रविवार, 3 अगस्त 2014

ओम प्रकाश शर्मा का आलेख – निजी विद्यालय बनाम राजकीय विद्यालय

प्रायः राजकीय विद्यालय व निजी विद्यालय के परीक्षा परिणामों, कार्यप्रणाली, उन दोनो के प्रति लोकरुचि आदि को लेकर तुलनात्मक टिप्पणियाँ देना आम बात हो गई है। इन टिप्पणियों में हर बार निजी विद्यालयों की श्रेष्ठता पर प्रकाश डाला जाता है तथा राजकीय विद्यालयों में होने वाली शैक्षणिक गतिविधियों को हेय बतला कर उन टिप्पणियों को अन्तिम रूप प्रदान कर दिया जाता है। इन दोनों प्रकार के शिक्षा संस्थानों में मौलिक अन्तर क्या है? इसे समझने या इस पर अपने विचार प्रकट करने की आवश्यकता शायद ही किसी ने अनुभव की हो। मेरे विचार से इस मौलिक अन्तर को समझे बिना इस प्रकार की टिप्पणियाँ आम जनता में जहाँ अनेक प्रकार की भ्राँतियाँ उत्पन्न करती है वहीं साथ ही साथ निजी विद्यालयों के लिए अनचाहे विज्ञापन का कार्य भी करती हैं क्योंकि इन दोनो प्रकार के विद्यालयों के संचालन के उद्देश्य ,प्रवेश पाने की नियमावली एवं कार्यप्रणाली, प्रवेश पाने वाले छात्रों के सामाजिक परिवेश, अभिभावकों की आर्थिक स्थिति आदि में दिन रात का अन्तर है।

वर्तमान में अधिकाँश निजी विद्यालयों की स्थापना का उद्देश्य व्यावसायिक होता है। सामान्यतः इनके संचालन का प्रमुख लक्ष्य आर्थिक हितों को प्राप्त करना है जनहित की भावना तो उसकी सहायिका बन स्वतः ही कार्य करती है। यहाँ गुणवत्ता लाने का प्रयास अपनी साख को बनाकर अपनी आय को बढाने या स्थायी बनाए रखने के उद्देश्य से होता है। वे ही बालक निजी विद्यालयों में प्रवेश पा सकते हैं जिनके माता पिता अथवा अभिभावक विद्यालय द्वारा फीस व विभिन्न निधियों के रूप में निर्धारित धनराशि देने में सक्षम होते हैं जबकि सरकारी संस्थाओं का लक्ष्य समाज के सभी वर्गो के बालकों को बिना किसी भेदभाव के शिक्षित करना है ताकि वह अपने परिवार,समाज व देश के विकास में अपनी सक्रिय भूमिका निभा सके। राजकीय विद्यालय में कई बालक ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके लिए दो वक्त का भोजन जुटा पाना अपने आप में एक समस्या है। इसीलिए उनके स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सरकारी विद्यालयों में दोपहर के भोजन की व्यवस्था भी की जाती है यहाँ पर शिक्षा के साथ साथ बालकों के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाता है। इसके साथ साथ बालिकाओं के लिए निशुल्क पुस्तकों आदि की भी व्यवस्था की जाती है। आई.आर.डी.पी, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रों एवं मेधावी छात्रों के पढ़ाई अन्य खर्चों को पूरा करने के लिए अनेक प्रकार की छात्रवत्ति योजनाओं का प्रावधान किया जाता है। इनका मुख्य ध्येय जन साधारण को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना है।

