शनिवार, 19 जुलाई 2014

त्रिवेणी तुरकर का यात्रा संस्मरण - सागर : भारत के समुद्र तट

भारत भूमि का स्मरण करते ही उत्तर में भारत माता के भव्य भाल को सुशोभित करता विशाल हिमगिरी व उसकी पर्वत श्रेणियां तथा निचले हिस्से में चरणों को पखारता असीम सागर जिसकी अलग अलग स्थानों पर विभिन्न छटायें दिखाई पडती हैं का एक अलौकिक चित्र मानस में उभरने लगता है। जीवन में पहली बार समुद्र को निकट से देखने का अवसर मिला सन 70 में जब पहली बार बंबर्इ्र के गेट वे आफ इंडिया के पास पहुंचकर समुद्र की विशालता व उसकी उंची उठती लहरों को देखा तो मन एक अलौकिक आनन्द से प्रफुल्लित हो उठा । अनंत आकाश के तले विशाल जलधि को निरखने में न जाने कितना समय बीता पर मन नहीं भरा। जूहू बीच पर जाकर पहली बार समुद्र की लहरों के पास जाकर जो आनन्द आया वह जीवन भर याद रहेगा । जूहू बीच पर सूर्यास्त होते देखना ऐसा लग रहा था मानो स्वर्णकलश धीरे धीरे सागर में समा रहा हो । रात्रि के समय गेट वे आफ इंडिया के पास खडे रहकर समुद्री जहाजों की लाइटें देखना बडा अच्छा लग रहा था। सच में ही इस स्थान से समुद्र दर्शन की शुरुवात मेरे लिये काफी उत्साहवर्धक रही । मैं इसे मेरा सौभाग्य ही समझती हूं कि इसके बाद अलग अलग समय पर भारत के विभिन्न समुद्र तटों पर जाने का अवसर मिला। परन्तु पहली बार के समुद्र दर्शन का रोमांच अब भी बरकरार है।

कुछ सालों के बाद कोल्हापुर की देवी के दर्शनों के बाद वहीं से आगे गोवा जाने का विचार आया बस से रात्रि का सफर करके सबेरे सबेरे गोवा पहुंचते रास्ते की हरियाली व प्राकृतिक सौंदर्य ने मन मोह लिया। गोवा के प्राकृतिक सौंदर्य के बारे में बहुत कुछ सुना व पढा था । यहां पहुंचने के बाद जिस आनन्द की अनुभूति हुई उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। यहां के समुद्र तट पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर खींच लेते हैं। हम गोवा के जिन तटों पर भी गये। अनेक देशी विदेशी पर्यटकों को व वहां के निवासियों को समुद्र की लहरों से अठखेलियां करते सुनहरे रेतीले तट पर बैठने खेलने का आनंद लेते हुये ही पाया ।नारियल के पेडों के कारण तट और भी मन भावन लगते हैं यहां आकर हमने भी अन्य लोगों को देखकर हिम्मत जुटाई और लहरों के पास जाकर रेत और लहरों के बीच खडे रहकर भीगने का आनंद उठाया ।पैरों को स्पर्श करती आती हुर्इ्र व जाती हुई लहरें एक विलक्षण आनन्द व उर्जा से भर देती हैं जिसे अनुभव तो किया जा सकता है परन्तु शब्दों में वर्णन करना आसान नहीं है। गोवा के विभिन्न तटों के अलावा यहां के बडे बडे चर्च दर्शनीय हैं ।

इन स्थानों पर जाकर खडे रहने मात्र से ही बाहर की दुनिया से अलग एक शांतिमय वातावरण का आभास होने लगता है ।

