रविवार, 31 अगस्त 2014

सूर्यकांत मिश्रा का शिक्षक दिवस विशेष आलेख - “गुरू” से “सर” तक की यात्रा के बीच

“गुरू” से “सर” तक की यात्रा के बीच
-: शिक्षक दिवस का औचित्य :-


    वर्तमान समय शिक्षा और शिक्षकों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं माना जाना  चाहिए । शिक्षा और शिक्षकों के बदले स्वरूप ने वास्तव में पुरातन पद्धतियों पर अपनी प्रतिष्ठा कायम की है या फिर आधुनिकता और व्यवसायिक दृष्टिकोण वाले इस युग ने शिक्षा के साथ शिक्षकों के महत्व पर सवाल खड़ा कर दिया है ? यह एक गंभीर मुद्दे के रूप में दिखायी दे रहा है । जहाँ शिक्षा पहले दान और संस्कारों का पर्याय मानी जाती थी वही आज के विलासितापूर्ण जीवन में शिक्षा इन दोनो व्यवहारिक दृष्टिकोणों से दूर कहीं भटक चुकी है। शिक्षकों के विषय में भी कुछ ऐसी ही दृश्य हमारी नजरों की सामने दिन प्रति दिन अलग-अलग रूप में आकर शिक्षकों के उस पुराने योगदान के साथ अस्वाभाविक तुलना के लिए विवश कर रहा है। शिक्षकों की जरूरत अनादिकाल से समाज की सर्वोपरीमाँग रही है। आज के समय में भी इसे कमतर आँकना हमारी भूल हो सकती है। इतना अवश्य है कि “गुरू” से “सर” तक की अविराम यात्रा में कहीं न कहीं हमारा गुरूत्व दूषित हुआ है और हम पर अंग्रेजियत की जो परत चढ़ी है उसने हमें गुरू के लिवास से लेकर गंभीरता तक अनेक परिवर्तनों से अवगत कराया है। यह उम्मीद करना हमारी उच्चश्रृंखलता हो सकती है कि शिक्षक धोती और कुर्ते के लिवास में पैरों पर खडाँऊ डालकर या फिर बिना जूता-चप्पल के शिक्षा के मंदिरों में अपनी उपस्थिति दे किन्तु इतना अवश्य है कि शिष्यों के लिए गुरू के रूप में माता-पिता से ऊपर स्थान रखने वाले शिक्षकों से समाज मानवीय व्यवहार के साथ द्रोणाचार्य और विश्वामित्र की भाँति आदर्शपात्र बनने की आशा को ठोस आधार देने से पीछे न हटे। इसके लिए शिक्षकों को स्वयं आगे आते हुए मिसाल पेश करना होगा ।


    हमारे देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. र्स्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्म दिवस को  शिक्षक दिवस के रूप मे मनाते हुए पूरा शिक्षा जगत गौरवान्वित होता आ रहा है। देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने से पूर्व शिक्षकीय जीवन में एक शिक्षक की भूमिका निभाने वाले डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षकों से प्रभावित होते हुए ही अपना जन्म दिन उन्हे तोहफे के रूप में दे दिया। अब इतने गौरवशाली दिन के आयोजन भी हमें अकल्पनीय घटनाओं के चलते बहुत कुछ सोचने पर विवश कर रहे हैं। हम जहॉ शिक्षकों के अन्दर आयी विकृतियों को बड़े गौर से परखते हुए उनसे सुधार की उम्मीद करते है, वही इस सिक्के का दूसरा पहलू जो शिष्य के रूप में हमारे बीच है, कहीं न कहीं अपनी जवाबदारी से भागने के बावजूद हमारी चिन्तित नजरों से नहीं देखा जा रहा है। मुझे यह कहने पर कतई संकोच नहीं कि शिक्षकों में आयी विकृति कानूनी व्यवस्था का दोष है़। विद्यालयीन शिक्षा से लेकर महाविद्यालयीन और चिकित्सा तथा अभियांत्रिकी शिक्षा में भी अब शिक्षार्थियों पर दबाव बनाने वाले सारे तरीके कानूनी दॉव पेंच में दम तोड़ चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया निर्णय में अब बच्चों के साथ मारपीट की बात को दूर उन्हे सामान्य लब्जो में डाटने-फटकारने वाले शब्द भी शिक्षकों को तीन साल के लिए जेल की हवा खिलाने वाले अपराध बना दिये गये हैं।


