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August 2014
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“गुरू” से “सर” तक की यात्रा के बीच
-: शिक्षक दिवस का औचित्य :-


    वर्तमान समय शिक्षा और शिक्षकों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं माना जाना  चाहिए । शिक्षा और शिक्षकों के बदले स्वरूप ने वास्तव में पुरातन पद्धतियों पर अपनी प्रतिष्ठा कायम की है या फिर आधुनिकता और व्यवसायिक दृष्टिकोण वाले इस युग ने शिक्षा के साथ शिक्षकों के महत्व पर सवाल खड़ा कर दिया है ? यह एक गंभीर मुद्दे के रूप में दिखायी दे रहा है । जहाँ शिक्षा पहले दान और संस्कारों का पर्याय मानी जाती थी वही आज के विलासितापूर्ण जीवन में शिक्षा इन दोनो व्यवहारिक दृष्टिकोणों से दूर कहीं भटक चुकी है। शिक्षकों के विषय में भी कुछ ऐसी ही दृश्य हमारी नजरों की सामने दिन प्रति दिन अलग-अलग रूप में आकर शिक्षकों के उस पुराने योगदान के साथ अस्वाभाविक तुलना के लिए विवश कर रहा है। शिक्षकों की जरूरत अनादिकाल से समाज की सर्वोपरीमाँग रही है। आज के समय में भी इसे कमतर आँकना हमारी भूल हो सकती है। इतना अवश्य है कि “गुरू” से “सर” तक की अविराम यात्रा में कहीं न कहीं हमारा गुरूत्व दूषित हुआ है और हम पर अंग्रेजियत की जो परत चढ़ी है उसने हमें गुरू के लिवास से लेकर गंभीरता तक अनेक परिवर्तनों से अवगत कराया है। यह उम्मीद करना हमारी उच्चश्रृंखलता हो सकती है कि शिक्षक धोती और कुर्ते के लिवास में पैरों पर खडाँऊ डालकर या फिर बिना जूता-चप्पल के शिक्षा के मंदिरों में अपनी उपस्थिति दे किन्तु इतना अवश्य है कि शिष्यों के लिए गुरू के रूप में माता-पिता से ऊपर स्थान रखने वाले शिक्षकों से समाज मानवीय व्यवहार के साथ द्रोणाचार्य और विश्वामित्र की भाँति आदर्शपात्र बनने की आशा को ठोस आधार देने से पीछे न हटे। इसके लिए शिक्षकों को स्वयं आगे आते हुए मिसाल पेश करना होगा ।


    हमारे देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. र्स्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्म दिवस को  शिक्षक दिवस के रूप मे मनाते हुए पूरा शिक्षा जगत गौरवान्वित होता आ रहा है। देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने से पूर्व शिक्षकीय जीवन में एक शिक्षक की भूमिका निभाने वाले डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षकों से प्रभावित होते हुए ही अपना जन्म दिन उन्हे तोहफे के रूप में दे दिया। अब इतने गौरवशाली दिन के आयोजन भी हमें अकल्पनीय घटनाओं के चलते बहुत कुछ सोचने पर विवश कर रहे हैं। हम जहॉ शिक्षकों के अन्दर आयी विकृतियों को बड़े गौर से परखते हुए उनसे सुधार की उम्मीद करते है, वही इस सिक्के का दूसरा पहलू जो शिष्य के रूप में हमारे बीच है, कहीं न कहीं अपनी जवाबदारी से भागने के बावजूद हमारी चिन्तित नजरों से नहीं देखा जा रहा है। मुझे यह कहने पर कतई संकोच नहीं कि शिक्षकों में आयी विकृति कानूनी व्यवस्था का दोष है़। विद्यालयीन शिक्षा से लेकर महाविद्यालयीन और चिकित्सा तथा अभियांत्रिकी शिक्षा में भी अब शिक्षार्थियों पर दबाव बनाने वाले सारे तरीके कानूनी दॉव पेंच में दम तोड़ चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया निर्णय में अब बच्चों के साथ मारपीट की बात को दूर उन्हे सामान्य लब्जो में डाटने-फटकारने वाले शब्द भी शिक्षकों को तीन साल के लिए जेल की हवा खिलाने वाले अपराध बना दिये गये हैं।


    शैक्षणिक संस्थाओं में बच्चों के अनुकूल माहौल तैयार करने प्रशासनिक स्तर पर नित-नये नियम बनाये जा रहे हैं। पास और फेल करने के नियमों में भी शिथिलता बरती जा रही है। कक्षा आठवीं तक बिना परीक्षा के पास करना और दसवीं-बारहवीं बोर्ड परीक्षा में फेल विद्यार्थियों को मुख्य परीक्षा सहित चार अवसर प्रदान करने की योजना ने शिक्षकों  द्वारा पढ़ाये जा रहे पाठ्यक्रम की गुणवत्ता के साथ शिक्षकों की योग्यता पर भी संदेह पैदा किया है। अब शिक्षकों को ही अपनी प्रमाणिकता सिद्ध करने नये सिरे कार्य प्रणाली को बदलना होगा। बिना किसी प्रकार का दबाव बनाये कक्षा में बच्चों की उपस्थिति से लेकर अनुशासन और पढ़ायी का उन्मुक्त वातावरण तैयार करना भी शिक्षकों के कर्त्तव्य में शामिल माना जाना चाहिए। बाल-सुलभ हरकतों के बावजूद उन पर किस प्रकार नियंत्रण किया जाये जब कि कक्षा से बाहर करना, घुटने टिकाना,कान ऐंठना, या उन्हें शर्मसार करने वाली किसी भी प्रकार की सजा देना कानूनन अपराध बना दिया गया हो, तब कैसे एक शिक्षक दबाव पूर्वक अध्ययन का माहौल बनाय़े। नीति नियंताओं और प्रशासनिक अधिकारियों को इस ओर ध्यान देते हुए कक्षा नियंत्रण में सहायक बिन्दु तैयार कर विद्यार्थियों को उस पर अमल करने दिशा निर्देश देना ही एक मात्र विकल्प के रूप में दिखायी पड़ रहा है।


    शिक्षक दिवस के अवसर पर स्वयं एक शिक्षक की हैसियत से कहना चाहता हॅू कि कुछ अपवादित शिक्षकों की कार-गुजारी की सजा नये नियमों को थोपने के साथ न देते हुए कक्षा नियंत्रण का अधिकार शिक्षकों के हाथों देना ही उचित माना जा  सकता है। शिक्षक को बेचारा प्राणी बनाने वाले सारे नियम कानून शिक्षण संस्थाओं के लिए महज चाईल्ड केयर सेन्टर बनकर रह गये हैं। उन्हे दिशा-निर्देर्शित करते हुए एक कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक द्वारा पालक की हैसियत से डॉट-डपट और हल्की चपत के माध्यम् से समझाया जाने वाला शिक्षा का महत्व दम-तोड़ता दिखायी दे रहा है। बेबश-शिक्षक और उद्दंड विद्यार्थी के बीच किस प्रकार का कानून सुकून दे सकता है इस पर न्यायविदों और शिक्षा शास्त्रियों को मंथन करना होगा। वर्तमान में जो हवा चल रही है अथवा प्रशासन द्वारा चलायी जा रही है, उसके चलते एक शिक्षक डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सपनों को भारतवर्ष के संदर्भ में पूरा कर दिखाएगा इसमे संदेश ही संदेह है। सवाल यह उठता है कि जहाँ शिक्षकों के अधिकारों पर चाबुक चलाये जा रहे हैं वहीं उन्हे सुरक्षा की कौन सी गारण्टी दी जा रही है एक शिक्षक मनचले विद्यार्थियों द्वारा मार दिया जाता है, महिला शिक्षिका छेड़खानी का शिकार हो जाती है। या फिर कक्षा के भीतर शरारती विद्यार्थियों द्वारा ब्लेक बोर्ड पर शिक्षक के खिलाफ टीका-टिप्पणी की जाती है तब इन परिस्थितियों में हमारा कानून मूक दर्शक बन जाता है।


    शासन-प्रशासन द्वारा शिक्षकों के कार्यो में बाधा-पैदा करने वाले बनाये गये और बनाये जा रहे नियमों का माकूल जवाब स्वयं शिक्षकों को देना होगा। इसके लिए अपनी कर्त्तव्यनिष्ठा को चुनौती स्वीकार करते हुए शिक्षकों को विपरीत परिस्थितियों में उत्तम परीक्षा परिणाम देना होगा। साथ ही बच्चों के कोमल मन में अपने लिए जगह बनाने के उद्धेश्य से उनकी हर कठिनाई को दूर करने हर समय खड़े  रहना होगा । बच्चों को यह विश्वास दिलाना भी अब शिक्षकों का कर्त्तव्य है कि उनका हर फैसला अथवा डांट-डपट छात्रों के हित में माता-पिता की तरह लिया गया निर्णय है, ताकि उनके हृदय में शिक्षकों के प्रति मलीनता अथवा कुविचारों का जन्म न हो । आज की इक्कीसवीं शताब्दी में छात्र-शिक्षक संबंध मधुर बनाना भी इतना आसान काम नहीं रह गया है । अब छात्र को शिष्य एवं शिक्षक को गुरूजी की गरिमा कायम रखने मिल-जुल क र नीति बनाने की जरूरत बलवती दिखायी पड़ रही है। मुझे यह कहने में भी संकोच नही कि शैक्षणिक संस्थाओं में छात्रो-शिक्षकों के बीच बढ़ रही दूरी या गंभीर दिख रही खाई के पीछे कानूनी अड़चनें ही आड़े आ रही हैं। मुझे याद है अपनी शालेय एवं महाविद्यालयीन पढ़ायी जब छात्र और शिक्षक के बीच कानून और पालकों का हस्तक्षेप आड़े नही आता था, और वातावरण भी बड़ा ही सुखद हुआ करता था ।


    शिक्षा का स्तर भी पहले की तुलना में कमजोर ही दिखायी पड़ रहा है। इस प्रतियोगी युग में चाहे पालक हो या विद्यार्थी उसे अच्छे अंको अथवा ए प्लस ग्रेड से ही मतलब है। संस्थाएं भी बच्चों और पालकों की इसी सोच को भुनाते हुए रूपये कमाने में लगी हुई हैं। परीक्षा से पूर्व प्रश्न पत्रों की गोपनियता भंग-करते हुए चहेते विद्यार्थियों को अंक देने वाले शिक्षक का सम्मान भी पालकों की गलत सोच के कारण पनप रहा है। ऐसा ही विद्यार्थी प्रतियोगिता परीक्षा मे जब अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता है तो उसका धरातल उसे दिखायी देने लगता है । कुल मिलाकर शिक्षा का स्तर और शिक्षकों पर बनाया गया गैर कानूनी दबाव भविष्य के लिए सुखद परिणाम देने वाला कदम नही कहा जा सकता है


शर्मनाक है यह सरकारी फरमान।
    भारत वर्ष के सबसे बड़े राज्य राजस्थान ने बढ़ते अपराधों के नियंत्रण की दिशा में चौंकाने वाला निर्णय लेते हुए शिक्षकों का कैरेक्टर वेरिफिकेशन शुरू कराने की योजना को अंतिम रूप दिया है। संस्कारों का निर्माण करने वाले और राष्ट्रनिर्माता कहे जाने वाले शिक्षकों के चरित्र पर उठाया जाने वाला सवाल इस वर्ष के शिक्षक दिवस का पुरस्कार माना जा सकता है । राजस्थान प्रदेश में कार्यरत कुल दस लाख शिक्षकों के चरित्र सत्यापन का कार्य शुरूआती रूप ले चुका है। प्रदेश में चार लाख सरकारी तथा छह लाख गैर-सरकारी शिक्षक कार्यरत हैं। जयपुर कमिश्नरेट क्षेत्र की सरकारी शालाओं सहित राज्य के कई स्कूलों में छात्राओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आने के बाद चरित्र सत्यापन जैसी योजना को अमल में लाया जा रहा है। प्रदेश शासन ने पुलिस के माध्यम् से सभी स्कूलों में पत्र भेजकर स्टाफ के नाम, पते, मोबाईल नम्बर, व आवास की विस्तृत जानकारी मांगी है। इस सरकारी  फरमान के बाद शिक्षकों ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा है कि स्कूलों में घटित चंद घटनाओं के बाद पूरे शिक्षक समाज पर उँगली उठाना उचित नहीं है । शिक्षकों ने कड़े लहजे में कहा है ऐसे ही मामलों में जेल की हवा खा रहे राजनेताओं तथा अधिकारियों के चरित्र सत्यापन की जरूरत क्यों नहीं समझी जा रही है ? जहाँ तक चरित्र सत्यापन का सवाल उठाया जा रहा है, शिक्षकों का स्पष्टीकरण है कि शिक्षकीय पेशे सहित सभी प्रकार की नौकरी में काम सम्हालने से पूर्व पुलिस वेरिफिकेशन सहित चरित्र प्रमाण पत्र मंगाया जाता है और वह रिकार्ड के तौर पर विभागों के पास सुरक्षित रहता है। फिर इस प्रकार की प्रक्रिया अपराध में लिप्त लोगों को सजा दिलाने तक होनी चाहिए, न कि सभी को उस कीचड़ में घसीटने तक।  

                                                    
                          
                                           प्रस्तुतकर्ता
                                       (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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  आत्मविश्वास
                                                       डॅा.लता सुमन्त
     बेटे के कहने पर बाबा ने अपना 35 साल पुराना नौकरी का गाँव छोड़ा था. अब तक आपने बहुत श्रम किये.अब आप केवल आराम करेंगे.केवल बेटे की बातों पर विश्वास न करके उन्होंने बहू से भी पूछा - हम तुम्हारे साथ रहें उसमें तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं?परंतु निशीता को किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति न थी.
       बहू और बेटे के साथ नये फ्लेट में उनके तीन साल बहुत ही आनंदोल्लास और चैन से गुजरे.जो वे समझ भी न पाए.प्रेम से बातें करना,बहू की सराहना करना,उसे सम्मान देना, हर कार्य में उसे सहकार देना आदि.माँ - बाबा की तरह ही प्यार करनेवाले तथा उसकी भावनाओं की कद्र करनेवाले थे उसके सास - ससुर.उसके मन के हर पल की जैसे उन्हें खबर रहती थी.निशीता को जैसे एक माँ - बाबा के छूटने पर दूसरे,सास - ससूर, माँ - बाबा की जगह मिल गए थे.उसे माँ - बाप की कमी कभी महसूस नहीं हुई थी.
          बडे जेठ, जेठानी, नंद सभी लोग बहुत ही और हमेशा उसकी सराहना करनेवाले थे.प्रेम की कमी न थी और अपनापन पारावार था.अपनी निशीता पढी - लिखी,सहृदयी और नम्र है.इस बात की हर कोई तारीफ करता.निशीता का प्यार और नम्रता से हर किसी के साथ पेश आना तथा हर किसी के प्रति समान व्यवहार के कारण वह हर किसी की प्रिय थी.विवाह के पश्चात केवल घर ही बदला है ऐसा उसे हमेशा महसूस होता था.
      उसे अपने शुरु के दिन याद हो आए.दीपकभाई साहब ने कहा था -बाबा को हर चीज समय पर ही चाहिए.ग्यारह बजे खाना, ढाई बजे चाय,थोडी देर भी उन्हें नहीं चलती.उस क्षण कुछ देर के लिए वह चिंतित जरुर हुई थी लेकिन थोडी ही देर में उस चिंता का निराकरण हो गया था,क्योंकि वह कई बार उनके गाँव जा चुकी थी इसलिए बाबा के स्वभाव से वह खूब परिचित थी.
         बाबा कई दिनों से बीमार थे.उन्हें अस्पताल में भरती करा दिया गया और सारे टेस्ट करा लिये गए.डॅाक्टरों के अनुसार बीमारी तो कोई नहीं पर बुढापा अपने आप में एक बहुत बडी बीमारी है .पीठ दर्द, पैरों में जकडन, भूख न लगना आदि तो ब़ुढ़ापे में होता ही रहता है.पाचनक्रिया मंद होने से भूख कम लगती है,खाने की इच्छा नहीं होती ,पेट ठीक नहीं रहता और इस कारण से सब कुछ होता रहता है.अस्पताल से बाबा घर आए तो बहू ने कहा - आपके लिए थोडा बदलाव जरूरी है.क्यों नहीं आप कुछ दिनों के लिए दीपक भाई साहब के यहाँ हो आते? नहीं बेटा ! मुझे यहीं रहना अच्छा लगता है. कुछ दिनों में ही मैं ठीक हो जाऊँगा.तुम चिंता न करो.
        आगे कुछ दिन अच्छे गुजरे. एक दिन पीठ पर मसाज करते समय उन्होंने पत्नी से कहा-मेरे जाने के पश्चात तुम यहीं रहना.नशीता तुम्हारा अच्छा ध्यान रखेगी और तुम्हें अपने साथ लेकर चलेगी ऐसा मेरा विश्वास है.बाबा की बातें सुनकर निशीता को जैसे सब कुछ मिल गया था.अपने से ज्यादा विश्वास उन्हें अपनी बहू पर था.अपने बाद अपनी जीवन संगिनी के दिन अच्छे गुजरेंगे और उसे किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं होगी इसी आत्मविश्वास के साथ उन्होंने आँखें मूँदी थी.उनके चेहरे पर उनके आत्मविश्वास का दिव्य तेज झलक रहा था.
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                        Associate professor in hindi
 
   

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मुनिया

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        -- मनोज 'आजिज़'

           आदित्यपुर, जमशेदपुर

फैक्ट्री में काम चल रहा था । मशीनों की शोर के बीच रफ़ीक का फ़ोन बज उठा । एक बार तो छोड़ दिया और काम में ही मशगूल रहा पर फिर कुछ मिनटों में फ़ोन बज उठा । इस बार उसे लग रहा था कि कोई खास बात होगी और जेब से फ़ोन निकाल कर देखा तो घर से कोई कर रहा था । फ़ोन रिसीव किया तो माँ की आवाज़ । घबराते हुए रफ़ीक ने फ़ोन करने का कारण पूछा । माँ जल्दबाजी में कही-- जल्दी घर आ जा । तुम बाप बने हो । घर में रौशनी आई है । रफ़ीक समझ चूका था कि बेटी हुयी है । सुपरवाइजर के पास छुट्टी के लिए अर्जी डाला । सुपरवाइजर अचानक छुट्टी का कारण पूछने लगा । रफ़ीक ने सर झुका कर जवाब दिया-- साहब मुनिया हुयी है । सुपरवाइजर झट बोल पड़ा-- इतना गुमसुम क्यों हो? मुनिया नहीं डॉली आई है कहो !

