बुधवार, 9 जुलाई 2014

सुशील यादव का व्यंग्य - मन तडपत .....हरी दर्शन को ....

मन तडपत .....हरी दर्शन को ....

 

जब भी मैं अपनी आस्था के दिए में, जी भर के तेल –घी डाल के बस जलाने ही वाला होता हूँ कि कहीं न कहीं बवाल हो जाता है।

स्वनाम धन्य महाराज,अघोरी, एकटक बाबा ,पेट्रोल वाले बाबा,बुलेट बाबा,पायलट बाबा और ऐसे ही स्वयं घोषित बाबाओं -भगवानों को मैं , अपनी श्रधा-सुमन पेश करने की नीयत से तैयार करता हूँ या ज्यादातर कहूँ कि अर्धांगनी द्वारा एक्सपेल किया जाता हूँ कि “मानो .....नहीं मानोगे तो सद्गगति नहीं मिलती” ,तो यकायक कोई न कोई चमत्कार हो जाता है और मैं ढोगी लोगों के चक्कर में आते-आते रह जाता हूँ।

पत्नी द्वारा मुझे, सदगति को समझाते-समझाते तकरीबन पच्चीस साल हो गए। इतना लंबा प्रवचन अनास्था को आस्था में बदलने का अपने आप में मिसाल है। शायद कहीं न मिले।

जितनी जीवटता से उनने अपने प्रयास किये हैं उतनी शिद्दत से मैं भी अपनी अकड में कायम रहा हूँ। नहीं, मुझे इन ढकोसलेबाज साधू-महात्माओं के बीच मत घसीटो। मैं किसी दिन उनसे उलझ पडुंगा। ये लोग अजवाइन,मुग- मुलेठी,हरड,बहर,त्रिफला और किचन में शामिल चीजों के उपयोग और फायदे बता-बता के अपना प्रवचन टी आर पी बनाए रखते हैं। बीमारी के कारण और निदान के लिए क्या खाना है,-केला,करेला नीबू आंवला की जानकारी प्रवचन , बीच-बीच में देते रहते हैं। इनका मकसद होता है ज्यादा से ज्यादा लोगे घेरे में आयें। चढावा मिलता रहे।

अमेरिका में ये क्या चल पायेंगे ?वहाँ वैज्ञानिक प्रमाण के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। इन बाबाओ की दाल पच्चास सीटी भी दे दो तो उधर के कुकर में नहीं गलेगी।

हमने साइंस पढ़ा है। साइंस में ऐसी कोई चमत्कारिक चीज नहीं जिसके तह में उसके होने या न होने का कारण न छुपा हो। ये बाबा लोग सिर्फ और सिर्फ कुछ प्रयोग ,कुछ हाथ की सफाई ,नजरों का धोखा और सम्मोहन के उथले जानकार होते हैं। सिद्धियाँ किसी को नहीं मिली होती।

हस्त रेखा बाबाओं को किसी मुर्दे के हाथ की छाप दिखा के देखो। उसके लंबी जीवन की गाथा पढ़ देंगे। इलेक्शन जीता देने की ग्यारंटी दे देंगे, राजयोग के हकदार बता देंगे। किसी बीमार मरणासन्न की कुंडली में, उनको बच्चे के यशस्वी होने का पूरा भविष्य दिख जाएगा, बता देंगे बहनजी ये एक दिन ऐसा सिक्सर लगाएगा कि दुनिया देखती रह जायेगी ! बशर्ते कुंडली बिच्ररवाने, किसी कुलीन घर की धनी महिला पहुंची हो।

मेरे तर्कों को खारिज करना, और किसी बहाने मुझको देव दर्शन के लिए प्रति माह-दो माह में राजी कर लेना पत्नी का हक बनता है इससे मुझे आज भी इनकार नहीं है।

सबकुछ ,जानकार ,मैं चुपचाप बिना बहस के उनके द्वारा ले जाए जाने वाले हर जगह, हर तीर्थ में सर नवा लेता हूँ। वैवाहिक जीवन की नय्या को पार लगाने के लिए ,इतनी आस्था की वो हकदार भी है ?

अपने तर्कों से, उनकी भक्ति भाव को क्षीण करने में मेरी उक्तियाँ , भले कोई असर न छोडी हो मगर बाबाओं के प्रपंच से उनको सचेत जरुर कर रखा है।

पहले, ‘बाबा दर्शन मात्र’ से पुलकित हो उठाती थी। चेहरा दमकने लगता था।ये भी लगता था कि, किसी जन्म के पुन्य थे, जो बाबा घर पधारे।

बाबाओं का सत्कार करने, उनको ड्राइंग रूम में बिठाके मेवा-मिष्ठान का अंबार लगा देने ,छप्पन भोज परोसने में वो ये जतलाती थी कि मोहल्ले के किसी घर में है इतना दम ? ,दान-दक्षिणा में, सोने-चांदी,कपडे पैसे, यथा बाबा तथा चढावा का जी खोल अनुसरण करती।

अब ,मेरे समझाइश को तव्वजो दे के , फक्त, पांच सौ से नीचे की राशि ही, इस मद में किसी –किसी बाबा को आवंटित कर पाती है।

मैंने काश्मीर से कन्या-कुमारी तक के भक्ति-मार्ग, भक्तों और देवगणों की व्याख्या अपने तरीके से की है।

उनके भगवान से पूछा है, जब इतने सारे भक्त-गण काल-कलवित हुए केदारनाथ में घटी त्रासदी में भगवान कहाँ गए थे ?मोक्ष को पाने का यही सुगम रास्ता है तो हर साल ये सुनामी क्यों नहीं आती ?