    शैक्षणिक संस्थाओं में बच्चों के अनुकूल माहौल तैयार करने प्रशासनिक स्तर पर नित-नये नियम बनाये जा रहे हैं। पास और फेल करने के नियमों में भी शिथिलता बरती जा रही है। कक्षा आठवीं तक बिना परीक्षा के पास करना और दसवीं-बारहवीं बोर्ड परीक्षा में फेल विद्यार्थियों को मुख्य परीक्षा सहित चार अवसर प्रदान करने की योजना ने शिक्षकों  द्वारा पढ़ाये जा रहे पाठ्यक्रम की गुणवत्ता के साथ शिक्षकों की योग्यता पर भी संदेह पैदा किया है। अब शिक्षकों को ही अपनी प्रमाणिकता सिद्ध करने नये सिरे कार्य प्रणाली को बदलना होगा। बिना किसी प्रकार का दबाव बनाये कक्षा में बच्चों की उपस्थिति से लेकर अनुशासन और पढ़ायी का उन्मुक्त वातावरण तैयार करना भी शिक्षकों के कर्त्तव्य में शामिल माना जाना चाहिए। बाल-सुलभ हरकतों के बावजूद उन पर किस प्रकार नियंत्रण किया जाये जब कि कक्षा से बाहर करना, घुटने टिकाना,कान ऐंठना, या उन्हें शर्मसार करने वाली किसी भी प्रकार की सजा देना कानूनन अपराध बना दिया गया हो, तब कैसे एक शिक्षक दबाव पूर्वक अध्ययन का माहौल बनाय़े। नीति नियंताओं और प्रशासनिक अधिकारियों को इस ओर ध्यान देते हुए कक्षा नियंत्रण में सहायक बिन्दु तैयार कर विद्यार्थियों को उस पर अमल करने दिशा निर्देश देना ही एक मात्र विकल्प के रूप में दिखायी पड़ रहा है।


    शिक्षक दिवस के अवसर पर स्वयं एक शिक्षक की हैसियत से कहना चाहता हॅू कि कुछ अपवादित शिक्षकों की कार-गुजारी की सजा नये नियमों को थोपने के साथ न देते हुए कक्षा नियंत्रण का अधिकार शिक्षकों के हाथों देना ही उचित माना जा  सकता है। शिक्षक को बेचारा प्राणी बनाने वाले सारे नियम कानून शिक्षण संस्थाओं के लिए महज चाईल्ड केयर सेन्टर बनकर रह गये हैं। उन्हे दिशा-निर्देर्शित करते हुए एक कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक द्वारा पालक की हैसियत से डॉट-डपट और हल्की चपत के माध्यम् से समझाया जाने वाला शिक्षा का महत्व दम-तोड़ता दिखायी दे रहा है। बेबश-शिक्षक और उद्दंड विद्यार्थी के बीच किस प्रकार का कानून सुकून दे सकता है इस पर न्यायविदों और शिक्षा शास्त्रियों को मंथन करना होगा। वर्तमान में जो हवा चल रही है अथवा प्रशासन द्वारा चलायी जा रही है, उसके चलते एक शिक्षक डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सपनों को भारतवर्ष के संदर्भ में पूरा कर दिखाएगा इसमे संदेश ही संदेह है। सवाल यह उठता है कि जहाँ शिक्षकों के अधिकारों पर चाबुक चलाये जा रहे हैं वहीं उन्हे सुरक्षा की कौन सी गारण्टी दी जा रही है एक शिक्षक मनचले विद्यार्थियों द्वारा मार दिया जाता है, महिला शिक्षिका छेड़खानी का शिकार हो जाती है। या फिर कक्षा के भीतर शरारती विद्यार्थियों द्वारा ब्लेक बोर्ड पर शिक्षक के खिलाफ टीका-टिप्पणी की जाती है तब इन परिस्थितियों में हमारा कानून मूक दर्शक बन जाता है।