रफ़ीक धीमी आवाज़ में बड़बड़ाया--साहब, हम लोगों के लिए तो मुनिया, चुनिया और गुड़िया ही ठीक है । डॉली, जॉली, और रॉली को हम कहाँ से परवरिश दें? सुपरवाइजर की आँखें खुली रह गईं और छुट्टी के आवेदन पर बिना देखे साइन कर दिया । 

इकलौती बहू/कहानी

चिन्‍ताप्रसाद कुल जमा चौथी जमात तक पढ़े थे पर खानदानी चालाक थे। चिन्‍ताप्रसाद के पुरखों ने कमजोर वर्ग के लोगों को भूमिहीन बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। अंग्रेजों के जमाने में भूमिका लेखा -जोखा रखना इनका खानदानी पेशा था पर आजादी के बाद सब कुछ सरकार की अधीनस्‍थ हो गया। नौकरी के लिये इश्‍तहार निकलने लगे। नौकरी के लिये कोई भी आवेदन कर सकता था,पढ़े- लिखे नवयुवक ने परम्‍परागत्‌ एकाधिकार को पटकनी दे दी। चिन्‍ताप्रसाद पैतृक व्‍यवसाय हाथ नहीं लगने की उम्‍मीद खत्‍म हो गयी थी। वे बचपन में शहर की ओर भाग चले थे । शहर में आने के बाद उन्‍हें नौकरी के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ा। जैसे नौकरी उनकी इन्‍तजार कर रही थी। कालेज की कैन्‍टीन में चिन्‍ताप्रसाद को काम मिल गया। तनख्‍वाह के साथ खाना रहना मुफ्‌त मिलने लगा। चिन्‍ताप्रसाद की तनख्‍वाह सूखी बच जाती थी। साल भर के चिन्‍ताप्रसाद की नौकरी पक्‍की हो गयी थी। वह हर दूसरे महीने बूढे़ मां-बाप को मनिआर्डर भेजने का नियम बना लिया। चिन्‍ताप्रसाद के घर हर दूसरे महीने मनिआर्डर की रकम लेकर डाकिया आता। डाकिया आसपास के गांवों में चिन्‍ताप्रसाद की जिक्र करता फिरता,कहता मुंशीलाल का बेटवा बहुत कमासूत हो गया है,ससुरा चिन्‍तवा शहर भाग तो कर गया, देखो हर दूसे महीना दो सौ का मनिआर्डर भेजता है। खैर अच्‍छा कर रहा है दो सौ पर दो रूपया तो अपनी भी कमाई हो जाती है। चिन्‍ताप्रसाद की कमाई को देखकर उसके रिश्‍तेदार ने अपने साले की बी․ए․पास लड़की से ब्‍याह करवा दिया। नौकरी पक्‍की होते ही चिन्‍ताप्रसाद सरकारी दमाद हो गया। पत्‍नी रजनी को भी शहर ले आया। वह पढ़ी लिखी थी उसे घर में बैठना अच्‍छा नही लगता था। वह चिन्‍ताप्रसाद से कहती क्‍यों जी मेरे लिये कही नौकरी ढूंढ दो मैं घर में बैठना नहीं चाहती।

चिन्‍ताप्रसाद-घर में काम कम है क्‍या?हमारी तनख्‍वाह और सुख-सुविधा कम पड़नी लगी है क्‍या ?

रजनी-देखो रोटी रसोई के अलावा और कौन सा काम है। सुन्‍दरप्रसाद स्‍कूल जाने लगा है,खूबी साल भर में स्‍कूल जाने लायक हो जायेगी। मेरा मन घर में नहीं लगता,मुझे कुछ करना है। बहुत बन संवर को आपको बहुत रिझा चुकी। दो बच्‍चे हो गये है। मन उबने लगा है रोज रोज एक ही काम तुम्‍हारी सेवा सुश्रुषा,आपको खुश करने के लिये शरीर के पोर-पोर हिलवा डालना। मैं भी इंसान हूं। मैं सुहाग रात में ही बोल दी थी ना, मैं दो बच्‍चों से ज्‍यादा पैदा नहीं करूंगी। बूढ़ा-बूढी तो चाहते है सूअर जैसे बच्‍चे पैदा करूं तो वो मुझसे नहीं होगा। हां आपको सन्‍तुष्‍ट रखने में कोई कोर-कसर नही छोड़ूंगी पर मुझे बच्‍चों के भविष्‍य के लिये कुछ करना है।

चिन्‍ताप्रसाद-करने को बहुत काम है।

रजनी-रोटी रसोई,कपड़ा धोना,झाड़ू पोछा बस यही ना ।

चिन्‍ताप्रसाद-और भी तुम बहुत काम करती हो।

रजनी-अच्‍छा तुम्‍हारी मालिश। ये कोई काम नहीं यह तो घरवाली का दायित्‍व बनता है। पति,सास-ससुर की सेवासुश्रुषा करें,पति को खुश रखे। घर परिवार का पूरा धन रखे।

चिन्‍ताप्रसाद-तुम तो रोज बिना मालिश किये मुझे सोने नहीं देती। कुछ औरतें तो ऐसी है जो पति के सिर पर तेल रखना अपनी गुलामी का प्रतीक मानती है। तुम तो रोज मालिश करता हो।

रजनी-फुसलाओ ना । मुझे कुछ करना है,अपनी आय और बढ़ानी है,सुन्‍दर और खूबी बिटिया के अच्‍दे से अच्‍छे स्‍कूल में दाखिला करवाना है।

चिन्‍ताप्रसाद-होगा तुम चिन्‍ता ना करो,खाना खाओ आराम करो दिन भर थक जाती हो बच्‍चों के पीछे भाग-भागकर। खूबी स्‍कूल जाने लगेगी तब तुम्‍हारे काम के बारे में सोचेगें।

सालभर बाद रजनी जिद कर बैठी। चिन्‍ताप्रसाद हथियार डाल दिया। रजनी डाकघर की एजेण्‍ट बन गयी। पैसा जमा करवाने लगी। साथ ही घर में कैन्‍टीन भी खोल ली। अब क्‍या रजनी की तरकीब काम आ गयी । कुछ ही बरसों में रूपया की बारिस होने लगी। सुन्‍दर प्रसाद एम․काम की परीक्षा पास करते ही बैंक में अफसर लग गया। अब तो रजनी के हौशले को जैसे पंख लग गये। सुन्‍दर प्रसाद की नौकरी लगते ही बहुत खरीददार आने लगे। मुंह मांगी रकम गाड़ी सब देने को तैयार थे। रजनी को पुष्‍पा भा गयी। भा भी क्‍यों न जाती रूप-रंग यौवन भी था ही ऐसा सुन्‍दर प्रसाद पुष्‍पा के आगे कहीं नहीं लगता था। पुष्‍पा एम․ए․ तक पढी थी। पुष्‍पा के पिता उसके लिये दूल्‍हा खरीदने के लिये मुंह मांगी रकम देने को भी तैयार थे। रजनी को एम․ए․ तक पढी बहू के साथ मुंह मांगी कीमत भी मिल रही थी,बात पक्‍की हो गयी।

अच्‍छे मुहुर्त में सुन्‍दर प्रसाद और पुष्‍पा का ब्‍याह हो गया। पुष्‍पा ससुराल आयी। रजनी पुष्‍पा की सासु मां ने उसे चाभी का गुच्‍छा देते हुए बोली पुष्‍पा यह घर तुम्‍हारे हवाले कर रही हूं।

पुष्‍पा-सासु मां अभी से ये भार कैसे उठा सकूंगी।

रजनी-मेरी इकलौती बहू उठाना तो तुमको ही है। अरे जब मैं आयी थी तो चिन्‍ताप्रसाद की तरफ इशारा करके बोली इनके दर्जन भर भाई-बहनों को बोझा उठाना पड़ा था मुझे,तुम्‍हारे सामने तो वैसा संकट तो नही है।

चिन्‍ताप्रसाद झेंपते हुए बोले थाम लो,इकलौती बहू हो सब कुछ तुम्‍हारा हो तो है,बस मेरी खूबी का धन रखना।

पुष्‍पा-खूबी मेरी ननद नहीं छोटी बहन है,उनको तो पलकों पर बिठाकर रखूंगी कहते हुए पुष्‍पा ने चाभी का गुच्‍छा थाम लिया था। चाभी के गुच्‍छे ने पुष्‍पा को ऐसे चक्रव्‍यूह में फंसा दिया जिसकी उसे कल्‍पना भी नहीं थी। रजनी ने घर की जिम्‍मेदारी से फुर्सत ले ली। बतौर पोस्‍ट आफिस बचत एजेण्‍ट खुद को व्‍यस्‍त कर ली। कैन्‍टीन की जिम्‍मेदारी अब पुष्‍पा के उपर थी। पुष्‍पा भी हार नहीं मानने वाली थी वह भी इकलौती बहू का ताज पाकर अपना सर्वस्‍व स्‍वाहा करने को तैयार थी। पुष्‍पा के ब्‍याह के साल भर बाद चिन्‍ताप्रसाद की नौकरी चली गयी। खूबी भागकर ब्‍याहकर ली। चिन्‍ताप्रसाद ने कैन्‍टीन का कारबार और बढ़ा लिया पर एक भी मजदूर नहीं रखा। सब काम पुष्‍पा को करना होता सौ ग्राहकों की टिफिन का खाना बनाना बर्तन भाड़े साफ करना। चिन्‍ताप्रसाद रिक्‍शा में भर कर दोनो समय टिफिन पहुंचाने जाता। बेचारी कोल्‍हू का बैल हो गयी थी सुबह चार बजे उठता बारह बजे सोने जाती। इसके बात सुन्‍दरप्रसाद की सेवा सुश्रुषा। सुन्‍दरप्रसाद हट्‌ठा-कटठा पहलवान जैसे था,पुष्‍पा तो इस घर में आते ही सूखना शुरू हो गयी थी अब तो सूखकर कांटे जैसी हो चली। सुन्‍दरप्रसाद की नजरों में वह अब एक मजदूर जैसी हो गयी थी पर रात भर वह पुष्‍पा को वेश्‍या की तरह निचोड़ना नहीं भूलता था। सुन्‍दरप्रसाद पुष्‍पा के साथ बाहर जाना अपानी तौहीनी समझता था। वह कार में अपने साथ कभी नहीं बिठाया,चाहे वह अपनी मां के साथ जा रहा हो या अकेले पुष्‍पा को पिछली सीट पर बिठाता जैसे पुष्‍पा उसकी घरवाली नही होकर घर की नौकरानी हो। समय के चक्र ने पुष्‍पा को भी दो बच्‍चों की मां बना दिया पर वह मायके का मुंह नहीं देखी। ब्‍याह के पन्‍द्रह साल बाद मां की तेरहनी में रजनी को मायके जाने की इजाजत मिली थी और तेरहवीं बीतते ही वापस चले आने की हिदायत भी इकलौती बहू को। पुष्‍पा समर्पित भाव से घर-मंदिर और पतिदेव की उपासना में लगी रहती। वह स्‍वयं कभी भी इकलौती बहू की सीमा नहीं तोड़ी जबकि उसके सास-ससुर ही नहीं पति ने उसे एक नौकरानी से अधिक कभी नहीं समझा।

पुष्‍पा के तन से उपजे पसीने और आंखों से पसीजे आंसू पीकरे चिन्‍ता प्रसाद का कैन्‍टीन का व्‍यवसाय खूबफलफूल रहा था। कैन्‍टीन के व्‍यवसाय में उसका नाम काफी उपर पहुंच गया था खैर पहुंचता भी क्‍यों नहीं सब काम पुष्‍पा ही जो करती, खाना भी इतना अच्‍छा बनाती कि अंगुलिया चाटते रह जाये। थोक में डिब्‍बे कभ्‍ मांग बढ़ने लगी,ग्राहक कई गुना बढ़ गये। चिन्‍ताप्रसाद को टिफिन पहुंचाने में दिक्‍कत महसूस होने लगी। कैन्‍टीन के बढ़ते हुए व्‍यवसाय को देखकर रजनी ने अपना काम धीरे-धीरे घटाने लगी चिन्‍ताप्रसाद की चिन्‍ता कम करने के लिये। रजनी डिब्‍बा भरवाने में पुष्‍पा की तनिक मदद करने लगी। धीरे-धीरे रजनी ने पोस्‍ट आफिस बचत का काम एकदम बन्‍द कर दी और कैन्‍टीन की गद्‌छी संभाल ली। चिन्‍ताप्रसाद का काम पहले भी डिब्‍बा पहुंचाना और सामान लाना था। रजनी गद्‌दी के साथ सामान खरीदने में भी चिन्‍ताप्रसाद का सयोग करने लगी परन्‍तु पुष्‍पा का काम बढ़ता चला गया। ससुराल में उसे कभी किसी ने इंसान नहीं समझा। बस उसे बैल की तरह दिन रात जोतते रहे। पुष्‍पा ससुराल और पति की कभी नमूसी नहीं होने दी। इकलौती बहू होने के नाते वह ससुराल को मंदिर समझकर सेवा कार्य में लगी रहती थी।

कैन्‍टीन का व्‍यवसाय प्रगति पर था अचानक चिन्‍ताप्रसाद का गला बन्‍द होने लगा। डाक्‍टर को दिखाया तो डाक्‍टर बोले गुटखा तम्‍बाकू खाने से जबड़े जाम हो गये है,सब तरह की नशा छोड़ना पड़ेगा। मरता क्‍या ना करता चिन्‍ता प्रसाद ने सब त्‍याग दिया पर रत्‍ती भी फायदा नहीं हुआ। अन्‍तोगत्‍वा पता लगा कैसर आखिरी स्‍टेज पर है और एक कैंसर दिन चिन्‍ता प्रसाद को लील गया। अब रजनी के सिर पर कैन्‍टीन के व्‍यवसाय को संभालने की जिम्‍मेदारी पूरी तरह से आ गयी। लाखा कोशिशों के बाद भी धंधा धीरे-धीरे मंदा पड़ने लगा।

उधर सुन्‍दर प्रसाद की नौकरी में भूचाल की स्‍थिति पैदा हो गयी,उसे किसी घोटाले के कारण नौकरी से निकाल दिया गया। कई महीनो तक नियति घर से दफतर जाने वाले समय निकलता वापस आने वाले समय वापस आता। आर्थिक स्‍थिति चरमराने लगी थी। एक दिन कैन्‍टीन का सामान खरीने के लिये बाजार जाने की तैयारी कर रही थी कि इसी बीच सुन्‍दरप्रसाद आ गया संयोग से महीने का पहला सप्‍ताह था। रजनी सुन्‍दरप्रसाद से बोला बेटी तेरी मदद चाहिये।

सुन्‍दरप्रसाद-मां चलो कहा चलना है।

रजनी-बाजार ।

सुन्‍दरप्रसाद-क्‍या खरीदना है।

रजनी-अरे कैटीन और घर के लिये राशन लेना है।

सुन्‍दरप्रसाद-चलो मां गाड़ी अभी बाहर खड़ी है गैरेज में नही खड़ी किया हूं चलो।

रजनी-बेटा कुछ रूपये की मदद चाहिये।

सुन्‍दरप्रसाद-वह तो नहीं है।

रजनी-तनख्‍वाह नहीं मिली क्‍या ?