गोवा प्रवास के बाद रेल यात्रा कर सुबह रत्नागिरी पहुंचे गणपतिपुळे के मंदिर व समुद्र के बारे में बहुत कुछ सुना था । बस का प्रवास करके जब वहां पहुंचे तो इस स्थान के माहात्म्य का प्रत्यक्ष अनुभव आया नाम के अनुरुप गणेश टेकडी के चारों ओर बने परिक्रमा पथ पर चलना व साथ ही घने वृक्षों व लताओं से तथा चटटानों के प्राकृतिक सौंदर्य का भरपूर आनन्द लेते हुये परिक्रमा पूरी कर जब मंदिर के प्रांगण में पहुंचे तो समुद्र की लहरों की मंदिर प्रांगण के पत्थरों से टकराने की ध्वनि ने मन मोह लिया । मंदिर के अंदर जाकर गणपतिजी के दर्शन पाकर बहुत दिनों की अभिलाणा पूर्ण होने की प्रसन्नता से भरकर हम बाहर आकर मंदिर के परकोटे के पास बैठ गये ।जहां लहरें आ आकर इस तरह मंदिर से टकरा रहीं थी मानों स्वयम समुद्र देवता ही अपनी लहरों द्वारा गणेशजी की पूजा अर्चना कर रहें हो। काफी समय तक हम इस अनिवर्चनीय आनंद का अनुभव लेते रहे वहां से उठने की इच्छा न रहते हुये भी रात्रि के आगमन की आहट मिलने के कारण वहां से उठकर निकट की ही धरमशाला के कमरों में आराम करने चले गये रात भी लहरों की आवाज सुनते ही बीती । सुबह फिर से वहीं जाकर समुद्र के एक नये अलौकिक स्वरुप के दर्शन हुये । लहरें मानों हमें जीवन जीने के लिये एक अमूल्य संदेश देती रहती हैं कि सभी के जीवन में उतार व चढाव एक नितांत अनिवार्यता है इसका अनुभव हर एक व्यक्ति को कभी न कभी होता ही है और हमें हर तरह से इससे जूझने के लिये तैयार होना ही है।

दक्षिण भारत के समुद्र तट

दक्षिण भारत की तीन चार छोटी छोटी यात्राओं के दौरान अलग अलग स्थानों के समुद्र तटों पर जाने का अवसर मिला। पहली यात्रा की शुरुवात कोयंबटूर से गुरुवायूर पहुंचकर सुबह सुबह गुरुवायूर के प्रसिद्ध मंदिर में दर्शन करने गये सैकडों दीपकों की रोशनी से जगमगाता मुख्यमूर्ति के सामने का बरामदा भक्तों से भरा हुआ सब गोविन्दा गोविन्दा का जयघोण् करते प्रभुदर्शन के लिये अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे । भव्य प्रतिमा के दर्शनों से मन अभिभूत हो उठा इसके बाद अगला पडाव था मदुराई के प्रसिद्व मीनाक्षी मंदिर का जिसकी भव्यता व शिल्प अति सुंदर है। इसी यात्रा में आगे बढते हुये रात्रि दो बजे पहुंचे कन्याकुमारी यहां के सूर्योदय व विवेकानंद शिला को निकट से देखने की ती्रव इच्छा शीघ्र ही पूरी होने वाली थी। जिस होटल में रात्रिे निवास के लिये रुके थे उसकी खिडकी से ही संत तिरुवल्लूवर की भव्य प्रतिमा के दर्शन हो रहे थे सब कुछ इतना विलोभनीय लग रहा था कि हम बेसब्री से रात के बीतने का इंतजार करने लगे ।

