मंगलवार, 26 अगस्त 2014

अमिताभ विक्रम की कविताएँ

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कुतिया


एक कुतिया
बड़े-बड़े थन लटकाये
घुसती पुंछ को
पावों में दबाये
वहाँ-जहां
पहले से ही तीन पिल्ले
अपनी माँ को चाट रहे है
माँ अपने सूखे थन
पर कांटना बरदाश्त नहीं कर पाती
वह उठकर भागती है
बच्चे गुडककर इधर-उधर गिर जाते हैं
दोनों कुतियाँ एक-दूसरे को देखती हैं
दोनों की आखों में
दर्द है, भूख है
और है कुछ लाचारी
कोई नहीं भोंकता
कोई नहीं लड़ता
शायद बेबसी है
जीने की
जीते रहने की
लड़ने की
लड़ते रहने की
अपने ही आप से
इस जीवन से

 

गरीब


दो गरीब बच्चे...
एक लड़का और एक लड़की
उम्र का कोई पता नहीं
उनकी त्वचा से उम्र का पता नहीं चल रहा था
कपड़े थे
गंदे
पर दाग अच्छे थे
जैसे कि एक गरीब के होने चाहिए
मांग रहे थे
अपने जीने का हक
अठन्नी, रुपया, दो रुपया
उन्हें देख कोई सिकोड़ता था
मुंह
तो कोई अपनी जेब
कोई देना चाहता था बिना भेदभाव किये
“चोकलेट” और करना चाहता था
“चोकलेटबाजी”
वे भूखे थे
उन्हें नहीं पता था
आत्मा और परमात्मा के बारे में
उन्हें नहीं पता था
माता-पिता के बारे में
वे दुनिया में अकेले थे
उन्हें किसी से मोह नहीं था
उन्हें सिर्फ भूख लगी थी
वे नंगे नहीं थे

चीजें


स्त्रियॉं की चीजें में
होते है घुंगरू और
बहुत सारे नग-नगीने
चटकीले-भड़कीले रंग
और फूल-पत्तियाँ
हरी, लाल, गुलाबी, बैंगनी
बहुत सारा कपड़ा
बहुत सारी परतें
जिसमें वो ढक जाती है
काम भर
और दिखता रहता है
बहुत कुछ
स्त्रियॉं की चीजें
होती है कुछ विचित्र
 

संवाद


जब हो जाता है बंद संवाद
मनुष्यों से
तो चल पड़ता है वह
जंगलों में
चाह नहीं उसे बुद्ध बनने की
वह तो चाहता है अब
जानवरों को दोस्त बनाना
सीखना वहाँ के तौर-तरीके
जो सीखाते हैं
संघर्ष करना और जीना
इस जंगल-राज में
पर होते हैं कई मौनी-बाबा भी
जो अपनाते हैं मध्यम मार्ग
बंद कर देते हैं
मनुष्यों से वार्तालाप
और पाल लेते हैं
कुत्ता, बिल्ली, या वैसा ही कुछ
ताकि संवाद जारी रहे

जुगनू


मैंने सुना था
चाँद की दूधिया रोशनी में
उड़ती हैं पारियाँ
सुनहरे पंखों पर
ओस की बूंदें लिए
जुगनूओं की प्यास बुझाने
मैंने सुना था
जुगनू घुस जाते हैं वहाँ
जहाँ होता है अंधेरा
मिट्टी की महक
खुला आकाश और धरती
वे फैलाते रंग और चमक
मैंने सुना था
जुगनू का दिल जलता है
जब वह जगमगाता है
उसकी प्यास नहीं बुझ पाती
ओस के तिलिस्मी पानी से
मैंने देखा है
जुगनू को तड़पते हुए
जलते हुए अपनी ही आग में
वह जलकर ही बुझता है
जलता है फिर बुझता है
मैं सोचता हूँ
निर्मल रोशनी उसकी
जैसे भटकती आत्मा कोई
उड़ती शरीर की तलाश में
जब वह जलता है
तब कहीं कोई जीता है

"निर्मल बात"


क्या कहते हो तुम इतना सरल
जो कर देता मन को निर्मल
जैसे हो कोई द्रव्य तरल
देता मरहम ज़ंग लगे मन पुर्जों को
और फिर नहीं रुकता मन कल-पुर्जा
किसी बात को रहते घिसते हुए
आगे बढ़ता अविरम अविरल
जैसे कल कल करता हो जल
कहते हो तुम कितना निर्मल

