शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

पुस्तक समीक्षा - सपनों के वातायन

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हिंदी दिवस पर ---

ज़िन्दगी से साँस लेती कविताएँ: सपनों के वातायन
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                                                       -- डॉ मनोज 'आजिज़'
कविता एक संवेदनशील ह्रदय की नितांत अभिव्यक्ति है जो सूक्ष्म-दर्शन,आतंरिक अनुभूति एवं चिरन्तनता का वाहक बनती है। इसमें सभी प्रकार की भावनायें प्रकाशित हो सकती हैं---चाहे हर्ष या विषाद, अतीत या वर्तमान और फिर भविष्यत की सूचना, दृश्य या अदृश्य, यथार्थ या कल्पना। ऐसी ही विविध भावनाओं को समाहित कर पुस्तकाकार, द्वितीय काव्य-संग्रह 'सपनों के वातायन' के रूप में प्रस्तुत की हैं जमशेदपुर शहर की वरिष्ठ कवयित्री पद्मा मिश्रा ने। इनकी कविताओं में विषय वैविध्य के साथ शैल्पिक प्रयोग भी है। कविगुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर कहते हैं कि सबसे कठिन कार्य सरल होना या सरलता को बनाये रखना है और पद्मा मिश्रा की कविताओं में यही सरलता व्याप्त है जिससे पाठकों तक इनकी कविताएँ सहज रूप से पहुँच पाती है और ग्राह्य भी होती है।
यह इक्कीसवीं सदी के उत्तर आधुनिक समय है जब भूमंडलीकरण का दौर जोरों पर चल रहा है। भारतीय संस्कृति का विघटन और टूटती परम्पराओं का सिलसिला आँखों देखा हाल जैसा प्रति पल दिखता है। हमारी संस्कृति ने प्रकृति से जुड़कर अपनी जड़ों को मजबूत किया हैं पर आज हम माँ स्वरुपा प्रकृति से भी विमुख हो रहे हैं जो संस्कृति से भी विमुखता का कारण बना हुआ है। कवयित्री इन्ही सब विषयों पर चिंतित होकर कविता के रूप में हम सब के बीच अपनी बातों को रखती हैं।
कुल ७० कविताओं का यह संग्रह 'वाणी वंदना' से शुरू होता है और तीसरी कविता 'राष्ट्र वंदना' है। 'माँ' कविता में एक करुण इच्छा है माँ को सर्वदा 'अहसास बनकर' पास पाने का। मनुष्य जानता है कि मृत्यु अटल सत्य है फिर भी कुछ न कुछ शिकायत जरूर रहती है। इस कविता में आंतरिक सूक्ष्मता झलकती है जो भारतीय समाज में रिश्तों की पकड़ को दर्शाता है। ये पंक्तियाँ हृदय को छू जाती है--
सुनो माँ !कहीं जाना नहीं
बस यूँ ही रहो मेरे आस पास
अहसास बनकर---
तुम मेरे पास हो.. हमेशा !
इस संग्रह में कई ऐसी कविताएँ हैं जो पाठक की भावनाओं को जागृत करती है और कविता से पाठक का जुड़ाव गहरा होता चला जाता है। ऐसी कुछ कविताएँ हैं-- मेरे देश की नारी, बेटियाँ, बेटियाँ भावनाओं-सी, माटी मेरे गाँव की, मेरा वतन, मैंने गमलों में बोये थे आदि।
पद्मा की कविताओं में एक स्वतः स्फूर्त प्रवाह है और भाषा भी प्रांजल है। इनकी कविताओं का एक वैशिष्ट्य है तत्सम्, तद्भव और देशज शब्दों का उपयुक्त प्रयोग। हिंदी को इन कविताओं से बल मिलेगा। छंद और रस का भी मानक प्रयोग किया गया है जिससे कविताओं में एक विशिष्ट पठनीयता आई है। 'धरती के भींगे अंतर में' की कुछ पंक्तियाँ हैं--
धरती के भींगे अंतर में
नव-स्नेह अंकुरित हो पाये,
और बूंद बूंद नभ कोरों पर
गीतों की छटा उमड़ जाये।
तुम बरसा दो नव रास कण में
वह प्रेम गुंजरित हो जाये।
पद्मा मिश्रा की कविताओं का भावना पक्ष अति प्रबल है। प्राकृतिक एवं आपसी संबंध विषयक कविताएँ ज्यादा हैं और यह बात पक्की होती है इन शीर्षकों से गुजरने से-- लौटा है बसंत, बासन्ती मन, जब बरसे बादल, तब गाँव याद आये, मित्रता संजीवनी है, महिला दिवस के बहाने, भावनाएं, दहलीज़ आदि।
छायावादी कविताओं में कल्पना की प्रधानता होती है और साथ में रहस्य की भी उपस्थिति होती है। छायावादी कविताओं को रहस्यवाद और चित्रभाषावाद का पर्याय भी माना जाता रहा है। चित्रभाषा के उपकरण हैं--प्रतीक, लक्षणा, व्यंजना, आभ्यन्तर साम्य के आधार पर लिए जाने वाले अप्रस्तुत, अनोक्ति पद्धति आदि। विशेष बात यह है कि पद्मा मिश्रा की कविताओं में इन सबका आधिक्य और आवरण भी नहीं है जिससे पाठक को सहज ही काव्य-रस लेने में असुविधा होती हो । रचनाओं में एक लालित्य है। शैली और अभिव्यंजना में एक तात्पर्य सहित लावण्यता भी है।
'बासंती मन' कविता में कवयित्री लिखती हैं--
बासंती मन क्या गाता है ?
गंध-गंध रस भीनी धरती का अंतर्मन,
मधुपर्क सुवासित झिलमिल जीवन का आँगन
आज हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे उतार-चढ़ाव, कुरूपता, विसंगति और असहजता हैं कि प्रत्येक जीवन एक अलग व्यथा-कथा है। इसी अनुभूति और सत्य को उद्घाटित करती ये पंक्तियाँ--
किसके अधरों का गीत लिखूँ, आँखों में स्वप्निल सौगातें
किसके जीवन की कथा कहूँ, हर बात कहानी लगती है।
हिंदी भाषा के प्रति इनकी श्रद्धा और आदर अटूट है जो इन्होने 'अपनी भाषा हिंदी' और 'कहाँ तुम खो गयी हिंदी' नामक कविताओं में व्यक्त किया है। -- न जाने कितने चौराहे,गली ,सड़कों मीनारों पर,