सुन्‍दरप्रसाद-मिली थी मां पर कोई एकाउण्‍ट हैंगकर तीन महीने से पैसे निकाल ले रहा है,जबकि वह सस्‍पेंड चल रहा था।

रजनी-क्‍या,मुसीबत पर मुसीबत।

सुन्‍दरप्रसाद-मां चिन्‍ता ना करो सब ठीक हो जायेगा।

रजनी सुन्‍दरप्रसाद के साथ गयी आधी अधूरी सामान लेकर आयी पर इतने सामान से कैन्‍टीन चला पाना कठिन था। चिन्‍ताप्रसाद के मरते ही परिवार पर मुसीबत के पहाड़ गिरने लगे थे। पुष्‍पा को देखकर रजनी की हिम्‍मत बढ़ जाती वह हार मानने को तैयार न था। साल बीत गया तब जाकर रजनी को पता चला कि बेटे की नौकरी नहीं रही। सुन्‍दरप्रसाद टयूशन पढ़ाने का काम करने लगा पर वह कैन्‍टीन के काम से नही जुड़ा चाहता तो पैतृक व्‍यवसाय से जुड़कर अच्‍छा कारोबार कर सकता था पर कहते हैं ना विनाश काले विपरीत बुद्धि वही हुई। टयूशन की कमाई से सुन्‍दरप्रसाद अपना खर्च निाकल लेता बस। सुन्‍दरप्रसाद की पैतृक जमे जमाये व्‍यवसाय में अरूचि के कारण थक हारकर कैन्‍टीन का धंधा रजनी को बन्‍द करना पड़ा और घर का कैंटीन वाला एरिया किराये पर चढ़ गया। इससे घर कि आर्थिक स्‍थिति में कोई चमत्‍कारिक सुधार तो नहीं हुआ पर चूल्‍हा गरम होने का इन्‍तजाम तो हो गया था।

पुष्‍पा को दिन पर दिन घर की बिगड़ती आर्थिक स्‍थिति बेचैन किये जा रही थी। एक दिन वह हिम्‍मत कर सुन्‍दरप्रसाद से सविनय बोली क्‍यों जी हम नौकरी कर ले क्‍या ?

सुन्‍दरप्रसाद-मेरी नौकरी चली गयी तो तू मुझे ताना दे रही है।

पुष्‍पा सुन्‍दरप्रसाद का पांव पकड़कर बोली कैसी बात कर रहे है। इस घर का दुख-सुख मेरा दुख-सुख है। क्‍या मैं इस घर से अलग हूं। मेरे लिये तो यह घर मंदिर है है और घर के लोग देवता।

सुन्‍दरप्रसाद-रहने दे मेरा मजाक उ़ड़ाने को।

पुष्‍पा-आपका मजाक उड़ाकर मुझे नरक का भागी नही बनना है। मैं तो आपका साथ देना चाहता हूं हाथ बटाना चाहती हूं,घर की तरक्‍की में अपने को स्‍वाहा करना चाहता हूं ।

सुन्‍दरप्रसाद- रहने दे स्‍वाहा करने को बहुत कर लिया तुमने स्‍वाहा। तुमको पेट भर खाने को तो मिल रहा है ना।

पुष्‍पा-पेट तो कुत्‍ते भी भर लेते है।

सुन्‍दरप्रसाद-कहा तुमको कलेक्‍टर की नौकरी मिल रही है।

पुष्‍पा-भले ही कलेक्‍टर की नौकरी नही मिले स्‍कूल टीचर की तो मिल सकती है।

सुन्‍दरप्रसाद-कर ली तुमने नौकरी जाओ घर के काम में मन लगाओ। ऐसे ही ऐरे-गैरो को नौकरी मिलती रही तो तुम अब तक कलेक्‍टर बन गयी होती। मैं तो कमिश्‍नर होता,कलेक्‍टर कमिश्‍नर एक घर में रहते,दो लालबत्‍ती की कारें घर के सामने खड़ी,चल हट तुम्‍हारी जगह चूल्‍ह चौके में है,तुम वही तक ठीक हो।

पुष्‍पा ने हिम्‍मत दिखाई आज उसने पत्‍नी धर्म को तोड़ दिया। वह तमतमाते हुए बोली घरकी नौकरानी मुझे आपने बनाया है, मुझे भी मौका मिला होता तो मैं भी कुछ बनकर दिखा सकती थी। दुर्भाग्‍यवश मां-बाप ब्‍याह की के उतावलेपन में मेरे भविष्‍य का क्‍तल करवा दिया आपके हाथों मिस्‍टर सुन्‍दरप्रसाद। दुनिया के सामने तो नौकरानी की तरह रखे बंद कमरे में मेरी शरीर से वैसे ही खेलते रहे जैसे श्‍वान हड्‌डी से खेलता है। ये दोनों बच्‍चे मैं अकेले नहीं पैदा की हूं। साथ आने जाने में आपकी महिमा मण्‍डित होता है,देखना मैं नौकरी करके दिखाउंगी।

घर में शोर सुनकर पुष्‍पा आ धमकी। घर की नौकरानी यानि इकलौती बहू को खरखोटी सुनायी पर पुष्‍पा के जबान पर लटका ताला आज अनायास टूट गया था। वह अपनी बात बेधड़क रखे जा रही थी। उसकी हिम्‍मत को देखकर सुन्‍दरप्रसाद के होश उड़ चुके थे। पुष्‍पा बोली सांरी माय डियर हसबैण्‍ड,आई मैनेज माई ओन प्रोबल्‍म एण्‍ड गिभ बेटर फयूचर टू माई किडस्‌ कहते हुए वह सासूमां से आंखों में आंसू लिये अपने मन की बात कह सुनायी।

रजनी-तुमको नौकरी करनी है।

पुष्‍पा-हां सासूमां बच्‍चों के अच्‍छे भविष्‍य के लिये। मैंनेजर साहब तो फेल हो गया। इनकी सारी मैनेजरियल स्‍किल मुझे नौकरानी बनाये रखने में निकलती रही और खुद फेल हो गये। दो साल से हाथ पर हाथ धरे बैठे है। ऐसे कैसे काम चलेगा। बच्‍चों के स्‍कूल की फीस जमा करनी है। बाबूजी की दी छत है वरना क्‍या हाल होता ऐसे पति के साथ।

रजनी-पुष्‍पा तू इस घर की इकलौती बहू है,अब तक जो हुआ भूल जाओ। तुमको भी अपनी किस्‍मत अजमाने का मौका मिलना चाहिये। सुन्‍दरप्रसाद के पिता भी इस दुनिया में रहे और ना ही तेरे मां-बाप। मैं अपनी आंखों के सामने तुम लोगों को सम्‍पन्‍न देखना चाहती हूं। बहू तुम्‍हें भी अपना भाग्‍य अजमाने का मौंका है,मेरी आंखों के सामने तुम्‍हारी मनोकामना पूरी हो जाती तो मैं भी चैन से मर सकूं। रजनी की ऐसी बात सुनकर पुष्‍पा रजनी का पांव पकड़कर बोली सासूंमां मरने की बात ना करो।

रजनी-पुष्‍पा के सिर पर हाथ रखते हुए बोली बहू तुम्‍हारी काबिलियत को हम लोगों ने कोई अहमियत नही दी। तुम कैन्‍टीन की एक बेजुबान अवैतनिक कर्मचारी बनी रही। तुमने कभी भी अपने लिये कुछ नहीं मांगा। आज तुमने मांगा भी है तो घर परिवार के लिये। तुम अपनी किस्‍मत अजमा सकती हो बहू मेरी आर्शीवाद तुम्‍हारे साथ है। हो सकता है तुम्‍हारे प्रयास से घर की आर्थिक स्‍थिति में सुधार आ जाये। काश तुम्‍हारी काबिलियत को पहले समझ लिया गया होता। इस परिवार के सुन्‍दरप्रसाद और खूबी को काबिल समझते रहे । दोनो ने आपनी काबिलियत दिखा दिया,पुष्‍पा जब से तुम इस घर में आयी हो अग्‍नि परीक्षा ही दे रही हो । अब तुम खुद अग्‍नि परीक्षा देने जा रही हो,भगवान तुम्‍हें सफलता दे।

पुष्‍पा-सासूंमां मैंने बहुत लगन से पढ़ाई पूरी की हूं। मां-बाप दादा-दादी ही नहीं पूरे कुटुम्‍ब की लाडली थी पर नसीब ने धोखा दे दिया और मैंनेजर साहब और प्रसाद परिवार की नौकरानी हो गयी। दुर्भाग्‍यवश इसके लिये मेरे बाप ने अपनी इकलौती बेटी के लिये अपने जीवन भर की कमाई कुर्बान कर दी और खुद कंगाल हो गये। पुष्‍पा सुन्‍दरप्रसाद की ओर मुखातिब होते हुए बोली वाह रे मैनेजर साहब क्‍या सिला दिया आपने धर्मपत्‍नी को रात में वेश्‍या और दिन में नौकरानी बना कर रख दिया। आपने जो भी दुर्व्‍यवहार मेरे साथ किया मैंने उसे भी स्‍वीकारा । आपकी उन्‍नति के लिये हमेशा प्रार्थना करती रहती हूं।

रजनी-अभी बहुत देर नहीं हुई है,यदि तुममें हुनर है तो दिखा सकती है प्रसाद परिवार के भले के लिये इकलौती बहू होने के नाते।

पुष्‍पा-हां सासूमां जरूर दिखाउंगी। प्रसाद परिवार ही मेरा अस्‍तित्‍व है,उसके हित में पहले दर्द सही अब हुनर का उपयोग भी क्‍योंकि प्रसाद परिवार के हुनर को जमाना ने देख लिया है।

रजनी-बहू बात करने का नहीं कर दिखाने का वक्‍त है। प्रसाद परिवार जर्जर कश्‍ती को अब तुम्‍हारा ही भरोसा है।

पुष्‍पा-हां सासुमां कहते हुए,आंसू पोछते हुए वह सीधे अन्‍दर गयी अपने साथ मायके से लायी सन्‍दूक उठाकर आंगन में पटकी दी।

रजनी-पुष्‍पा सन्‍दूक क्‍यों तोड़ रही हो।

पुष्‍पा-तोड़ नहीं रही हूं सासूमां इसी सन्‍दूक में मेरे सपने सजाने का साजो सामान पड़ा है।

रजनी-क्‍या ?

पुष्‍पा-जंग खायी फाईल हवा में लहराते हुए बोली मिल गया वो साजो सामान।

रजनी-इतना बावली क्‍यों हो रही है।

पुष्‍पा-मुझे हुनर दिखाने का मौका जो दिया है प्रसाद परिवार की मुखिया ने।

कुछ ही पलों में पुष्‍पा की जीवन शैली एकदम बदल गयी। वह दूसरे दिन जल्‍दी उठी,घर का झाड़ू पोंछा कर खुद स्‍नान की । पूजा घर में स्‍थापित देवी देवताओं के साथ अपने स्‍वर्गीय ससुर चिन्‍ताप्रसाद की प्रज्ञा,शील और करूणा के प्रतीक बुद्ध भगवान की तस्‍वीर रखकर मौन लम्‍बी पूजा अर्चना की। पूजा अर्चना के बाद पति सुन्‍दरप्रसाद और सासुमां का चरण स्‍पर्श कर वह घर से अकेले निकल पड़ी। पुष्‍पा रोज सुबह घर से ऐसे ही निकलती और शाम ढलते वापस आ जाती। बड़ी आस्‍था और श्रद्धा के साथ घर का काम कर रजनी उखड़ती सांस को सहारा देती,पति सुन्‍दरप्रसाद को ढांढस बंधाती। अन्‍ततःपुष्‍पा को एक कालेज में हिन्‍दी प्राध्‍यापक की नौकरी मिल गयी। धीरे-धीरे पुष्‍पा के प्रयास से प्रसाद परिवार में सुख-शान्‍ति और वैभव स्‍थापित हो गया। पति सुन्‍दरप्रसाद और रजनी के लिये वही पुष्‍पा जिसकी कद्र नौकरानी जैसी भी नहीं थी आत्‍मसम्‍मान बन गयी। रजनी स्‍वाभिमान से कहती फिरती पुष्‍पा प्रसाद परिवार की इकलौती बहू जर्जर कश्‍ती को स्‍वर्णिम बना दिया। बहू भले ही इकलौती हो पर पुष्‍पा वही पुष्‍पा जो फूटी आंख भी नहीं भाती थी।

 

डा․नन्‍दलाल भारती

आजाददीप,15-एम-वीणा नगर,इंदौर । म․प्र․। -452010

पुस्‍तक समीक्षा

पुस्‍तक ः अजनबी मौसम से गुजरकर

लेखक ः विनोद कुमार

प्रकाशकः प्रकाशन संस्‍थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई

दिल्‍ली-110002

मूल्‍य ः 150/-

अजनबी मौसम से गुजरकर पंद्रह कहानियों का संग्रह है जो लंबे अंतराल पर लिखी गयी है. पुस्‍तक के लेखक विनोद कुमार कवि, नाटककार, निर्देशक एवं अभिनेता भी है जिनकी हिन्‍दी और अंग्रेजी में ग्‍यारह पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी है तथा चार पुस्‍तकें प्रकाशनाधीन है. आकाशवाणी दूरदर्शन से पचास से ज्‍यादा नाटक प्रसारित होते रहे हैं तथा पंद्रह नाटकों का देश के विभिन्‍न नगरों-महानगरों में लगभग 150 बार मंचन एवं प्रदर्शन हो चुका है. लेखक विनोद कुमार फिल्‍म ‘आक्रांत' के लेखक और निर्देशक भी है जिसका प्रीमियर दूरदर्शन के राष्‍ट्रीय चैनल पर हो चुका है जो टाइम वीडियो पर उपलब्‍ध है. इसके अतिरिक्‍त लेखक झारखंड़ केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालय, राँची में अंग्रेजी केन्‍द्र के अघ्‍यक्ष एवं भाषा स्‍कूल के डीन है.

लेखक ने पुस्‍तक के प्रस्‍तावना में लिखा है कि पुस्‍तक में संग्रहित कहानियाँ आज के समय की पड़ताल करती हुई उस आदमी का आकलन करती है जो खुद अपने आपसे और व्‍यवस्‍था से लड़ते हुए लहूलुहान हो रहा है. कहानियों के तमाम चेहरों में अक्‍स हमारे आसपास परिचित उन संवेदनाओं की कथा व्‍यथा है जहाँ हम पूरी शिद्‌दत के साथ अपने होने का एहसास करते हैं.

‘अजनबी मौसम से गुजरकर पाठकगण महसूस करेंगे कि इतने सहज सरल शब्‍दों में आज के जीवन की विसंगतियों की परतों को खोलना हर लेखक के बूते की बात नहीं है. पाठकों को इन कहानियों में जिंदगी से मुलाकात होगी. आज जब ज्‍यादातर कहानियों के केन्‍द्र में देह-विमर्श है, ऐसे में खुद को इस चलन से अलग कर लेना विनोद कुमार की बहुत बड़ी उपलिब्‍ध्‍ मानी जाएगी.कथाकार किसी भोगे हुए यथार्थ को ही अपने कथानक का आधर बनाता है. वह यथार्थ उसका भोगा हुआ भी हो सकता है, कोई देखी हुई घटना भी हो सकती है या किसी व्‍यक्‍ति से सुनी हुई दास्‍तान भी हो सकती है. केवल कल्‍पना से कहानी नहीं बनती और अगर केवल कल्‍पना से कहानी बना दी जाए तो उसमें तथ्‍य की गम्‍भीरता नहीं होती यद्यपि यह भी सत्‍य है कि यथार्थ का सपाट वर्णन कहानी की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. घटना का विवरण रचनाकार की शैली और संप्रेषणीयता के आधर पर ही कहानी का रूप ले पाता है. कथाकार विनोद कुमार एक ऐसे ही कथाकार है जो तथ्‍यों से छेड़छाड़ नहीं करते अपितु अपनी शैली और प्रस्‍तुतीकरण क्षमता से उसे पठनीय और ग्राह्‌य बना देते है. लेखक विनोद कुमार ने जीवन की सच्‍ची कहानियाँ लिखी है. यह अच्‍छी बात है कि कुछ ‘उतर आध्‍ुनिक' लेखकों की तरह विनोद कुमार संवेदना को बीते जमाने की चीज नहीं मानते बल्‍कि पूरी संवेदना के साथ लिखते हैं.

जहाँ एक ओर टी.वी., फिल्‍म या अखबारों में स्‍त्री-पुरूष के यौन संबंधें की कहानियों को प्रमुखता दी जा रही हो, वहाँ विनोद कुमार जैसे कथाकार जो जीवन यथार्थ को महत्‍व दे, आम आदमी के संघर्षों को स्‍वर दे तो इस प्रवृति की सराहना होनी चाहिए. संग्रह की पंद्रह कहानियाँ किसी न किसी मुद्‌दे का उघाड़ती है. विनोद कुमार के इस संग्रह को पढ़कर लगता है कि वह कहानी के कहानीपन को बचाए रचाने वाले कहानीकार है. संग्रह की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आलोचकों और प्रबुठ्ठ पाठकों को भी कहानियाँ पंसद आयेंगी वहीं सामान्‍य पाठक भी इन कहानियों से जुड़ने में दिक्‍कत महसूस नहीं करेंगे.

