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चन्द्रकुमार जैन का आलेख - अपराजेय मानवीय जिजीविषा के समर्थ रचनाकार मिथिलेश्वर

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अपराजेय मानवीय जिजीविषा के समर्थ रचनाकार मिथिलेश्वर डॉ.चन्द्रकुमार जैन  भारत की अग्रणी सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लि...

अपराजेय मानवीय जिजीविषा के समर्थ रचनाकार मिथिलेश्वर

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

भारत की अग्रणी सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (इफको) द्वारा स्थापित श्री लाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान इस वर्ष मिथिलेश्वर को प्रदान किया जाएगा। वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी की अध्यक्षता में गठित इस वर्ष के निर्णायक मंडल में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रमेश कुंतल मेघ, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, देवी प्रसाद त्रिपाठी और डॉ. दिनेश कुमार शुक्ल शामिल थे। निर्णायक मंडल द्वारा मिथिलेश्वर का चयन उनके व्यापक साहित्यिक अवदान को ध्यान में रखते हुए किया गया है। 

राग दरबारी जैसा चर्चित उपन्यास देने वाले प्रख्यात व्यंग्यकार श्री लाल शुक्ल की स्मृति में हर साल दिया जाने वाला यह प्रतिष्ठित पुरस्कार है, जो किसी ऐसे रचनाकार को दिया जाता है जिसकी रचनाओं में गांव और कृषि जीवन से जुड़ी समस्याओं, आकांक्षाओं और संघर्षो को मुखरित किया गया हो। विपरीत परिस्थियों में भी जीवन की  सार्थक सक्रियता बहाल रखने वाली अपराजेय मानवीय जिजीविषा के नाम से मिथिलेश्वर के रचना संसार की प्रतिष्ठा है। 

ग्रामीण जीवन का जीवंत चित्रण

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मिथिलेश्वर ग्रामीण जीवन के कुशल चितेरे हैं। उनके कथा साहित्य में गांव की जिंदगी अपने समस्त रूप, रंग और गंध के साथ चित्रित हुआ है। उनके छ: उपन्यास और ग्यारह कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें प्रेम ना बाड़ी उपजै, यह अंत नहीं, माटी कहे कुम्हार से और बाबू जी, तिरिया जनम, हरिहर काका(कहानी संग्रह) प्रमुख हैं।  दो खंडों में प्रकाशित उनकी आत्मकथा पानी बीच मीन पियासी और कहां तक कहें युगों की बात काफी चर्चित हुई है। 

उल्लेखनीय है कि इस सम्मान से सम्मानित होने वाले साहित्यकार को प्रशस्ति-पत्र के अलावा ग्यारह लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। मिथिलेश्वर को यह सम्मान आगामी नई दिल्ली में एक भव्य समारोह में प्रदान किया जाएगा। 1 जनवरी 2015 को प्रदान किया जाएगा।

मिथिलेश्वर का रचना संसार

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31 दिसंबर 1950 को बैसाडीह भोजपुर बिहार में जन्में मिथिलेश्वर आम आदमी की स्थिति और नियति के उद्घाटक हैं।  एम ए.और डाक्टरेट की शिक्षा के साथ 100 से अधिक कहानियाँ,आलोचना, संस्मरण, व्यंग्य, निबंध आदि से उनका सृजन संसार सुसज्जित है। देश-विदेश की कई भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद भी हुआ है। उनकी रचनाओं में कहानी संग्रह- बाबूजी, बंद रास्तों के बीच, दूसरा महाभारत, मेघना का निर्णय, तिरिया जनम, हरिहर काका, एक में अनेक, एक थे पो.बी.लाल, भोर होने से पहले, मिथिलेश्वर की श्रेष्ठ कहानियाँ, गाँव के लोग, विगह बाबू, ज़िंदगी का एक दिन, छह महिलाएँ, माटी की महक, धरती गाँव की, प्रतिनिधि कहानियाँ और उपन्यास- झुनिया, युद्धस्थल शामिल हैं। 