सुबह सूर्योदय के पूर्व ही सभी पर्यटक होटल की छत पर एकत्रित होकर सूर्यदेवता की अगवानी के लिये पहुंच गये थे। सूर्योदय का वह विलोभनीय समय हमेशा ही स्मरण रहेगा।विवेकानंद शिला तक पहुंचने के लिये कुछ दूरी बोट से तय करने में बडा आनंद आया। शिलापर खउे होकर तीन समुद्रों का संगम देखकर मन पुलकित हो उठा । विवेकानंद स्मारक के उपासना स्थल में लोगों की उपस्थिती के बावजूद वहां की निस्तबधता असीम शांति प्रदान कर रही थी।यहां के समुद्र तटों पर अलग अलग रंगों की रेत सबको आकण्ति करती है। इसके बाद हमारा अगला पडाव था रामेश्वरम रामेश्वरम का प्रसिद्व मंदिर समुद्र के सामने ही है। दर्शन के लिये जाने से पहले समुद्र स्नान करके ही मंदिर में प्रवेश करने का नियम है ।इसके पहले कभी समुद्र के पानी में स्नान करने का मौका नहीं आया था किनारे पर ही जाकर समुद्र स्नान करके मंदिर में प्रवेश करने पर परिक्रमा पथ से गुजरते हुये हर कोने में एक तीर्थ के जलकुंउ से जल निकाल कर दर्शनार्थियों पर डालते हैं इस तरह परिक्रमा करते करते सभी प्रमुख तीर्थों के जल से भीगते गीले वस्त्रों में ही भक्तगण आगे चलते चलते प्रसिद्ध ज्योर्तिलिंग के दर्शन करने पहुंचते हैं ।रावण पर विजय पाने के बाद इस स्थान पर श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी । रामेश्वरम को बारह ज्योर्तिलिंगों में एक महत्वपूर्ण तीर्थ माना गया है।

इसी यात्रा में आगे बढते हुये हम कोचीन के बंदर गाह तक भी गये व मालवाहक समुद्री जहाजों पर सामानों का लदान होते व उतारते हुये देखने का अवसर मिला करीबन पांच सालों बाद फिर से दक्षिण भारत की यात्रा पर जाने का सुअवसर मिला इस समय चेन्नई के पास मरीना बीच पर जाने का मौका मिला संध्या समय यहां मेले की सी चहल पहल दिखाई्र देती है। यह तट काफी विशाल है।पांडिचेरी पहुंचकर वहां भी सागर की उंची उंची उठती किनारे तक आती लहरों को देखना अत्यंत ही रोमांचकारी अनुभव रहा सुरक्षाकारणों से यहां समुद्र दर्शन सुरक्षित अंतर से करना ही उचित प्रतीत होता है।पांउिचेरी का प्रसिद्ध अरविंद आश्रम व यहां उसके आसपास घूमना बहुत ही आनंददायी रहा यहां ंनिर्माणाधीन संकुल आरोविल एम्पीथियेटर दूर से ही भव्य लग रहा था । निकट जाकर तो उस स्थान से उठने की इच्छा ही नहीं हो रही थी । महाबलीपुरम के समुद्र तट के दर्शन हमने सुरक्षित अंतर से ही किये । यहां पर लहरें तेजी से व काफी उंचाई तक उठकर तट से टकराते हुये तीव्र ध्वनि उत्पन्न करती हैं ।सुनामी की विनाशकारी त्रासदी के बाद से इस स्थान पर समुद्रदर्शन सुरक्षित अंतर से ही किया जाता है। भगवान विणुकी शे शयया पर लेटी हुई पत्थर की विशालकाय मूर्ति व पांडवों के रथ दर्शनीय हैं। चेन्नई का मरीना बीच काफी विस्त्रत व सुन्दर है। यहां के निवासियों व पर्यटकों केा यह तट प्रिय व आनंददायी होने के कारण यहां हमेशा मेले की सी चहल पहल रहती है।