आप देखते हैं कि निजी संस्थाओं में प्रवेश देते समय जहाँ बालक की लिखित एवं साक्षात्कार के रूप में मौखिक परीक्षा ले कर उसकी बुद्धि, परिवार एवं सामाजिक वातावरण को जानने का प्रयास किया जाता है वहाँ साथ ही साथ उसके अभिभावक का भी साक्षात्कार लिया जाता है जिसमें उनकी सामाजिक स्थिति शैक्षणिक योग्यता व आर्थिक स्थिति का जायजा़ ले कर यह जानने का प्रयास किया जाता है कि क्या ये बालक को अपने घर पर शैक्षिक वातावरण प्रदान करवाने, उनको गृहकार्य एवं परीक्षा की तैयारी करवाने में सक्षम हैं या नहीं। बड़ी कक्षाओं में 80 प्रतिषत या उससे भी अधिक अंक प्राप्त करने वाले छात्रों को ही इन विद्यालयों में प्रवेश दिया जाता है। जब आप क्रीम को मथेंगे तो उसमें मक्खन आएगा ही। जबकि राजकीय विद्यालयों में प्रवेश पाने का विधान इसके बिलकुल विपरीत है यहाँ पर तो जो माता-पिता अपने बच्चों को नहीं पढ़ाना चाहते उनका पहले विद्यालय प्रबंधन समिति के माध्यम से पता लगवा कर उन्हें जबरन अपनी संतान को विद्यालय में प्रवेश दिलवाने के लिए बाध्य किया जाता है। इस प्रकार निजी विद्यालय जहाँ मात्र अभिजात्य वर्ग, व मध्यम वर्ग के कुछ लोगों को शिक्षा प्रदान करने का कार्य कर रहे हैं वहीं सरकारी शिक्षा संस्थान आम जनता को शिक्षा की मुख्य धारा में जोड़ने में प्रयास रत है। (जिनमें अक्षम बालक सम्मिलित हैं।) यहाँ बड़ी कक्षाओें में भी सभी बालकों को कला विषय में प्रवेश लेने का अधिकार तो है ही साथ ही साथ 50 प्रतिशत अंक प्राप्त बालक विज्ञान विषय में प्रवेश लेने का अधिकारी है।

यहाँ एक बात और द्रष्टव्य है कि एक ही बौद्धिक स्तर के बच्चों को एक साथ पढ़ाना शिक्षक के लिए सुगम होता है ,ऐसा निजी विद्यालयों में ही सम्भव है। वे तथाकथित योग्य बालकों का चयन करते हैं और जो बालक पिछड़ता चला जाता है उसकी प्रमोशन रोक दी जाती है या अभिभावकों को अपने बच्चें को उस विद्यालय से निकालने के लिए विवश कर दिया जाता है या उनका बोर्ड का दाखिला नियमित छात्र के रूप में न भेज कर निजी रूप में भेजा जाता है जबकि सरकारी स्कूलों में आठवीं तक के छात्रों को प्रायः अनुत्तीर्ण नहीं किया जा सकता और इस प्रकार विभिन्न बौद्धिक स्तर के बच्चों को शिक्षक को एक साथ पढ़ाना पड़ता है जो एक कठिन कार्य है। इतना ही नहीं जिन विद्यार्थियों को निजी विद्यालय मलाई के समान छाँट कर प्रवेश देते है जब वे किसी कारण वहाँ नहीं चल पाते तो वहाँ से छोड़ दिए जाते हैं। तो उनको शिक्षित करने का उत्तरदायित्व भी राजकीय विद्यालय के अध्यापक बखूबी निभाते हैं। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को भी आम बच्चों के साथ चलाना उनके लिए एक चुनौती है। इन अध्यापकों के सामने सबको एक साथ चलाने की समस्या प्रमुख होती है और अन्य के मुकाबले अंको की दौड़ का विचार कम।

