बुधवार, 27 अगस्त 2014

राजीव आनंद का आलेख - स्‍मृति शेष यू.आर.अनंतमूर्तिः बहुभाषी साहित्‍य परंपरा के प्रतिनिधि रचनाकार

स्‍मृति शेष यू.आर.अनंतमूर्तिः बहुभाषी साहित्‍य परंपरा के प्रतिनिधि रचनाकार

उद्विपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति आधुनिक कन्‍नड़ साहित्‍य के ऐसे चितेरे थे जिनके साहित्‍य से गाँव कभी ओझल नहीं हुआ. यद्यपि उनके साहित्‍य में गाँव के प्रति भावुक दृष्‍टिकोण नहीं मिलती अपितु समाजवादी दृष्‍टिकोण से उपजे चिंतन ही मुखर हुयी और उन्‍होंने गाँव को केन्‍द्र में रखकर विपुल साहित्‍य रचा.

21 दिसंबर 1932 को कर्नाटक के एक छोटे से गाँव मेलिगे में जन्‍में यू. आर. अनंतमूर्ति न सिर्फ कन्‍नड़ साहित्‍य अपतिु भारतीय साहित्‍य जगत के ख्‍यातिप्राप्‍त साहित्‍यकार थे. 22 अगस्‍त को 82 वर्ष के उम्र में उनका निधन हो गया. उनके जाने से न सिर्फ कन्‍नड़ साहित्‍य जगत बल्‍कि समूचे भारतीय साहित्‍य जगत को एक अपूरणीय क्षति हुई है.

यथार्थ का वर्णन अपने उपन्‍यासों में करते हुए एक प्रतीकात्‍मक कथा गढ़ने में सिद्धहस्‍त थे अनंतमूर्ति. उन्‍होंने दो परस्‍पर विरोधी पात्रों को अपने उपन्‍यास ‘संस्‍कार' में प्राणेशाचार्य और नारणप्‍पा के रूप में गढ़ा और गाँव की कथा कहते हुए दोनों पात्रों के बीच भंयकर द्वंद्व को बहुत ही सरल और सुगम भाषा में बयान किया. प्राणेषाचार्य ब्रहमवादी मूल्‍यों से उपजे श्रेष्‍ठ ब्राहमण थे जबकि परम्‍परा और धर्म से सचेत विद्रोह करने वाला चिर विद्रोही पात्र नारणप्‍पा था. श्रेष्‍ठ ब्राहमण का पात्र प्राणेषाचार्य उपन्‍यास में चंदरी नामक वेश्‍या से प्रागढ़ संबंध रखता है. यह समझना आसान नहीं होगा कि किस तरह का द्वंद्व तीनों परस्‍पर विरोधी पात्रों के बीच लेखक ने बुना होगा. 1965 में यह उपन्‍यास प्रकाशित हुआ तो अनंतमूर्ति की ख्‍याति को जैसे पर लग गए थे. कई भाषाओं में इस उपन्‍यास का अनुवाद किया गया. संस्‍कार में अनंतमूर्ति ने ब्रहमणवादी मूल्‍यों और सामाजिक व्‍यवस्‍था पर कठोर प्रहार किया है. वी.एस.नायपाल जैसे ख्‍यातिलब्‍ध विदेषी साहित्‍यकार ने अपनी पुस्‍तक ‘अ वून्‍डेड सिवलायजेषन' में अनंतमूर्ति के उपन्‍यास ‘संस्‍कार' की भूरि-भूरि प्रशंसा कई पन्‍नों में किया है.

अनंतमूर्ति के साहित्‍य की सबसे बड़ी विशेषता पात्रों के माघ्‍यम से दार्शनिक, कलात्‍मक एवं सामाजिक द्वंद्वों को रेखांकित करना रहा है, उन्‍होंने परस्‍पर विरोधी विचार एवं दृष्‍टि रखने वाले पात्रों को गढ़ा जिनके माघ्‍यम से अनेकानेक दृष्‍टिकोण एक साथ उपस्‍थित होते चलते है और पात्रों के बीच अनेकानेक स्‍तरों पर संघर्ष चलता रहता है. अनंतमूर्ति अपने साहित्‍यिक सृजन में रूढ़ि और विद्रोह, परम्‍परा और आधुनिकता, सत्‍य और असत्‍य, जीवन और मृत्‍यु जैसे परस्‍पर विरोधी दृष्‍टिकोणों पर विमर्ष करते हुए जीवन के वास्‍तविक अर्थ को ढूंढ़ने का प्रयास करते रहे हैं. उन्‍होंने ‘संस्‍कार' के अतिरिक्‍त ‘भारतीपूरा', अवस्‍थे तथा ‘भव' नामक औपन्‍यासिक कृतियों का सृजन किया यद्यपि 1955 में ही उनका पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुका था और वे कन्‍नड़ साहित्‍य जगत में अपना स्‍थान बना चुके थे. इसके अतिरिक्‍त उन्‍होंने कई कहानियाँ लिखा जो ‘घटश्राद्ध', ‘प्रश्‍न', ‘आकाश और बिल्‍ली' नामक कहानी संग्रहों में प्रकाशित है. उन्‍होंने पर्याप्‍त आलोचनात्‍मक और वैचारिक लेखन भी किया तथा कुछ सारगर्भित कविताएँ भी लिखी, जो दो कविता संग्रहों में प्रकाशित है. 1994 में उन्‍हें समग्र साहित्‍य सृजन के लिए ज्ञानपीठ पुरूस्‍कार दिया गया था. भारत सरकार ने 1998 में पदमभूषण सम्‍मान से सम्‍मानित किया और 2013 में उन्‍हें मेन बुकर प्राइज भी दिया गया था.

अनंतमूर्ति की एक सारगर्भित कविता जो उन्‍होंने कन्‍नड़ में कुछ इस प्रकार लिखा था-

‘‘नहीं कहा हमारे पुरातनों ने

करते है नृत्‍य नटराज

वे कहे

‘यहाँ' करते है नृत्‍य नटराज

कर रहे है इंगित स्‍थल को

और दिखा रहे है ‘कहाँ' ''

यह कविता उनके साहित्‍य सृजन के दृष्‍टिकोण को इंगित करती है. कन्‍नड़ साहित्‍य में नव्‍यधारा के प्रवर्त्‍तकों में से एक उद्विपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति सही अर्थों में एक महान साहित्‍यकार थे. उनके स्‍मृति को नमन.

 

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह-815301

झारखंड़

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