शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

राजीव आनंद का आलेख - चाचा चौधरी की एक याद

स्‍मृति शेष देसी सुपरमैन चाचा चौधरी के रचयिता प्राण नहीं रहे

चाचा चौधरी, बिल्‍लू, पिंकी, साबू, रमन, चन्‍नी चाची, श्रीमतीजी और राका जैसे किरदारों के रचयिता प्राण कुमार शर्मा गुडगाँव के एक अस्‍पताल में 6 अगस्‍त को अंतिम सांसे ली․ प्राण कुमार शर्मा के जाने से साथ चला गया हमलोगों के बचपन की ढ़ेर सारी यादें जिसे हमलोगों ने चाचा चौधरी, साबू, चन्‍नी चाची जैसे सामाजिक किरदारों के सानिघ्‍य में संजोया था․ इन किरदारों के कारनामे पढ़-पढ़ कर हम बड़े हुए․

दरअसल 1960 के दशक में जब प्राण शर्मा ने चाचा चौधरी कामिक्‍स स्‍ट्रिप बनानी शुरू की, उस समय कोई भी देसी कॉमिक किरदार मौजूद नहीं था․ भारत में भी लगभग विदेशी कॉमिक्‍स ही पढ़ा जाता था․ ऐसे समय में प्राण शर्मा ने एक खांटी भारतीय कॉमिक किरदार बुढ़े चाचा चौधरी को पगड़ी पहनाकर हाथ में लाठी थमाकर भारतीय बच्‍चों के बीच लाया तथा यह बताने की जरूरत नहीं कि चाचा चौधरी का किरदार उतना ही प्रसिद्ध व लोकप्रिय हुआ जितना कि शरलॉक होम्‍स का किरदार․ चाचा चौधरी कॉमिक्‍स के एक करोड़ से भी ज्‍यादा नियमित पाठक रहे तथा लगभग दस भाषाओं में चाचा चौधरी कॉमिक्‍स प्रकाशित होती रही․

यद्यपि यह सत्‍य है कि कॉमिक्‍स को वो दर्जा नहीं मिल पाया जो साहित्‍य और संगीत को मिलता आया है पर इस सत्‍य से भी कोई इंकार नहीं कर सकता है, कि साहित्‍य जो समाज के लिए करता आया है, प्राण शर्मा के कॉमिक्‍स ने बच्‍चो के लिए वही किया․ साठ से अस्‍सी के दशकों में शायद ही कोई बच्‍चा ऐसा रहा हो जिसने चाचा चौधरी को नहीं पढ़ा हो और सामाजिक संस्‍कार एवं प्रतिबद्धता की बातें नही सीखा हो․ यह प्राण शर्मा की दूर दृष्‍टि और बुद्धिमता ही थी कि उन्‍होंने सत्‍तर के दशक में ही जब कम्‍प्‍यूटर उतना लोकप्रिय नहीं हुआ था लिखा था कि ‘‘चाचा चौधरी का दिमाग कम्‍प्‍यूटर से भी तेज चलता है․'' उन्‍होंने अपने नटखट, शरारती, गंभीर और ताकतवर किरदारों के जरिए बच्‍चों को हंसते-हंसते समस्‍याओं से जूझने और उसका समाधान करने की कला सिखाया․ प्राण शर्मा रचित किरदारों को पढ़ने वाली एक पूरी पीढ़ी रही है․

15 अगस्‍त 1938 को लाहौर के एक गाँव कासूर में जन्‍में प्राण कुमार शर्मा ने कार्टूनिस्‍ट कैरिअर की शुरूआत 1960 में दिल्‍ली से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘मिलाप' से किया था․ इस अखबार में उन्‍होंने ‘दाबू' नाम के किरदार गढ़े थे जो बाद में चाचा चौधरी के साथ परछाई की तरह रहने वाला ज्‍यूपिटर नामक ग्रह से आया भीमकाय ‘साबू' बना और कॉमिक्‍स की दुनिया में छा गया․ यह वही समय था जब बच्‍चों की पत्रिका ‘पराग' में प्राण शर्मा का कामिक्‍स बच्‍चे बड़े चाव से पढ़ते थे․ दरअसल 1969 में पहली बार प्राण शर्मा ने ‘लोटपोट' नामक पत्रिका में चाचा चौधरी का किरदार गढ़ा और मशहूर हुए․ इसके बाद उन्‍होंने डायमंड कॉमिक्‍स के लिए कई कॉमिक किरदारों को गढ़ा और दशकों तक भारतीय कॉमिक्‍स की दुनिया में छाए रहे․ 2009 में कार्टून फिल्‍म चाचा चौधरी आयी जिसमें रघुवीर यादव ने चाचा चौधरी का किरदार निभाया था․

प्राण शर्मा का अपने कार्यों के प्रति प्रतिबद्धता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्‍होंने अंतिम सांस तक अपने पाठकों के लिए कार्टून बनाया और उनके जाने के बाद पाठकों को उनकी कमी न खले इसलिए उन्‍होंने चाचा चौधरी की कई श्रृंखला पहले ही बना रखा था․

प्राण शर्मा के बनाए कॉमिक किरदारों का महत्‍व यह है कि कॉमिक्‍स की दुनिया में विदेशी कॉमिक किरदारों जैसे मेंड्रेंक, ब्‍लॉडी, सुपरमैन, फैंटम, बैटमैन के वर्चस्‍व को भारत में खत्‍म कर दिया और सामाजिक कार्टून किरदारों को गढ़कर एक नयी शुरूआत किया․ प्राण कुमार शर्मा अमर चित्र कथा श्रृंखला के रचयिता अनंत पाई के बाद दूसरे सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध भारतीय कार्टूनिस्‍ट हुए जिन्‍होंने चाचा चौधरी और साबू के किरदार को भारत के घर-घर में पहुँचा दिया तथा नन्‍हें बच्‍चों के चेहरे पर न सिर्फ मुस्‍कान बिखेरा अपितू बच्‍चों को सामाजिक संस्‍कार भी अपने किरदारों के माघ्‍यम से सिखाए․ उनकी स्‍मृति को नमन․

राजीव आनंद

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  1. सही कहा आपने हम सभी ने चाचा चौधरी को बचपन में जितने चाव से पढ़ा उतना अन्य किसी को नहीं .प्राण जी का निधन हम सभी की हानि है हम सभी की यादो में वह सदैव रहेंगे .

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