विशाखापटनम के समुद्र तट

छत्तीसगढ के जगदलपुर के निकट प्रसिद्ध जलप्रपात चित्रकोट व तीरथगढ के जलप्रपात सुरम्य घाटियों घने जंगलों के प्राक्रतिक सौंदर्य से अभिभूत हमलोगों को पता चला कि जगदलपुर से विशाखापटनम सडक मार्ग से आसानी से पांच छह धन्टों में पहुंचा जा सकता है ।हमने कार से अपनी यात्रा आरम्भ की काफी दूरी तक हम उडीसा की सीमा में चलते हुये से आन्ध्र प्रदेश की सीमा में प्रवेश किया रास्ते में पहाउी घाटीयों के घुमावदार रास्तेां व राह किनारे के ग्रामों व हरितिमा का आनंद लेते जब हम विजयनगरम पहंचे तब रात हो चुकी थी रात्रि विश्राम के लिये हम वहीं रुक गये।दूसरे दिन विजयनगरम से थोडा आगे जाने पर समुद्र किनारे से जाने वाले मार्ग से हम विशाखापटनम की ओर रवाना हो गये ।एक ओर सम्रुद व दूसरी ओर हरियाली तथा पहाडियां देखदेख कर मन उल्लास से भर उठा ।कुछ समय बाद हम भीमली बीच पर पहुंच गये । यहां समुद्रतट के किनारे बैठने के लिये पक्का तटबंघ और छोटे सुंदर पार्क हैं जहां बैठकर समुद्र की लहरों के नर्तन को देखते रास्ते की थकान कब गायब हो गई पता ही नहीं चला।काफी समय तक इस समुद्र तट पर लहरों में भीगने व लहरों के आने व वापस जाने केा महसूस करने का आनन्द उठाते रहे । यहां किनारे पर लाईट हाउस भी है।

इससे आगे बढकर हम.ऋणिकेांडा के समुद्रतट पर पहुंचे ।यहां पर्यटकों के रुकने के लिये काफी अच्छे होटल हैं आंध्र प्रदेश पर्यटन विभाग के हरिथा बीच रिर्सोट के जिस कमरे में हम रुके वहां से समुद्र का अर्धव्रताकार क्षेत्र बहुत ही सुंदर लग रहा था । उंचाई पर से समुद्र की लहरों के नर्तन देखते हमें ऐसा लगा मानो वे लहरें पास आने का आमंत्रण दे रही हों । नजदीक जाकर लहरों से खेलने के आनन्द को शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।किनारे से दूर समुद्र की ओर लगातार देखते रहने पर उसकी विशालता अभिभूत कर देती है। सुदूर क्षितिज की ओर नभ का व समुद्र का नीला रंग एक दूसरे से गले मिलता आभसित होता है। बीचपर बच्चों के खेलनें के लिये सुंदर पार्क भी यहीं बना है ं इस तट से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर केैलाशगिरी काफी उंची पहाडी पर स्थित है यहां पहुंचने के लिये रोप वे व उसके बाद रेल से सफर करना होता हैं कैलाश गिरी अपने नाम के अनुकूल प्राक्रतिक सौंदर्य से भरपूर मनोरम स्थल है।बादलों से आच्छादित उंची पहाउी पर शिव पार्वती की भव्य मूर्तियों के दर्शन करना एक अलौकिक अनुभव था।कुरसुरा नामक स्थान पर एक पुरानी पनउुब्बी प्रदर्शन के लिये रखी गई है। समीप ही सबमेरीन म्युझियम देखकर बहुत जानकारी व कई प्रकार के जलपोतों के माडेल व युद्ध सामग्री देखने का अवसर मिला। विशाखापटनम का काफी लम्बा समुद्र तट साथ ही हरियाली से भरपूर पहाडियां बीच बीच में मछुवारों की झोपडियां देखते हुये ऐसा लग रहा था कि यहीं पर अपना भी घर होता पर यह तो सबके लिये संभव नहीं यह सोचकर हम दुबारा इन तटों पर आकर फिर से आनन्द उठाने का विचार करते वापसी के प्रवास पर चल पउे।

पुरी

जगन्नाथपुरी की यात्रा के समय पुरी पहुंचकर हम जिस होटल में रुके वह सम्रुद्र तट से निकट ही था। वहां पहुंचते ही हमने होटल में समय बिताने के बजाय समुद्र किनारे जाकर यात्रा की थकान मिटाने का विचार किया। पांच मिनट बाद हम उस विशाल तट पर पहुंच गये। लहरों का नर्तन पैरों के नीचे भीगी हुई रेत का सुखद स्पर्श व सागरतट की प्राणदायिनी वायु ने हमारी यात्रा की थकान को दूर कर हमें तरोताजा कर दिया।उस समय भी वहां के मनोरम तट पर काफी चहल पहल थी कुछ लोग लहरों में भीगने का आनन्द ले रहे थे कुछ श्रद्धालु पानी में डुबकियां लगाकर समुद स्नान का आनन्द उठा रहे थे। हम भी काफी समय तक लहरों से भीगने व रेत में बैठकर यात्रा की थकान को भूलकर तरोताजा हो गये । दूसरे दिन सूर्योदय के पूर्व ही हमने तट पर पहुंचकर सूर्यदेवता के उदय के अविस्मरणीय व विलोभनीय स्वरुप का आनन्द उठाया।

