पुस्तक समीक्षा - मैं नहीं गाता हूँ…

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पुस्‍तक समीक्षा

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पुस्‍तक ः मैं नही गाता हॅूं․․․․․․

कवि ः आनंद पाठक ‘आनन'

प्रकाशक ः अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्‍ली-110030

मूल्‍य ः 240/-

मुक्‍तिबोध ने ज्ञानात्‍मक संवेदना और संवेदनात्‍मक ज्ञान की बात की थी, वे ज्ञान के संवेदनात्‍मक रूपांतरण की बात करते थे अर्थात ज्ञान के वर्चस्‍ववाद के नकार के वे पक्षधर थे․ आज का कवि संचार क्रांति के प्रभाव में प्रकृति से कटता जा रहा है, अब कवि शून्‍य में टकटकी लगाए नहीं रहता यानी एकांत से कटता जा रहा है․ कवि के जीवन से एकांत के गायब होने के इस समय में आनंद पाठक एकांत में टकटकी लगाते हुए कविता करते हैं-

‘‘मुझसे मेरे गीतों का प्रिय ! अर्थ न पूछो

कहाँ-कहाँ से हमें मिले है, दर्द न पूछो ''

 

कवि प्रेम के व्‍यापार में तब्‍दील होने से दुखी होते हुए प्रेम और उसके विभिन्‍न आयामों के आसपास कविताएँ बुनते है, जो जीवन के शश्‍वत मूल्‍यों का संवर्धन करती है․ कवि आनंद पाठक कहते है-

 

‘‘जीवन के इस सफर में, श्‍वासों के इस भंवर में

टूटे हुए सपन का श्रृंगार मांगता हॅूं

मैं प्‍यार मांगता हॅूं ''

आज जो प्रेम का रूप है बदल चुका है, प्रेम में असफल प्रेमी अपनी प्रेमिका से बदला लेने पर अमादा हो जाते है। ऐसे व्‍यापारिक समय में कवि पाठक कहते हैं-

 

‘‘शब्‍दों की नक्‍काशी केवल, भाव गीत के अलग-थलग

दिल से दिल की राह न निकले, मैं वो गीत नहीं गाता हॅूं ''

 

बकौल कवि ‘‘मुझे अपने बारे में कभी गलतफहमी नहीं रही है․ मैं मानता हॅूं कि मैं ‘गालिब' नहीं हॅूं․ उस प्रतिभा का शतांश भी शायद मुझ में नहीं है लेकिन मैं यह नहीं मानता कि मेरी तकलीफ गालिब से कम है या उसे मैंने कम शिद्‌त से महसूस किया है․'' कवि आनंद पाठक की कविताओं की यह विशेषता पुस्‍तक में देखने को मिलती है कि कवि ने दर्द औ पीड़ा को जिस भाव और भाषा के साथ आई, वही लिखा इसलिए उनकी कविताएँ कहीं हिन्‍दी में, कहीं हिन्‍दुस्‍तानी में, कहीं भोजपूरी में, कहीं गजल के रूप में, कहीं मुक्‍तक के रूप में तो कहीं गीत की शक्‍ल में सामने आती है․ वहीं अनुभूति के स्‍तर पर उनकी कविताओं में अलग-अलग मिजाज और रंग देखने को मिलते है․

 

अपने लोगों के होली जैसे त्‍योहार में न आने और न बुलाने की पीड़ा जहां कवि ने भोजपूरी में इस तरह अभिव्‍यक्‍त किया है-

‘अपने न अईलु न हमके बोलउलु

‘कजरी' के हाथे न चिठिया पठउलु

होली में मनवा जोहत रहै गईलस

केकरा से जा के तू रंगवा लगउलु '

वहीं गजल के रूप में कवि की प्रेम पीड़ा को इस तरह अभिव्‍यक्‍ति मिली है-

‘धड़कते हुए दिल ने उनको पुकारा

जमाने को हो न सका ये गवारा

तुम्‍हारे लिए ये हँसी-खेल होगा

कभी दिल का तोड़ा कभी दिल संवारा '

प्रेम के बदलते रूप की पीड़ा से मर्महात कवि कहता है-

‘लफ्‍ज होठों पे आ लड़खड़ाने लगे

जिसको कहने में हम को जमाने लगे

नए जमाने की कैसी हवा बह चली

दो मिनट में मुहबब्‍त जताने लगे '

 

आज के आत्‍मकेन्‍द्रित परिवेश की एक बहुत बड़ी जरूरत है अपने समय और समाज को रचनात्‍मकता से जोड़ना और कवि आनंद पाठक के कविताओं के संग्रह ‘‘मैं नहीं गाता हॅूं․․․․․'' से गुजरते हुए पाठकगण यह महसूस कर सकते है कि कवि अपने समय और समाज को रचनात्‍मकता से जोड़ने के लिए किस कदर सक्रिय हैं․ अपने अंह का विसर्जन कर व्‍यष्‍टि को समष्‍टि में एवं अंह को वयं में बदलते हुए कवि आनंद पाठक ‘आनन' ने कविताएँ लिखा है․ उनके कविता कर्म को समझने के लिए मैं ‘शब्‍द हुए निःशब्‍द' से एक दोहा को उद्धृत करना चाहॅूंगा-

‘‘एक विसर्जन अंह का, एक आत्‍म का ताप

मन की गठरी खोलती, भावुकता चुपचाप ''

 

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा, गिरिडीह

ढारखंड़ पीन-815301

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