सोमवार, 14 जुलाई 2014

सीमा शर्मा की कहानी - रहीमन पानी राखिए

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रहीम जी एक भविष्य दृष्टा थे उस युग में जबकि सारे नदी-नाले, तालाब पानी से लबालब रहते थे तभी उन्होंने सोच लिया था कि अगर लोगों ने पानी की बचत नहीं की तो निश्चित तौर से बूंद-बूंद को तरस जाएंगे। ' 'रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून. ..। '' आज जबकि धूल, धूप और प्रदूषण में आदमी खास-खास कर परेशान है ऐसे में नल देवता अगर दर्शन दे दें तो आत्मा अतृप्त नहीं होती। इच्छा तो होती है कि भगवान जी को जो माला चढ़ाई है उतारकर नल देवता पर चढ़ा दें और उनकी आरती उतार लें। कभी-कभी तो नल देव बादलों की तरह गरज-गरज कर बरसते हैं जबकि कभी ऐसे रूठ जाते हैं मानो कोई प्रेमिका प्रेमी से रूठी बैठी हो।

हर आदमी जमीन नाप-नाप कर पानी के स्रोत छूता है। हमारे पड़ोसी तो अलसुबह उठकर हमारे ओवरहेड टैंक से पानी चोर कर नहा धो लेते हैं पर क्या करें कमबख्त निद्रा देवी के कारण कभी भी रंगे हाथों नहीं पकड पाते। शहर की किसी भी कॉलोनी में मार्डन पनिहारिनें गगरिया भरने को आतुर दिखाई देंगी। एक दफे मैंने एक मॉर्डन बाला से पूछा भी कि तुम ये गगरी कैसे उठा लेती हो? तुरंत बोली - ' 'मटकी डांस और गगरी-गरबा ही किए थे। '' अब तो नौजवान लड़कों के मजे हो गए हैं वो भी इन कन्याओं का पानी भरवाने में रुचि लेकर प्रेम की नई पेंगे भरने लगे है। कन्याऐं भी कम नहीं हैं काम निकल जाने के बाद उन हेल्पर्स को पहचानती भी नहीं हैं। जबकि वो बेचारा सांवली सी कन्या में भी मधुबाला की झलक देखता फिर रहा था।

अगर एक दिन भी नल न आए तो ऐसा लगता है कि कही भी जिंदगी में उत्साह नहीं है। न स्कूल में मेडम का पढ़ाने में मन लगता है और न ही काम में। एक मेडम बेहद

गमगीन चेहरा लिए शून्य में न जाने क्या खोज रहीं थीं। मैंने जैसे ही पूछा - ' 'क्या हुआ तबियत खराब है?'' तुरंत बोलीं - ' 'चार दिन से नल नहीं आया। ' मैंने कहा - ' 'अरे टैंकर मंगवा लेतीं। '' वो दुखी होकर बोलीं - ' 'अरे यार घर के नल के पानी की बात ही कुछ और होती है। ' जैसे नल का पानी न होकर अमृत झरना होता हो नल।

वैसे नल न आने से मोहल्ले में जागरूकता बढ़ सी जाती है और भाईचारा परिलक्षित होता है। औसत बुद्धि का आदमी भी ज्ञान की बातें करता नजर आता है। बेचारे चोरों का हाल तो बेहाल हो गया है। सुनने में आता है कि फलां कालोनी में तो रात के दो बजे नल की सप्लाई शुरू है तो आदमी ठाठ से सुबह सात बजे तक चद्दर तान के सोता था। अब पांच बजे भड़भड़ाता सा उठ पड़ता है और कहीं दस मिनिट की भी देर हो जाए तो समझ लो पड़ोसी का टिल्लू पंप उसके पंप को मुंह चिढ़ाता और जीभ चिढ़ाता नजर आएगा और नल देवता का दर्शन लाभ आपको मिल पाएगा कि नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं।

