रविवार, 3 अगस्त 2014

पद्मा मिश्रा की कहानी - सपनों की सड़क

तीन दिनों से कालोनी की सड़क बन रही है,लगता है जैसे कोई बड़ा आयोजन हो रहा हो,-सरकारी अफसरों की आवाजाही बढ़ गई है,,मजदूरों का शोरगुल ,कहीं मिटटी काटने और गिट्टी सीमेंट मिलानेवाली मिक्सिंग मशीन की धड़धड़ाती आवाजें विचित्र सा माहौल बना रही हैं,,,पूरे वातावरण में कोलतार की गंध फैली हुई है,,इतनी गर्मी व् उमस के बावजूद  बेचारे मजदूरों के हाथ पसीना पोंछने के बाद तुरंत बेलचा उठा अपने काम में जुट जाते हैं,,, अपनी छत से मैं भी इस पूरे दृश्य को आत्मसात कर रही हूँ मजदूर मजदूरिनों के छोटे बच्चे एक किनारे बैठ कर टकटकी लगाये अपने माँ बाप को काम करते देख रहे हैं,,कुछ बच्चे मेरे घर के लोहे के गेट पर चढ़ कर खेल रहे हैं,-बहुत छोटे छोटे बच्चे हैं,जिनके चेहरों पर जिंदादिली की मुस्कान है, और आँखों में चंचलता--उनकी खिलखिलाती हंसी से उस नीरस  वातावरण  बोझिलता बीच बीच में भंग होती रहती है,

''एई चुप कोरो,''-चटाक् ''-किसी बच्चे ने दूसरे को कस कर थप्पड़ मार दिया था ,बदले में वो भी उससे उलझ जाता है,उसकी माँ आकर उसे शांत करती है,- उसके आंसू पोंछ जब जाने के लिए मुड़ी तो वह बिलख उठा--माँ!,,माँ गो,,आमी भात खाबो ''

''एखने थाक --आश्छि आमी '',, वह बच्चे की भूख को नकार ,अपने काम में मगन हो गई,ताकि काम जल्दी पूरा कर बच्चे को कुछ खिला सके,चार पैसे कमा सके ,,,

मुझे उस निरीह भूखे बच्चे पर दया आ रही थी धूप भी तेज थी,उस भीषण गर्मी में भला कब तक वह भूख-प्यास बर्दाश्त कर पाता ?अपनी रसोईं से बिस्कुटों का डिब्बा उठाया और बाहर आकर उन छोटे बच्चों में बाँट दिया ,कुछ देर तक सभी बड़ी शांति से बैठकर बिस्कुट खाते रहे फिर सारे लड़ाई झगड़े भूल अपने खेल में व्यस्त हो गए,,,,काश!,,इंसान भी बच्चों जैसा होता -पल भर में सारे लड़ाई झगड़े भूल शांति-सुख की नींद सो पता तो दुनिया में यह मार-काट तो न मचती !,,

अपने घर के दरवाजे पर खड़ी थी,धूप  तेज होने पर भी कालोनी वाले वहां से टले नहीं थे,उनके घर के सामने की सड़क पर गिट्टी की मोटी चादर बिछ सके और समतल जमीन बने इस बात की परख करते हुए अपना काम जो करवाना था,सरकारी काम है-कहीं जैसे तैसे निपटा कर न चले जाएँ ,,,जिसके लिए वे अघोषित जाँच अधिकारी बने ,डटे हुए थे ,,मेरी कालोनी का वार्ड पार्षद  अभी अभी मुझसे  पानी की दो बोतलें  मांग कर ले गया है, -चार कुर्सियां मैंने पहले ही भिजवा दी थीं ,,,सभी अधिकारी और ठेकेदार एक साथ बैठे थे,गाड़ियों की लम्बी कतार लगी थी,--इसी बीचसड़कों की लम्बाई-चौड़ाई और मोटाई की भी जाँच होती -फिर सड़क आगे बढ़ती , शाम होने लगी थी ,काम रोक दिया  गया,सारे मजदूर आजके दिन की पगार के लिए इकट्ठा हो गए थे,,,तभी जोरदार हल्ला हुआ,पता चला की ठेकेदार कम पैसे दे रहा था -बाकि मजदूरी कल देने का आश्वासन देकर जिसका विरोध मजदूर कर रहे थे,-,क्या खाएंगे -बनिए का उधार  चुकाना है -साहब,,,बच्चा बीमार है ,,सबकी अपनी अपनी परेशानियां --लेकिन परवाह किसे थी ?,,बहस चल रही थी,,मजदूर नाराज थे और फैसलाहुआ  कि वे आगे का काम नहीं करेंगे जब तक पैसे पूरे नहीं मिलेंगे'',,,समझौते की कोशिशें जारी थीं ,,

लेकिन इन सबसे अलग ,,,कुछ नन्हे हाथों ने अपना काम बंद नहीं किया था,,,वे नन्हे कदमों से गिरते-पड़ते ,गिट्टी,बालू सीमेंट मिलकर  खेल खेल में ,अपने  अनगढ़ हाथों से ,करीब एक मीटर सड़क बना चुकेथे ,,ये उनके सपनो की सड़क थी -जहाँ न भूख थी,न गरीबी,न बनिए  का उधार चुकाना था,-न अपने माँ,बाबा की तरह जिंदगी की जद्दोजहद से जूझना था,,-वे तो अपने खेल में -अपने सपनों की दुनिया  में वे मगन थे - -! 

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