रविवार, 31 अगस्त 2014

पुस्‍तक समीक्षा - चौखड़ी जनउला

पुस्‍तक समीक्षा

विलुप्‍त होते शब्‍दों को सहेजने का उद्यम-‘‘चौखड़ी जनउला‘‘

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वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

भारतेन्‍दु हरिशचन्‍द्र ने लिखा है कि ‘निज भाषा उन्‍नति अहै, सकल उन्‍नति के मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय के शूल‘ अपनी भाषा के प्रति प्रेमाभिव्‍यक्‍ति का इससे श्रेष्‍ठ उदाहरण अन्‍यत्र दुर्लभ है। सचमुच भाषा न केवल भावों के सम्‍प्रेषण का माध्‍यम भर है बल्‍कि मनुष्‍य के सोच-विचार, चिन्‍तन-मनन, स्‍वप्‍न और कल्‍पना का आधार भी है। भाषा हमें अपनी जड़ों से जोड़कर रखती है। अपनी मातृभूमि के प्रति उत्तरदायित्‍वों का बोध कराती है। पर ध्‍यान रहे, कोई भी भाषा अपनी सर्वश्रेष्‍ठता सिद्ध कर किसी को भी भाषायी विवाद में फँसने के लिए नहीं उकसाती बल्‍कि सबको समानता के साथ ‘सबके साथ, सबका विकास‘ का संदेश देती है। भाषा तो कल-कल, छल-छल बहती नदी के निर्मल धार के समान होती है जो अपने विकास यात्रा के पथ पर आने वाली अन्‍य भाषाओं के शब्‍दों को बड़ी आत्‍मीयता के साथ आत्‍मसात करके वृहद से वृहत्तर होती चली जाती है। लेकिन इस विराटता के कारण जब भाषा के प्राण तत्‍व सूखने लगते हैं अर्थात मूल भाषा के शब्‍द विलुप्‍त होने लगते हैं तब भाषाविद्‌ों, विचारकों एवं साहित्‍यकारों का सजग होकर भाषा को सहेजने का उद्यम करना न केवल स्‍वाभाविक है बल्‍कि अत्‍यावश्‍यक भी है।

हमारी छत्तीसगढ़ी भी बड़ी समृद्ध है। यह अपने भावाभिव्‍यक्‍ति के लिए अन्‍य भाषा के शब्‍दों का कभी मोहताज नहीं रही। मगर बदलते दौर में आधुनिकता और मीडिया के प्रभाव से इसमें अन्‍य भाषा विश्‍ोषकर हिन्‍दी के शब्‍द व्‍यापक रूप से घुल-मिल गए हैं और मूल शब्‍द विलुप्‍त होने लगे हैं। चूंकि छत्तीसगढ़ी अब राज भाषा बन गई है। यह हमारी अस्‍मिता और हमारे प्रदेश की पहचान है। इसलिए मूल शब्‍दों को सहेजने के लिए विद्वानों के द्वारा कई तरह के प्रयास किये जा रहे हैं यथा शब्‍दकोश का निर्माण और प्रचुर मात्रा में छत्तीसगढ़ी साहित्‍य का लेखन इत्‍यादि।

छत्तीसगढ़ी भाषा के शब्‍दों को सहजने का उद्यम करने वाले विद्वान अपने-अपने ढंग से इस कार्य को निष्‍ठापूर्वक कर रहे हैं। इन्‍हीं क्रम में एक नाम है श्री दिनेश चौहान जी का जो कला, साहित्‍य और संस्‍कृति के त्रिवेणी संगम राजिम नयापारा में निवास कर छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा चित्रोत्‍पला महानदी के धारा के समान अपनी वैचारिक प्रखरता से भाषा की समृद्धि और विकास के लिए कमर कसकर जुटे हुए है। दैनिक पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर इस विषय पर उनका वैचारिक लेख पाठकों को चिन्‍तन के लिए प्रेरित करता रहा है। छत्तीसगढ़ी के विलुप्‍त होते शब्‍दों को सहजने के लिए उन्‍होंने एक ऐसी अनूठी शैली का आश्रय लिया है जिसमें मनोरंजन भी हो, दिमागी कसरत भी हो और एक चुनौती भी हो। विस्‍मृति के नेपथ्‍य में छिपे शब्‍दों को समृति पटल पर लाने के लिए जिस शैली को उन्‍होंने अपनाया है उसे ‘चौखड़ी जनउला (वर्ग पहेली) का नाम दिया है। श्री दिनेश चौहान जी के द्वारा मातृभाषा के ऋण को चुकाने के लिए किये गए इस परिश्रम को समुचित सम्‍मान देते हुए प्रतिष्‍ठित दैनिक अखबार पत्रिका ने अपने अंक ‘पहट‘ में इसे क्रमशः प्रकाशित कर पाठकों तक पहुँचाने का स्‍तुत्‍य एवं वन्‍दनीय प्रयास किया है। अब राजभाषा आयोग के आर्थिक सहयोग पर प्रकाशित होकर यह चौखड़ी जनउला अर्थात छत्तीसगढ़ी वर्ग पहेली पुस्‍तकाकार में पाठकों के हाथ में हैं। मुझे आशा ही नहीं बल्‍कि पूर्ण विश्‍वास है कि यह पुस्‍तक अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वाले और उसकी समृद्धि तथा विकास चाहने वालों के लिए के मानस पटल पर छत्तीसगढ़ी शब्‍द भण्‍डार की भरपूर वृद्धि करेगी एवं अति उपयोगी तथा महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी। इस उत्तम कृति के लिए श्री दिनेश चौहान जी को हार्दिक बधाई।

 

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

बोड़रा ( मगरलोड़)

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

birendra.saral@gmail.com

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