शनिवार, 16 अगस्त 2014

पखवाड़े की लघुकथाएं

चंद्रेश कुमार छतलानी

सबसे अलग नालायक

"सुनती हो, देखा तुमने गुप्ता जी की बेटी आज दौड़ में फर्स्ट आयी है, देखो हर फ़ील्ड में अव्वल है और एक हमारी बेटी है, पास हो जाती है यही उसका एहसान है, मैं पहले ही कहता था कि जिस रास्ते पर चल रही है वो सही नहीं है| दिन भर बस पता नहीं क्या सोचती रहती है | पांचवीं में पढ़ती है और बैठी ऐसे रहती है जैसे 50 साल की बुढ़िया हो |" - मदन जी चिल्लाते हुए अपने घर में दाखिल हुए|

उनकी पत्नी तो जैसे ये वाक्य सुनने को आतुर बैठी थी, उसने भी चिल्लाते हुए जवाब दिया, "अब आपके खानदान की है, और क्या उम्मीद रखोगे, मंदबुद्धि और नालायकी के सिवा? "

मदन जी सर पकड़ कर बैठ गए| वो अपनी बेटी को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाना चाहते थे, लेकिन उनके बस में कुछ भी नहीं था| उनकी पत्नी स्वभाव से क्रोधी थी, इसलिए वो कई मामलों में शांत रहते थे| कभी-कभी इस तरह बोलकर और फिर सर पकड़कर अपनी कुंठा बाहर निकालते|

उनकी बेटी सीतू अपने पिता का यह प्यार समझे ना समझे, यह ज़रूर समझ रही थी कि वो सबसे पिछड़ रही है| वो चुपचाप सी रहने लग गयी थी.. सबसे अलग और अकेली|

हर तरह से कोशिश कर मदन जी हार चुके थे| सीतू एक दिन मोबाइल पर कोई गाना सुनते हुए गुनगुना रही थी.. मदन जी ने यह देख कर जब भी समय मिलता तेज़ आवाज़ में प्रेरणादायक गीत चलाने शुरू कर दिए, ताकि उनकी बेटी सुन सके|

उस दिन 15 अगस्त था, हल्की बारिश भी थी| मदन जी अपनी बेटी को लेने उसके स्कूल चले गए| स्कूल के बाहर कीचड़ थी, उन्होंने देखा कि उस कीचड़ में कुछ देश के झंडे, जो कि प्लास्टिक से बने हैं, गिरे पड़े हैं| उन्हें देख कर बहुत दुःख हुआ| पता नहीं देश कहाँ जा रहा है...| अचानक उनकी आँखें फटी रह गयीं, एक ही क्षण में आंसू भी निकल आये, जब उन्होंने देखा कि बाकी सारे बच्चे बारिश से बचते हुए निकल रहे हैं, लेकिन उनकी बेटी सीतू अकेली उस कीचड़ में गंदे होने की परवाह किये बिना अपने हाथ डाल कर वो सारे झंडे बाहर निकाल रही है...

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चंद्रेश कुमार छतलानी

पता - 3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर - 5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान)