पत्नी से अब ,जब आग्रह करता हूँ कि इस बार केदार बाबा के पास चलें, वो बहाने से टाल देती है, मंजू अभी पेट से है उसकी देखभाल जरूरी है ?

कभी गंगा –हरिद्वार जाने की सोचा तो, मीडिया वालों ने इतना हल्ला मचाया कि गंगा मैं ली हो गई है?

सरकारी सफाई अभियान में अनुमानित है ,अस्सी करोड लगेंगे|

हमने सोचा लगा लो भाई , अस्सी करोड, तब चले जायेंगे, कौन जल्दी है ?

कम से कम बदली हुई गंगा को , देख के ये तसल्ली हो सकेगी कि भगीरथ ने जिस गंगा के लिए इतना तप किया उस गंगा को हम सवा करोड लोग, क्या कारण थे कि अस्सी करोड वाली भेट नहीं दे सके थे आजतक ?

गंगा दर्शन बाद, फक्र से मैंय्या से कहेंगे माँ गंगे हमने अस्सी करोड आपमें समर्पित किये हैं। अब तो अपने चाहने वालों का उद्धार करो माँ।

’माते’ हमारे कहे, इस आंकड़े में फेर हो तो, हमें क्षमा करना|

इनमें से कुछ करोड अगर , भारत की भूखी जनता ,नेता .ठेकेदार ,इंजीनीयर के उदर में समा गए हो तो हमारे आकडे को माँ आप स्वयं सुधार लेना। माँ सब आपके बेटे हैं ,इनके अपराध क्षमा करना। कल वे सब ‘अस्थिया’ बन के आप के पास आयेंगे। तब के लिए ,आप अपना ‘सलूक’ इन गैर-इरादतन भ्रष्टाचारियों के प्रति अभी से सुरक्षित रख लें माँ।

अगले पडाव में हम साईं को रखे हुए थे। अब कुछ संत लोग ये समझाइश दिए जा रहे हैं कि साईं जी को भगवान की श्रेणी में, लोगों ने, पैसा कमाने की नीयत से रख दिया था। वे कभी अपने आप को भगवान बोले ही नहीं ?

तस्सल्ली है तो इस बात की कि इस मामले में कोई जांच आयोग बैठेगा नहीं| कोई सी बी आई, पुलिस वाले किसी को हडकायेंगे नहीं कि बताओ किसके कहने पे ये भगवान का दर्जा दिया ?बेचारा फकीर तुझसे बोलने तो नहीं आया था कि मुझे सम्मान दो ?बेकार दूसरों के कटोरे की आमदनी खराब कर दी ?

लोग आस्था रखते हैं नेक आचरण पर ?

अपने को भगवान कहलाये जाने वाले एक संत ने अमेरिका में जाके प्रवचन दिया।

जिस किसी ने उन प्रवचनों में अपने आप को बहा लिया वे उन सब के लिए भगवान हो गए।

बिल्कुल ऐसे ही ,लोगों ने अपना अभीष्ट साईं में देखा ,साईं उनके भगवान हो गए।

किसी के हाथ –पैर तो बाँधना नहीं है कि नहीं .....इन्हें मत मानो .....

जहाँ हम अपने तर्क को घुसेड देते हैं, भगवान वहाँ से प्राय: लुप्त हो जाते हैं।

या यूँ कहे, भगवान वहीं निवास करते हैं जो बिना राग-द्वेष-इर्ष्या-लालच के उनमे लींन हो जाए। फायदे की कोई बात न हो। सब प्रभु की इच्छा है ,यही सोच उत्तम रखे ।

अगर कहीं सचमुच प्रभु हैं, तो ‘प्रभु दर्शन की अवहेलना’ का पाप, मुझको कदम-कदम लगते जा रहा है ?

इस ‘सहारे’ को ‘बुढापे की लाठी’ लोग यूँ ही नहीं कहते ?

किसी दिन पूरी अनास्था छोड़ के, मैं अगर माथा टेके किसी दर पे मिल जाऊ, तो कतई आश्चर्य मत कीजियेगा।

इतना जरुर है ,भगोड़े बाबाओं को, अगर वे मुझे ‘पारस’ देने का भी लालच दें, तो उनको अपनी गाँठ की चवन्नी भी न दूँ।

 

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग {छ.ग.}

८.७.१४

mob:09426764552

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