बुधवार, 27 अगस्त 2014

पुस्तक समीक्षा - अजनबी मौसम से गुजरकर

पुस्‍तक समीक्षा

पुस्‍तक ः अजनबी मौसम से गुजरकर

लेखक ः विनोद कुमार

प्रकाशकः प्रकाशन संस्‍थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज,

नई दिल्‍ली-110002

मूल्‍य ः 150/-

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अजनबी मौसम से गुजरकर पंद्रह कहानियों का संग्रह है जो लंबे अंतराल पर लिखी गयी है. पुस्‍तक के लेखक विनोद कुमार कवि, नाटककार, निर्देशक एवं अभिनेता भी है जिनकी हिन्‍दी और अंग्रेजी में ग्‍यारह पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी है तथा चार पुस्‍तकें प्रकाशनाधीन है. आकाशवाणी दूरदर्शन से पचास से ज्‍यादा नाटक प्रसारित होते रहे हैं तथा पंद्रह नाटकों का देश के विभिन्‍न नगरों-महानगरों में लगभग 150 बार मंचन एवं प्रदर्शन हो चुका है. लेखक विनोद कुमार फिल्‍म ‘आक्रांत' के लेखक और निर्देशक भी है जिसका प्रीमियर दूरदर्शन के राष्‍ट्रीय चैनल पर हो चुका है जो टाइम वीडियो पर उपलब्‍ध है. इसके अतिरिक्‍त लेखक झारखंड़ केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालय, रांची में अंग्रेजी केन्‍द्र के अघ्‍यक्ष एवं भाषा स्‍कूल के डीन है.

लेखक ने पुस्‍तक के प्रस्‍तावना में लिखा है कि पुस्‍तक में संग्रहित कहानियां आज के समय की पड़ताल करती हुइर् उस आदमी का आकलन करती है जो खुद अपने आपसे और व्‍यवस्‍था से लड़ते हुए लहूलुहान हो रहा है. कहानियों के तमाम चेहरों में अक्‍स हमारे आसपास परिचित उन संवेदनाओं की कथा व्‍यथा है जहां हम पूरी शिद्‌दत के साथ अपने होने का एहसास करते हैं.

‘अजनबी मौसम से गुजरकर पाठकगण महसूस करेंगे कि इतने सहज सरल शब्‍दों में आज के जीवन की विसंगतियों की परतों को खोलना हर लेखक के बूते की बात नहीं है. पाठकों को इन कहानियों में जिंदगी से मुलाकात होगी. आज जब ज्‍यादातर कहानियों के केन्‍द्र में देह-विमर्श है, ऐसे में खुद को इस चलन से अलग कर लेना विनोद कुमार की बहुत बड़ी उपलिब्‍ध्‍ मानी जाएगी.कथाकार किसी भोगे हुए यथार्थ को ही अपने कथानक का आधार बनाता है. वह यथार्थ उसका भोगा हुआ भी हो सकता है, कोई देखी हुई घटना भी हो सकती है या किसी व्‍यक्‍ति से सुनी हुई दास्‍तान भी हो सकती है. केवल कल्‍पना से कहानी नहीं बनती और अगर केवल कल्‍पना से कहानी बना दी जाए तो उसमें तथ्‍य की गम्‍भीरता नहीं होती यद्यपि यह भी सत्‍य है कि यथार्थ का सपाट वर्णन कहानी की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. घटना का विवरण रचनाकार की शैली और संप्रेषणीयता के आधार पर ही कहानी का रूप ले पाता है. कथाकार विनोद कुमार एक ऐसे ही कथाकार है जो तथ्‍यों से छेड़छाड़ नहीं करते अपितु अपनी शैली और प्रस्‍तुतीकरण क्षमता से उसे पठनीय और ग्राह्‌य बना देते है. लेखक विनोद कुमार ने जीवन की सच्‍ची कहानियां लिखी है. यह अच्‍छी बात है कि कुछ ‘उतर आधुनिक' लेखकों की तरह विनोद कुमार संवेदना को बीते जमाने की चीज नहीं मानते बल्‍कि पूरी संवेदना के साथ लिखते हैं.

जहां एक ओर टी.वी., फिल्‍म या अखबारों में स्‍त्री-पुरूष के यौन संबंधों की कहानियों को प्रमुखता दी जा रही हो, वहां विनोद कुमार जैसे कथाकार जो जीवन यथार्थ को महत्‍व दे, आम आदमी के संघर्षों को स्‍वर दे तो इस प्रवृति की सराहना होनी चाहिए. संग्रह की पंद्रह कहानियां किसी न किसी मुद्‌दे का उघाड़ती है. विनोद कुमार के इस संग्रह को पढ़कर लगता है कि वह कहानी के कहानीपन को बचाए रचाने वाले कहानीकार है. संग्रह की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आलोचकों और प्रबुठ्ठ पाठकों को भी कहानियां पंसद आयेंगी वहीं सामान्‍य पाठक भी इन कहानियों से जुड़ने में दिक्‍कत महसूस नहीं करेंगे.

 

राजीव आनंद, प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा, गिरिडीह-815301ए झारखंड़,

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