शनिवार, 2 अगस्त 2014

पुस्तक समीक्षा - चीख

पुस्तकः    चीख

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लेखकः    सत्यदेव

समीक्षक – राजीव आनंद
प्रकाशकः   राज पब्लिशर्स, रतनजी रोड, पुराना बाजार, धनबाद (झारखंड)
मूल्य :     50/-

    खामोशी से चीखते सवालों का संग्रह है सत्यदेव की 97 लघुकथाओं की यह पुस्तक 'चीख'. झारखंड़ सरकार के अधीन खाद्य सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता विभाग में आपूर्ति निरीक्षक को अपना परम कर्तव्य मानते हुए पतीत हो चुकी इंसान की भावना एवं सोच को अपनी पुस्तक 'चीख' के माघ्यम से समाज को वो आइना दिखलाया है जिसमें दिखाई देने वाली तस्वीर को न तो झुठलाया जा सकता है और न ही मिटाया जा सकता है।
    स्माज में विभिन्न परिस्थितियों अथवा परिवेशों में व्याप्त विसंगतियों के कारण जीवन जीना दुरूह हो जाता है। इसी विसंगतियों से जुड़ी यथार्थ की भूमि में संवेदना से अभिसिंचित लघुकथा का अंकुरण होता है। वास्तव में लघुकथा जीवन के एकांश का सारांश है। सफल रचनाकार वही है जो अपने समय के निर्मम यथार्थ को संवेदना के धरातल पर परखने की कसौटी का माद्दा रखता हो। सही मायने में लघुकथा वही है जो पाठक के संवेदना के तार को झंकृत करने की क्षमता रखता हो, साथ उसमें वस्तु विशेष हो और कथा की समग्रता भी 'चीख' पुस्तक की लघुकथाओं से गुजरते हुए पाठक को पल-पल ऐसा महसूस होगा कि इन सभी घटनाओं का वह स्वयं साक्षी है।
    लेखक सत्यदेव साधुवाद के पात्र है क्योंकि सरकारी नौकरी की व्यस्तता के बावजूद वे साहित्य की साधना करते आ रहे है। नौकरी की जिम्मेदारियों को निभाते हुए लेखक सत्यदेव ने साहित्य लेखन किया है। उनकी बेबाकी का उत्कृष्ट नमूना है 'आवाज' नामक लघुकथा जिसे एक सरकारी अधिकारी द्वारा लिखे जाने की उम्मीद नहीं की जा सकती। एक सच्चा लेखक जो साहित्य के प्रति समर्पित है उसके द्वारा नौकरी, परिवार और लेखन के बीच सामंजस्य बिठाना बहुत मुश्किल नहीं होता।
    लेखक सत्यदेव बिना लाग-लपेट के ऐसे किरदार को अपने पाठकों को उपलब्ध कराते है जो लघुकथा क्षेत्र में मील के पत्थ्र है। कम से कम शब्दों में लेखक के विभिन्न किरदारों ने जो पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे हैं। इन रचनाओं की सार्थकता इसलिए है कि ये अपनी संक्षिप्तता और सम्प्रेषणीयता में समाज को यथार्थ से ही नहीं परिचित कराती है अपितु उसके सोच को भी एक दृष्टि प्रदान करती है। लघुकथा का प्रतिपाद्य विषय समाज है तथा समाज में स्त्री-पुरूष, अमीर-गरीब, निर्बल-सबल, ईमानदार-बेईमान जिन परिस्थितियों में जीवन जीते है, संघर्ष करते है उन सभी का चित्रण लघुकथा का प्रतिपाद्य है। लेखक सत्यदेव की लघुकथाएँ मनुष्य में संवेदना जगाकर उसे मनुष्य बने रहने का प्रेरक स्रोत प्रदान करता है।
    निसंदेह लेखक सत्यदेव का दिल जनसामान्य के लिए धड़कता है क्योंकि सामान्यजन ही किसी व्यक्ति के अंदर के लघुकथाकार को जगाता है। चुंकि सामान्यजन को महत्व दिए बगैर लघुकथा नहीं लिखी जा सकती। लेखक सत्यदेव ने समाज में परिव्याप्त बाजारवाद, पूंजीवाद, उपभोक्तावाद, बेराजगारी, बालश्रम, आर्दशहीनता, मूल्यविहीनता, भ्रष्टाचार, स्वार्थपरत, भोगवादी राजनीति, आस्थाविहीनता, हताशा, निराशा, कुंठा, विसंगति, असंगति, पारिवारिक बिघटन आदि को प्रतिपाद्य बनाते हुए कुल 97 लघुकथाओं के माघ्यम से 'चीख' में व्यक्त किया है जो काबिलेतारीफ है। लेखक का साहित्य लेखन समाजोन्मुखी है। लेखक अगर इसी तरह सजग और सतर्क रहकर रचनात्मकता को चुनौती के रूप में स्वीकार करते रहे तो उनकी लघुकथा की मात्रा भी प्रशस्त होती रहेगी।

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