हमारा बिल्लू तो रोज मेरी राशि पढ़कर नल की भविष्यवाणी कर देता है अगर राशि में लिखा आए कि काम बिगड़ते-बिगड़ते बन जाएगा और सुख सुविधा में बढ़ोत्तरी होगी तो समझ लीजिए नल देवता के दर्शन सौ फीसदी चांस हैं। शहर में नल न आने से सांप्रदायिक दंगे नहीं होते पर पार्षदों की राहू-केतु की दशाऐं चालू हो जाती हैं, कही पर उनका काला मुंह किया जाता है और कहीं पर उन्हें ताले के अंदर बंद कर दिया जाता है। महिला मोर्चा की बहने पार्षदों के नाप की चूड़िया लेकर खाली घड़े फोड़-फोड़ कर प्रदर्शन और धरने पर बैठ जाती हैं। कोई प्रशासन को कोसता हे तो कोई नरकपालिका को। पर कौओं के कोसने से भी कभी ढोर मरते हैं। नल देव जब तक प्रसन्न नहीं होंगे समझ लीजिए नहीं आएंगें।

किसी-किसी कॉलोनी में तो कुरुक्षेत्र के दृश्य परिलक्षित होते हैं, महाभारत की हाय-हाय सी मची रहती है। एक-एक बर्तन पर घर के तीन-तीन सदस्यों की ड्यूटी लग जाती है। जैसे ही सप्लाई चालू हुई युद्ध सा मच जाता है। जो लड़किया कॉलेज जाने लायक होकर भी कालेज नहीं जा रही हों तो समझ लीजिए कालोनी में पानी के लिए मोर्चे पर तैनात हैं। एक दफे परीक्षा ड्यूटी के दौरान मैंने देखा एक लड़की पूरी पच्चीस मिनिट बाद कक्षा में दाखिल हुई। मैंने गुस्से से कहा - ' 'सो गई थीं क्या?'' वो मुस्कराकर लजाई और बोली - ' 'मेडल नल आ गए थे। '' ' 'अच्छा.. .तो परीक्षा का क्या है भई अगली बार हो जाएगी.. -पूरक वाली, पर नल....। '' उसकी बात सुनकर साथ में खड़े वीक्षक सर पूरे आधे घंटे की ड्यूटी से गायब हो गए। लौटे तो मैंने पूछा - ' 'सर क्या बात है तबियत तो. . वो तुरंत बात काट कर बोले- ' 'दुश्मनों की हो खराब तबियत..ये जो देर से आई थी न कन्या ये मेरे ही मोहल्ले की है मैं तो फोन करने गया था। पर घरवाली तो सास भी कभी बहू.. .देखने में लगी थी उसे पता ही नहीं था कि नल आए आधा घंटा हो गया। लड़के के बारे में पता किया तो पता चला कि माँ के काम में हाथ बंटाने की जगह वो तो सार्वजनिक नल के पास खड़ा मार्डन पनिहारिनों की मदद में लगा था.. उसे तो मैं घर जाकर देख लूंगा। दांत पीसकर सर बोले। सही है आज बेचारों के यहां कम मात्रा में पानी भर पाएगा। इसके बाद तो उनका ड्यूटी में मन ही नहीं लगा।

जिस दिन नल आए समझिए आनंद ही आनंद। फ्रिज में आइस्कीम जमाइए और हलुआ पूड़ी उड़ाने को जी करता है। पर जब कभी भी न आए तो ऐसा लगता है कि खिचड़ी और दलिया ही बहुत है। मैंने तो घर में दोने-पत्तल, सकोरे और कुल्हड़ मंगवा रखे हैं। ताकि बरतन धोने में पानी कम लगे। भला हो प्रशासन का जिससे गरीब दोने पत्तल वाली के घर बरसों से धूल खा रहे भंडार की खपत तो हो गई। नल न आऐ तो मेहमान दुश्मन सा प्रतीत होता हे और तो और मैं अपने बच्चों को शाम को नीटू के यहां खेलने जरूर भेजती हूं जिससे जब भी उन्हें प्यास लगे तो नीटू की माँ का पानी खत्म हो। हमारे यहां तो बेचारे नाती पोतों तक के लिए पानी बना रहे। फिर याद आते हैं रहीम जी - ' 'अरे मोती और चून तो पानी बिना उबर जाएगें पर मनुष्य की मौत तो प्यासा रहकर ही हो पाएगी। '

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डॉ. सीमा शर्मा

सहायक प्राध्यापक,

ग्वालियर मप्र

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(चित्र – रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति)

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