    शासन-प्रशासन द्वारा शिक्षकों के कार्यो में बाधा-पैदा करने वाले बनाये गये और बनाये जा रहे नियमों का माकूल जवाब स्वयं शिक्षकों को देना होगा। इसके लिए अपनी कर्त्तव्यनिष्ठा को चुनौती स्वीकार करते हुए शिक्षकों को विपरीत परिस्थितियों में उत्तम परीक्षा परिणाम देना होगा। साथ ही बच्चों के कोमल मन में अपने लिए जगह बनाने के उद्धेश्य से उनकी हर कठिनाई को दूर करने हर समय खड़े  रहना होगा । बच्चों को यह विश्वास दिलाना भी अब शिक्षकों का कर्त्तव्य है कि उनका हर फैसला अथवा डांट-डपट छात्रों के हित में माता-पिता की तरह लिया गया निर्णय है, ताकि उनके हृदय में शिक्षकों के प्रति मलीनता अथवा कुविचारों का जन्म न हो । आज की इक्कीसवीं शताब्दी में छात्र-शिक्षक संबंध मधुर बनाना भी इतना आसान काम नहीं रह गया है । अब छात्र को शिष्य एवं शिक्षक को गुरूजी की गरिमा कायम रखने मिल-जुल क र नीति बनाने की जरूरत बलवती दिखायी पड़ रही है। मुझे यह कहने में भी संकोच नही कि शैक्षणिक संस्थाओं में छात्रो-शिक्षकों के बीच बढ़ रही दूरी या गंभीर दिख रही खाई के पीछे कानूनी अड़चनें ही आड़े आ रही हैं। मुझे याद है अपनी शालेय एवं महाविद्यालयीन पढ़ायी जब छात्र और शिक्षक के बीच कानून और पालकों का हस्तक्षेप आड़े नही आता था, और वातावरण भी बड़ा ही सुखद हुआ करता था ।


    शिक्षा का स्तर भी पहले की तुलना में कमजोर ही दिखायी पड़ रहा है। इस प्रतियोगी युग में चाहे पालक हो या विद्यार्थी उसे अच्छे अंको अथवा ए प्लस ग्रेड से ही मतलब है। संस्थाएं भी बच्चों और पालकों की इसी सोच को भुनाते हुए रूपये कमाने में लगी हुई हैं। परीक्षा से पूर्व प्रश्न पत्रों की गोपनियता भंग-करते हुए चहेते विद्यार्थियों को अंक देने वाले शिक्षक का सम्मान भी पालकों की गलत सोच के कारण पनप रहा है। ऐसा ही विद्यार्थी प्रतियोगिता परीक्षा मे जब अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता है तो उसका धरातल उसे दिखायी देने लगता है । कुल मिलाकर शिक्षा का स्तर और शिक्षकों पर बनाया गया गैर कानूनी दबाव भविष्य के लिए सुखद परिणाम देने वाला कदम नही कहा जा सकता है