राजीव आनंद, प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा, गिरिडीह-815301ए झारखंड़, संपर्क 9471765417

अहा! बचपन

प्रार्थना,

तुम्‍हारी मम्‍मी से जब मैं स्‍मार्टफोन के फीचर्स सीख रहा था, तो तुम्‍हारी प्रतिक्रिया थी, ‘‘नानू, आपके माम डेड ने नहीं सिखाया था क्‍या ? ‘‘मेरे उत्तर‘‘ उस समय ये सब नहीं थे‘‘। पर तुम्‍हारी जिज्ञासा थी कि मेरा बचपन कैसा था ? तुम्‍हें होस्‍टल जाना था, इसलिए आज तुम्‍हें इस पत्र के माध्‍यम से अपने बचपन की एक झलक भर दिखलाने का प्रयास कर रहा हूँ।

माम को अम्‍मा, डेड को बाबूजी, सिस को दीदी, ब्रो को भैया, आंटी को मौसी चाचीजी, अंकल को ताऊजी चाचाजी, काम वाली बाई को काकी, नानू को नानाजी, दादू को दादाजी कहते थे। साइकिल से स्‍कूल जाते समय हेलमेट नहीं पहनना होता था, टी.वी. नहीं होने से अम्‍मा बाबूजी के पास हमारे लिए समय होता था, स्‍कूल से आने के पश्‍चात गली में साथियों के साथ खेलते थे, इसलिए हमें फेसबुक फे्रन्‍डस की आवश्‍यकता नहीं थी। दादी की मठरी इतनी स्‍वादिष्‍ट होती थी कि हमें मेगी, पीजा की कमी महसूस नहीं होती थी। लालटेन की हल्‍की रोशनी में पढ़ने पर भी हमें चश्‍मा नहीं लगा, प्‍लेट भर चावल मिठाई खाने पर भी हमें मोटापे की बीमारी नहीं लगी, कुऐं नल का पानी भी हमें स्‍वस्‍थ रखता था। इसलिए हमें आरओ एवं मिनरल वाटर बोटल की आवश्‍यकता नहीं थी। दादाजी नानाजी के पास हमारी हर समस्‍या का समाधान था। इसलिए हमें गूगल सर्च की कमी नहीं खली, हमें हेल्‍थ सप्‍लीमेन्‍ट्‌स, बैटरी वाले खिलौने, ट्‌यूशन, कोचिंग की आवश्‍यकता नहीं थी।

हम अपने रिश्‍तों मित्रों के यहां कभी भी आ जा सकते थे, इसलिए हमें उनकी परमिशन के लिए मोबाइल की आवश्‍यकता नहीं थी। हमे बड़े भाई बहनों के छोटे हो गए कपड़ो से कोई परहेज नहीं था, अम्‍मा, दादीजी, भाभी, बुआजी को फेशियल, मेकअप, वेक्‍स की आवश्‍यकता नहीं थी। हम साधारण डॉक्‍टर की गोली या वैद्यजी की पुड़िया से ही ठीक हो जाते थे, इसलिए उस समय पेडीटे्रशियन नहीं होते थे, बर्थडे केक की क्रीम से हमें चेहरे को कार्टून नहीं बनाना होता था, दादीजी का जन्‍मदिन पर रोली चावल का तिलक ही हमारे मस्‍तक की शोभा होता था। महीने के आखिरी सप्‍ताह में अम्‍मा को सब्‍जी लाने के लिए हम खुशी से अपनी गुल्‍लक की अनमोल बचत दे दिया करते थे।

अम्‍मा बाबूजी का कहना ही हमारे लिए आदेश होता था, बहन से लड़ते थे, पर वही बहन हमें अम्‍मा की मार से भी बचाती थी। राखी पर हमने बहन को मोबाइल, कपड़े, रिंग कुछ नहीं दिया फिर भी वह हमें राखी बांधती थी। हमारे मित्र स्‍थायी थे, इसलिए हमें उन्‍हें हर साल फ्रेंडशिप बैंड नहीं बांधने होते थे।

अम्‍मा के बीमार होने पर ब्रेड नहीं लानी पड़ती थी। पड़ौस की चाची के यहां जाकर खाना खा लेते थे। पड़ौस की कमला ताईजी हमारे लिए केजुएलिटी की डॉक्‍टर थी। हमारी ही रसोई में से हीगं, अजवाइन लाकर हमें पानी से खिला देती थी। घाव पर हल्‍दी घी का छोंक लगाकर बांध देती थी। हमें न तो टिटनेस के इंजेक्‍शन, न ही ऐंटीबायोटिक की गोलियों की जरूरत थी। जुकाम तो अदरक तुलसी की चाय से ही ठीक हो जाता था। ताऊजी के अचानक आ जाने पर भी अम्‍मा को ड्रेस बदलने की चिन्‍ता नहीं होती थी, क्‍योंकि वे हमेशा साड़ी में ही रहती थी।

खूब पत्र लिखते थे, डाकिया चाचा हर रोज आता था, एस.एम.एस. टि्‌वटर की तरह कैरेक्‍टर्स की संख्‍या की सीमा नहीं थी। हाँ हमारे कैरेक्‍टर (चरित्र) पर घर की आंखों के अतिरिक्‍त पड़ौस की भाभी ताईजी की भी नज़र रहती थी, उन्‍हें भी हमें डांटने समझाने का पूरा अधिकार था। मदर्स डे, फादर्स डे, टीचर्स डे नहीं होते थे, हर दिन माता पिता गुरू के लिए समर्पित था। वर्तमान के शहर की प्रतिष्‍ठित कम्‍पनी के शीर्षस्‍थ अधिकारी से अधिक सम्‍मान हमारे पोस्‍टमास्‍टर बाबूजी को मिलता था। मेरे दादाजी की मृत्‍यु पर हमारे घर के सामने बोहरा मुस्‍लिम के होटल मालिक ने 13 दिन तक रेडियो बंद रखा था। डाकघर में सर्तकता अधिकारी नहीं था, पर हमारे बाबूजी को लिफाफे पोस्‍टकार्ड के पैसे पोस्‍ट अॉफिस में जमा कराने होते थे।

हमारी बहनें घर स्‍कूल दोनों जगह सुरक्षित थीं। दादाजी के मन्‍दिर के भगवान में इतनी श्रद्‌धा थी कि हमें किसी को गुरू महात्‍मा, स्‍वामी, संत बनाने मानने की आवश्‍यकता नहीं थी। शिक्षा में ज्ञान भी सम्‍मिलित था, इसलिए हमने किसी गुरू से दीक्षा नहीं ली। गर्मी में छत पर आंगन में सोते थे, इसलिए पंखे के लिए बिजली नहीं होने पर इनवर्टर की आवश्‍यकता नहीं थी। हिन्‍दी माध्‍यम के स्‍कूल में भी हमें रेन एंड मार्टिन की लाल किताब से जो सशक्‍त अंग्रेजी की ग्रामर पढ़ाई गई थी, वह आज भी एस.एम.एस. वाली अंग्रेजी के वाइरस से प्रभावित नहीं हुई। मैं आज भी एस.एम.एस. में उसी प्रकार सही अंग्रेजी लिखता हूँ, जो परीक्षा में लिखता था।

घर का खाना अमृत सदृश होता था। फ्‍लेट, मकान नहीं थे, पर दो कमरों का निवास भी घर था। पांचों भाई बहन एक ही चौकी पर पढ़ते थे, सुख-दुःख आते थे, पर प्‍यार, स्‍नेह, अपनापन इतना अधिक था कि दुःख जल्‍दी भाग जाता था। जीवन का गिलास कभी खाली नहीं रहा, भरा मात्र भी नहीं हमेशा छलकता ही रहा।

जीवन सरल, संतुष्‍ट, सार्थक था, जीवन संध्‍या में बचपन की वही सादगी, चरित्र, अनुशासन काम आ रहा है।

यह पत्र तुम्‍हें स्‍केन करके ई-मेल भी कर सकता था पर डाक से इसलिए भेज रहा हूँ कि पोस्‍टमेन अंकल होस्‍टल में तुम्‍हारे नाम का तुम्‍हारे जीवन का पहला लिखित पत्र लेकर आऐंगे तो तुम्‍हें वाट्‌स अप, एस.एम.एस., लाइक, कमेंट की अपेक्षा लिखित पत्र का महत्त्व महसूस होगा

 

सस्‍नेह

शुभाकांक्षी

दिलीप

दिलीप भाटिया ;क्‍पसममच ठींजपंद्ध, रावतभाटा 323307,

ई-मेल - dileepkailash@gmail.com

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जय जवान

       इस घटना से जुड़े सभी नाम छुपाते हुए मैं एक सच्चा किस्सा बयां कर रहा हूँ। आर्मी में भर्ती के लिए प्रत्याशियों को कुछ मनोवैज्ञानिक सवालों 

से भी गुजरना पड़ता है। कोई 20 - 21 वर्ष  पहले एक मीटिंग के दौरान एक वरिष्ठ व्यक्ति ने जब शीर्षस्थ पद पर आसीन एक अधिकारी को बताया 

कि उनके विभाग ने प्रत्याशियों को परखने के लिए जो नई मनोवैज्ञानिक प्रश्नावली तैयार की है, वह बहुत ही त्रुटिहीन है तो शीर्षस्थ पद पर आसीन 

उस अधिकारी ने हम सभी को अपना एक अनुभव सुनाया। कुछ समय पहले उनके ड्राइवर ने उनसे आग्रह किया था कि वे उसके बेटे मंजीत  को फ़ौज 

में भर्ती करवाने की कृपा करें। उन्होंने उसी समय ड्राइवर द्वारा बताये गए भर्ती केंद्र के मुखिया को फोन पर मंजीत की मदद करने को कहा। तीन - चार 

दिन बाद भर्ती केंद्र के मुखिया ने खेद प्रकट करते हुए उन्हें सूचना दी कि मंजीत फ़ौज के लिए फिट नहीं पाया गया।  

      खैर, यही कोई छह महीने बाद उनका ड्राइवर मिठाई का डब्बा लिए उनके कमरे में दाखिल होते हुए बोला - साहब, मंजीत भर्ती हो गया है। " डब्बे 

से मिठाई का टुकड़ा उठाते हुए जब  उन्होंने ड्राइवर को थोड़ा कुरेदा तो पता चला कि जो काम उन जैसा उच्च अधिकारी न करवा पाया था , वह दलाल 

को दस हजार रुपये देने से  हो गया था । 

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रिश्तेदार

           आज सुबह जब  समाचार पत्र देखा था तो उस समय यह  बात मुझे कुछ स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आई थी । सूबे के वर्तमान मुख्यमंत्री के बेहद 

करीबी पत्रकार मानवेन्द्र ने संपादकीय पृष्ठ पर छपे अपने लेख में उन पर नियमों की अवहेलना करते हुए अपने कुछ चुनिंदा लोगों को सरकारी ठेके दिलाने 

के आरोप लगाये थे। कुछ दिन पहले तक मुख्यमंत्री के साथ दिखने और उनके कसीदे काढ़ने वाले मानवेन्द्र को अचानक यह क्या हुआ, यह बात मैं उस समय 

तो नहीं समझ पाया था किन्तु अब इस पहेली का समाधान हो गया है । विश्वनीय सूत्रों  से पता चला है कि मुख्यमंत्री ने चुनाव से पहले मानवेन्द्र को अपना 

मीडिया एडवाइजर नियुक्त करने का जो वादा किया था, उसे भूलते हुए उन्होंने दो दिन पहले अपने किसी करीबी रिश्तेदार को यह जिम्मेदारी सौंपी है।  

          बहरहाल, मानवेंद्र के अनुसार सूबे की तरक्की के लिए हाइ कमांड को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी किसी ऐसे नेता को सौंपनी होगी जो जनता से किये 

गए वादों को निभाने के लिए ठोस पहल करे । आप नैतिकता का सवाल उठा सकते हैं  किन्तु मुझे तो मानवेन्द्र का यह गुस्सा वाजिब लगता है। आखिर, वह 

भी तो जनता का हिस्सा है और उससे भी ऊपर मेरा करीबी रिश्तेदार है। 

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बेताल का सवाल

            अभी राजा विक्रम शव को कंधे पर लादकर कुछ ही कदम चले  थे  कि तभी उस शव में मौजूद बेताल ने अपनी पुरानी शर्त को दोहराते हुए राजा 

विक्रम को यह नयी कथा सुनाई। बेताल बोला, " महाराज, सिर्फ परिश्रम करने से लाभ नहीं होता है। सफलता के लिए परिश्रम के साथ चालाकी भी जरूरी है। 

उदहारण के लिए शायद तुम उस व्यक्ति को जानते हो जो युवावस्था में गुंडई करता था लेकिन अब इस देश में एक प्रदेश पर शासन कर रहा है और बड़े - बड़े 

विद्वानों से अपनी चरण वंदना करवा रहा है। मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि ये तथाकथित विद्वान सब कुछ जानते हुए भी उसकी चरण वंदना क्यों करते हैं ? " 

           शर्त को भूलते हुए राजा विक्रम ने तनिक क्रोधित होते हुए कहा, " हे बेताल, ये  सभी विद्वान सरकार द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों और अन्य सुविधाओं 

को प्राप्त करने हेतु उस घटिया इंसान की चापलूसी में लगे रहते हैं। " बहरहाल, राजा के जवाब को सुनकर बेताल ने फिर वही किया जो वो आजतक करता आया है। 

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- सुभाष चन्द्र लखेड़ा, सी - 180 , सिद्धार्थ कुंज, सेक्टर - 7, प्लाट नंबर - 17, नई दिल्ली - 110075.

ऐसे आचरण पर हमारी खामोशी आखिर क्यों ?

डॉ.चन्द्रकुमार जैन

देश की राजधानी में एक युवती के साथ चलती बस में बलात्कार की घटना की चर्चा जमकर हुई थी। निर्भया का मामला अब संवेदना और प्रतिक्रिया से ज्यादा प्रचार के रूप में ढल-सा गया मालूम पड़ता है।संसद में हर दल की ओर से इस पर चिन्ताव्यक्त की गयी और बलात्कार के अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा का कानून बनाने के सुझाव भी दिए गए। पहल भी हुई। लेकिन अफ़सोस है कि  21 वीं सदी में इन पुराने पड़ चुके सुझावों पर चर्चा का दौर आज भी लगातार चल रहा है।

देश में यह अपने किस्म का अलहदा विरोध प्रदर्शन कहा जा सकता है। फिर भी, बात सिर्फ अनाचार या दुराचार की नहीं, देश में ऐसे न जाने कितने मामले हैं जिन्हें सीधे या प्रकारांतर से दुराचार की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए लेकिन जिन्हें लेकर हम न कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, ना ही ऐसे आचार-व्यवहार के अँधेरे को चीरने वाली कोई किरण तलाशते हैं। सोचें आखिर ऐसा क्यों ?

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की कठोर सजा दी जानी चाहिये, लेकिन सजा तो घटना के घटित होने के बाद का कानूनी उपचार है। हम ऐसी व्यवस्था पर क्यों विचार नहीं करना चाहते, जिसमें ऎसी घटनाएं हो ही नहीं। हमारे देश में केवल स्त्री के साथ ही बलात्कार नहीं होता है, बल्कि हर एक निरीह, असहाय और मजबूर व्यक्ति के साथ हर दिन और हर पल कहीं न कहीं असद व्यवहार होता ही रहता है। उसे आप क्या कहेंगे ?

मसलन मिसाल की तौर पर समझें कि एक पुलिस का जवान कानून व्यवस्था का हिस्सा बनने केलिये पुलिस में भर्तीहोता है, लेकिन पुलिस के आला अफसर या उसका बॉस  उसे अपने घर पर अपनी और अपने परिवार की चाकरी में तैनात कर देता है। जहॉं उसे केवल घरेलू कार्य करने होते हैं-ऐसा नहीं है, बल्कि उसे अफसर की बीवी-बच्चियों के गन्दे कपड़े भी साफ करने होते हैं। आप ही बतिये क्या यह उस पुलिस कॉंस्टेबल के सम्मान का बलात्कार नहीं है?

जब एक व्यक्ति न्याय के मन्दिर में,सब जगह से निराश होकर न्याय पाने की आस लेकर जाता है तो उसे न्याय के मन्दिर में प्रवेश करने के लिये सबसेपहले वकीलों से मिलना होता है, जिनमें से कुछेक को छोड़कर अधिकतर ऐसेव्यक्ति के साथ निर्ममता और ह्रदयहीनता से पेश आते हैं। वे अपनी मनमानीफीस के अलावा कोर्ट के कागज बनवाने, नकल लेने, मुंशी के खर्चे और अदालत के बाबू को खुश करने आदि न जाने कितने बहानों से न्यायार्थी से हर पेशीपर मनमानी वसूली करते रहते हैं। जिसकी पूर्ति के लिये ऐसे मजबूर व्यक्तिको अपनी पत्नी के जेवर तक बेचने पड़ते हैं। अपने बच्चों को बिना सब्जी रूखी रोटी खिलाने को विवश होना पड़ता है। अनेक बार अपनी अचल सम्पत्ति भी गिरवी रखनी या बेचनी पड़ती है। इसे आप क्या कहेंगे ?