आज सरकारी विद्यालयों की अपेक्षा निजी विद्यालयों की ओर लोगों के झुकाव का कारण अंग्रेजी भाषा के प्रति मोह तथा लोगों का बढ़ता आर्धिक स्तर है। आज सभी अंग्रेजी भाषा के महत्व को को समझ कर अपने बालकों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्रदान कराने वाले विद्यालय में प्रवेश दिलवाने के लिए प्रयासरत रहते हैं क्योंकि अभी तक राजकीय विद्यालय में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से सभी विषयों में शिक्षा प्रदान करने का वातावरण नहीं बन पाया है। यही कारण है कि आर्थिक रूप से समर्थ अभिभावकों का रूझान निजी विद्यालयों की ओर बढ़ा है। जबकि राजकीय विद्यालयों में उन परिवारों से भी बच्चे भी आते है जो शिक्षा क्षा के स्थान पर घरेलू काम, पशु पालन, कृषि कार्य आदि को प्राथमिकता देते हैं तथा जिनका कोई महान लक्ष्य नहीं होता और न ही उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कोई योजना । कोई कृषक बनना चाहता है तो कोई सैनिक तो कुछ सिपाही बनना चाहते है तो कुछ वाहन चालक। थोड़े से बालक अवश्य होते हैं जो दूसरों को अपना आदर्श बना महान लक्ष्य को लेकर चलते है। उसके अध्यापक ही उनमें नई प्रेरणा का संचार करते है और उनकी रुचि के अनुसार लक्ष्य निर्धारण कर उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उनका मार्ग दर्शन करते हैं। जिन बालकों के माता-पिता अथवा अभिभावक जागरूक होते हैं उनके बालक राजकीय विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर निजी विद्यालय के छात्रों से भी आगे निकल कर अपने माता पिता व अध्यापकों का नाम रोशन करते है।

निजी विद्यालय अपनी इमारतों ,बालकों की बढ़िया वर्दियों, अन्य सुविधाओं तथा अंग्रेजी माध्यम के द्वारा आम आदमी को उसी प्रकार आकर्षित करते हैं जिस प्रकार माल रोड़ या मैगामार्ट की सजी हुई दुकानें । चयनित छात्रों का परिणाम उनके लिए विज्ञापन का कार्य करता है। जहाँ तक पढ़ाई का प्रश्न है निजी विद्यालय में पढने वाले छात्रों के माता-पिता या तो अपने बालक को स्वयं गृहकार्य तथा आगामी टेस्ट की तैयारी के लिए देर रात जाग जाग कर पढ़ाते हैं या अपने धन के बल पर टयू्यन की व्यवस्था करवाते हैं जबकि राजकीय विद्यालय में कई की तो पहली ही पीढी पढ़ रही होती है और विद्यालय में अध्यापकों के अतिरिक्त उनका मार्ग दर्शन करने वाला कोई नहीं होता।

कुछ एक निजी विद्यालयों को छोड़कर अधिकाँश में सारे वर्ष शैक्षणिक गतिविधियाँ ही करवाई जाती है तथा खेलकूद व स्वास्थ्य पर ध्यान कम दिया जाता है जबकि सरकारी विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा क्षा अथवा खेलकूल की ओर भी सदैव ध्यान दिया जाता है। बालक राष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं तक चयनित हो कर जाते हैं, इनमें एन.एस.एस.,एन.सी.सी. इत्यादि का प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता है। शिक्षा के साथ-साथ इस प्रकार की गतिविधियाँ वर्ष भर चलती रहती हैं। निजी विद्यालय में जब अभिभावकों को बुलाया जाता है तो उन्हे अवशी जाना पड़ता है अन्यथा उनके बालक को कक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाती। अभिभावकों ने भारी रकम खर्च की होती है एक तो उसका दर्द होता है दूसरे उन्हे भय होता है कि कहीं उनके बालक को स्कूल से निकाल न दें। इसके विपरीत राजकीय विद्यालय में एक बार बालक को प्रवेश दिलाने के बाद कई छात्रों के अभिभावको के तो पुनः दर्शन ही नहीं होते वे तो प्रवेश दिला कर ही अपने आपको कर्त्तव्यमुक्त अनुभव करते हैं। यहाँ तक कि वर्ष में तीन बार बुलाई जाने वाली विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठक में बार-बार बुलाने पर भी वे आना उचित नहीं समझते।