इन ऊँची पट्टिकाओं पर टंगे बेशर्म नारों पर

हमारी संस्कृति से दूर कैसे हो गई हिंदी,

कहाँ तुम खो गई हिंदी
असल भारत गांव में बसता है। गांव भारत की आत्मा है। भारतीय कला, संस्कृति और साहित्य का विकास मूल रूप से लोक-जीवन से ही हुआ है। ग्रामीण स्नेह, उदारता, हरियाली, और सहज जीवन का कोई सानी नहीं है। 'माटी मेरे गाँव की' कविता में इसकी सोंधी व्याख्या है और यह कविता एक मानक के रूप में स्थापित होगी, यह मेरा विश्वास है।
अक्षत रोली धूलि चन्दन माटी मेरे गांव की,
हरी धान की सजी बालियाँ, पगडंडी की शान थी।
……
स्नेह भरा था दीवारों पर, ममता की मुस्कान थी
ढूंढ रही पहचान जिंदगी , उस आँचल के छाँव की
अक्षत रोली धूलि चन्दन माटी मेरे गांव की।

सपनों के वातायन' एक पठनीय, विचारणीय एवं संवेदनशील कविता संग्रह है जो स्वागत योग्य है। सुन्दर व आकर्षक आवरण सहित स्पष्ट मुद्रण के लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं। कविता सदा-नीरा है और पद्मा मिश्रा की कविताएँ इस बात को पुष्ट करती हैं। ऐसे ही रचनाकारों से कविता समृद्ध होती जाएगी और समाजोन्मुख चिंतन का फैलाव होता जायेगा। कविता से मनुष्य संवेदनशील होता है और आज के ''मनी मेकिंग' युग में कविता जीवन की एक अनिवार्य अनुसांगिकता है। इसे शांति का माध्यम बनाया जाना चाहिए ,कविता एक दिव्य संस्कार है जिसका पद्मा मिश्रा बखूबी पालन कर रही हैं

 

समीक्ष्य पुस्तक-- सपनों के वातायन
समीक्षक-- मनोज 'आजिज़'
प्रकाशक-- सारस्वत प्रकाशन, मुजफ्फरपुर  (२०१३)
मूल्य- १२५ रु

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