रविवार, 31 अगस्त 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - ऐसे आचरण पर हमारी खामोशी आखिर क्यों ?

ऐसे आचरण पर हमारी खामोशी आखिर क्यों ?

डॉ.चन्द्रकुमार जैन

देश की राजधानी में एक युवती के साथ चलती बस में बलात्कार की घटना की चर्चा जमकर हुई थी। निर्भया का मामला अब संवेदना और प्रतिक्रिया से ज्यादा प्रचार के रूप में ढल-सा गया मालूम पड़ता है।संसद में हर दल की ओर से इस पर चिन्ताव्यक्त की गयी और बलात्कार के अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा का कानून बनाने के सुझाव भी दिए गए। पहल भी हुई। लेकिन अफ़सोस है कि  21 वीं सदी में इन पुराने पड़ चुके सुझावों पर चर्चा का दौर आज भी लगातार चल रहा है।

देश में यह अपने किस्म का अलहदा विरोध प्रदर्शन कहा जा सकता है। फिर भी, बात सिर्फ अनाचार या दुराचार की नहीं, देश में ऐसे न जाने कितने मामले हैं जिन्हें सीधे या प्रकारांतर से दुराचार की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए लेकिन जिन्हें लेकर हम न कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, ना ही ऐसे आचार-व्यवहार के अँधेरे को चीरने वाली कोई किरण तलाशते हैं। सोचें आखिर ऐसा क्यों ?

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की कठोर सजा दी जानी चाहिये, लेकिन सजा तो घटना के घटित होने के बाद का कानूनी उपचार है। हम ऐसी व्यवस्था पर क्यों विचार नहीं करना चाहते, जिसमें ऎसी घटनाएं हो ही नहीं। हमारे देश में केवल स्त्री के साथ ही बलात्कार नहीं होता है, बल्कि हर एक निरीह, असहाय और मजबूर व्यक्ति के साथ हर दिन और हर पल कहीं न कहीं असद व्यवहार होता ही रहता है। उसे आप क्या कहेंगे ?

मसलन मिसाल की तौर पर समझें कि एक पुलिस का जवान कानून व्यवस्था का हिस्सा बनने केलिये पुलिस में भर्तीहोता है, लेकिन पुलिस के आला अफसर या उसका बॉस  उसे अपने घर पर अपनी और अपने परिवार की चाकरी में तैनात कर देता है। जहॉं उसे केवल घरेलू कार्य करने होते हैं-ऐसा नहीं है, बल्कि उसे अफसर की बीवी-बच्चियों के गन्दे कपड़े भी साफ करने होते हैं। आप ही बतिये क्या यह उस पुलिस कॉंस्टेबल के सम्मान का बलात्कार नहीं है?

जब एक व्यक्ति न्याय के मन्दिर में,सब जगह से निराश होकर न्याय पाने की आस लेकर जाता है तो उसे न्याय के मन्दिर में प्रवेश करने के लिये सबसेपहले वकीलों से मिलना होता है, जिनमें से कुछेक को छोड़कर अधिकतर ऐसेव्यक्ति के साथ निर्ममता और ह्रदयहीनता से पेश आते हैं। वे अपनी मनमानीफीस के अलावा कोर्ट के कागज बनवाने, नकल लेने, मुंशी के खर्चे और अदालत के बाबू को खुश करने आदि न जाने कितने बहानों से न्यायार्थी से हर पेशीपर मनमानी वसूली करते रहते हैं। जिसकी पूर्ति के लिये ऐसे मजबूर व्यक्तिको अपनी पत्नी के जेवर तक बेचने पड़ते हैं। अपने बच्चों को बिना सब्जी रूखी रोटी खिलाने को विवश होना पड़ता है। अनेक बार अपनी अचल सम्पत्ति भी गिरवी रखनी या बेचनी पड़ती है। इसे आप क्या कहेंगे ?

जब एक बीमार उपचार के लिये डॉक्टर के पास जाता है तो वह अस्पताल में उसकी ओर ध्यान नहीं देता है। अस्पताल या क्लीनिक में बैठक यानी मरीजों के इंतज़ार के लिए पर्याप्त सही जगह के अ भाव, पीने के पानी तक की सुविधा न होने पर भी अपने क्रम से मिलने की शर्तें होती हैं।

कहीं-कहीं तो अपनी बारी की प्रतीक्षा में मरीज का डैम घुटने लगता है फिर भी उसे डॉक्टर के घर मोटी फीस अदा करके दिखाने को विवश होना पड़ता है! केवल फीस से ही डॉक्टर का पेट नहीं भरता है, बल्कि अपनी अनुबन्धित लेबोरेटरी पर मरीज के अनेक टेस्ट करवाये जाते हैं और मंहगी कीमत वाली दवाएँ लिखी जाती हैं। जिनमें से डॉक्टर को प्रतिदिन घर बैठे मोटी राशि कमीशन में मिलती है। शरीर का इलाज कराते-कराते मरीज आर्थिक रूप से बीमार हो जाता है। क्या यह मरीजों का डॉक्टरों द्वारा हर दिन किया जाने वाला यह व्यवहार किस श्रेणी में आता है ?

एक प्रोफ़ेसर जिसे किसी ख़ास विषय में पढ़ाने के लिए चुना गया है। अच्छी तनख्वाह है,सम्मानजनक ज़िंदगी है, लेकिन वह न तो विद्यार्थियों को पढ़ाता है, न ही उन्हें प्रेरित करने का कोई माद्दा उसके पास है। पढ़ाना-लिखाना छोड़कर वह सब कुछ करता है। इसे आप किस दर्जे में रखेंगे? ऐसे कई उदाहरण और भी दिए सकते हैं। शिक्षक पढ़ाते नहीं, दीगर तमाम काम करते हैं। मस्तिष्क की खुराक देना तो दूर, पोषाहार को बेच दिया जाता है। आँगनवाड़ी केन्द्रों पर बच्चों की देखरेख करने के बजाय उन्हें कुछ घण्टे के लिये कैद करके रखा जाता है।

इन हालातों पर हमारी खामोशी आखिर किस बात का सबूत है, फैसला आप कीजिए।

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लेखक दिग्विजय कालेज,राजनांदगांव में प्राध्यापक हैं।

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