शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

मनोज ‘आजिज़’ का आलेख

सराईकेला छौ नृत्य: एक परिचय

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                                     --- मनोज 'आजिज़'

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भारत में लोक कला, संगीत, नृत्य और कथा की हजारों सालों की परंपरा रही है । पूरे देश के हर कोने में कुछ न कुछ नया और अलग लोक-रंग दिख ही जायेगा । इन्हीं सब में से एक है छौ नृत्य जिसे बोल चाल की भाषा में छौ नाच भी कहा जाता है । छौ नृत्य की तीन शैलियाँ हैं-- मानभूम शैली, मयूरभंज शैली और सराईकेला शैली । इन तीनों में कौन पुरातन है इसको लेकर काफी मतान्तर हैं पर तीनों शैलियाँ अपने आप में विशिष्ट हैं और तीनों में से एक यानी सराईकेला शैली झारखण्ड के लिए गौरव है और बाकी दो भी झारखण्ड से सटे पुरुलिया और मयूरभंज के हैं जो पड़ोसी राज्यों के हैं । सराईकेला छौ की एक अलग पहचान इसलिए है कि इसके पीछे सराईकेला के राज परिवार का हाथ रहा है या कहें कि वे इस शैली के पृष्ठ पोषक रहे हैं । छौ को यूनेस्को ने सांस्कृतिक धरोहर के रूप में आख्यायित किया है । इस नृत्य शैली में लोक-कथाओं के साथ-साथ लोक भंगिमाओं को प्रदर्शित किया जाता है । 

सराईकेला छौ शैली में काफी बारीकियां हैं जो कठिन एवं शिल्प के दृष्टिकोण से मार्जित है । सराईकेला छौ सराईकेला के राजाओं के इतिहास से जुड़ा हुआ है । सिंह देव राजाओं ने इस शैली की उत्पत्ति और संवर्धन में महती भूमिका निभाई । वे खुद नृत्य प्रदर्शन करते थे और परिकल्पना भी करते थे । सिंह देव राजाओं ने सबसे पहले आज के पश्चिम सिंहभूम के पोड़ाहाट में 1205 ई में राजत्व स्थापित किया । यह इलाका आदिवासी बहुल रहा है जो  शिकारी या कृषक वर्ग के थे । अलग अलग इलाकों से भी लोगों को रहने की इजाज़त दी जाने लगी जिसमे 'पाइका' जाति के लोग भी थे जो युद्ध कला में निपुण हुआ करते थे और दिन भर के कठिन परिश्रम के बाद वे सभी सामूहिक नृत्य करते थे जिसमे युद्ध का विवरण झलकता था । इस नृत्य की अंग भंगिमा से शौर्य और वीरता झलकती थी । ऐसा माना जाता रहा है कि छौ नृत्य इसी पाइका नृत्य से ही सृजित हुआ है । 

16वी सदी में पोड़ाहाट राज घराने के विक्रम सिंह देव ने सराईकेला राज स्थापित किया जो खड़काई नदी के किनारे था । सराईकेला छौ नृत्य शैली के कुछ नामचीन गुरु देश-विदेश में अपनी प्रस्तुति से ख्याति अर्जित किये हैं और उनमें से प्रमुख हैं--कुमार विजय प्रताप सिंह देव, राजकुमार सुधेंद्र नारायण सिंह देव, गुरु केदारनाथ साहू, बी बी पट्टनायक, बिक्रम कुम्भकार आदि । साम्प्रतिक छौ गुरुओं में शशधर आचार्य का नाम विशेष रूप में लिया जा सकता है । 

छौ नृत्य में मुखौटा का प्रयोग होता है जो अलग अलग रूपों के होते हैं । यह इसलिए प्रयोग में लाया जाता है ताकि प्रस्तुतकर्ता अपनी असल पहचान को छुपा कर जिस नृत्य अभिनय में रत रहते हैं उसे बखूबी निभा सके ।  शुरुआत में इन्हें पत्तों से बनाया जाता था फिर लकड़ी का प्रयोग होने लगा । लौकी और कोहड़े के छाल का भी प्रयोग किया जाता था पर अब बाँस और 'थतमोरा' का प्रयोग किया जाता है । 

छौ पारम्परिक, लोक-प्रचलन एवं समकालीनता का समन्वय है । इस नृत्य का विषय लोक साहित्य से लेकर महाकाव्य तक विस्तृत है । यह नृत्य अपने अंग भंगिमा के लिए जाना जाता है । भावना और मनः स्थिति को दर्शाने के लिए सर, गर्दन और पैरों के चलन और गति का कुशल प्रयोग किया जाता है । नाट्य शास्त्र के १०८ करणों को छौ में उपलय कहा जाता है । सराईकेला छौ में 'मयूर' नृत्य का काफी महत्व है और इसे विशिष्ट और गुणी कलाकार ही प्रस्तुत करते हैं । 'नाविक' नृत्य भाग में एक दंपत्ति को जीवन की नदी को पार करते हुए प्रस्तुत किया जाता है । छौ नृत्य के विषय किंवदंती और पौराणिक ग्रंथों से भी लिए जाते हैं जैसे 'रात्रि'-- दुर्गा का एक रूप जो शांति और प्रलय दोनों को दर्शाता है । यह ऋग्वेद के 12 वें अध्याय से लिया गया है । इस नृत्य प्रस्तुति को साम्प्रतिक करने के लिए 'संध्या' को इससे जोड़ा गया जो भारतीय नारी का प्रतीक है । 'चाँद' का प्रवेश दोनों को सम्मिलित करने के लिए किया गया है । 

छौ में ओडिसी नृत्य शैली का भी प्रभाव देखा जा सकता है । कुमार विजय प्रताप सिंह देव ने इसका प्रयास किया और उन्होंने तो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत आधारित 'छंद' और 'राग' का भी अनुप्रवेश छौ में कराया । इसके अलावे शहनाई, बांसुरी, ढोल, खोल, मादल, नगाड़ा, धमसा और कोरका आदि वाद्य यंत्रों का भी प्रयोग होने लगा । 

संगीत नाटक अकादमी इस नृत्य शैली का संरक्षण और संवर्धन के लिए काफी संजीदा है । सराईकेला राज घराने के वर्तमान वारिस राजा प्रताप आदित्य सिंह देव और रानी साहिबा अरुणिमा सिंह देव का भी इस शैली को संवर्धित करने में ईमानदार सहयोग रहता है । प्रत्येक वर्ष चैत्र संक्रांति में छौ महोत्सव इन्हीं के देखरेख में सम्पादित होता है । आधुनिक सराईकेला छौ नृत्य के जनक कुमार विजय प्रताप सिंह देव के पोषण में यह शैली उनके गुजरे वर्षों  बाद भी देश-विदेश में अपनी शाख़ जमा पाने में सक्षम है । जरुरत है ऐसी कलाओं को और भी बढ़ावा दिए जाने की और आम लोगों से जोड़ने की ताकि इन कलाओं को बचा पाने में सुविधा हो और कलाकार भी प्रजन्म दर प्रजन्म ऐसी कलाओं के मुरीद बनते बनाते जाएँ । 

(लेखक बहु भाषीय कवि-ग़ज़लकार हैं और पेशे से अंग्रेजी भाषा-साहित्य के व्याख्याता है ।  भारतीय कला-संस्कृति में इनकी विशेष रूचि है और साहित्य से इतर भारतीय दर्शन, कला और संस्कृति पर इनके शोध-पत्र प्रकाशित होते रहते हैं । )


पता- आदित्यपुर-२, जमशेदपुर

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