जब एक बीमार उपचार के लिये डॉक्टर के पास जाता है तो वह अस्पताल में उसकी ओर ध्यान नहीं देता है। अस्पताल या क्लीनिक में बैठक यानी मरीजों के इंतज़ार के लिए पर्याप्त सही जगह के अ भाव, पीने के पानी तक की सुविधा न होने पर भी अपने क्रम से मिलने की शर्तें होती हैं।

कहीं-कहीं तो अपनी बारी की प्रतीक्षा में मरीज का डैम घुटने लगता है फिर भी उसे डॉक्टर के घर मोटी फीस अदा करके दिखाने को विवश होना पड़ता है! केवल फीस से ही डॉक्टर का पेट नहीं भरता है, बल्कि अपनी अनुबन्धित लेबोरेटरी पर मरीज के अनेक टेस्ट करवाये जाते हैं और मंहगी कीमत वाली दवाएँ लिखी जाती हैं। जिनमें से डॉक्टर को प्रतिदिन घर बैठे मोटी राशि कमीशन में मिलती है। शरीर का इलाज कराते-कराते मरीज आर्थिक रूप से बीमार हो जाता है। क्या यह मरीजों का डॉक्टरों द्वारा हर दिन किया जाने वाला यह व्यवहार किस श्रेणी में आता है ?

एक प्रोफ़ेसर जिसे किसी ख़ास विषय में पढ़ाने के लिए चुना गया है। अच्छी तनख्वाह है,सम्मानजनक ज़िंदगी है, लेकिन वह न तो विद्यार्थियों को पढ़ाता है, न ही उन्हें प्रेरित करने का कोई माद्दा उसके पास है। पढ़ाना-लिखाना छोड़कर वह सब कुछ करता है। इसे आप किस दर्जे में रखेंगे? ऐसे कई उदाहरण और भी दिए सकते हैं। शिक्षक पढ़ाते नहीं, दीगर तमाम काम करते हैं। मस्तिष्क की खुराक देना तो दूर, पोषाहार को बेच दिया जाता है। आँगनवाड़ी केन्द्रों पर बच्चों की देखरेख करने के बजाय उन्हें कुछ घण्टे के लिये कैद करके रखा जाता है।

इन हालातों पर हमारी खामोशी आखिर किस बात का सबूत है, फैसला आप कीजिए।

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लेखक दिग्विजय कालेज,राजनांदगांव में प्राध्यापक हैं।

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स्वामीनारायण अक्षरधाम (गोवर्धन यादव)

स्वामीनारायण अक्षरधाम एक नूतन-अद्वितीय संस्कृति-तीर्थ है. भारतीय कला, प्रज्ञा और चिंतन का बेजोड संगम यहाँ देखा जा सकता है. भारतीय संस्कृति के पुरोधा, स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक श्री घनश्याम पाण्डॆ या सहजानन्दजी ( 1781-1830) की पुण्य स्मृतियों को समर्पित स्वामीनारायण अक्षरधाम के आकर्षण से प्रभावित होकर जन-सैलाब खिंचा चला आता है..और स्वामी के दर्शन कर अपने को अहोभागी मानता है. धर्म और संस्कृति को समर्पित इस महामानव ने अपने आपको तप की भट्टी में तपाया, ज्ञान की लौ को प्रज्जवलित किया, और संचित पुण्यों को जनसाधारण के बीच समर्पित कर दिया.

एक दिव्य महापुरुष योगीजी महाराज ने आशीर्वाद दिया था कि यमुना के पावन तट पर एक भव्य आध्यात्मिक महालय की स्थापना होगी, जिसकी ख्याति दिग-दिगन्त में होगी. गुणातीत गुरुपरंपरा के पांचवे गुरु/ संतशिरोमणी/ दिव्य व्यक्तित्व के धनी विश्ववंदनीय प्रमुखस्वामी महाराजजी ने अपने गुरु के

. clip_image004 उस परिकल्पना को पृथ्वी- तल पर साकार कर दिखाया.

स्वामिनारायण अक्षरधाम के निर्माण और संवहन का उत्तरदायित्व बी.ए.पी.एस.स्वामिनारायण संस्था ने पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन किया. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मान्यता प्राप्त यह संस्था एक अंतराष्ट्रीय सामाजिक-आध्यात्मिक संस्था है, जो विगत एक शताब्दी से मानव-सेवा मे रत है. 3700 सत्संग केन्द्रों, 15,700 सत्संग सभाओं, 850 नवयुवा सुशिक्षित संतो,, 55,000 स्वयंसेवकों द्वारा सेवित और लाखों अनुयायियों के द्वारा यह संस्था शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में अपनी प्रमुख भूमिका निर्वहन बडी लगन-श्रद्धा और समर्पण के साथ कर रही है.

यमुना के किनारे लगभग एक सौ एकड जमीन पर उस परिकल्पना को साकारित किया गया है. इस भव्य स्मारक की डिजाइन श्री महेशभाई देसाई तथा श्री बी.पी.चौधरी ने उकेरी तथा सिकन्दरा (राज) के चालीस गाँवों के लगभग सात हजार कारीगरों ने इसे तराशा-संवारा, उन्हें क्रमसंख्या दी और फ़िर ट्रकों के माध्यम से निर्माण-स्थली पर भिजवाया. अंकोरवाट, अजन्ता, सोमनाथ, कोणार्क के सूर्य मन्दिर सहित देश-विदेश के कई मन्दिरों के स्थापत्य के गहन अध्ययन-मनन और वेद, उपनिषद तथा भारतीय शिल्प की कई पुस्तकों के गहन अध्ययन से प्राप्त जानकारियों के आधार पर इसका निर्माण किया गया. विशाल भव्यता लिए इस इमारत जो बनने में जहाँ चालीस साल लग सकते थे, उसे महज पांच वर्षों में पूरा कर दिखाया. यह किसी आश्चर्य से कम प्रतीत नहीं होता. छः नवम्बर दो हजार पांच में इसकी विधिवत इसकी नींव रखी गई थी जो दो हजार दस में बनकर पूरी हुई.

घनश्याम पाण्डॆ उर्फ़ स्वामीनारायण उर्फ़ सहजानन्द स्वामीजी हिन्दू धर्म के स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक पुरुष थे. आपका जन्म 03-04-1781 अर्थात चैत्र शुक्ल 9 वि.संवत 1837 में भगवान श्रीराम की जन्मस्थलि “अयोध्या” के पास स्थित ग्राम छपिया में हुआ था. आपके पिताश्री का नाम श्री हरिप्रसाद तथा माताश्री का नाम भक्तिदेवी था. सद्ध प्रसूत बालक घनश्याम के हाथ में पद्म, पैर में बज्र, तथा कमल-चिन्ह देखे गए. इन दैवीय अलंकरों से युक्त इस बालक ने महज पांच वर्ष की आयु में अक्षर ज्ञान प्राप्त किया था. आठ वर्ष की उम्र में आपका जनेऊ संस्कार किया गया. आपने कई शात्रों का गहनता से अध्ययन किया. ग्यारह वर्ष की आयु आते ही आपके माता-पिता का देहावसान हो गया. किसी कारण से आपका अपने बडॆ भाई के साथ विवाद हो गया. उसी समय आपने अपना घरबार छॊड दिया. अगले सात साल तक आप भारत में भ्रमण करते रहे. लोग उन्हें नीलकण्ठवर्णी कहने लगे. उन्होंने अष्टांगयोग श्री गोपाल योगीजी से सीखा. उत्तर में उत्तुंग हिमालय, दक्षिण में कांचीपुरम, श्रीरंगपुर, रामेश्वर होते हुए पंढरपुर और नासिक होते हुए आप गुजरात आ गए. मांगरूल के समीप “लोज” गाँव में निवास कर रहे स्वामी मुक्तानन्दजी से परिचय हुआ, जो स्वामी रामानदजी के शिष्य थे. वे उन्हीं के साथ रहने लगे.

स्वामी रामानन्दजी ने संप्रदाय की परम्परा के अनुसार नीलकण्ठवर्णी को “पीपलाणा” गाँव में दीक्षा दी और नया नाम दिया सहजानन्द. एक साल बाद स्वामीजी ने “जेतपुर” में सहजानन्दजी को अपने संप्रदाय का “आचार्य” पद दे दिया. कुछ समय बाद रामानंदजी का देहावसान हो गया. उसके बाद वे देश भर में घूम-घूमकर ईश्वर के गुणानुवाद करते और धर्म का प्रचार-प्रसार करते हुए लोगों को स्वामीनारायण मंत्र का जाप करने की सीख देते रहे. तन-मन से ईश्वर को समर्पित सहजानन्दजी ने 1830 ई. में अपनी देह छोड दी.

स्वामीनारायन के नाम से विख्यात हुए इस महान संत का स्मारक गांधीनगर (गुजरात) मे’अक्षरधाम” स्थापत्यकला का उत्कृष्टतम नमूना है. इसी तर्ज पर दिल्ली में यमुना के पावन तट पर भव्य स्मारक बनाया गया है,जिसकी विशालता, भव्यता देखते ही दर्शानार्थी को किसी दिव्य लोक में ले जाती है. .clip_image006 दिव्य द्वार- दसों दिशाओं के प्रतीक हैं, जो वैदिक शुभकामनाओं को प्रतिबिंबित करते हैं clip_image008 भक्ति द्वार- परंपरागत भारतीय शैली का अनोखा प्रवेश द्वार clip_image010 मयूर द्वार=स्वागत द्वार में परस्पर गूंथे हुए मयूरतोरण

clip_image012 अक्षरधाम मन्दिर=गुलाबी पत्थरों और श्वेत संगमरमर के संयोजन से 234 कलामंडित स्तम्भ,, 9 कलायुक्त घुमट-मण्डपम, 20 चतुष्कोणी शिखर और 20,000 से भी अधिक कलात्मक शिल्प, इसकी ऊँचाई 141फ़ीट,चौडाई 316 फ़ीट और लंबाई 356 फ़ीट है clip_image014 श्रीहरि चरणारविंद=सोलह मांगलिक चिन्हों से अंकित श्री हरिचरणारविंद

clip_image015 मूर्ति= पंचधातु से निर्मित स्वर्णमंडित 11 फ़ीट ऊँची नयनाभिराम मूर्ति. कलामंडल. सिंहासनों पर विराजमान क्रकशः भगवान लक्ष्मीनारायण, श्रीरामजी-सीताजी, श्रीकृष्ण-राधाजी, और श्री महादेव-पार्वती जी की संगमरमर की दर्शनीय मूर्तियां

clip_image017 कलात्मक छत

clip_image019 मंडोवर= अर्थात बाह्य दीवार. कुल लंबाई 611 फ़ीट, ऊँचाई 25 फ़ीट. 4287 पत्थरों से निर्मित यह मंडोवर भारतीय नागरिक शैली के स्थापत्यों में सबसे बडा है.

clip_image021 गजेन्द्र पीठ= अक्षरधाम का यह भव्य महालय 1070 फ़ीट लम्बी गजेन्द्रपीठ पर स्थित है, 3000 टन पत्थरों से निर्मित है.,जो विश्व का एक मौलिक एवं अद्वितीय शैल्पमाल है. 148 हाथियों की यह कलात्मक गाथा, प्राणीसृष्टि के प्रति विनम्र भावांजलि है. भारतीय बोधकथाओं, लोककथाओं, पौराणिक आख्यानों इत्यादि से 80 दृष्य़ तराशे गए हैं.

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देखना न भूलें---विशेष= बाहरी दीवारों पर चारों ओर स्थापित भारतीय संस्कृति के महान ज्योतिर्धर संतों, भक्तों, आचार्यों, विभूतियों के 248 मूर्ति-शिल्प. भव्य प्रवेश मंडपम की अद्वितीय स्तंभ कलाकृति, छत में सरस्वती, लक्षमी,पार्वती आदि देवियों और गोपी-कृष्ण रास के अद्भुत शिल्प. नारायणपीठ में भगवान स्वामिनारायण के दिव्य चरित्रों के कुल 180 फ़ीट लंबे कलात्मक धातुशिल्प

प्रत्येक हाथी के साथ बदलती कलात्मक हाथी-मुद्राएं. “ हाथी और प्रकृति विभाग” में पंचतंत्र की कथाओं के प्रकृति की गोद में क्रीडा करते हाथियों की महमोहक मुद्राएं. “हाथी और मानव” विभाग में समाजजीवन से समरस हाथियों की कथाएं. “हाथी और दिव्य तत्त्व” विभाग में धर्म-परम्पराओं में हाथी की गाथाएं

खण्ड-1= सहजानंद दर्शन/प्रेरणादायक अनुभूति =रोबोटिक्स- एनिमेट्रोनिक्स, ध्वनि-प्रकाश, सराउण्ड डायोरामा आदि आधुनिक तकनिकों के माध्यम से श्रद्धा, अहिंसा, करुणा, शान्ति, आद्दि सनातन मूल्यों की अद्भुत प्रस्तुति भगवान स्वामिनारायणजी के जीवन-प्रसंगों के द्वारा.

खण्ड-२=नीलकण्ठ दर्शन= महाकाव्य सी फ़िल्म जो बालयोगी नीलकंटः की, जिन्होंने सात वर्ष तक नंगे पैर 12,ooo कि.मी. भारत की पदयात्रा की. 85 x 65 फ़ीट चित्रपट सत्य घटना पर आधारित,

खण्ड-३=संस्कृति विहार= दस हजार वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति की अद्भुत झाकी. नोकाविहार द्वारा 800 पुतलों एवं कई संशोधनापूर्ण प्रमाणभूत रचानाएं. विश्व की सर्वप्रथम युनिवर्सिटी तक्षशिला,नागार्जुन की रसायनशाला देखकर भारत के भव्य इतिहास की झांकी देखी जा सकती है.

यज्ञपुरुष कुण्ड एवं संगीतमय फ़व्वारे= लाल पत्थरों से निर्मित 300 x 300 फ़ुट लम्बा प्राचीन कुण्ड परम्परा का नमुना, कुण्ड के भीतर कमलाकार जलकुंड में संगीतमय फ़ुवारा. जल,ज्योति और जीवनचक्र का अद्भुत संयोजन. 27 फ़ीट ऊँचा बालयोगी नीलकंठ ब्रह्मचरी की प्रतिमा

नारायण सरोवर= मन्दिर के तीनो ओर प्राचीन जलतीर्थॊं की महिमापूर्ण परंपरा को समर्पित नारायण सरोवर की स्थापना की गई है. 151 तीर्थों और नदियों के पवित्र जालसिंचन से यह सरोवर परम तीर्थ बना है.

अभिषेक मण्डपम= शुभकामनाओं और प्रार्थनाओं के साथ नीलकण्ठ ब्रह्मचारी की मूर्ति पर गंगाजल से विधिपूर्वक अभिषेक.

योगी हृदय कमल=हरी घास की भव्य कालीन पर एक विशाल अष्टदश कमल.

प्रेमवती आहारगृह=अजंता की अद्भुत कलासृष्टि के आल्हादक वातावरण में शुद्द ताजा भोजन, मधुर जलपान की सुविधा.

सांस्कृतिक उद्दान=22 एकड में फ़ैले उपवन में पुष्प-पौधों का कलात्मक अभियोजन. 8 फ़ुट ऊँचे 65 कांस्यशिल्प.

सूर्यप्रकाश के सात रंगों के प्रतीकरुप सात अश्वों का अनुपम सूर्यरथ, सोलह चन्द्र कलाओं के प्रतीकात्मक 16 हिरनो का अद्भुत चन्द्ररथ, भारतीय वीररत्न, महान स्त्रीरत्न, प्रतिभावंत भारतीय बालरत्न, एवं राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने वाले महान राष्ट्ररत्नो के अभूतपूर्व कांस्यशिल्प. clip_image027 clip_image029 clip_image030

clip_image032 राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा का “अमृत महोत्सव”( 16-17 मार्च 2013) स्थान-सत्याग्रह मंडप, राजघाट दिल्ली में आयोजित किया गया था. अपने मित्रो-श्री डी.पी.चौरसिया,श्री नर्मदा प्रसाद कोरी तथा श्री विष्णु मंगरुलकरजी के साथ दिल्ली जाना हुआ.(चित्र- राजघाट में अपने मित्रों के साथ) .एक शाम स्वामीनारायण अक्षरधाम भी जाना हुआ. वहाँ के प्रचलित नियमों के चलते हम अपने कैमरे आदि अन्दर परिसर में नहीं लेजा सकते थे. अतः वहाँ से प्राप्त मार्गदर्शका के आधार पर इस आलेख को तैयार किया गया.

गोवर्धन यादव.

आखिर कब थमेगा भगदड़ का बवन्‍डर ?