आग


पास जंगल तक पहुँच गयी आग
क्यों तुम सोये हो
आदमखोर की नहीं सुन रहे आवाज़
कहाँ तुम खोये हो
नहीं कोई आने वाला
मीडिया, ना नेता
ना ओर कोई लाला
भूलो मत तुम शोषित हो
प्रकृति पुत्र नहीं, शापित “शूद्र” हो
क्या इंतज़ार है
कई सो झोपड़ी फुकने का
या मरने की बाट जोहते हो
संतानों और मवेशियों की
उठो कि हाथ में थामे मशाले
धू-धू कर जलाने
जो भी हो दुश्मन
प्रकृति या फिर कोई जन
वार्ता के कटु प्रेम गीत
अब नहीं हैं तुम्हारे मीत
अब नहीं तुम्हें बचा पाएगें
वादे और सब्र के घूट
थी वह तब भी मिथ्या बातें
अब भी है निरा झूठ
जागो ! होश में आओ
तुम्हारा घर है तुम्हारा वतन
उसे बचाने का करो जतन
कर्मशील बनो “बुद्धिजीवी” नहीं
प्रयास करो सोचो नहीं
बस रहे केवल इतनी खबर
कि तुम भी ना बन जाओ ख़बर
आग से आग बुझाओ
आवाजों को गुम ना होने दो
जागो! होश में आओ
क्यों तुम सोए हो

 

पाँच दृश्य


 
एक
चिनार का एक सूखा पत्ता
झूलता हुआ, मदमस्त सा
गिरता धरा पर
मैं देखता उस दरख़्त की
ऊंचाई को, महानता को
क्या कभी वहाँ पहुँच पाऊँगा, मैं
या शाम हो जाएगी इस जीवन की यहीं
दो
एक चील पंख फैलाये उड़ती है
और बैठ जाती सुखी जमीन पर
खाने लगती कीड़े और चिटीयों को
कौवों की एक जमात आती है
खोदती धरती को और खाती
मकोड़ों और पतंगों को
चील उड़ जाती है
तीन
दो बच्चे आते हैं
मुझे देखकर मुसकुराते हैं
हाँ, मैं भी जीना चाहता हूँ
वे खेलते लुका-छुपी
जैसे मैं अभी जी रहा हूँ
घूमते चिनार के इर्द-गिर्द
जैसे यह संसार घूम रहा है
मेरे चारों ओर
चार
मैं हँसता हूँ
पर हंसी सुनाई नहीं देती
शायद मन में हंसा, पता नहीं
आखों से दो बूंदें गुड़कती हैं
पर कोई देखने वाला नहीं
मैं भी सैलाब को नहीं रोकता
शायद आत्मा आखों से बह रही है
पाँच
समय अगर रुक सकता
तो क्या मांगता
सूखा पत्ता चिनार का बस
हवा में रुक जाता और मैं
उसे देखता रहता
या बच्चे ऐसे ही घूमते रहते
चिनार के चारों और
चील और कौवे रहते
वहीं दरख़्त पर
और मैं आत्मा को बहने देता
बस समय रुक जाता
सदा के लिए

मृत्यु


बड़े और छोटे के पिता नहीं रहे
और मैं आज़ाद हो गई
उनका साथ ढ़ोहना था
और उनकी मृत्यु थी
खोना, नहीं
रोना, कदापि नहीं
बस एक होना, हाँ 
एक घटना थी जो घटित हो गयी
पर मेरी शादी उनके साथ
घटी एक दुर्घटना थी
आजीवन कारावास की
झूठ नहीं बोल सकती
बड़ी बुआ की तरह
जिन्हें दुख था सबसे ज्यादा
जो आई थी केवल उनके
पैदा होने पर
शादी में
और अब मरने पर
पर मैं मरी हूँ रोज़
मन से
तन से और
चेतन से
मैं क्यों रोऊँ
मैं तो आज उल्लास करुगी
मन को सजाउगी
तन को निखारूगी
चेतन को बनाउगी
मेरा तो आज जन्म हुआ है
मैं तो आज आजाद हुई हूँ
 
 
Biography:
 
Amitabh Vikram Dwivedi is an assistant professor of linguistics in the School of Languages and Literature at Shri Mata Vaishno Devi University, India. His research interests include language documentation, writing descriptive grammars, and the preservation of rare and endangered languages in South Asia. He has contributed articles to many English journals.
 
His most recent books are A Grammar of Hadoti (Lincom Europa Academic Publications, 2012) and A Grammar of Bhadarwahi (Lincom Europa Academic Publications, 2013), and A Grammar of Dogri is forthcoming.
 
As a poet, he has published around fifty poems in different anthologies worldwide. Until recently, his poem “Mother” has included as a prologue to Motherhood and War: International
Perspectives (Eds.), Palgrave Macmillan Press. 2014.
 
 
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Amitabh Vikram Dwivedi, PhD
Assistant Professor
Faculty of Languages & Literature
College of Humanities & Social Sciences
Shri Mata Vaishno Devi University, Katra
Jammu & Kashmir, INDIA 182 320
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E-mail IDs:
amitabhvikram@yahoo.co.in
amitabh.vikram@smvdu.ac.in
http://smvdu.net.in/

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