आज भी उस प्रातःकाल की छवि व स्फूर्तिदायक ताजगी से भरपूर सुबह की याद पुरी का नाम लेते ही साकार हो उठती है । दूसरी सुबह पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर की भव्यता का अनुभव करते जगन्नाथजी के दर्शन का सुअवसर मिला। यहांपर प्रसाद रुप में भात का वितरण किया जाता है जिसे भक्तगण श्रद्धा से ग्रहण करते हैं ।इसकी महत्ता के संबंध में कहा जाता हे जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हात यहां श्री जगन्नाथ भगवान की रथ यात्रा पुरी का महत्वपूर्ण उत्सव है। इसी यात्रा के दौरान प्रसिद्ध चिल्काझील को देखने का मौका मिला यहां मोटर बोट से झील में काफी समय तक सैर का आनन्द उठाया पानी में जलक्रीडा करती डाल्फिनें झील के किनारों की मनोहारी हरितिमा को निहारते हुये अनिवर्चनीय आनन्द की अनुभूति हुई।

इसी सैर के दौरान एक रेतीले स्थान पर रुककर गाईडने हमें लाल केकडे रेड क्रेब दिखाये। पास ही नालवन नामक पक्षी अभयारण्य में छोटी छोटी चिडियाओं का मधुर कलरव गूंज रहा था।आगे जाकर सिपाकुडा नामक स्थान पर सी माउथ है यहा झील व समुद्र का संगम दिखार्इ्र देता है। यहां मछुवारे मछलियां व सीप बेच रहे थे सीपों में मोती की खेती के बारे में भी वे जानकारी दे रहे थे । पुरी से भुवनेश्वर होते हुये नंदनकानन पहुंचे इसे सन1960 में बनाया गयाव सन 1979 से जनता के लिये खोला गया। नंदन कानन अपने नाम के अनुरुप प्राक्रितक सौंदर्य से संपन्न है। अनेक दुर्लभ प्रजातियों के पशु पक्षी अजगर इत्यादि देखने का अवसर मिला रोप वे द्वारा इसको कम समय में यहां की सुंदर झील व नंदनकानन की शोभा को देखना अति आननददायी अवसर था । इसी यात्रा में कटक भुवनेश्वर होते हुये कोणार्क का सूर्यमंदिर देखने पहुंचे भारी पत्थरों से निर्मित इस प्राचीन धरोहर का सौंदर्य व शिल्प अप्रतिम व वर्णनातीत है। इसके पास जाकर देखने पर आश्चर्य होता है कि किस प्रकार भारी पत्थरों का उठाकर उपर तक ले जाकर प्राचीन समय में इसका निर्माण किया गया होगा। सूर्य के रथ के विशाल पहिये व दिवारों पर उकेरी गई शिल्पाक्रतियां देखकर इन्हें बनाने वाले शिल्पकारों के अथक परिश्रम व लगन को श्रद्धापूर्वक नमन करना ही उचित है। इसी यात्रा में आगे बढते पारादीप पहुंचें यहां का यात्री निवास आसपास के प्राक्रतिक सौंदर्य व हरितिमा से भरपूर है।दिनके समय यहां के बंदरगाह के पास जाकर मालवाहक जहाजों से भारी सामानों का बडी बडी क्रेनों द्वारा चढाना व उतारना देखना बहुत ही अच्छा लगा। सभी ओर हरियाली से भरपूर यह स्थान देख शरीर को नर्इ्र उर्जा से भरपूर संध्या समय हम समुद्र किनारे का आनन्द उठाने जिस स्थान पर हम बैठकर लहरों का कभी पंडित जवाहरलाल नेहरु पारादीप आने पर रुके थे इसे नेहरु भवन का नाम दिया गया है ।यहां का मछलीधर व लाइट हाउस भी इस समय की यात्रा में देखने का अवसर मिला ं। पारादीप में एक स्थान पर अमर सेनानी सुभा चन्द्र बोस की ओजस्वी प्रतिमा को देखकर आजाद हिन्द फौज व दिल्ली चलो की गर्जना देकर भारत माता की मुक्ति के लिये आजीवन लडनेवाले महान व्यकित्वका स्मरण हो आया ।

