरू हो जाओ। वैसे भी एक

बाबा का स्थान खाली होने वाला है।  

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कलयुगी महाभारत 
                                                                                   

अवकाश के क्षणों में सत्यभामा जी ने भगवान श्री कृष्ण से पूछ लिया - प्रभु, कलयुग में महाभारत हुआ तो उसमें कौन जीतेगा ?
भगवान ने मुस्कराते हुए कहा - प्रिय, कलयुग कागजी शेरों का जमाना होगा। इसमें अपने को शेर मानने वाले योद्धा अपने चारों तरफ

सुरक्षा घेरा बनाकर युद्ध क्षेत्र में उतरेंगे। यह युद्ध भी कागजी होगा और यह मैदानों के बजाय स्कूल - कॉलेज के भवनों, पंचायत घरों और

अन्य दूसरे सरकारी भवनों में होगा। ऐसे सभी युद्धों में सर गिने जायेंगे। इसलिए ऐसे युद्धों में तब कौरव ही जीतेंगे। बाणों की जगह बटन

दबेंगे और जिसके नाम के बटन को ज्यादा लोग दबाएंगे, वही विजयी माना जायेगा। पाण्डव तो पांच होंगे और कौरव सौ होंगे। मेरी सेना

भी कौरवों के साथ होगी। मैं पाण्डवों के साथ रहूंगा लेकिन मेरा वोट तो एक ही गिना जायेगा।
यह सुनकर सत्यभामा जी खिन्न स्वर में बोली - तो क्या आप पाण्डवों की मदद नहीं करेंगे ?
भगवान हँसते हुए बोले - सत्यभामा जी, आप यूं दुखी न हों। यह सब तो मेरी लीला है। द्वापर के पांडवों को तो मोक्ष प्राप्त हो गया था।

दरअसल, ये सभी कौरव हैं किन्तु ये जनता को बरगलाने के लिए नकली महाभारत खेल रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद ये सब एक - दूसरे

की मदद करते हैं। कलयुग में यही होना है। जनता इस युग में कष्ट भोगने के लिए अभिशप्त है।

   " प्रभु ! आपकी लीला आप ही जानें। " यह कहने के बाद सत्यभामा जी निरीह भारतीय जनता के लिए प्रार्थना करने लगी।
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भ्रष्टाचार पर  सोचते हुए !

 

आजकल दिमाग अक्सर भ्रष्टाचार पर स्वयं सोचने लगता है दरअसल, दिमाग पिछले कुछ वर्षों में लगातार इसी विषय पर अन्ना, रामदेव,
केजरीवाल, मोदी और कहीं वे नाराज न हो जायें तो आडवाणी जी के विचार सुनता रहा है। इसके अलावा स्वयं भ्रष्टाचार में संलिप्त अन्य दूसरे नेता
भी इस विषय पर अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं। भ्रष्टाचार का सर्वाधिक  सुंदर नख - शिख वर्णन करने में वे माहिर होते हैं क्योंकि वे भ्रष्टाचार की
वजह से ही पैदा हुए लगते हैं। हमारे टीवी से जुड़े मीडिया कर्मियों का तो यह प्रिय विषय है। वे अपने चैनलों में नियमित रूप से एक सफ़ेद दाड़ी वाले
को, एक गंजे युवा को और  अपने कुछ ऐसे परिचितों को बुलाकर इस विषय पर बहस कराते हैं जिनका खुद का दामन जगह - जगह दागी प्रतीत होता है।

खैर, आज रात से दिमाग शायद सोते समय भी इसी विषय पर सोचता रहा क्योंकि मैं सपने में एक ऐसे नेता की प्रशंसा में कविता पाठ कर रहा था

जिनके कुछ किस्म के भ्रष्टाचारों से उनकी वह पत्नी भी परेशान है जिसने नेता जी से कहकर अपने सभी भाइयों को कई नगरों में करोड़ों के प्लाट लाखों में
दिलाये और अपने लिए भी विदेशी बैंकों में भारी धन राशि जमा कराई है। बहरहाल, दिमाग का क्या ? वह अब बगावत कर चुका है। वह आज उस भ्रष्टाचार
के बारे में सोच रहा है जिसे करोड़ों रुपये के एवज में वे लोग करते हैं जिन्हें इस देश के लोग अपना नायक - नायिका मानने के भ्रम में फंसे हुए हैं। यह भ्रष्टाचार
विभिन्न उत्पादों के विज्ञापन से जुड़ा हुआ है।

दिमाग का मानना है कि यदि आपने किसी पदार्थ को कभी भी इस्तेमाल नहीं किया है और न आपने उसके बारे में कोई जांच - पड़ताल की है तो फिर
आप किस हक़ से उसे आमजन को इस्तेमाल करने को कहते हैं ? हमारे देश में फिल्मों सहित विभिन्न क्षेत्रों में चोटी पर पहुंचे नायक - नायिकाएं सभी ऐसे
उत्पादों की तारीफ़ में विज्ञापनों में कसीदे काढ़ते नजर आते हैं जिनको उन्होंने कभी भी इस्तेमाल नहीं किया है और न भविष्य में करेंगे। हमारी फ़िल्मी नायिकाएं
जिन साबुनों के विज्ञापनों से करोड़ों कमाती हैं, उनका इस्तेमाल वे सिर्फ तस्वीर खिंचवाने के दौरान करती हैं। हमारे जो फ़िल्मी नायक गर्भवती महिलाओं को
ऐसे विज्ञापनों में सलाह - मशविरा देते हैं, वे अपने लिए बच्चे किराए की कोख से पैदा करवाते हैं। हमारे कुछ नायक जिन्हें कुछ लोग  भगवान का दर्ज तक
देते हैं, वे तेल - तौलियों के विज्ञापनों में नजर आते हैं। इनमें ऐसे लोग भी हैं जो सिर्फ अपने उत्पादों पर भरोसा रखते हैं, शेष सभी उन्हें लूटेरे नजर आते हैं।

मेरा दिमाग मेरे से ही पूछ रहा है कि क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है। मैंने किसी का नाम नहीं लूंगा जबकि दिमाग मुझे लगातार उनका नाम लेकर परेशान कर
रहा है। उनके नाम आप सभी जानते हैं। अ से  लेकर ज्ञ तक, आप सभी के विज्ञापन देखते आये हैं। दिमाग तो सिर्फ आप से आपकी राय जानना चाहता है।
आखिर, जिस तेल या साबुन को वे खुद इस्तेमाल नहीं करते, उसे हमें लगाने को क्यों कहते हैं ? दिमाग परेशान है। उसे यह भी मिड -डे मील जैसा भ्रष्टाचार
लगता है क्योंकि ये सब वे पैसा बनाने के लिए करते हैं, जनता को सही मार्ग दर्शन देने के लिए नहीं !

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- सुभाष लखेड़ा, सी - 180 , सिद्धार्थ कुंज, सेक्टर - 7, प्लाट नंबर - 17, नई दिल्ली - 110075           

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