प्रातःकाल विद्यालय जा रहे दोनो प्रकार के विद्यालय के विद्यार्थियों पर एक विहंगम दृष्टि डालें तो आप देखेंगे कि निजी विद्यालय के छात्र या तो वाहनों में आते हैं और यदि नहीं तो पैदल चलने वाले छात्र का बैग उनके माता-पिता या अभिभावकों ने उठाए हुए होते हैं जबकि राजकीय विद्यालय के छात्र जहाँ अपना बोझ स्वयं उठाते हैं वहीं उन्हे विद्यालय आने पूर्व व घर जाकर अपने माता पिता के कार्य में भी हाथ बंटाना पड़ता है। इतना ही नहीं उन्हे घरेलू कार्य के कारण कई-कई दिनों तक विद्यालय से अवकाश पर या अवकाश न मिलने की दशा में अनुपस्थित भी रहना पड़ता है। राजकीय विद्यालय देश में वर्गभेद की भावना को समाप्त कर सामाजिक-साँस्कृतिक एकता स्थापित करने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहते है यहाँ पर सभी को समान रूप से प्रवेश लेने का अधिकार है। यहाँ ‘राजा रंक एक समाना’ वाली कहावत पूर्णरूपेण चरितार्थ होती है।

निजी विद्यालय के संचालक विद्यालय के प्रशासन के लिए स्वतंत्र है इसलिए कई विषयों जैसे अध्यापक के पद रिक्त होने पर उसके स्थान पर अस्थायी नियुक्ति आदि तत्काल कर लेते हैं जबकि राजकीय विद्यालय में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता इसके लिए एक लम्बी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसमें काफी समय लग जाता जिससे शैक्षणिक कार्यो में कई बार अवश्य व्यवधान पड़ता है। इसके अतिरिक्त राजकीय विद्यालयों के अध्यापकों की कार्य क्षमता व विश्वसनीयता को देखते हुए उनका देश की अन्य गतिविधियों में सहयोग वांछित होता है जबकि निजी विद्यालय के अध्यापकों पर ऐसा कोई बोझ नहीं होता।

सर्वशिक्षा अभियान के माध्यम से हमारे विद्यालयों की दशा में बहुत परिवर्तन आया है। साथ ही साथ निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के पारित होन पर इन विद्यालयों की बागड़ोर अभिभावकों के ही हाथ में छोड़ दी गई है। मूल्यांकन पद्धति में भी परिवर्तन आया है, अंग्रेजी भाषा को भी पहली कक्षा से लागू किया गया है, नवाचारों से अवगत करवाने के लिए अध्यापको के लिए प्रशिक्षण शिवरों का आयोजन किया जा रहा है जिसके परिणाम आशाजनक हैं। जिससे आगामी कुछ वर्षो में हमारे विद्यालय के परिणाम भी निजी विद्यालयों से पीछे नहीं रहेंगे। आज भी परिवर्तन देखे जा रहे है। सरकारी विद्यालयों में पढ़े लिखे छात्र प्रतियोगी परीक्षा में अन्यों से बाजी मारने में पीछे नहीं है। फिर भी अभी वह समय नहीं आया है अभी दोनों प्रकार के विद्यालयों की स्थिति में रात दिन का अन्तर है इसलिए अभी उसी आधार पर इनकी उपलब्धियों का अवलोकन किया जाना चाहिए।

अन्त में यदि हम देखें तो दोनों प्रकार की संस्थाओं में उतना ही अन्तर है जितना पूँजीवादी व्यवस्था व समाजवादी व्यवस्था में है। इन दोनों की परिस्थितियों व लक्ष्यों में दिन रात का अन्तर है। मेरा उद्देष्य किसी को हेय और श्रेष्ठ बतलाना नहीं है परन्तु इतनी तो गुजारिश कर ही सकता हँ कि दो असमान में तुलना करके भ्रान्तियाँ उत्पन्न कर अपने कर्त्तव्य का पालन कर रहे सहस्रों शिक्षको की भावनाओ को ठेस न पहुँचाएँ और सरकारी विद्यालयों पर अंगुली उठा कर सरकारी संस्थाओं के महत्त्व को कम करने का प्रयास न करें

 

(ओम प्रकाश शर्मा )

एक ओंकार निवास, सम्मुख आँगरा निवास,

छोटा शिमला ,शिमला -

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    1. हेमंत जी टिप्पणी के माध्यम से उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

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