मंगलवार, 26 अगस्त 2014

रजनीश कांत की कहानी - एक सड़क की सिसकियाँ

एक सड़क की सिसकियां   (कहानी)

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मैं सुनसान हूं, मुझे गम नहीं। मैं उबड़-खाबड़ हूं, मुझे दिक्कत नहीं। मेरी हालत खराब है, मुझे कोई तकलीफ नहीं है। हमसे होकर काफी कम लोग गुजरते हैं, इससे भी मुझे कोई परेशानी नहीं है। मुंबई से सटे नालासोपारा के स्टेशन रोड से ये बातें उसके बगल वाली सड़क बता रही थी। सड़क ठीक हालत में नहीं थी और लोग भी इसका कम ही इस्तेमाल करते थे।

स्टेशन रोड उस सड़क की बातें काफी गौर से सुन रहा था और जब उसने अपनी बात खत्म की तो स्टेशन रोड अचानक किसी गम में डूब गया। स्टेशन रोड को ऐसा देखकर बगल वाली सड़क को अच्छा नहीं लगा। उसे लगा कि उसकी वजह से स्टेशन रोड को कोई चोट पहुंची है।

दोनों के बीच कुछ देर तक खामोशी रही। थोड़ी देर के बाद बगल वाली सड़क ने फिर से बातचीत की पहल की। उसने स्टेशन रोड से पूछा, क्या उसकी बातों से कोई तकलीफ पहुंची है। स्टेशन रोड ने ना में सर हिलाया। तो, फिर अचानक क्या हुआ।

स्टेशन रोड ने फिर अपने मन की बात बगल वाली सड़क से कहना शुरू किया। स्टेशन रोड ने कहा कि कुछ समय पहले तक मेरी हालत भी तुम्हारी जैसी ही थी। लोग तो हमारा काफी इस्तेमाल करते थे लेकिन नगर निगम की अनदेखी की वजह से मैं बदहाली से जूझ रहा था।

मेरे किनारे पर सीवर उफना रहे होते थे और मैं खुद उबड़-खाबड़ थी। नालियां खुली होने के कारण बरसात में मुझे जलभराव का भी सामना करना पड़ता था। बरसात में लोगों को आने-जाने में तकलीफ होती थी। कूड़ाघर न होने की वजह से मेरे ऊपर ही लोग कूड़ा फेंक दिया करते थे इतना ही नहीं लाइट व्यवस्था न होने की वजह से शाम होते ही लोगों का निकलना मुश्किल होता था।

स्टेशन रोड ने आगे कहा कि कुछ समय के बाद हमारी हालत ठीक हुई। प्रशासन की नजर हमारी बदहाली पर गई। लोगों को भी हमारी हालत ठीक कराने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। ऊपर से चुनाव सर पर था तो नेताजी को भी कुछ काम करके दिखाना था।

इन सबसे हमारी हालत ठीक हुई। हमारी मरम्मत की गई। मेरा पक्कीकरण किया गया। मुझे चौड़ा किया गया। सीवर व्यवस्था को ठीक किया गया। स्ट्रीट लाइट लगाए गए। साफ-सफाई का पक्का इंतजाम किया गया। सारे गड्ढे भर दिए गए। पर्यावरण और हरियाली का ध्यान रख कर मेरे किनारे पेड़-पौधे भी लगाए गए।

स्टेशन रोड ने अपने बगल वाली सड़क से कहा कि ये सब देखकर मैं काफी खुश हुआ। मैं खासा उत्साहित था कि अब तो लोग जब भी हमसे होकर गुजरेंगे तो उनको कोई तकलीफ नहीं होगी। लेकिन, मेरी ये खुश कुछ ही समय तक रही, क्योंकि कुछ समय के बाद गणपति का शहर में आगमन होने वाला था।

लोगों में बाप्पा के स्वागत को लेकर काफी जोश था। लोगों की इसी जोश ने हमारा बुरा हाल कर दिया। बाप्पा को प्रतिष्ठित करने के लिए मुझे जगह-जगह खोद डाला । मेरे बदन पर कई जख्म किये गए। हद तो तब हो गई जब बाप्पा के विसर्जन के बाद भी मेरी मरहम-पट्टी नहीं की गई।  

ये सिलसिला गणेश चतुर्थी तक ही सीमित नहीं रहा। कोई भी त्योहार हो, किसी भी नेता का आगमन हो, होलिका दहन करना हो, हर बार हमारा कलेजा छलनी किया जाता है। सबसे दुख की बात तो ये है कि जो लोग मुझे छलनी करते हैं वही लोग सरकार, नेता, मंत्री, प्रशासन को गाली भी देते हैं कि वो सड़क ठीक क्यों नहीं करते।  

स्टेशन रोड ने कहा मुझे जख्मी होने का ज्यादा दुख नहीं है बल्कि मैं ये देखकर ज्यादा दुखी हूं कि जिन लोगों को मेरे ऊपर चलना है, वो ही मुझे जगह-जगह खोद डालते हैं।

आखिर में स्टेशन रोड ने दर्द भरे लफ्जों में कहा भगवान इनको सद्बुद्धि देना।

रजनीश कांत, मुंबई 

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