ई-मेल - chandresh.chhatlani@gmail.com

http://chandreshkumar.wikifoundry.com

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लता सुमन्त

आत्मविश्वास
                                                       डॅा.लता सुमन्त
     बेटे के कहने पर बाबा ने अपना 35 साल पुराना नौकरी का गाँव छोड़ा था. अब तक आपने बहुत श्रम किये.अब आप केवल आराम करेंगे.केवल बेटे की बातों पर विश्वास न करके उन्होंने बहू से भी पूछा - हम तुम्हारे साथ रहें उसमें तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं?परंतु निशीता को किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति न थी.
       बहू और बेटे के साथ नये फ्लेट में उनके तीन साल बहुत ही आनंदोल्लास और चैन से गुजरे.जो वे समझ भी न पाए.प्रेम से बातें करना,बहू की सराहना करना,उसे सम्मान देना, हर कार्य में उसे सहकार देना आदि.माँ - बाबा की तरह ही प्यार करनेवाले तथा उसकी भावनाओं की कद्र करनेवाले थे उसके सास - ससुर.उसके मन के हर पल की जैसे उन्हें खबर रहती थी.निशीता को जैसे एक माँ - बाबा के छूटने पर दूसरे,सास - ससूर, माँ - बाबा की जगह मिल गए थे.उसे माँं - बाप की कमी कभी मेहसूस नहीं हुई थी.
          बडे जेठ, जेठानी, नंद सभी लोग बहुत ही और हमेशा उसकी सराहना करनेवाले थे.प्रेम की कमी न थी और अपनापन पारावार था.अपनी निशीता पढी - लिखी,सहृदयी और नम्र है.इस बात की हर कोई तारीफ करता.निशीता का प्यार और नम्रता से हर किसी के साथ पेश आना तथा हर किसी के प्रति समान व्यवहार के कारण वह हर किसी की प्रिय थी.विवाह के पश्चात केवल घर ही बदला है ऐसा उसे हमेशा मेहसूस होता था.
      उसे अपने शुरु के दिन याद हो आए.दीपकभाई साहब ने कहा था -बाबा को हर चीज समय पर ही चाहिए.ग्यारह बजे खाना, ढाई बजे चाय,थोडी देर भी उन्हें नहीं चलती.उस क्षण कुछ देर के लिए वह चिंतित जरुर हुइ थी लेकिन थोडी ही देर में उस चिंता का निराकरण हो गया था,क्योंकि वह कई बार उनके गाँव जा चुकी थी इसलिए बाबा के स्वभाव से वह खूब परिचित थी.
         बाबा कई दिनों से बीमार थे.उन्हें अस्पताल में भरती करा दिया गया और सारे टेस्ट करा लिये गए.डॅाक्टरों के अनुसार बीमारी तो कोई नहीं पर बुढापा अपने आप में एक बहुत बडी बीमारी है .पीठ दर्द, पैरों में जकडन, भूख न लगना आदि तो ब़ुढ़ापे में होता ही रहता है.पाचनक्रिया मंद होने से भूख कम लगती है,खाने की इच्छा नहीं होती ,पेट ठीक नहीं रहता और इस कारण से सब कुछ होता रहता है.अस्पताल से बाबा घर आए तो बहू ने कहा - आपके लिए थोडा बदलाव जरूरी है.क्यों नहीं आप कुछ दिनों के लिए दीपक भाई साहब के यहाँ हो आते? नहीं बेटा ! मुझे यहीं रहना अच्छा लगता है. कुछ दिनों में ही मैं ठीक हो जाऊँगा.तुम चिंता न करो.
        आगे कुछ दिन अच्छे गुजरे. एक दिन पीठ पर मसाज करते समय उन्होंने पत्नी से कहा-मेरे जाने के पश्चात तुम यहीं रहना.नशीता तुम्हारा अच्छा ध्यान रखेगी और तुम्हें अपने साथ लेकर चलेगी ऐसा मेरा विश्वास है.बाबा की बातें सुनकर निशीता को जैसे सब कुछ मिल गया था.अपने से ज्यादा विश्वास उन्हें अपनी बहू पर था.अपने बाद अपनी जीवन संगिनी के दिन अच्छे गुजरेंगे और उसे किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं होगी इसी आत्मविश्वास के साथ उन्होंने आँखें मूँदी थी.उनके चेहरे पर उनके आत्मविश्वास का दिव्य तेज झलक रहा था.
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                        Associate professor in hindi

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देवेन्द्र सुथार

जहां चाह,वहीँ राह
 
(मिट्टी से भला कोई घर बनता है। यह तो जल्दी से टूट जाएगा। बच्चे ने इसका
जबाव देते हुए कहा था कि जब घर मिट्टी के ऊपर बनाया जाता है तो मिट्टी से
घर नहीँ बन सकता?)
 
एक छोटा बच्चा समुद्र के किनारे खेल रहा था। वहीँ से गुजरते एक आदमी ने
पूछा बेटा तुम यह क्या कर रहे हो? मिट्टी से क्योँ खेल रहे हो? बच्चे ने
कहा मैँ मिट्टी से नहीँ खेल रहा। मैँ घर बनाने की कोशिश कर रहा हूँ। वह
आदमी हंस पडा और बोला हां,मिट्टी का घर न? मिट्टी से भला कोई घर बनता है।
यह तो जल्दी से टूट जाएगा। बच्चे ने इसका जबाव देते हुए कहा था कि जब घर
मिट्टी के ऊपर बनाया जाता है तो मिट्टी से घर नहीँ बन सकता? मैँ मिट्टी
से घर बनाऊंगा भी और दुनिया मेँ अपने माता-पिता का नाम ऊंचा भी करुंगा।
पूरी दुनिया मुझे देखती रहेगी। बच्चे के आत्मविश्वास से उस आदमी को लगा
कि अगर मन मेँ चाहत हो तो सब कुछ किया जा सकता है।
--.
 
