रविवार, 31 अगस्त 2014

गोवर्धन यादव का आलेख - स्वामीनारायण अक्षरधाम की संस्कृति-तीर्थ यात्रा

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स्वामीनारायण अक्षरधाम (गोवर्धन यादव)

स्वामीनारायण अक्षरधाम एक नूतन-अद्वितीय संस्कृति-तीर्थ है. भारतीय कला, प्रज्ञा और चिंतन का बेजोड संगम यहाँ देखा जा सकता है. भारतीय संस्कृति के पुरोधा, स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक श्री घनश्याम पाण्डॆ या सहजानन्दजी ( 1781-1830) की पुण्य स्मृतियों को समर्पित स्वामीनारायण अक्षरधाम के आकर्षण से प्रभावित होकर जन-सैलाब खिंचा चला आता है..और स्वामी के दर्शन कर अपने को अहोभागी मानता है. धर्म और संस्कृति को समर्पित इस महामानव ने अपने आपको तप की भट्टी में तपाया, ज्ञान की लौ को प्रज्जवलित किया, और संचित पुण्यों को जनसाधारण के बीच समर्पित कर दिया.

एक दिव्य महापुरुष योगीजी महाराज ने आशीर्वाद दिया था कि यमुना के पावन तट पर एक भव्य आध्यात्मिक महालय की स्थापना होगी, जिसकी ख्याति दिग-दिगन्त में होगी. गुणातीत गुरुपरंपरा के पांचवे गुरु/ संतशिरोमणी/ दिव्य व्यक्तित्व के धनी विश्ववंदनीय प्रमुखस्वामी महाराजजी ने अपने गुरु के

. clip_image004 उस परिकल्पना को पृथ्वी- तल पर साकार कर दिखाया.

स्वामिनारायण अक्षरधाम के निर्माण और संवहन का उत्तरदायित्व बी.ए.पी.एस.स्वामिनारायण संस्था ने पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन किया. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मान्यता प्राप्त यह संस्था एक अंतराष्ट्रीय सामाजिक-आध्यात्मिक संस्था है, जो विगत एक शताब्दी से मानव-सेवा मे रत है. 3700 सत्संग केन्द्रों, 15,700 सत्संग सभाओं, 850 नवयुवा सुशिक्षित संतो,, 55,000 स्वयंसेवकों द्वारा सेवित और लाखों अनुयायियों के द्वारा यह संस्था शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में अपनी प्रमुख भूमिका निर्वहन बडी लगन-श्रद्धा और समर्पण के साथ कर रही है.

यमुना के किनारे लगभग एक सौ एकड जमीन पर उस परिकल्पना को साकारित किया गया है. इस भव्य स्मारक की डिजाइन श्री महेशभाई देसाई तथा श्री बी.पी.चौधरी ने उकेरी तथा सिकन्दरा (राज) के चालीस गाँवों के लगभग सात हजार कारीगरों ने इसे तराशा-संवारा, उन्हें क्रमसंख्या दी और फ़िर ट्रकों के माध्यम से निर्माण-स्थली पर भिजवाया. अंकोरवाट, अजन्ता, सोमनाथ, कोणार्क के सूर्य मन्दिर सहित देश-विदेश के कई मन्दिरों के स्थापत्य के गहन अध्ययन-मनन और वेद, उपनिषद तथा भारतीय शिल्प की कई पुस्तकों के गहन अध्ययन से प्राप्त जानकारियों के आधार पर इसका निर्माण किया गया. विशाल भव्यता लिए इस इमारत जो बनने में जहाँ चालीस साल लग सकते थे, उसे महज पांच वर्षों में पूरा कर दिखाया. यह किसी आश्चर्य से कम प्रतीत नहीं होता. छः नवम्बर दो हजार पांच में इसकी विधिवत इसकी नींव रखी गई थी जो दो हजार दस में बनकर पूरी हुई.

घनश्याम पाण्डॆ उर्फ़ स्वामीनारायण उर्फ़ सहजानन्द स्वामीजी हिन्दू धर्म के स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक पुरुष थे. आपका जन्म 03-04-1781 अर्थात चैत्र शुक्ल 9 वि.संवत 1837 में भगवान श्रीराम की जन्मस्थलि “अयोध्या” के पास स्थित ग्राम छपिया में हुआ था. आपके पिताश्री का नाम श्री हरिप्रसाद तथा माताश्री का नाम भक्तिदेवी था. सद्ध प्रसूत बालक घनश्याम के हाथ में पद्म, पैर में बज्र, तथा कमल-चिन्ह देखे गए. इन दैवीय अलंकरों से युक्त इस बालक ने महज पांच वर्ष की आयु में अक्षर ज्ञान प्राप्त किया था. आठ वर्ष की उम्र में आपका जनेऊ संस्कार किया गया. आपने कई शात्रों का गहनता से अध्ययन किया. ग्यारह वर्ष की आयु आते ही आपके माता-पिता का देहावसान हो गया. किसी कारण से आपका अपने बडॆ भाई के साथ विवाद हो गया. उसी समय आपने अपना घरबार छॊड दिया. अगले सात साल तक आप भारत में भ्रमण करते रहे. लोग उन्हें नीलकण्ठवर्णी कहने लगे. उन्होंने अष्टांगयोग श्री गोपाल योगीजी से सीखा. उत्तर में उत्तुंग हिमालय, दक्षिण में कांचीपुरम, श्रीरंगपुर, रामेश्वर होते हुए पंढरपुर और नासिक होते हुए आप गुजरात आ गए. मांगरूल के समीप “लोज” गाँव में निवास कर रहे स्वामी मुक्तानन्दजी से परिचय हुआ, जो स्वामी रामानदजी के शिष्य थे. वे उन्हीं के साथ रहने लगे.

