रविवार, 27 जुलाई 2014

शशि गोयल की बाल कहानी - नन्हा वीर

नन्‍हा वीर

अमर सिंह की रानी ने समाचार सुना तो धक से रह गई। स्‍वयं उसके भाई ने ही उसका सुहाग उजड़वा दिया था। शाहजहॉ के साले सलावत खॉ ने अमर सिंह का अपमान भरे दरबार में किया। राजपूत खून खौल उठा और एक ही बार में अपमान करने वाले का सिर दरबार के फर्श पर लुढ़कने लगा। वीर अमर सिंह के क्रोध से डर कर उस समय शाहजहॉ भयभीत अंतःपुर से चले गये। दरबारियों ने तलवारें चमकाई। एक हिकारत की निगाह उन पर डाल कर अमर सिंह घोड़े पर सवार हो कोट लॉघ कर बाहर आ गये। शाहजहॉ भी बदला लेने की फिराक में था, उसने अमर सिंह के साले अर्जुन गौड़ को लालच दे कर अपनी तरफ मिला लिया। अमर सिंह को सिखा पढा कर महल में ले आया और पीछे से अमर सिंह को मार डाला। शाहजहॉ ने ठहाका लगाया और अमरसिंह की नंगी लाश बुर्ज पर डलवा दी। चील कौवे बैठने लगे।

रानी का ह्‌दय पति के अपमान और भाई की बेवफाई से जल रहा था साथ ही राजपूत स्‍त्री पति के शव को चील कौवों को खाने को छोड़ कर जौहर कैसे करे। रानी ने सैनिक भेजे लेकिन उन्‍हें मार डाला गया। वे शव के समीप भी न पहुँच सके।

शाहजहाँ ने व्‍यंग्य से कहा-क्‍या इसके खानदान में ऐसा कोई भी नहीं है जो इसकी लाश ले जा सके। रानी अपने और बहादुर कह सकने वाले सबसे प्रार्थना कर चुकी तो हार कर बोली ,‘बंदी मेरी तलवार ला और मेरे साथ चल मैं स्‍वयं महारावल की लाश शाहजहाँ के किले से निकालकर लाऊँगी।' रानी ने सैनिक वेश बनाया, तलवार ली लेकिन उसी समय अमरसिंह के बड़े भाई का लड़का राम सिंह सैनिक वेष मे हाथ में चमचमाती तलवार लिये सामने आया,‘रूको चाची' उस चौदह वर्षीय बालक ने दृढ़ स्‍वरों में कहा,” मेरे होते अभी आपको महल से बाहर जाने की नौबत नहीं आयेगी। ”पर बेटा 'उस कोमल चेहरे को आशंकित दृष्‍टि से देखते बोली तो वह बोला,”चाचाजी के पावन शरीर की रक्षा करना मेरा धर्म है। मैं प्राण दे दॅूंगा इसके लिये बेटा जा!'रोते रोते रानी ने आशीष दी। ‘रो मत चाची' घोड़े को ऐड़ लगाते हुए राम सिंह ने कहा,” चाचा जी के शव के साथ मैं अभी लौटता हूं।

दुर्ग का द्वार खुला था तीर की तरह राम सिंह बढ़ता चला गया द्वार रक्षक समझ पायें तब तक राम सिंह दुर्ग के निकल पहुँच गया। दुर्ग पर तैनात सैनिकों को तलवार की धार पर एक के बाद एक गिराता वह बुर्ज पर चढ़ गया। पूज्‍य चाचा जी का शव उठाया उतरा और घोड़े पर बैठा पर कोई सैनिक कुछ न कर सका वह मार काट मचाता दुर्ग के बाहर हो गया।

‘बेटा तूने मेरी मरे पति का और सम्‍पूर्ण राजपूत जाति का मान रखा हैं ईश्‍वर तेरी रक्षा करे' और साथ ही तैयार चिता में शव रख उस पर जा बैठी।

Dr. shashi goyal

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------