रविवार, 31 अगस्त 2014

लता सुमन्त तथा मनोज 'आजिज़' की लघुकथाएँ

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  आत्मविश्वास
                                                       डॅा.लता सुमन्त
     बेटे के कहने पर बाबा ने अपना 35 साल पुराना नौकरी का गाँव छोड़ा था. अब तक आपने बहुत श्रम किये.अब आप केवल आराम करेंगे.केवल बेटे की बातों पर विश्वास न करके उन्होंने बहू से भी पूछा - हम तुम्हारे साथ रहें उसमें तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं?परंतु निशीता को किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति न थी.
       बहू और बेटे के साथ नये फ्लेट में उनके तीन साल बहुत ही आनंदोल्लास और चैन से गुजरे.जो वे समझ भी न पाए.प्रेम से बातें करना,बहू की सराहना करना,उसे सम्मान देना, हर कार्य में उसे सहकार देना आदि.माँ - बाबा की तरह ही प्यार करनेवाले तथा उसकी भावनाओं की कद्र करनेवाले थे उसके सास - ससुर.उसके मन के हर पल की जैसे उन्हें खबर रहती थी.निशीता को जैसे एक माँ - बाबा के छूटने पर दूसरे,सास - ससूर, माँ - बाबा की जगह मिल गए थे.उसे माँ - बाप की कमी कभी महसूस नहीं हुई थी.
          बडे जेठ, जेठानी, नंद सभी लोग बहुत ही और हमेशा उसकी सराहना करनेवाले थे.प्रेम की कमी न थी और अपनापन पारावार था.अपनी निशीता पढी - लिखी,सहृदयी और नम्र है.इस बात की हर कोई तारीफ करता.निशीता का प्यार और नम्रता से हर किसी के साथ पेश आना तथा हर किसी के प्रति समान व्यवहार के कारण वह हर किसी की प्रिय थी.विवाह के पश्चात केवल घर ही बदला है ऐसा उसे हमेशा महसूस होता था.
      उसे अपने शुरु के दिन याद हो आए.दीपकभाई साहब ने कहा था -बाबा को हर चीज समय पर ही चाहिए.ग्यारह बजे खाना, ढाई बजे चाय,थोडी देर भी उन्हें नहीं चलती.उस क्षण कुछ देर के लिए वह चिंतित जरुर हुई थी लेकिन थोडी ही देर में उस चिंता का निराकरण हो गया था,क्योंकि वह कई बार उनके गाँव जा चुकी थी इसलिए बाबा के स्वभाव से वह खूब परिचित थी.
         बाबा कई दिनों से बीमार थे.उन्हें अस्पताल में भरती करा दिया गया और सारे टेस्ट करा लिये गए.डॅाक्टरों के अनुसार बीमारी तो कोई नहीं पर बुढापा अपने आप में एक बहुत बडी बीमारी है .पीठ दर्द, पैरों में जकडन, भूख न लगना आदि तो ब़ुढ़ापे में होता ही रहता है.पाचनक्रिया मंद होने से भूख कम लगती है,खाने की इच्छा नहीं होती ,पेट ठीक नहीं रहता और इस कारण से सब कुछ होता रहता है.अस्पताल से बाबा घर आए तो बहू ने कहा - आपके लिए थोडा बदलाव जरूरी है.क्यों नहीं आप कुछ दिनों के लिए दीपक भाई साहब के यहाँ हो आते? नहीं बेटा ! मुझे यहीं रहना अच्छा लगता है. कुछ दिनों में ही मैं ठीक हो जाऊँगा.तुम चिंता न करो.
        आगे कुछ दिन अच्छे गुजरे. एक दिन पीठ पर मसाज करते समय उन्होंने पत्नी से कहा-मेरे जाने के पश्चात तुम यहीं रहना.नशीता तुम्हारा अच्छा ध्यान रखेगी और तुम्हें अपने साथ लेकर चलेगी ऐसा मेरा विश्वास है.बाबा की बातें सुनकर निशीता को जैसे सब कुछ मिल गया था.अपने से ज्यादा विश्वास उन्हें अपनी बहू पर था.अपने बाद अपनी जीवन संगिनी के दिन अच्छे गुजरेंगे और उसे किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं होगी इसी आत्मविश्वास के साथ उन्होंने आँखें मूँदी थी.उनके चेहरे पर उनके आत्मविश्वास का दिव्य तेज झलक रहा था.
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                        Associate professor in hindi
 
   

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मुनिया

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        -- मनोज 'आजिज़'

           आदित्यपुर, जमशेदपुर

फैक्ट्री में काम चल रहा था । मशीनों की शोर के बीच रफ़ीक का फ़ोन बज उठा । एक बार तो छोड़ दिया और काम में ही मशगूल रहा पर फिर कुछ मिनटों में फ़ोन बज उठा । इस बार उसे लग रहा था कि कोई खास बात होगी और जेब से फ़ोन निकाल कर देखा तो घर से कोई कर रहा था । फ़ोन रिसीव किया तो माँ की आवाज़ । घबराते हुए रफ़ीक ने फ़ोन करने का कारण पूछा । माँ जल्दबाजी में कही-- जल्दी घर आ जा । तुम बाप बने हो । घर में रौशनी आई है । रफ़ीक समझ चूका था कि बेटी हुयी है । सुपरवाइजर के पास छुट्टी के लिए अर्जी डाला । सुपरवाइजर अचानक छुट्टी का कारण पूछने लगा । रफ़ीक ने सर झुका कर जवाब दिया-- साहब मुनिया हुयी है । सुपरवाइजर झट बोल पड़ा-- इतना गुमसुम क्यों हो? मुनिया नहीं डॉली आई है कहो !

रफ़ीक धीमी आवाज़ में बड़बड़ाया--साहब, हम लोगों के लिए तो मुनिया, चुनिया और गुड़िया ही ठीक है । डॉली, जॉली, और रॉली को हम कहाँ से परवरिश दें? सुपरवाइजर की आँखें खुली रह गईं और छुट्टी के आवेदन पर बिना देखे साइन कर दिया । 

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