मंगलवार, 26 अगस्त 2014

प्रमोद यादव का व्यंग्य - लेखक संपादक संवाद

लेखक-सम्पादक संवाद / प्रमोद यादव

‘सौवीं रचना’

संपादक से लगातार सखेद - पत्र पाते-पाते लेखक निराश और हताश हो गया. आखिरी बार अपनी रचना के साथ उसने संपादक को एक चेतावनी भरा पत्र लिखा - ‘ महोदय, आपने तो शायद मेरी रचना नहीं छापने की कसम खा रखी है..फिर भी आशान्वित हूँ..सुबह कभी तो आएगी.. यह मेरी सौवीं रचना है.सौ का अर्थ तो आप अच्छी तरह समझते होंगे..आशा है, इसका जरुर सम्मान करेंगे अन्यथा एक उदीयमान लेखक का समय पूर्व अवसान निश्चित समझिये .’

इस बार लेखक को संपादक से सखेद वाला पत्र नहीं मिला..बल्कि ‘विचारणीय’ की सूचना मिली..लेखक फूला न समाया..किन्तु जब अंक आया तो हक्का-बक्का रह गया....संपादक ने ‘ आपके पत्र ‘ कालम में उसके पत्र को ही छाप दिया था..

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‘अदालत का सीन’

जज- ‘ आपने पत्रिका के संपादक को गोली क्यूं मारी ?

लेखक - ‘ जब-जब रचनाएँ भेजता.. सखेद लौटा देते...गोली न मारता तो और क्या करता?’

जज- ‘ इतनी छोटी सी बात के लिए गोली मार दी ?’

लेखक - ‘ मेरी रचनाये सखेद वापस कर मुझे तिल -तिल मारते थे ..मैंने इकट्ठे ही मार दी तो क्या गजब हो गया ?..मेरा निशाना चूक गया इसलिए गोली हाथ में लगी और बच गया...फिर भी खुश हूँ..साल दो साल अब किसी को भी ‘सखेद-पत्र’ नहीं लिख पायेंगे..

जज-(संपादक से)- ‘ आपको इस विषय पर कुछ कहना है ? ‘

संपादक- ‘ जज साहब, मैं इस केस को ज्यादा तूल नहीं देना चाहता..मेरी जान बच गयी..अब इनकी जान लेकर क्या करना ?... वैसे सजा के तौर पर आप इन्हें कुछ देना चाहें तो मेरी विनती स्वीकार कर इन्हें मेरे स्वस्थ होने तक पत्रिका का संपादन सौप दें...संपादक बनने पर ही इन्हें संपादक के दायित्वों का बोध होगा और सखेद पत्रों का सविस्तार ज्ञान होगा..’

जज ने फैसला सुना दिया....

अब लेखक महोदय संपादक हैं और वही सब कर रहें हैं जो पहले वाले करते थे...थोक के भाव में लेखकों को ‘सखेद पत्र’ थमा रहे हैं......बीच-बीच में अपनी घटिया रचनाओं का रसास्वादन करा रहें हैं...

लगता है इस बार कोई सखेद पत्र प्राप्त लेखक का निशाना नहीं चुकेगा.. संपादक बिलकुल नहीं बचेगा..’

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‘विश्व रिकार्ड’

एक कवि ने एक साप्ताहिक के संपादक को अपनी चार सौ पेज की लंबी असमाप्त कविता प्रकाशनार्थ भेजी और साथ में एक पत्र...पत्र में लिखा कि कविता अधूरी है.और सालों तक अधूरी रहेगी..आप निरंतर इसे प्रकाशित करते रहें..हर सप्ताह मैं किश्त दर किश्त भेजता रहूँगा..विश्व रिकार्ड बनाने में मदद कर आप भी छापने का विश्व रिकार्ड बनाए..मेरे साथ बहती गंगा में हाथ धोएं..

संपादक ने क्षमा याचना सहित रचना सखेद लौटाते लिखा – ‘ बंधू, पहले आप अपनी असमाप्त कविता को समाप्त करें ..फिर भेजें...तब तक मेरा सुपुत्र भी जवान हो जाएगा...फैसला वही करेगा.. वैसे..फॉर युअर काइंड इनफर्मेशन..आपको बता दूं—सखेद रचना लौटाने का विश्व रिकार्ड मेरे नाम ही है.. और फिलहाल इसी से संतुष्ट हूँ..