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25 अगस्‍त 2014 समय सुबह 6 बजे वही समय जब श्रृद्धालु सतना जिले में स्‍थित चित्रकूट के कामतानाथ स्‍वामी के मंदिर सहित कामदगिरी पर्वत परिक्रमा में बढ़चढ़कर भाग ले रहे थे, किसी ने यह नहीं सोचा था कि उनकी यह परिक्रमा आखिरी परिक्रमा होगी। और उनकी जिदंगी के सांसें चंद मिनटों में समाप्‍त हो जायेंगी। बस बचेगी तो हर तरफ पुकार-ही-पुकार चीख-ही-चीख जिसे कोई सुनने और समझने वाला नहीं होगा बस होगा तो वहां भागने वाला ही होगा, और आस्‍था के सैलाब के भगदड़ के बवन्‍डर में बस मिलेगी तो केवल आस्‍था के पुजारियों की लाशें ही लाशें जिनके फोटो खीचने वाले तो हजारों मिल जायेंगें पर उन जिदंगियों को सहारा देने वाला कोई नहीं मिलेगा।

जी हॉं में बात कर रहा हूं मध्‍यप्रदेश के सतना जिले में भगवान राम की तपोस्‍थली कही जाने वाली चित्रकूट नगरी की जहॉं की भूमि ऋषियों और मुनियों के तप से पावन बन गई, माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने सीता और लक्ष्‍मण के साथ अपने वनवास के चौदह वर्षों में से ग्‍यारह वर्ष इसी पावन भूमि पर बिताए थे। इसी भूमि पर ऋषि अत्रि और माता सती अनसुइया ने ध्‍यान लगया था। तथा ब्रम्‍हा विष्‍णू और महेश ने इसी पावन भूमि पर सती अनसुइया के घर जन्‍म लेकर इसी धरती को ध्‍न्‍य कर दिया था। जो मंदाकिनी नदी के किनारे पर बसा ‘’चित्रकूट धाम’’ के नाम से जाना जाने जगा और आज भी इस चित्रकूट धाम कि महिमा लोग गाते चले आ रहे हैं।

मध्‍यप्रदेश के कुछ हिस्‍से सहित उत्‍तरप्रदेश के 38,2 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला शांत और सुन्‍दर चित्रकूट धाम प्रकृति और ईश्‍वर कि अनुपम देन है। चारों और से विन्‍ध्‍य पर्वत श्रृखंलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्‍चर्यो की पहाडी कहा जाता है। इस भूमि पर मंदाकिनी नदी के किनारे बने अनेक घाट और मंदिर में पूरे साल श्रृद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। इसी के चलते भले ही प्रशासन ने सोमवती अमावस्‍या के दिन श्रृद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पुख्‍ता इंतजाम किये हों, पर इस धार्मिक नगरी में हुऐ हादसे ने एक बार फिर मध्‍यप्रदेश के रतनगढ़ में हुऐ हादसे की भयावह तस्‍वीर सामने ला दी है। मध्‍यप्रदेश के रतनगढ़ हादसे ने श्रृद्धालुओं को जो जख्‍म दिये वो पूरे भर भी नहीं पाये कि एक और बड़े हादसे कि भयावह तस्‍वीर हमारे सामने हैं। नौ महीने पहले रतनगढ़ हादसे में लगभग 117 लोग आस्‍था के सैलाब के भगदड़ के बवन्‍डर के काल के गाल में समा गये। परिणामस्‍वरूप शासन प्रशासन ने ऐसी घटनाओं को भविष्‍य में रोकने हेतु व्‍यापक स्‍तर पर इंतजामात किये थे। फिर भी धार्मिक नगरी चित्रकूट में परिक्रमा के दौरान आस्‍था के उस सैलाब के भगदड़ के बवन्‍डर में 10 श्रृद्धालुओं की मौत हो गई और सैकड़ों लोग जिंदगी और मौत से लड़ रहें हैं।

क्‍या आस्‍था के मंदिर में घटी इन घटनाओं की जिम्‍मेदारी लेने का काम मात्र शासन और प्रशासन का हैं? या फिर इन घटनाओं के दोषी मूल रूप से आस्‍था के वे पूजारी भी हैं, जो कभी साईं को भगवान मानने से इंकार करते हैं तो कभी धर्म की आड़ में भगवान को बॉटने के काम में लगे हुऐ हैं। पर कभी उन्‍होंने देश के धार्मिक तीर्थ स्‍थानों पर लगने वाले मेलों में श्रृद्धालुओं की सुरक्षा व्‍यवस्‍था की बात नहीं की । भारत देश में सभी को स्‍वतंत्रा का अधिकार प्राप्‍त है, जिसके अनुसार कोई भी व्‍यक्‍ति को यह अधिकार प्राप्‍त है कि वो किसी धर्म अथवा मंदिर या भगवान के प्रति आस्‍था रख सकता है। फिर भी हम यह सब भूलकर अपने धर्म या अपने मंदिर को श्रेष्‍ठ सावित करने में नहीं हिचकिचाते हैं।

आखिर क्‍यों? देश के तमाम मंदिरों और धार्मिक तीर्थ स्‍थानों पर आने वाले श्रृद्धालुओं की बेहतर सुरक्षा व्‍यवस्‍था और उनकी जानमाल की रक्षा करने की बात करने वाला कोई नहीं है। क्‍या आपकी आस्‍था के स्‍थान पर आपकी सुरक्षा करने की जिम्‍मेदारी मात्र शासन प्रशासन की है? या फिर उन लोगों की भी है जो भगवान को बॉंटने की कसम खा बैठे हैं। एक ओर श्रृद्धालुओं को रतनगढ़ हादसे ने दिये जख्‍म भर भी नहीं पाये कि सोमवती अमावस्‍या के दिन लगभग नौ महीने के अंतराल में धार्मिक नगरी कही जाने वाली चित्रकूट नगरी के कामतानाथ स्‍वामी के कामदगिरी पर्वत की परिक्रमा के समय मची भगदड़ ने लगभग 10 श्रृद्धालुओं की जान ले ली। और कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। भले ही शासन प्रशासन ने मृतकों को दो-दो लाख रूपये देने की घोषणा की हो और घायलों को 10-10 हजार रूपये देने की घोषणा की हो पर श्रृद्धालुओं के घाव रूपयों से भरने वाले नहीं हैं।

धार्मिक नगरी की इस भयावह घटना ने श्रृद्धालुओं सहित तमाम सुरक्षा एजेंसियों के रोंगटे जरूर खड़े कर दिये होंगे और उन घटनाओं की यादें ताजा कर दी होगी जिन घटनाओं में सैकड़ों श्रृद्धालुओं ने अपनी आस्‍था के मंदिरों में तीर्थ स्‍थानों में थोड़ी सी लापरवाही से जान दे दी। क्‍या इन घटनाओं की पुनरावृत्‍ति भविष्‍य में होगी ? क्‍या इन घटनाओं से श्रृद्धालु सहित शासन प्रशासन सबक लेगा? क्‍या घटना के कारणों को फिर से नजरअंदाज किया जावेगा ? क्‍या भविष्‍य में प्रशासन द्वारा किये गये व्‍यापक इंतजामात फिर से धरे-के-धरे रह जायेंगे ? क्‍या श्रृद्धालुओं की धार्मिक तीर्थ स्‍थानों पर सुरक्षा व्‍यवस्‍था हेतु धर्म संसद में इकठ्ठा हुऐ लोग धार्मिक तीर्थ स्‍थानों पर श्रृद्धालुओं की बेहतर सूरक्षा व्‍यवस्‍था हेतु इकठ्ठा हो पायेंगें ? क्‍या धार्मिक परिसम्‍मपत्‍तियों पर पैनी नजर रखने वाले जिम्‍मेदार लोग श्रृद्धालुओं की सुरक्षा पर भी पैनी नजर रख पायेंगे? तमाम तरह के सबाल इस धार्मिक नगरी में घटी घटना से जन्‍म लेतें हैं। जिनका जवाब देने की जिम्‍मेदारी मात्र शासन प्रशासन की नहीं है बल्‍कि उन लोगों की भी जो कभी साईं को भगवान मानने से इंकार करते तो कभी धर्म की आड़ में भगवान को बॉंटने का काम करतें हैं। देश में धार्मिक तीर्थ स्‍थानों पर लगने वाले मेलों में घटी ऐसी घटनाओं ने श्रृद्धालुओं की कमर तोड़ कर रख दी है

ऐसी घटनाओं से सबक लेना मात्र शासन प्रशासन का काम नहीं है बल्‍कि हम सबको ऐसी दुर्भाग्‍यपूर्ण घटनाओं से सबक लेना होगा। और यह कसम खानी होगी कि हम किसी भी धार्मिक तीर्थ स्‍थान के मेले में भगदड़ के बवन्‍डर से होने वाली अफवाहों पर पैनी नजर रखकर श्रृदालुओं के लिये बनने वाली विपरीत परिस्‍थियों को उनके अनुकूल बनाने में कसर नहीं छोड़ेगे। तभी हम रतनगढ़ हादसे या कामदगिरी परिक्रमा में हुऐ हादसों की पुनराव़ृत्‍ति रोक पायेंगे। भगवान राम की तपोस्‍थली कही जाने वाली नगरी में सोमवती अमावस्‍या के दिन कामदगिरी पर्वत की परिक्रमा के समय घटी घटना से हम सबको सबक लेना ही होगा। और प्रशासन के व्‍यापक सुरक्षा इंतजामातों को अपनी सुरक्षा के इंतजाम से जोड़कर सुरक्षा इंतजाम को और मजबूत बनाना ही होगा।

धार्मिक स्‍थानों में घटी इस प्रकार की घटनाओं के ज्‍यादातर कारण एक श्रृद्धालु द्वारा बोगस अफवाह फैलाना रहा है। और उसकी झॅूठी अफवाह को श्रृद्धालु अपने मन और मस्‍तिक में उतारकर भगदड़ जैसे बवन्‍डर को जन्‍म दे देते हैं, अन्‍जाम आपके सामने हैं। फिर भी हम धार्मिक तीर्थ स्‍थानों में लगने वाले मेलों की सुरक्षा व्‍यवस्‍था की बात करना भूल जाते हैं। और कभी धर्म की आड़ में भगवान को बॉटने में लगे रहते हैं तो कभी धर्म ससंद के बहाने साईं को भगवान ना मानने के लिए इकठ्ठा हो जाते हैं। आखिर कब तक हम लोग अपनी जिम्‍मेदारी से जी चुराते रहेंगे और धार्मिक स्‍थानों में मची भगदड़ के बवन्‍डर के काल के गाल में समाते रहेगें ?

 

अनिल कुमार पारा,

तहसील रामनगर जिला सतना मध्‍यप्रदेश,

पुस्‍तक समीक्षा

विलुप्‍त होते शब्‍दों को सहेजने का उद्यम-‘‘चौखड़ी जनउला‘‘

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वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

भारतेन्‍दु हरिशचन्‍द्र ने लिखा है कि ‘निज भाषा उन्‍नति अहै, सकल उन्‍नति के मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय के शूल‘ अपनी भाषा के प्रति प्रेमाभिव्‍यक्‍ति का इससे श्रेष्‍ठ उदाहरण अन्‍यत्र दुर्लभ है। सचमुच भाषा न केवल भावों के सम्‍प्रेषण का माध्‍यम भर है बल्‍कि मनुष्‍य के सोच-विचार, चिन्‍तन-मनन, स्‍वप्‍न और कल्‍पना का आधार भी है। भाषा हमें अपनी जड़ों से जोड़कर रखती है। अपनी मातृभूमि के प्रति उत्तरदायित्‍वों का बोध कराती है। पर ध्‍यान रहे, कोई भी भाषा अपनी सर्वश्रेष्‍ठता सिद्ध कर किसी को भी भाषायी विवाद में फँसने के लिए नहीं उकसाती बल्‍कि सबको समानता के साथ ‘सबके साथ, सबका विकास‘ का संदेश देती है। भाषा तो कल-कल, छल-छल बहती नदी के निर्मल धार के समान होती है जो अपने विकास यात्रा के पथ पर आने वाली अन्‍य भाषाओं के शब्‍दों को बड़ी आत्‍मीयता के साथ आत्‍मसात करके वृहद से वृहत्तर होती चली जाती है। लेकिन इस विराटता के कारण जब भाषा के प्राण तत्‍व सूखने लगते हैं अर्थात मूल भाषा के शब्‍द विलुप्‍त होने लगते हैं तब भाषाविद्‌ों, विचारकों एवं साहित्‍यकारों का सजग होकर भाषा को सहेजने का उद्यम करना न केवल स्‍वाभाविक है बल्‍कि अत्‍यावश्‍यक भी है।

हमारी छत्तीसगढ़ी भी बड़ी समृद्ध है। यह अपने भावाभिव्‍यक्‍ति के लिए अन्‍य भाषा के शब्‍दों का कभी मोहताज नहीं रही। मगर बदलते दौर में आधुनिकता और मीडिया के प्रभाव से इसमें अन्‍य भाषा विश्‍ोषकर हिन्‍दी के शब्‍द व्‍यापक रूप से घुल-मिल गए हैं और मूल शब्‍द विलुप्‍त होने लगे हैं। चूंकि छत्तीसगढ़ी अब राज भाषा बन गई है। यह हमारी अस्‍मिता और हमारे प्रदेश की पहचान है। इसलिए मूल शब्‍दों को सहेजने के लिए विद्वानों के द्वारा कई तरह के प्रयास किये जा रहे हैं यथा शब्‍दकोश का निर्माण और प्रचुर मात्रा में छत्तीसगढ़ी साहित्‍य का लेखन इत्‍यादि।

छत्तीसगढ़ी भाषा के शब्‍दों को सहजने का उद्यम करने वाले विद्वान अपने-अपने ढंग से इस कार्य को निष्‍ठापूर्वक कर रहे हैं। इन्‍हीं क्रम में एक नाम है श्री दिनेश चौहान जी का जो कला, साहित्‍य और संस्‍कृति के त्रिवेणी संगम राजिम नयापारा में निवास कर छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा चित्रोत्‍पला महानदी के धारा के समान अपनी वैचारिक प्रखरता से भाषा की समृद्धि और विकास के लिए कमर कसकर जुटे हुए है। दैनिक पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर इस विषय पर उनका वैचारिक लेख पाठकों को चिन्‍तन के लिए प्रेरित करता रहा है। छत्तीसगढ़ी के विलुप्‍त होते शब्‍दों को सहजने के लिए उन्‍होंने एक ऐसी अनूठी शैली का आश्रय लिया है जिसमें मनोरंजन भी हो, दिमागी कसरत भी हो और एक चुनौती भी हो। विस्‍मृति के नेपथ्‍य में छिपे शब्‍दों को समृति पटल पर लाने के लिए जिस शैली को उन्‍होंने अपनाया है उसे ‘चौखड़ी जनउला (वर्ग पहेली) का नाम दिया है। श्री दिनेश चौहान जी के द्वारा मातृभाषा के ऋण को चुकाने के लिए किये गए इस परिश्रम को समुचित सम्‍मान देते हुए प्रतिष्‍ठित दैनिक अखबार पत्रिका ने अपने अंक ‘पहट‘ में इसे क्रमशः प्रकाशित कर पाठकों तक पहुँचाने का स्‍तुत्‍य एवं वन्‍दनीय प्रयास किया है। अब राजभाषा आयोग के आर्थिक सहयोग पर प्रकाशित होकर यह चौखड़ी जनउला अर्थात छत्तीसगढ़ी वर्ग पहेली पुस्‍तकाकार में पाठकों के हाथ में हैं। मुझे आशा ही नहीं बल्‍कि पूर्ण विश्‍वास है कि यह पुस्‍तक अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वाले और उसकी समृद्धि तथा विकास चाहने वालों के लिए के मानस पटल पर छत्तीसगढ़ी शब्‍द भण्‍डार की भरपूर वृद्धि करेगी एवं अति उपयोगी तथा महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी। इस उत्तम कृति के लिए श्री दिनेश चौहान जी को हार्दिक बधाई।

 

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

बोड़रा ( मगरलोड़)

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

birendra.saral@gmail.com

॥ ऊँ गं गणपतये नमः ॥

डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ः व्‍यक्‍तित्‍व और कृतित्‍व

''जयन्‍ती पर विशेष'' शोधार्थी - लोकेश कुमार शर्मा

जल - कण - सा छोटा जीवन,

रज - कण - सी उसकी काया;

सागर - सी आकांक्षाएँ,

पर्वत - सी उसकी माया।

(जीवन संगीत)

जीवन की नश्‍वरता और उसकी आकांक्षाओं को सहज शब्‍द देने वाले डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र आधुनिक युग के लब्‍ध प्रतिष्‍ठित साहित्‍यकार हैं। सरस्‍वती के सफल आराधक डॉ. मिश्र की कालजयी कृतियां खड़ी बोली हिन्‍दी की समृद्ध धरोहर हैं। डॉ. रामकुमार वर्मा ने लिखा है कि - ''पं. बलदेव प्रसाद मिश्र हिन्‍दी की उन विभूतियों में हैं जिन्‍होंने अपनी प्रतिभा का प्रकाश अज्ञात रूप से विकीर्ण किया है। साहित्‍य के सभी अंगों पर सफलतापूर्वक उत्‍कृष्‍ट कृतियों की सृष्‍टि कर उन्‍होंने हिन्‍दी की सेवा की है''

डॉ. मिश्र की कृतियों के अनुशीलन से यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि उन्‍होंने अपनी साहित्‍यिक प्रतिभा से हिन्‍दी साहित्‍य के विविध अंगों के भण्‍डार की श्रीवृद्धि की है। गद्य और पद्य पर उनका असामान्‍य अधिकार था, तथापि वे एक लब्‍धप्रतिष्‍ठित कवि के रूप में हमारे सामने आते हैं। डॉ. मिश्र मूलतः दार्शनिक थे, फिर भी उनका कवि व्‍यक्‍तित्‍व ही सर्वोपरि रहा है। यह अवश्‍य है कि उनकी कृतियों में उनके दार्शनिक व्‍यक्‍तित्‍व की आभा सर्वत्र विद्यमान रही है। गद्य और पद्य दोनों में ही उनकी दार्शनिक चेतना दुरूह न होकर अत्‍यंत सरल रही है। जिसे प्रबुद्ध पाठकवर्ग से लेकर आमजन भी सहजता से हृदयंगम कर लेता है।