शर्मनाक है यह सरकारी फरमान।
    भारत वर्ष के सबसे बड़े राज्य राजस्थान ने बढ़ते अपराधों के नियंत्रण की दिशा में चौंकाने वाला निर्णय लेते हुए शिक्षकों का कैरेक्टर वेरिफिकेशन शुरू कराने की योजना को अंतिम रूप दिया है। संस्कारों का निर्माण करने वाले और राष्ट्रनिर्माता कहे जाने वाले शिक्षकों के चरित्र पर उठाया जाने वाला सवाल इस वर्ष के शिक्षक दिवस का पुरस्कार माना जा सकता है । राजस्थान प्रदेश में कार्यरत कुल दस लाख शिक्षकों के चरित्र सत्यापन का कार्य शुरूआती रूप ले चुका है। प्रदेश में चार लाख सरकारी तथा छह लाख गैर-सरकारी शिक्षक कार्यरत हैं। जयपुर कमिश्नरेट क्षेत्र की सरकारी शालाओं सहित राज्य के कई स्कूलों में छात्राओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आने के बाद चरित्र सत्यापन जैसी योजना को अमल में लाया जा रहा है। प्रदेश शासन ने पुलिस के माध्यम् से सभी स्कूलों में पत्र भेजकर स्टाफ के नाम, पते, मोबाईल नम्बर, व आवास की विस्तृत जानकारी मांगी है। इस सरकारी  फरमान के बाद शिक्षकों ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा है कि स्कूलों में घटित चंद घटनाओं के बाद पूरे शिक्षक समाज पर उँगली उठाना उचित नहीं है । शिक्षकों ने कड़े लहजे में कहा है ऐसे ही मामलों में जेल की हवा खा रहे राजनेताओं तथा अधिकारियों के चरित्र सत्यापन की जरूरत क्यों नहीं समझी जा रही है ? जहाँ तक चरित्र सत्यापन का सवाल उठाया जा रहा है, शिक्षकों का स्पष्टीकरण है कि शिक्षकीय पेशे सहित सभी प्रकार की नौकरी में काम सम्हालने से पूर्व पुलिस वेरिफिकेशन सहित चरित्र प्रमाण पत्र मंगाया जाता है और वह रिकार्ड के तौर पर विभागों के पास सुरक्षित रहता है। फिर इस प्रकार की प्रक्रिया अपराध में लिप्त लोगों को सजा दिलाने तक होनी चाहिए, न कि सभी को उस कीचड़ में घसीटने तक।  

                                                    
                          
                                           प्रस्तुतकर्ता
                                       (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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  1. शिक्षक दिवस पर गुरु से सर तक की यात्रा का सफर लेखक ने बखूबी समझाया है कक्षा में अनुशासन किस प्रकार लाया जाये जबकि सामान्य डॉट भी सजा की श्रेणी में आ गयी है आनेवाले समय में शिक्षक को अनेक चुनोतियो का सामना करना होगा . अधिक से अधिक प्रभावशाली शिक्षण के माध्यम से इन चुनौतिओ का सामना किया जा सकता है लेख के द्वारा ही ज्ञात हुआ कि राजस्थान में शिक्षकों का कैरेक्टर वेरिफिकेशन शुरू कराने की योजना को अंतिम रूप दिया है यह बहुत ही सोचनीय बात है कि जहाँ गुरू को भगवान से पहले पूजा जाता हो वह अब यह सिथिति उतपन हो गयी है ऐसे में शिक्षक दिवस पर यही आशा है कि शिक्षको की गरिमा बनी रहे .

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  2. मिश्रा जी,
    ये फरमान जारी करने वाले भूल जाते हैं कि खुद उनके अपने बच्चे बिना डाँट-चपत के किस तरह तैयार हो रहे हैं. अब शासन केवल नेता को सौंप दिया गया है. देखते जाईए यह तरकीबें हमें किस नर्क तक ले जाएंगी. आज भी याद हैं वे दिन जब गुरुजी कहा करता थे गेंदा खेलो और खेलो - इस बार पास नहीं होगे.. और उसी की प्रतिस्पर्धा में पढ़ कर जब नतीजे सामने आए, तो गुरुजी स्कूल के गेट पर मेरा इंतजार करते मिले... उस दिन पीठ पर उनकी दी थपथपाहट आज भी महसूस होती है... अब की शायद बात होती तो छूने से भी कतराते.

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