गुजरात

पर्यटन के शौकीन हम जून2010में गुजरात भ्रमण के लिये निकले। गोंदिया से अहमदावाद तक का सफर रेल से करने के बाद वहां का प्रसिद्ध अक्षरधाम मंदिर व घंटकर्ण मंदिर के दर्शन किये । इन दोंनों स्थानों के स्वच्छ परिसर भव्यता व शांतिपूर्ण वातावरण ने मन मोह लिया । दूसरे दिन सबेरे द्वारिकाधीश के दर्शन करने अहमदाबाद से द्वारिका के लिये रवाना होकर संध्या तक द्वारिका पहुंचे । रात्रि विश्राम के बाद सुबह द्वारिकाधीश मंदिर पहुंचकर द्वारिकाधीश के दर्शन का लाभ उठाया ।यह मंदिर पुरातन व भव्य है। इसके बाद हम बेटद्वारिका ,यानी पुरातन द्वारिकानगरी जिसके बारे में कहा जाता है कि यह प्राचीन नगरी समुद्र में डूब गई थी ओखा बंदर गाह पहुंचकर वहां से स्टीमर द्वारा बेटद्वारिका तक पहुचे अब यहेां एक छोटा सा द्वीप व प्राचीन मंदिरों में से कुछ ही अच्छी हालत में हैं। इस स्थान पर किसी समय द्वारिकाधीश की ऐश्वर्यपूर्ण नगरी थी।इसी यात्रा में लौटते समय जलाराम मंदिर आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदा मठ नागेश्वर मंदिर गोपी तालाब भालकातीर्थ इत्यादि के दर्शन किये। पोरबंदर पहुंचकर र्कीती मंदिर महात्मा गांधी व कस्तूरबा के जन्मस्थल को देखने का अवसर मिला दोनों ही स्थान पासपास हैं व कीर्तीमंदिर गांधीजी से संबंधित संग्रहालय के रुप में है।

गुजरात के दीव सम्रुद तट की सुंदरता के बारे में जितनी जानकारी मिली थी उससे बहुत अधिक मनोरम इसे प्रत्यक्ष देखने पर पाया। सभी उम्र क्रे पर्यटक यहां पर लहरों में भीगकर समुद्रस्नान का व रेत पर चलने का आनंद उठा रहे थे । हमने काफी देर तक इस तट का आनन्द उठाया व एक नई उर्जा से ओतप्रोत होकर अपने अगल पडाव सोमनाथ की ओर रवाना हो गये । सोमनाथ के प्रसिद्ध मंदिर के पास हम रात्रि के समय पहुंचे यहां यात्रियों के रुकने की काफी अच्छी व्यवस्था है। प्रात काल उठकर स्नानादि करके सर्वप्रथम भगवान सोमनाथ के ज्योर्तिलिंग के दर्शन करने पहुंचे । भारत के प्रमुख बारह ज्योर्तिलिंगों में इसका प्रमुख स्थान है।