कई पुरस्कारों से अलंकृत

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मिथिलेश्वर जी को बाबूजी पुस्तक के लिए म,प, साहित्य परिषद द्वारा वर्ष 1976 के 'अखिल भारतीय मुक्तिबोध पुरस्कार', बंद रास्तों के बीच पुस्तक के लिए सोवियत रूस द्वारा वर्ष 1979 के सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, मेघना का निर्णय पुस्तक के लिए उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 1981-82 के यशपाल पुरस्कार तथा निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन द्वारा राज्य के सर्वोत्कृष्ट हिंदी लेखक के लिए वर्ष 1983 के अमृत पुरस्कार से पुरस्कृत एवं सम्मानित। सारस्वत साधना के उनके सृजन मुकुट में अब श्रीलाल शुक्ल पुरस्कार का मयूर पंख और जुड़ गया है। 

चंद कृतियों के मर्म पर एक नज़र

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मिथिलेश्वर जी के चल खुसरो घर आपने संग्रह की कहानियों में आज का गाँव है- अपने सारे राग-विराग, सुख-दुःख के साथ। शहरी संस्कृति ने जिस तरह मानवीय संवेदनाओं को विकृत किया है उसका विद्रूप असर गाँव के सिवानों तक भी फैल चुका है। नतीज़तन अपसंस्कृति और अजनबीपन ने नगरों की तरह ही गाँवों में भी रिश्तों की गरमाहट को कम किया है। दरअसल गाँवों-क़स्बों के इस बदलते जीवन और परिवेश के यथार्थ को ही मिथिलेश्वर की ये कहानियाँ पूरी संवेदनशीलता के साथ बुनती और अभिव्यक्त करती हैं।

आत्मकथ्यात्मक उपन्यास है–पानी बीच मीन पियासी, जो उनके समय और समाज का जीवन्त दस्तावेज़ है। ज़मीन से जुड़ा कोई संघर्षशील व्यक्ति विभिन्न समस्याओं से जूझते हुए कैसे रचनात्मकता ग्रहण करता है तथा संवेदना के धरातल पर अपनी रचना-प्रक्रिया में असंगतियों के ख़िलाफ़ आलोचनात्मक विवेक जाग्रत करने की कोशिश करता है, इसका सशक्त आख्यान है यह कृति। सचमुच किसी व्यक्ति का यथार्थ जीवन किसी भी काल्पनिक रचना से अधिक मर्मस्पर्शी, विचारोत्तेजक और प्रभावकारी होता है, यह कृति इस बात का भी पुख्ता प्रमाण है। 

एक लेखक के जीवन संघर्षों के तहत आज़ादी के बाद के गाँवों की बेबाक अन्तःकथा प्रस्तुत करनेवाली इस कृति में जातिगत द्वेष, खेती के कठिन और जटिल संघर्ष, लिंग-भेद आदि निरन्तर विस्तार पाती अराजक स्थितियाँ मन को आहत करती हैं। बावजूद इसके अभावों से जूझते हुए ग्रामीणों का अस्तित्व-रक्षा के लिए प्रखर संघर्ष, और फिर गाँव से टूटने और जुदा होने की पीड़ा तो दर्ज है ही, साथ ही शहरी समाज में मध्यवर्गीय जीवन की तल्ख़ सच्चाइयों का खाका भी इस कृति को अहम बनाता है। 

ऐसी समस्याओं का साहित्य में समाधान ढूँढ़ने की पुरज़ोर लेखकीय कोशिश अपना प्रस्थान निर्मित करती है। स्वप्नों के ध्वंस की त्रासदी और स्वप्नों के मलबे से सार्थक स्वप्नों की पुनर्निर्मिति ही इस आत्मकथ्यात्मक उपन्यास को ‘स्वप्नों के महाकाव्यात्मक आख्यान’ में तब्दील करती है। जीवन्त आंचलिक भाषा और ज़मीनी स्पर्श इस कृति की अन्यतम विशेषताएँ हैं।