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‘बेसिर-पैर विशेषांक'

एक लेखक ने खूब नाराजगी के साथ मासिक पत्रिका के संपादक को पत्र लिखा कि उन्होंने उनकी अच्छी-खासी रचना का बैण्ड बजा दिया..रचना को बेतरतीब, क्रम-विहीन छापकर गुड-गोबर कर दिया....रचना का “अंत” शुरू में, “मिडिल” आखिरी में...और “आरम्भ” अंत में छाप दिया ...भला पाठक इसे कैसे पढ़ पाएंगे ?.किस तरह ‘लिंक’ बिठा पायेंगे ? वो तो यही समझेंगे कि मैं ही बे-सिर पैर का लेखक हूँ...’

संपादक ने जवाब भेजा- ‘ आप कतई चिंता न करें श्रीमान ..... छप गया है तो इसमें ज्यादा गुस्से होने वाली बात नहीं..क्योकि हमारा यह अंक ‘ तंत्र-मंत्र विशेषांक ‘ है...इसके सारे लेख बे-सिरपैर के हैं..पाठक मैनेज’ कर लेंगे.. आप टेंशन न लें.. निश्चिन्त रहें... बाकी सब हम देख लेंगे..’

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‘गेट टू गेदर’

एक बार स्वर्ग और नरक , दोनों लोकों का गेट-टू-गेदर स्वर्ग में होना तय हुआ जिसमें उन्नीस सौ छियासी बैच के ही मृतात्माओं को शामिल होने का आमंत्रण भेजा गया....स्वर्गवासी झक सफ़ेद पाजामे-कुरते में किसी वाशिंग पावडर के विज्ञापन जैसे वहाँ उपस्थित हुए तो वहीं नरकवासी चड्डी-बनियान गिरोह की तरह केवल चड्डी-बनियान में पधारे.. खचाखच भीड़ थी..कार्यक्रम शुरू होने में समय था..मुख्य-अतिथि वहाँ भी पृथ्वी वासी की तरह लेट-लतीफ़ था..अचानक एक मशहूर सम्पादक को चड्डी-बनियान में आँखें चुराते देख सफ़ेद पाजामाधारी नव-लेखक को मजा आ गया..वह अविलम्ब उनकी ओर लपका और चिढाने के अंदाज में बोला-‘ सम्पादक जी..नमस्कार...आप...और नरक मे ? ‘

‘ हाँ..पर तुमने ऐसा क्या रच दिया कि स्वर्ग पहुँच गए ?’ उसने घोर आश्चर्य से पूछा.

‘ चित्रगुप्त ने साफ़ कह दिया कि इसने अपने हिस्से का नरक नीचे ही भोग लिया है..किसी दुष्ट सम्पादक ने सखेद पत्र भेज-भेज इन्हें पागल कर मरने पर मजबूर किया इसलिए....अब तो इनका “स्वर्ग” बनता ही है.. पर आप कैसे नरक में आये ?’ लेखक ने जवाब देते पूछा.

‘ यहाँ भी नीचे की तरह घपला ही घपला है बंधु .कभी सपने में भी नहीं सोचा कि नरक भोगना पड़ेगा..मैंने कई सिफारिश लगाए..आवेदन दिए कि मुझे स्वर्ग आबंटित किया जाए पर सब सखेद पत्रों की तरह वापस लौट आये.. लेखकों पर घोर मानसिक प्रताड़ना का मुझ पर आरोप लगाये और नरक में धकेल दिए..’ उसने सफाई दी.

‘ वैसे नरक में क्या काम (दंड) देते हैं ? ‘ लेखक ने पूछा.

‘ बहुत ही घातक काम देते हैं..जिन रचनाओं को मैंने सखेद लौटाया , उसे ही जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर रोज पढ़ने बोलते हैं.. वह भी केवल एक बार नहीं बल्कि पांच-पांच बार..’

‘ तब तो इन दिनों मेरी रचनाएँ भी आप पंचम स्वर में बांच रहे होगे..’ लेखक ने मुस्कुराते हुए पूछा.

‘ हाँ..तुम्हारी पढता हूँ तभी नरक का ज्यादा अहसास होता है..वैसे तुम स्वर्ग में क्या करते हो ?’ उसने कौतूहल से पूछा.

‘ स्वर्ग की मासिक पत्रिका का सम्पादन कर रहा हूँ..आपकी बदौलत स्वर्ग भोग रहा हूँ..आप भी कुछ भेजिए और मिलते-जुलते रहिये..”नरक-कोना” में आपको छापूंगा..सखेद-पत्र नहीं भेजूँगा...इतना इत्मीनान रखिये..जाइए.. किस सम्पादक से पाला पड़ा.. क्या याद कीजिये..’

तभी मुख्य-अतिथि के आगमन की खबर से खलबली सी मची और हो-हल्ला के बीच सम्पादक भीड़ में कहाँ दुबक गया , पता ही न चला.

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प्रमोद यादव

गयानगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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