सोमनाथ मंदिर सदियों से एक प्रमुख तीर्थ के रुप में सारे भारत के हिदुओं के लिये श्रद्वास्थल के रुप में विख्यात है इसके वैभव व प्रचुर धनसंपदा के कारण कई बार इसे लूटा गया व तोडा गया परन्तु इसका बार बार पुर्ननिर्माण किया जाकर इस स्थान की महत्ता को अक्षुण्ण रखा गया है । आजादी के बाद वर्तमान मंदिर के पुर्ननिर्माण का संकल्प लौहपुरुण सरदार वल्ल्भभाई पटेल द्वारा लेकर पुरातन स्थल पर ही नये मंदिर की आधार शिला विधि जामनगर के श्री दिग्विजयसिंह के करकमलों द्वारा 8मई 1950 के दिन संपन्न की गई। देश के प्रथम राष्ट्रपति डा राजेन्द्रप्रसाद के करकमलों द्वारा यहां11मर्इ्र1911 के दिन सोमनाथ महादेव की पुनः प्रतिष्ठा संपन्न हुई। 45 सालों तक इस नये मंदिर के निर्माण पूर्ण होने पर तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने इसे1दिसंबर1995 को देश को समर्पित किया। इसे कैलाश महामेरुप्रसाद यह नाम दिया गया । यह मंदिर बहुत ही सुंदर व भव्य है। सागर तट पर स्थित यहां स्वयम समुद्र देवता ही महादेव का सदेव पूजन करते हैं। इसके निकट ही महारानी अहल्या देवी द्वारा इसवी सन1783 में बनवाया गया शिवालय है। जिसे अहल्येश्वर महादेव कहा जाता हे वर्तमान में इसे पुराना सोमनाथ मंदिर कहा जाता है।

 

भारतीय संस्कृति का प्रक्रति से अति निकट संबंध पा्रचीन काल से ही रहा है। यहां के वन पर्वत नदियां व जलाशय प्राचीनकाल से ही हमारे लिये पूजनीय रहे हैं हमारे महत्वपूर्ण श्रद्धास्थानों में से अधिकांश दुर्गम पर्वतीय स्थानों समुद्रतटों पर व नदी किनारे ही बने हैं और सदियों से पूजित हैं । प्राचीन समय में यातायात साधनों की कमी के कारण जनसाधारण के लिये इन स्थानों तक पहुंचना आसान नहीं था । वर्तमान समय में प्रचुर साधनों व पर्यटन की सुविधायें उपलब्ध होने के कारण हम तीर्थाटन व पर्यटन दोनों का ही आनंद उठा सकते हैं । देश क्रे अलग अलग स्थानों की यात्रा व वहां के दर्शनीय स्थलों को नजदीक से जाकर देखने से हमें देश की प्राकृतिक विविधताओं के साथ साथ वहां की सांस्कृतिक व पुरातन संपदा वर्तमान समय में हुये परिवर्तन व अति आधुनिक प्रगति इन सभी को जानकारी मिलने से पर्यटन के आनन्द के साथ ही हमारा ज्ञानवर्धन भी होता है।

हमारी धरती को सौंदर्य प्रदान करने में पर्वत श्रेणियां घाटीयां नदी झील जलप्रपात व सागर के रुप में जल संपदा का एक अति महत्वपूर्ण स्थान है ।साथ ही प्राकृतिक खनिज संपदा व बहुमूल्य रत्न भी प्रक्रति ही हमें प्रदान करती है ।

आज जिस अन्धाधुंद तरीके से हम अपने तात्कालिक लाभ के लिये हम प्रक्रति के संसाधनों का दोहन व जल थल तथा वायु प्रदूषण कर रहे हैं वह अपने हाथों अपने ही पैरों पर कुल्हाडी मारने जैसा ही आत्मघाती कार्य है। इसके लिये आवश्यक है कि हम अब भी चेत जायें । पर्यावरण की सुरक्षा करना प्रत्येक धरतीवासी का कर्तव्य है। जब भी हम प्रक्रति का आनन्द उठाने व अपने आप को फिर से उर्जा से परिपूर्ण करने के लिये विभिन्न स्थानों की यात्रा करते हैं तव हमें पर्यावरण की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।

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