भोर होने से पहले कहानी संग्रह - मिथिलेश्वर की कहानियाँ प्रायः उनकी अपनी जमीन से जुड़ी हुई होती हैं और वहाँ के शोषित, अभावग्रस्त और गरीबी में साँस ले रहे, या फिर विकसित हो रही औद्योगिक संस्कृति एवं शहरी हवा में कहीं खो गये आदमी की मनोदशा का विश्लेषण करती हैं। रचनाकार ने अपने आसपास के जीवन को एक्स-रे नजर से देखा, जाना है। जीवन के दुःखद, भयावह, कटु एवं विषाक्त परिवेश ने उन्हें भीतर तक कचोटा है, आहत किया है। शायद, इन्हीं सब विषमताओं और जटिलताओं से उपजी हैं मिथिलेश्वर की कहानियाँ। इनमें एक ओर जहाँ स्वाधीनता के इतने बरस बाद दीमक की तरह जहाँ-तहाँ चिपके सामन्ती जीवन पद्धति का चित्रण है तो कहीं आश्रय और पनाह की खोज में भटक गयी नारी-काया का। इससे भिन्न कुछ-एक कहानियाँ राजनीति और शिक्षा-जगत् के गिरते मूल्यों की ओर मार्मिक व्यंग्य के लहज़े में अंगुलि-निर्देश करती हैं। कुछ कहानियाँ शुद्ध काल्पनिक भी हैं। आंचलिक यथार्थ को सजीव एवं प्रभावपूर्ण बनाने में बिम्बों-प्रतीकों का समायोजन इन कहानियों की अपनी विशेषता है।

उपन्यास यह अंत नहीं - अंतहीन बनती समस्याओं के खिलाफ मानवीय संघर्ष की विजयगाथा का जीवंत उपन्यास है। जीवन की सकारात्मक चेतना और अपराजेय मानवीय जिजीविषा का सार्थक उद्घोष। ग्रामीण जीवन की जमीनी सच्चाई का बेबाक चित्रण। चुनिया और जोखन के रूप में अविस्मरणीय चरित्रों का सृजन। हिंसा, द्वेष और नफरत के विरुद्ध सहज मानवीय संबंधों की स्थापना। गहन मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज। हिन्दी उपन्यास के समकालीन दौर में कलावाद और यथार्थवाद के द्वंद्व को पाटने वाला एक मजबूत सेतु। एक तरफ भाषा की रवानगी और खिलंदड़पन तो दूसरी तरफ जमीनी सच्चाइयों का अंकन। भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर एक सशक्त कृति। बींसवी शताब्दी का एक स्तरीय और यादगार उपन्यास है। 

सुरंग में सुबह, मिथिलेश्वर का पहला राजनीतिक उपन्यास है। यह प्रभु वर्ग के राजनीतिक पाखण्ड तथा निम्न वर्ग के अन्ध विश्वास से एकसाथ जूझता है। हम जानते हैं कि समकालीन राजनीति में शैक्ष के द्वारा सफलता पाने की संस्कृति का वीभत्स विकास हुआ है। प्रस्तुत उपन्यास में सर्वोच्च पद पाने के लिए जिन अनैतिक माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है, वह दहला देता है। और भारतीय राजनीति के विकृत चरित्र को उघाड़ देता है। वस्तुतः इस उपन्यास में मिथिलेश्वर जहाँ भारतीय राजनीति के तलघर की यात्रा करते हैं वहीं सामाजिक बदलाव के लिए छटपटाते सामान्य जनता की आकांक्षओं, उम्मीदों और अन्तर्विरोधों को भी सफलतापूर्वक प्रस्तुत करते हैं। यह राजनीति के सच को प्रस्तुत करती एक पठनीय कृति है। 

सम्प्रति मिथिलेश्वर जी आरा, बिहार में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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प्राध्यापक - हिन्दी विभाग 

शासकीय दिग्विजय स्नातकोत्तर महाविद्यालय 

राजनांदगांव।

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रचनाकार: चन्द्रकुमार जैन का आलेख - अपराजेय मानवीय जिजीविषा के समर्थ रचनाकार मिथिलेश्वर
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