स्वामी रामानन्दजी ने संप्रदाय की परम्परा के अनुसार नीलकण्ठवर्णी को “पीपलाणा” गाँव में दीक्षा दी और नया नाम दिया सहजानन्द. एक साल बाद स्वामीजी ने “जेतपुर” में सहजानन्दजी को अपने संप्रदाय का “आचार्य” पद दे दिया. कुछ समय बाद रामानंदजी का देहावसान हो गया. उसके बाद वे देश भर में घूम-घूमकर ईश्वर के गुणानुवाद करते और धर्म का प्रचार-प्रसार करते हुए लोगों को स्वामीनारायण मंत्र का जाप करने की सीख देते रहे. तन-मन से ईश्वर को समर्पित सहजानन्दजी ने 1830 ई. में अपनी देह छोड दी.

स्वामीनारायन के नाम से विख्यात हुए इस महान संत का स्मारक गांधीनगर (गुजरात) मे’अक्षरधाम” स्थापत्यकला का उत्कृष्टतम नमूना है. इसी तर्ज पर दिल्ली में यमुना के पावन तट पर भव्य स्मारक बनाया गया है,जिसकी विशालता, भव्यता देखते ही दर्शानार्थी को किसी दिव्य लोक में ले जाती है. .clip_image006 दिव्य द्वार- दसों दिशाओं के प्रतीक हैं, जो वैदिक शुभकामनाओं को प्रतिबिंबित करते हैं clip_image008 भक्ति द्वार- परंपरागत भारतीय शैली का अनोखा प्रवेश द्वार clip_image010 मयूर द्वार=स्वागत द्वार में परस्पर गूंथे हुए मयूरतोरण

clip_image012 अक्षरधाम मन्दिर=गुलाबी पत्थरों और श्वेत संगमरमर के संयोजन से 234 कलामंडित स्तम्भ,, 9 कलायुक्त घुमट-मण्डपम, 20 चतुष्कोणी शिखर और 20,000 से भी अधिक कलात्मक शिल्प, इसकी ऊँचाई 141फ़ीट,चौडाई 316 फ़ीट और लंबाई 356 फ़ीट है clip_image014 श्रीहरि चरणारविंद=सोलह मांगलिक चिन्हों से अंकित श्री हरिचरणारविंद

clip_image015 मूर्ति= पंचधातु से निर्मित स्वर्णमंडित 11 फ़ीट ऊँची नयनाभिराम मूर्ति. कलामंडल. सिंहासनों पर विराजमान क्रकशः भगवान लक्ष्मीनारायण, श्रीरामजी-सीताजी, श्रीकृष्ण-राधाजी, और श्री महादेव-पार्वती जी की संगमरमर की दर्शनीय मूर्तियां

clip_image017 कलात्मक छत

clip_image019 मंडोवर= अर्थात बाह्य दीवार. कुल लंबाई 611 फ़ीट, ऊँचाई 25 फ़ीट. 4287 पत्थरों से निर्मित यह मंडोवर भारतीय नागरिक शैली के स्थापत्यों में सबसे बडा है.

clip_image021 गजेन्द्र पीठ= अक्षरधाम का यह भव्य महालय 1070 फ़ीट लम्बी गजेन्द्रपीठ पर स्थित है, 3000 टन पत्थरों से निर्मित है.,जो विश्व का एक मौलिक एवं अद्वितीय शैल्पमाल है. 148 हाथियों की यह कलात्मक गाथा, प्राणीसृष्टि के प्रति विनम्र भावांजलि है. भारतीय बोधकथाओं, लोककथाओं, पौराणिक आख्यानों इत्यादि से 80 दृष्य़ तराशे गए हैं.