देवो नारायणः मातु पिता मे स्‍वर्ग-संस्‍थितः

माताऽव्‍याज्‍जानकी देवी कुल-कल्‍याण-कारिणी॥

(कोशल किशोर, भूमिका से)

डॉ. मिश्र का जन्‍म संस्‍कारधानी के एक कुलीन कान्‍यकुब्‍ज ब्राह्‍मण परिवार में 12 सितंबर सन्‌ 1898 को हुआ। माता श्रीमती जानकी देवी और पिता श्री नारायण प्रसाद मिश्र की आप द्वितीय संतान थे। वैष्‍णव भक्‍ति के संस्‍कार आपको बाल्‍यावस्‍था से प्राप्‍त हुए। घर-परिवार के धार्मिक वातावरण से आपकी धार्मिक चेतना उद्‌भूत हुई। सन्‌ 1914 में स्‍टेट हाई स्‍कूल से प्रवेशिका की परीक्षा उत्‍तीर्ण की और इसी वर्ष नागपुर के हिस्‍लॉप कॉलेज में दाखिला लिया। सन्‌ 1918 में डॉ. मिश्र ने बी.ए. की परीक्षा उत्‍तीर्ण की। सन्‌ 1920 में मॉरिस कॉलेज (नागपुर विश्‍वविद्यालय) से दर्शन शास्‍त्र में एम.ए. की डिग्री हासिल की। सन्‌ 1921 में एल.एल.बी. की परीक्षा पास की। विद्यार्थी जीवन में ही उन्‍होंने संस्‍कृत, हिन्‍दी, ड्राईंग व शॉर्ट हैण्‍ड आदि की विशेष परीक्षाएं पास कर ली थीं। स्‍थानीय त्रिवेणी संग्रहालय में डॉ. मिश्र द्वारा तैयार नेल ड्राईंग का अवलोकन किया जा सकता है। सन्‌ 1939 में 'तुलसी दर्शन' नामक शोध-प्रबंध पर नागपुर विश्‍वविद्यालय द्वारा उन्‍हें शिक्षा विषयक सर्वोच्‍च उपाधि डी.लिट्‌. प्रदान की गई। इस शोध कार्य की यह भी विशेषता रही है कि मिश्र जी ने परंपरा को तोड़कर अंग्रेजी के स्‍थान पर अपना शोध-प्रबंध हिन्‍दी में प्रस्‍तुत किया था।

डॉ. मिश्र की संपूर्ण जीवनयात्रा के तीन पृथक-पृथक आयाम हैं। इन्‍हीं आयामों में हम डॉ. मिश्र के युगीन संदर्भ एवं जीवन दर्शन का सम्‍यक मूल्‍यांकन कर सकते हैं।

समाजसेवा के क्षेत्र में वे निष्‍काम समाजसेवी थे। अपने छात्र जीवन में ही उन्‍होंने 'बाल विनोदिनी समिति' एवं 'मारवाड़ी सेवा समाज' की स्‍थापना की थी। डॉ. मिश्र ने इस संस्‍था के माध्‍यम से कई रचनात्‍मक कार्य किए। जनसेवा को जनार्दन सेवा मानने वाले डॉ. मिश्र को सन्‌ 1952 से 1959 तक भारत सेवक समाज का प्रदेश संयोजक तथा केन्‍द्रीय मंत्रिमण्‍डल का सदस्‍य मनोनीत किया गया। डॉ. मिश्र ने भारत सेवक समाज के माध्‍यम से अनेक महत्‍वपूर्ण कार्य संपन्‍न कराये। पद, प्रतिष्‍ठा, धन, यश आदि से सदैव निस्‍पृह रहने वाले निष्‍काम समाज सेवी, साकेत संत डॉ. मिश्र की समाजसेवा अनुपम है। डॉ. मिश्र के राजनीतिक जीवन की शुरूआत सन्‌ 1920 में हो गई थी। जब उन्‍होंने ठाकुर प्‍यारेलाल सिंह के सहयोग से राजनाँदगाँव में राष्‍ट्रीय माध्‍यमिक शाला की स्‍थापना की थी। डॉ. मिश्र की सक्रिय राजनीति से जुड़ा एक और प्रसंग सामने आता है। सन्‌ 1948 में सरदार वल्‍लभ भाई पटेल के प्रयासों से राजनाँदगाँव स्‍टेट का विलीनीकरण हुआ। उसी समय राजनाँदगाँव को जिला केन्‍द्र घोषित करने की माँग के लिए एक 'जिला निर्माण समिति' का गठन डॉ. मिश्र की अध्‍यक्षता में हुआ था। डॉ. मिश्र रायगढ़ तथा खरसिया नगर पालिकाओं के अध्‍यक्ष, रायपुर नगर पालिका के ज्‍येष्‍ठ उपाध्‍यक्ष तथा राजनाँदगाँव नगर पालिका के अध्‍यक्ष रहे। सन्‌ 1972 में सम्‍पन्‍न आम चुनाव में डॉ. मिश्र खुज्‍जी-खेरथा (राजनाँदगाँव) क्षेत्र से विधायक चुने गये। राजनीति के माध्‍यम से उन्‍होंने समाज सेवा ही की। 'राम राज्‍य' महाकाव्‍य में लिखते हैं -

 

शासन से सम्‍बन्‍ध सभी का,

शासन से ही जग उन्‍नति है।

लोक व्‍यवस्‍था संस्‍थापन को

शासन ही तो अंतिम गति है॥

 

डॉ. मिश्र को संगठन के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्‍त हुई। मध्‍यप्रदेश हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन के तीन बार अध्‍यक्ष (प्रथम बार सागर, द्वितीय नागपुर व तृतीय बार नये मध्‍यप्रदेश के रायपुर अधिवेशन में); अखिल भारतीय प्राच्‍य महासम्‍मेलन (नागपुर अधिवेशन) के हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष; अखिल भारतीय हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन के तुलसी जयंती समारोह के अध्‍यक्ष; गुजरात प्रदेशीय एवं बम्‍बई प्रदेशीय राष्‍ट्रभाषा सम्‍मेलन एवं पदवीदान महोत्‍सव के अध्‍यक्ष; बंगीय हिन्‍दी परिषद्‌ कलकत्ता के अनेक वर्षों तक अध्‍यक्ष; समय-समय पर अनेक शैक्षणिक, साहित्‍यिक एवं सांस्‍कृतिक संस्‍थाओं के उद्‌घाटनकर्ता, प्रधान अतिथि, अध्‍यक्ष आदि; आकाशवाणी की परामर्शदात्री समिति के सदस्‍य एवं बम्‍बई आकाशवाणी द्वारा प्रायोजित अखिल भारतीय कवि सम्‍मेलन के अध्‍यक्ष; भारती संगम के प्रदेश संयोजक आदि। प्रशासनिक क्षेत्र में भी आपने बहुप्रशंसित कार्य किये। एक कुशल प्रशासक के रूप में आप रायगढ़ नरेश के यहाँ लगातार सत्रह वषोंर् तक नायब-दीवान और दीवान रहे। यह आपके जीवन का सर्वश्रेष्‍ठ काल रहा है। इस अंचल में उच्‍च शिक्षा के विकास में भी आपका अमूल्‍य योगदान रहा है। एस.बी.आर. कॉलेज बिलासपुर (1944-47), दुर्गा महाविद्यालय रायपुर (1948) तथा कल्‍याण महाविद्यालय भिलाई जैसी संस्‍थाओं की नींव रखी तथा प्राचार्य भी रहे। कमला देवी महिला महाविद्यालय राजनांदगांव के भी प्राचार्य रहे। सन्‌ 1970-71 में इंदिरा कला संगीत विश्‍वविद्यालय, खैरागढ़ के कुलपति पद पर भी कार्यशील रहे। लगभग दस वर्षों तक आप नागपुर विश्‍वविद्यालय के हिन्‍दी विभाग के अध्‍यक्ष पद पर भी मानसेवी रूप में कार्य करते रहे। नागपुर तथा बड़ौदा विश्‍वविद्यालय में आप विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे। भारत शासन ने आपको मैसूर राज्‍य में हिन्‍दी के विशिष्‍ट प्रोफेसर के रूप में भी नियुक्‍त किया। डॉ. मिश्र शोध-निर्देशक, विशेषज्ञ, परीक्षक के रूप में प्रयाग, लखनऊ, आगरा, दिल्‍ली, पंजाब, वाराणसी, पटना, कलकत्ता, जबलपुर, सागर, नागपुर, हैदराबाद आदि विश्‍वविद्यालयों से सम्‍बद्ध रहे। डॉक्‍टरेट की सर्वोच्‍च उपाधि डी.लिट्‌. तक के परीक्षक रहे।

डॉ. मिश्र के लिए साहित्‍य जीवन-साधना रही है। वे साहित्‍य सृजन को ब्रह्‍म साधना का ही एक रूप मानते थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ दृष्‍टव्‍य हैं; काव्‍य गं्रथ - कोशल किशोर, जीवन संगीत, साकेत संत, हमारी राष्‍ट्रीयता, रामराज्‍य, उदात्त संगीत, गांधी गाथा। समीक्षात्‍मक गं्रथ - साहित्‍य लहरी, तुलसी दर्शन, जीव विज्ञान, भारतीय संस्‍कृति, मानस में रामकथा, मानस माधुरी, मानस रामायण, तुलसी की रामकथा। नाटक - शंकर दिग्‍विजय, असत्‍य संकल्‍प, वासना-वैभव, समाज सेवक, मृणालिनी परिचय। संपादित पाठ्‌यपुस्‍तकें - काव्‍य कलाप, सुमन, साहित्‍य संचय, भारतीय संस्‍कृति को गोस्‍वामी जी का योगदान, संक्षिप्‍त अयोध्‍याकाण्‍ड, उत्तम निबंध, तुलसी शब्‍द सागर। अनुवाद - मादक प्‍याला, गीता सार, हृदय बोध, उमर ख़ैय्‍याम की रूबाईयाँ, ईश्‍वर निष्‍ठा, ज्‍योतिष प्रवेशिका। अप्रकाशित कृतियों की संख्‍या सत्रह तथा अधूरी कृतियों की संख्‍या पाँच है। डॉ. मिश्र ने साकेत संत की भांति साहित्‍य की अहर्निश सेवा की तथापि उनके अवदानों का सम्‍यक्‌ मूल्‍यांकन आज पर्यंत नहीं हो पाया है। भविष्‍य यह अवश्‍य स्‍वीकार करेगा कि डॉ. मिश्र बीसवीं शताब्‍दी के सर्वश्रेष्‍ठ साहित्‍यकार थे।

 

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लोकेश कुमार शर्मा,

गायत्री नगर, कमला कॉलेज रोड

राजनांदगांव (छ.ग.)

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(1)

जे एन यू के बाहर

आज बड़े भाई साहब

और होरी मिल गए

कुशल क्षेम पूछा तो कहने लगे

हमारी गर्दन अभी भी औरों के पाँव तले

दबी है

शिक्षा व्यवस्था अंग्रेज के आधीन हैं

हम कई बार शिकायत लेकर

आलोचकों, चिंतकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों

और अनुवादकों के पास गये

पर सब व्यस्त हैं

शोध सेमीनार विदेश यात्रा से उत्पन्न

यशोगान हेतु मठाधीशों की उपासना में

प्रेमचंद औ दूसरे माइबाप उनकी

पुस्तकों के काराग्रह में कैद है

सर्वाधिकार सुरक्षित की बेड़ियां पहने

मन चाहा लिखते हैं

पुस्तकें छपवाते हैं

परस्पर पीठ थपथपाते हैं

क्रम से पुरस्कार पाते हैं

सब जुगाड़ रस से परिपूर्ण है भैया

गोबर औ छोटे वही डटे हैं

कहते है आज प्रेमचंद को आजाद मैंने पूछा आप कहा जा रहे हैं

बोले लमही से आ रहे हैं

दिल्ली मुखर्जी नगर जा रहे हैं

करवाना है

 

(2)

सत्य और शिव

अनचीन्हे हुए

सुन्दरता जीवित लगती है

चलो इसी सहारे

प्रेम उपजता रहे

शेष मिल ही जायेंगे

इसी मोड़ पर ।

 

(3)

सत्य के कई पहलू होते हैं

हर पहलू का अपना सत्य होता है

प्रत्येक व्यक्ति अपने सत्य की स्थापना को ले

सत्ता की और अग्रसर होता है

 

(4)

भगवा
केसरिया
बसंती
लाल
ये रंग है
भक्ति के
बलिदान के
क्रांति के
तुम लाख कर लो प्रयास
इस पर न चढ़ा पाओगे
कट्टरता का रंग
ये रंग आजादी के हैं
हिंदुस्तान की
आत्मा के हैं
न मिटा पाओगे
ये हमारे रक्त में घुले हैं
इन्हें करो स्वीकार
इनमें रंग जाओ
कृष्ण की बांसुरी
नानक की वाणी
चैतन्य की मौज
भगत का जुनून
इसमें घुला है
ये मेरे देश के
इस रंग के
मायने हैं
तो क्यों न कहूं
गर्व से
मैं हिन्दुस्तानी हूँ ।

 

(5)

पीड़ितों की

जाति नहीं होती

ना ही नस्ल

उनमें एक ही

सम्बन्ध होता है

पीड़ा का

जैसे

शोषकों की

कोई जाति नहीं होती

वे परस्पर

जुड़े होते है

अपने हथियारों को

और भी

पैना

नुकीला

मोहक

बनाने हेतु

उनमें

प्रशंसा

चापलूसी और

सत्ता सम्बन्ध होता है ।

 

(6)

सपना जैसे

सोई हुई आँख का पानी

स्वतंत्रता

उत्सव में सिमटी

कुछ जानी पहचानी ।

 

(7)

बहुत दूर तक साहिल को तलाशा हमने

बस कुछ दूर कुछ दूर का भरोसा पाया

इक चाह थी दिल से जो जुडी रहती थी

बन गयी है उमर भर का इक सरमाया

 

(8)

वो बस बांग देकर बनता रहा मसीहा
औ आदमी हर बार सीढ़ी बनता गया

 

(10)

देश के पर्यावरणविद

परेशान है

कौए

चिड़िया

बाज

चील

हो गये लुप्त

चिंता में है

रोग है गुप्त

मित्रों जरा देखो

समझो गौर से

वे लुप्त नहीं है

स्थानांतरित है

कुछ संसद के

भीतर है

कुछ बाहर है ।

--

डा हरीश कुमार
बरनाला,पंजाब

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भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्रदर्शन-निषेध

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्थी सिद्धविनायक चतुर्दशी के नाम से विख्यात है. इस दिन संपूर्ण भारतवर्ष में श्रीगणेशजी की विधिवत स्थापना की जाती है. इसी दिन भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था. श्री गणेश हिन्दुओं के प्रथम पूज्य आराध्य देवता हैं. अपने भक्तों के कष्ट दूर करने में श्रीगणेश सक्षम देवता हैं.

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफ़लचारुभक्षणं उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजमं

इस तिथि में किया गया दान, स्नान, उपवास और पूजन-अर्चन श्रीगणेश की कृपा से सौ गुना हो जाता है., परन्तु इस दिन चन्द्रदर्शन से मिथ्या कलंक भी लगता है. अतः इस तिथि में चन्द्रदर्शन न हो, ऎसी सावधानी बरतनी चाहिए. इसी दिन भगवान श्रीकृष्णजी ने भी अकस्मात चन्द्रदर्शन कर लिए थे, इस चन्द्रदर्शन के कारन उन पर चोरी का आरोप लगा था. इस कथा से जुडा हुआ आख्यान जरुर पढा जाना चाहिए.

द्वापर युग में द्वारिकापुरी में सत्राजित नामक एक यदुवंशी रहता था. वह सूर्यदेव का परम भक्त था. उसकी कठिन भक्ति से प्रसन्न हो, सूर्य ने उसे एक स्यमन्तक नामक मणि दी, जो सूर्य के समान ही कान्तिमान थी. वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी तथा उसके प्रभाव से सम्पूर्ण राष्ट्र में रोग, अनावृष्टि, सर्प, अग्नि, चोर तथा दुर्भिक्ष आदि का भय नहीं रहता था

एक दिन सत्राजित उस मणि को धारणकर राजा उद्रसेन की सभा में आया. उस समय मणि की कान्ति से वह दूसरे सूर्य के समान दिखायी दे रहा था. भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा थी कि यदि वह दिव्य रत्न राजा उग्रसेन के पास रहता तो सारे राष्ट्र का कल्याण होता. सत्राजित को इस बात का पता चल गया कि श्रीकृष्ण इस मणि को प्राप्त करना चाहते हैं. वह श्रीकृष्ण की शक्तियों से भी परिचित था. अतः डरकर उसने उस मणि को अपने भाई प्रसेन को दे दी.

एक दिन प्रसेन घोडॆ पर सवार होकर आखेट के लिए वन में गया. तभी उसका सामना एक सिंह से हुआ. सिंह को मारने के बजाए वह स्वयं उसका शिकार हो गया. प्रसेन जब घर नहीं लौटा तो यादवों में कानाफ़ूसी होने लगी कि श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया है और मणि ले ली होगी.