मेरी आँखे खोल दी
 
बात उन दिनोँ कि जब मेरे दसवीँ की परीक्षा के बाद छट्टियाँ पडी तो मैंने
भी अपने भईया के साथ मुम्बई जाने के लिए कहा और वे मुझे ले जाने के लिए
राजी हो गये। मुम्बई मेँ रहना कई ओर काम कई ओर होने के कारण हमेँ रोज
ट्रेन के दर्शन करने पडते थे। उसी लोकल पैसेँजर ट्रेन से रोज सुबह महानगर
को जाते समय एक सज्जन लगभग हर दिन मेरे आसपास बैठे मिलते थे। मेरी तरह
अप-डाउन करने वाले वे सज्जन मुझे बडे रहस्यमय प्रतीत होते थे।
मितभाषी,हल्की सफेद दाढी-मूंछ और सूट-बूट धारी...लगते कोई बडे अधिकारी ही
थे। जब गाडी स्टेशन से छूटकर अगले सिग्नल पर किसी तकनीकी कारणवश धीमी हो
जाती थीँ,तो वे हमेशा,बगैर चूके अपनी सीट से उठकर खडे हो जाया करते थे और
सामने के विशाल किँतु खाली पडे भूखण्ड को देखकर कुछ बुदबुदाया करते थे।
ट्रेन की खिडकी मेँ से,उस विशाल भूखंड पर सिवाय एक मन्दिर और कुछ दूरी पर
एक दरगाह के अलावा कुछ नहीँ दिखता था। समझ से परे था कि वे सज्जन किसको
नमन कर रहे है,मंदिर को या दरगाह को। काफी दिनोँ के बाद जाकर जिज्ञासा
शांत हुई, पर जबाव चौँकाने वाला मिला, 'भैया,न तो मैँ मंदिर को हाथ जोडता
हूं न दरगाह की। मैँ तो उस पवित्र भूमि को प्रणाम करता हूं,नमन करता
हूं,जहां एक विशाल कपडा मिल थी और जिसमेँ मेरे पूज्य पिताजी मुलाजिम थे।
इसी जमीन की बदौलत आज मैँ एक उच्च पद पर हूं। रोज गाडी जब यहां से गुजरती
है,तो मैँ अपने स्वर्गीय पिता और उस 'स्वर्गीय' कपडा मिल को याद कर लेता
हूं,बस!
आज के इस स्वार्थी युग मेँ हम व्यक्तियोँ का इस्तेमाल कर इन्हेँ त्याग
देते है,मतलब होने पर दुश्मन भी दोस्तोँ की भाषा बोलने लगते है। ऐसे मेँ
उन सज्जन की वे कई बातेँ आज भी अनायास मुझे अपने अतीत की ओर मोड देती
हैँ। कितने कृतज्ञ थे वे सज्जन!
 
 
 
-देवेन्द्र सुथार,गांधी चौक,आतमणावास,बागरा,जिला-जालौर,राजस्थान। 343025
मेल आईडी-devendrasuthar196@gmail.com

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रमाकांत यादव


लघु-प्रसंग

"बापू की शपथ"

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हमारे प्यारे बापू लंदन से वकालत की पढाई करके भारत वापस आये|

लंदन की तरह वे भारत में भी अपना पहनावा पैंट, शर्ट कोट पहनते थे!

एक दिन बापू अपने गांव का दौरा करने निकले, रास्ते में उन्हें एक तालाब

मिला| उन्होने देखा कि तालाब बडा मनोहर दिखायी दे रहा है| तालाब के चारो

तरफ रंग- बिरंगे फूल खिलें हैं|

वे अपने कदमो को रोक न पाये और तालाब पर जा पहुँचे|

अरे! यह क्या? यहां का नजारा देखते ही बापू के पैरो तले जमीन खिसक गयी,

उन्होने देखा कि कुछ वयस्क और बच्चे तालाब में नंगे ही नहा रहे थे| बापू

के पूछने पर उन्होने उत्तर दिया कि हमारे पास वस्त्र नहीं है, और हम सब

निर्वस्त्र ही अपना जीवन यापन करते हैं| उनकी इन बातों को सुनकर बापू जी

की आंखे भर आयी और उन्होने अपनी कोट और शर्ट उनके सामने उछाल दी| और उसी

वक्त बापू ने शपथ ली कि-"जब तक हमारे देश के बच्चे-बच्चे के तन पर कपडा

नही हो जायेगा ,मैं आजीवन अपने तन पर धोती धारण करुंगा! चाहे वह गर्मी,

जाडा या तूफानी बरसात ही क्यों न हो| ऐसे थे हमारे प्यारे बापू जिन्होने

अपने वचन को मरते दम तक निभाया |

------------रमाकांत यादव, क्लास-12 नरायनपुर, बदलापुर ,जौनपुर,उ.प्र.

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