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देखना न भूलें---विशेष= बाहरी दीवारों पर चारों ओर स्थापित भारतीय संस्कृति के महान ज्योतिर्धर संतों, भक्तों, आचार्यों, विभूतियों के 248 मूर्ति-शिल्प. भव्य प्रवेश मंडपम की अद्वितीय स्तंभ कलाकृति, छत में सरस्वती, लक्षमी,पार्वती आदि देवियों और गोपी-कृष्ण रास के अद्भुत शिल्प. नारायणपीठ में भगवान स्वामिनारायण के दिव्य चरित्रों के कुल 180 फ़ीट लंबे कलात्मक धातुशिल्प

प्रत्येक हाथी के साथ बदलती कलात्मक हाथी-मुद्राएं. “ हाथी और प्रकृति विभाग” में पंचतंत्र की कथाओं के प्रकृति की गोद में क्रीडा करते हाथियों की महमोहक मुद्राएं. “हाथी और मानव” विभाग में समाजजीवन से समरस हाथियों की कथाएं. “हाथी और दिव्य तत्त्व” विभाग में धर्म-परम्पराओं में हाथी की गाथाएं

खण्ड-1= सहजानंद दर्शन/प्रेरणादायक अनुभूति =रोबोटिक्स- एनिमेट्रोनिक्स, ध्वनि-प्रकाश, सराउण्ड डायोरामा आदि आधुनिक तकनिकों के माध्यम से श्रद्धा, अहिंसा, करुणा, शान्ति, आद्दि सनातन मूल्यों की अद्भुत प्रस्तुति भगवान स्वामिनारायणजी के जीवन-प्रसंगों के द्वारा.

खण्ड-२=नीलकण्ठ दर्शन= महाकाव्य सी फ़िल्म जो बालयोगी नीलकंटः की, जिन्होंने सात वर्ष तक नंगे पैर 12,ooo कि.मी. भारत की पदयात्रा की. 85 x 65 फ़ीट चित्रपट सत्य घटना पर आधारित,

खण्ड-३=संस्कृति विहार= दस हजार वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति की अद्भुत झाकी. नोकाविहार द्वारा 800 पुतलों एवं कई संशोधनापूर्ण प्रमाणभूत रचानाएं. विश्व की सर्वप्रथम युनिवर्सिटी तक्षशिला,नागार्जुन की रसायनशाला देखकर भारत के भव्य इतिहास की झांकी देखी जा सकती है.

यज्ञपुरुष कुण्ड एवं संगीतमय फ़व्वारे= लाल पत्थरों से निर्मित 300 x 300 फ़ुट लम्बा प्राचीन कुण्ड परम्परा का नमुना, कुण्ड के भीतर कमलाकार जलकुंड में संगीतमय फ़ुवारा. जल,ज्योति और जीवनचक्र का अद्भुत संयोजन. 27 फ़ीट ऊँचा बालयोगी नीलकंठ ब्रह्मचरी की प्रतिमा

नारायण सरोवर= मन्दिर के तीनो ओर प्राचीन जलतीर्थॊं की महिमापूर्ण परंपरा को समर्पित नारायण सरोवर की स्थापना की गई है. 151 तीर्थों और नदियों के पवित्र जालसिंचन से यह सरोवर परम तीर्थ बना है.

अभिषेक मण्डपम= शुभकामनाओं और प्रार्थनाओं के साथ नीलकण्ठ ब्रह्मचारी की मूर्ति पर गंगाजल से विधिपूर्वक अभिषेक.

योगी हृदय कमल=हरी घास की भव्य कालीन पर एक विशाल अष्टदश कमल.

प्रेमवती आहारगृह=अजंता की अद्भुत कलासृष्टि के आल्हादक वातावरण में शुद्द ताजा भोजन, मधुर जलपान की सुविधा.

सांस्कृतिक उद्दान=22 एकड में फ़ैले उपवन में पुष्प-पौधों का कलात्मक अभियोजन. 8 फ़ुट ऊँचे 65 कांस्यशिल्प.

सूर्यप्रकाश के सात रंगों के प्रतीकरुप सात अश्वों का अनुपम सूर्यरथ, सोलह चन्द्र कलाओं के प्रतीकात्मक 16 हिरनो का अद्भुत चन्द्ररथ, भारतीय वीररत्न, महान स्त्रीरत्न, प्रतिभावंत भारतीय बालरत्न, एवं राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने वाले महान राष्ट्ररत्नो के अभूतपूर्व कांस्यशिल्प. clip_image027 clip_image029 clip_image030

clip_image032 राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा का “अमृत महोत्सव”( 16-17 मार्च 2013) स्थान-सत्याग्रह मंडप, राजघाट दिल्ली में आयोजित किया गया था. अपने मित्रो-श्री डी.पी.चौरसिया,श्री नर्मदा प्रसाद कोरी तथा श्री विष्णु मंगरुलकरजी के साथ दिल्ली जाना हुआ.(चित्र- राजघाट में अपने मित्रों के साथ) .एक शाम स्वामीनारायण अक्षरधाम भी जाना हुआ. वहाँ के प्रचलित नियमों के चलते हम अपने कैमरे आदि अन्दर परिसर में नहीं लेजा सकते थे. अतः वहाँ से प्राप्त मार्गदर्शका के आधार पर इस आलेख को तैयार किया गया.

गोवर्धन यादव.

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