उधर वन में, मुँह में मणि दबाए हुए सिंह को ऋक्षराज जाम्बवान ने देखा तो उसने उस सिंह को मारकर स्वयं मणि ले ली और ले जाकर अपने पुत्र को खेलने के लिए दे दिया.

उधर लोकापवाद के स्वर गली-कूचे में से होते हुए स्वयं श्रीकृष्णजी के कानों तक पहुँचे. अपने ऊपर लगे चोरी के आरोपों से वे विचलैत हो उठे. उन्होंने इस बात की चर्चा राजा उद्रसेनजी से की और कुछ साथियों को लेकर प्रसेन के घोडॆ के खुरों के चिन्हों को देखते हुए वन में जा पहुँचे.

वहाँ उन्होंने घोडॆ और प्रसेन को मृत अवस्था में पाया तथा पास ही में सिंह के चरणचिन्ह भी देखे. उन चिन्हों का अनुसरण करते हुए आगे जाने पर उन्हें सिंह भी मृत पडा मिला. वहाँ से ऋक्षराज जाम्बवान के पैरों के निशान देखते हुए वे उस गुफ़ा तक जा पहुँचे, जहाँ जाम्बवान का निवास था.

श्रीकृष्ण ने अपने साथियों से कहा कि अब यह तो स्पष्ट हो चुका है कि घोडे सहित प्रसेन सिंह द्वारा मारा गया है, परंतु सिंह से भी कोई बलवान है, जो इस गुफ़ा में रहता है. मैं अपने पर लगे लोकापवाद को मिटाने के लिए इस गुफ़ा में प्रवेश करता हूँ और स्यमन्तकमणि लाने की चेष्टा करता हूँ. यह कहकर वे उस गुफ़ा में घुस गए.

गुफ़ा गहन अन्धकार में डूबी हुई थी. किसी तरह कठोर चट्टानों से टकराते, अपने आपको बचाते हुए वे धीरे-धीरे आगे बढ रहे थे. काफ़ी अन्दर जाने पर उन्होंने देखा कि गुफ़ा के अन्दर काफ़ी रौशनी फ़ैल रही थी. यह प्रकाश उस दिव्य मणि के द्वारा फ़ैल रहा था. और आगे बढते हुए उन्होंने ने देखा कि एक नन्हा बालक उस दिव्य मणि से खेल रहा है. जैसे ही श्रीकृष्ण ने उस मणि को लेने का प्रयास किया, पास ही बैठा ऋक्षराज उन पर टूट पड. दोनों के मध्य इक्कीस दिन तक घोर युद्ध होता रहा. अन्त में शिथिल अंगवाले जाम्बवान ने भगवान श्रीकृष्ण को पहचान लिया और प्रार्थना करते हुए कहा:- “हे प्रभु ! आप तो मेरे स्वामी श्रीराम ही हैं. द्वापर में आपने मुझे इस रुप में दर्शन दिया. आपको कोटि-कोटि प्रणाम है. हे नाथ ! मेरे अपराध क्षमा करें. मैं अर्ध्यस्वरुप अपनी इस कन्या जाम्बवती सहित इस दिव्य मणि भी आपको देता हूँ, कृपया इन्हें ग्रहणकर मुझे कृतार्थ करें तथा मेरे अज्ञान को क्षमा करें”

श्रीकृष्णजी जाम्बवान से पूजित हो स्यमन्तकमणि लेकर जाम्बवती के साथ द्वारिका आए. वहाँ उनके साथ गए यादवगण बारह दिन बाद ही लौट आए थे. द्वारिका में यह बात बडी तेजी के फ़ैल गयी थी कि श्रीकृष्ण गुफ़ा में मारे गए हैं, किंतु उन्हें आया देख संपूर्ण द्वारिका में प्रसन्नता की लहर दौड गयी. उन्होंने यादवों से भरी हुई सभा में वह मणि सत्राजित को दे दी. सत्राजित ने भी प्रायश्चितस्वरुप अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्णजी से कर दिया.

यदि दैववशात चन्द्रदर्शन हो जाए तो इस दोष के शमन के लिए निम्नलिखित मंत्र का पाठ करना चाहिए, ऎसा विष्णुपुराण (4/13/42) में वर्णित है

सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः/ सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः

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103, कावेरी नगर,छिन्दवाडा(म.प्र.) 480001 गोवर्धन यादव

पुस्‍तक समीक्षा

पुस्‍तक ः अजनबी मौसम से गुजरकर

लेखक ः विनोद कुमार

प्रकाशकः प्रकाशन संस्‍थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज,

नई दिल्‍ली-110002

मूल्‍य ः 150/-

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अजनबी मौसम से गुजरकर पंद्रह कहानियों का संग्रह है जो लंबे अंतराल पर लिखी गयी है. पुस्‍तक के लेखक विनोद कुमार कवि, नाटककार, निर्देशक एवं अभिनेता भी है जिनकी हिन्‍दी और अंग्रेजी में ग्‍यारह पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी है तथा चार पुस्‍तकें प्रकाशनाधीन है. आकाशवाणी दूरदर्शन से पचास से ज्‍यादा नाटक प्रसारित होते रहे हैं तथा पंद्रह नाटकों का देश के विभिन्‍न नगरों-महानगरों में लगभग 150 बार मंचन एवं प्रदर्शन हो चुका है. लेखक विनोद कुमार फिल्‍म ‘आक्रांत' के लेखक और निर्देशक भी है जिसका प्रीमियर दूरदर्शन के राष्‍ट्रीय चैनल पर हो चुका है जो टाइम वीडियो पर उपलब्‍ध है. इसके अतिरिक्‍त लेखक झारखंड़ केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालय, रांची में अंग्रेजी केन्‍द्र के अघ्‍यक्ष एवं भाषा स्‍कूल के डीन है.

लेखक ने पुस्‍तक के प्रस्‍तावना में लिखा है कि पुस्‍तक में संग्रहित कहानियां आज के समय की पड़ताल करती हुइर् उस आदमी का आकलन करती है जो खुद अपने आपसे और व्‍यवस्‍था से लड़ते हुए लहूलुहान हो रहा है. कहानियों के तमाम चेहरों में अक्‍स हमारे आसपास परिचित उन संवेदनाओं की कथा व्‍यथा है जहां हम पूरी शिद्‌दत के साथ अपने होने का एहसास करते हैं.

‘अजनबी मौसम से गुजरकर पाठकगण महसूस करेंगे कि इतने सहज सरल शब्‍दों में आज के जीवन की विसंगतियों की परतों को खोलना हर लेखक के बूते की बात नहीं है. पाठकों को इन कहानियों में जिंदगी से मुलाकात होगी. आज जब ज्‍यादातर कहानियों के केन्‍द्र में देह-विमर्श है, ऐसे में खुद को इस चलन से अलग कर लेना विनोद कुमार की बहुत बड़ी उपलिब्‍ध्‍ मानी जाएगी.कथाकार किसी भोगे हुए यथार्थ को ही अपने कथानक का आधार बनाता है. वह यथार्थ उसका भोगा हुआ भी हो सकता है, कोई देखी हुई घटना भी हो सकती है या किसी व्‍यक्‍ति से सुनी हुई दास्‍तान भी हो सकती है. केवल कल्‍पना से कहानी नहीं बनती और अगर केवल कल्‍पना से कहानी बना दी जाए तो उसमें तथ्‍य की गम्‍भीरता नहीं होती यद्यपि यह भी सत्‍य है कि यथार्थ का सपाट वर्णन कहानी की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. घटना का विवरण रचनाकार की शैली और संप्रेषणीयता के आधार पर ही कहानी का रूप ले पाता है. कथाकार विनोद कुमार एक ऐसे ही कथाकार है जो तथ्‍यों से छेड़छाड़ नहीं करते अपितु अपनी शैली और प्रस्‍तुतीकरण क्षमता से उसे पठनीय और ग्राह्‌य बना देते है. लेखक विनोद कुमार ने जीवन की सच्‍ची कहानियां लिखी है. यह अच्‍छी बात है कि कुछ ‘उतर आधुनिक' लेखकों की तरह विनोद कुमार संवेदना को बीते जमाने की चीज नहीं मानते बल्‍कि पूरी संवेदना के साथ लिखते हैं.

जहां एक ओर टी.वी., फिल्‍म या अखबारों में स्‍त्री-पुरूष के यौन संबंधों की कहानियों को प्रमुखता दी जा रही हो, वहां विनोद कुमार जैसे कथाकार जो जीवन यथार्थ को महत्‍व दे, आम आदमी के संघर्षों को स्‍वर दे तो इस प्रवृति की सराहना होनी चाहिए. संग्रह की पंद्रह कहानियां किसी न किसी मुद्‌दे का उघाड़ती है. विनोद कुमार के इस संग्रह को पढ़कर लगता है कि वह कहानी के कहानीपन को बचाए रचाने वाले कहानीकार है. संग्रह की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आलोचकों और प्रबुठ्ठ पाठकों को भी कहानियां पंसद आयेंगी वहीं सामान्‍य पाठक भी इन कहानियों से जुड़ने में दिक्‍कत महसूस नहीं करेंगे.

 

राजीव आनंद, प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा, गिरिडीह-815301ए झारखंड़,

पुस्‍तक समीक्षा

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सुलगती जमीं की कराहती आवाज -‘‘मैं बस्‍तर बोल रहा हूँ--‘‘

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

शस्‍यश्‍यामला भारत भूमि के मानचित्र पर बस्‍तर की पहचान प्रकृति के गोद में बसे एक ऐसे भूखण्‍ड की रही है जो साल के सघन वृक्षों से आच्‍छादित है। जहाँ विश्‍व विख्‍यात कुटुम्‍बरसर की गुफा और च़ित्रकोट का जलप्रपात है। जहाँ माँ दन्‍तेश्‍वरी का पावन धाम है। डंकनी और शंखनी की धाराएं माँ दन्‍तेश्‍वरी के चरण पखारकर उसका यशोगान करती हुई धरा को अभिसिंचित कर उर्वरा बनाती है। जहाँ की धरती लोहा उगलती है। जहाँ महुए के मादक गंध के साथ वहाँ के निवासियों की जिन्‍दगी मांदर के थाप पर थिरकती है, नाचती और गाती है जहाँ का लोक संगीत आदिवासी दिलों की धड़कन और साँसों का सरगम है। पर न जाने किस मनहूस घड़ी में बस्‍तर के सुख और समृद्धि को किन स्‍वार्थी तत्‍वों की नजर लग गई कि बस्‍तर सुलगने लगा है। न जाने किन लोगों ने बस्‍तर के सीने में बारूद भर दिया है जो बस्‍तर आज लाल आतंक का पर्याय बन गया है। कब कहाँ धमाका हो जाए और इंसानी जिस्‍म के चिथडे़ उड़ जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। गोलियों की सनसनाहट और भारी बूटों की आवाज से सहमकर पहाड़ी मैना खामोश हो गई है। जीवन का संगीत थम-सा गया है। होठों की हँसी छिन गई है। दिल की धड़कनों में निराशा का घना कोहरा छा गया है और आँखों के भीतर आँसुओं का सैलाब छिपा है, देखने वालों को तो सिर्फ भींगीं आँखों की नमी भर ही दिखाई देती है। आखिर कौन हैं इस हालात के जिम्‍मेदार? बस इसी तड़प, छटपटाहट और बैचेनी की अभिव्‍यक्‍ति है डॉ राजाराम त्रिपाठी जी की कृति ‘ मैं बस्‍तर बोल रहा हूँ‘।

चूंकि डॉ त्रिपाठी औषधीय पौधों के ख्‍याति लब्‍ध विशेषज्ञ है इसलिए नब्‍ज पकड़कर मर्ज को पहचानना उन्‍हें खूब आता है। तभी तो उन्‍होंने बस्‍तर के पीड़ा की पड़ताल सतह के ऊपर-ऊपर ही नहीं बल्‍कि सतह के बहुत भीतर तक पहुँचकर करने का स्‍तुत्‍य प्रयास किया है। बस्‍तर के अन्‍तरात्‍मा में झाँकने की भरपूर कोशिश की है और सुलगती धरती की कराहती आवाज को ‘ मैं बस्‍तर बोल रहा हूँ‘ कृति के माध्‍यम से समाज के सामने रखा है। साहित्‍य को समाज का दर्पण कहा जाता है। साहित्‍य को समाज का दर्पण कहलाने का गौरव यूँ ही नहीं मिल गया है। इस गौरव को पाने के लिए साहित्‍यकारों की सदियों की साधना लगी हुई है। साहित्‍यकार की सजग दृष्‍टि हमेशा सामयिक घटनाओं पर होती है। वह घटना में अर्न्‍तनिहित कारणों का विश्‍लेषण करता है। घटनाओं पर चिन्‍तन करके कार्य और कारण का पड़ताल करता है। घटना के दूरगामी परिणाम पर विचार करता है और अपनी कृति में अपने चिन्‍तन का निचोड़ रखते हुए समाज को सचेत और जागृत करता है। मनुष्‍य की सोयी हुई संवेदना को झकझोर कर जगाता है और बेहतर मानव समाज के निर्माण के लिए मनुष्‍य को प्रेरित करता है।

डाॅ साहब की कृति में उनके चिन्‍तन के विविध रंग है। सुख-दुख, हर्ष-विषाद, आशा-निराशा, प्रश्‍न-उत्तर मगर सबसे ज्‍यादा चिन्‍तन है तो जल, जंगल और जमीन के साथ वहाँ बसने वाली जिन्‍दगी की है। जहाँ ‘मुखौटा‘ और ‘अक्‍श‘ कविता आत्‍मचिन्‍तन के लिए प्रेरित करती है वहीं ‘कौन हो तुम‘ कविता बस्‍तर के लूटने वाले हाथों से प्रश्‍न करती है। ‘मुझे मेरा बस्‍तर कब लौटा रहे हो‘ कविता में कवि का आक्रोश आग उगलता हुआ महसूस होता है। ‘फैसला लेना ही होगा अब‘ सिहांसन से सीधे ही प्रश्‍न करता है कि ‘वजीरों के वास्‍ते, प्‍यादे कटते रहेंगे कब तक‘। जहाँ ‘गौरय्‍या‘ कविता में कवि ने पक्षी सरंक्षण की बात कही है वहीं ‘आँगन की तुलसी कविता‘ में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और बिगड़ते हुए पर्यावरण पर गहरी चिन्‍ता जताई है। अपने निजी स्‍वार्थ के लिए पेड़ों की हत्‍या करने वाले पत्‍थर दिलों को आतमचिन्‍तन के लिए प्रेरित करते हुए कवि लिखते हें कि-

‘‘पेड़ से पूछिए मत! उन्‍हें देखिए---

फिर--

तुम्‍हें अपनी जिन्‍दगी का मकसद,

खुद-ब-खुद मिल जाएगा

और तुम्‍हारा जीवन,

‘आँगन की तुलसी बन जाएगा।‘‘

समीक्ष्‍य कृति की पहली ही कविता ‘मैं बस्‍तर बोल रहा हूँ‘ ही कृति के महत्त्व को रेखांकित करने के लिए पर्याप्‍त है। यह कविता कवि की निर्भीकता और कविता की ओजस्‍विता का प्रमाण है। जिसमें कवि अपनी खुली आँख से सब कुछ देखकर और सचेत मस्‍तिष्‍क से उस पर चिन्‍तन कर व्‍यवस्‍था की खामियों पर और मनुष्‍य की स्‍वार्थी प्रवृतियों पर विद्रोही तेवर अख्‍तियार कर लिखते हैं कि--

‘‘बरूदों से भरी हैं सड़कें, हरियाली लाली में बदली

नेता, अफसर, सेठ, साहूकार, पुलिस सिपाही और जमींदार

एक थैली के चट्टे-बट्टे, इनकी पोल अब खोल रहा हूँ, हाँ मैं बस्‍तर बोल रहा हूँ।‘‘

कवि के कवि कर्म के दर्द की पराकाष्‍ठा इन पंक्‍तियों में व्‍यक्‍त होता है, जब वे लिखते हैं कि ‘मेरी कविता में घायल बस्‍तर साँस लेता है‘। कवि का दृष्‍टिकोण हमेशा आशावादी होता है। तभी तो कवि डॉ त्रिपाठी अपने असफलता के भीतर की सफलता को महसूस कर लिखते हैं कि ‘मैं पतझड़ में बसंत, मौन में संवाद, मृत्‍यु में जीवन और प्रलय में सृष्‍टि ढुँढने की कोशिश करता हूँ।‘

इस कृति को पढ़कर मुझे भी उम्‍मीद है कि कवि के इस कृति की प्रेरणा से नई पीढ़ी सजग और सचेत होकर बस्‍तर के हितों की रक्षा करेगी। बस्‍तर को लूटने वाले हाथ विफल होंगे। भटके हुए लोगों की मनुष्‍यता जागेगी और खुशहाल और समृद्ध बस्‍तर का सपना साकार होगा। उत्तम कृति के लिए कवि को हार्दिक बधाई।

 

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘ बोड़रा (मगरलोड़) धमतरी (छत्तीसगढ़) birendra.saral@gmail.com

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