शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

दीनदयाल शर्मा का राजस्थानी हास्य व्यंग्य : धाप्या ईं बटाऊपणै स्यूं

राजस्थानी हास्य व्यंग्य-

धाप्या ईं बटाऊपणै स्यूं / दीनदयाल शर्मा 

म्हारौ टाबरपणौ गांव मांय बीत्यौ। गांव मांय टाबरां रै मन मांय आ बात कूट-कूट'र भर्यौड़ी ही, कै बटाऊ भगवान रौ औतार होवै। घरां बटाउंवां सारू बैठक अळगी बण्यौड़ी ही। घरां जणां भी बटाऊ आंवता, दड़बड़ाट सी मच ज्यांवती। कोई संदूक स्यूं चादर काडै। कोई चमची साफ करै। कोई नास्तै सारू प्लेट जचावै। पछै बटाऊ नै पूछै-कै चा कप मांय पीस्यौ कै बांटी मांय ? बटाऊ री सेवा मांय कोई काण कसर नीं रैज्यै, इण बात रौ पूरौ-पूरौ ध्यान राखता। घर ही नीं, पाड़ोसियां रा टाबर भी अनुशासित हो ज्यांवता, कै फलाणै घर मांय बटाऊ आयोड़ा है।

    म्हारै हिड़दै मांय भी सुवाल उकळता। कदास म्है भी बटाऊ बणस्यां। टैम रै साथै-साथै म्हूं टाबरां री ऊमर पार कर ली। पण बटाऊ बणनै रौ मौको नीं मिल्यौ। घर रै काम-काज मांय घणकरी सी बार बापूजी जांवता या फेर औ मौकौ म्हारै बडोड़ै भाईजी नै मिलतौ। भाईजी आंवतांईं आपरी सेवा रौ इस्यौ बखान करता कै म्हूं कळ'र राख हो ज्यांवतौ।

    अर जणां बी.ए. करी, उण टैम म्हूं अपणै आपनै बडौ समझण लागग्यौ। पछै बी.एड. री ट्रेनिंग करण सारू सरदारशहर जावणौ पड़्यौ। उण टैम बठै दूर-दूर रा भायला बण्या। बां सगळां रा पता ठिकाणां लिख-लिख;र पूरी डायरी भर ली। कागदां रौ दौर सरू होयौ। टैम निकळतौ रैह्यौ। कई साल निसरग्या। पछै दो-तीन खास भायला रैह्या, जिका हरेक कागद मांय आपरै सै'र आवणै रौ नूंतौ देंवता। अेक भायला वर्मा जी है। बै हरेक कागद मांय आपरै सै'र री बडाई करता। बां'रौ कैवणौ हो कै जे म्हारौ सै'र नीं देख्यौ तो समझौ दुनिया मांय कीं नीं देख्यौ। पछै बै लिखता म्हारौ घर थारौ घर ई समझौ। आधी रात नै भी आवौ तो थारै मान सारू बाखळ खुली लाधसी। ......... अर अेक दिन अचाणचकैई दिसम्बर रै म्हीनै मांय म्हूं आपरै भायलै वर्मा जी रै घरां पूग्यौ। बै घरां ई हा। मिलतांईं बोल्या- भाईजी माफ कर्या, म्हूं आपनै ओळख्यौ कोनी। 

    म्हूं बानै भायलैपणै री ओळ्यूं दिराई अर बां'रा लिख्योड़ा कागद दिखाया तो बै बोल्या- यार जोशी, तूं तो साचाणी आग्यौ।......... सुणतांईं म्हूं धोळौ होग्यौ। फेर बात नै संभाळतां थकां म्हूं कैयौ- म्हूं नी, तो के म्हारौ भूत आयौ है। 

    आ बात कोनी। म्हूं तो आ सोचै हो, इण जबर पाळै मांय..... अर बौ भी इत्ती दूर स्यूं..... तूं आ थोड़ी सकै। अर अब तूं आ ही गयौ है तो भई सिर माथै। अलबत तूं म्हारौ बटाऊ है।

    भायलै री बात सुण'र म्हनैं कीं सांस आयौ। म्हूं आपरी टैची अेक खानी राखी। खेसलौ उतार्यौ अर अेक तिपाई कुरसी रै किनारै बैठ'र होळै-होळै मौजा उतारण लाग्यौ। भायलै पूछ्यौ- 'सीधौ म्हारै कन्नै'ई आयौ है कै, कीं और भी काम हो ?'

    म्हूं बोल्यौ- नां, और कींरै जावै हो। म्हूं तो सीधौ थारै कन्नै'ई आयौ हूं। थे'ई लिखता..... कै म्हारै आवौ अर सै'र देखौ।

    'खैर, लिखणौ और बात है।' भायलै होळै सी कैयो।

    पछै पूछ्यौ- किताक दिन रुक स्यौ ?

    म्हूं होळै सी बोल्यौ- बस, अेक-दो दिनां मांय ई चल्यौ जास्यूं।

    भायलौ हांस'र बोल्यौ- 'अेक दो दिन क्यूं, दस दिन रुकौ। इणनै थारौ ई घर समझौ। म्हूं थोड़ौ काम मांय उळझ्योड़ौ हूं। थे इंयां कर्या, सै'र मांय जकी देखण आळी चीज है, बै म्हारा दोनूं छोरा बिनोद अर राकेश रै साथै देखियाइयौ। बुरौ नां मानी यार जोशी। म्हूं बस आभी आयौ.... पांचेक मिंटा मांय। अर बै' बिजळी दांईं गायब होग्या। 

    घण्टै भर पछै म्हारै भायलै वर्मा जी रौ बडगर राकेश आयौ अर बोल्यौ- अंकल, चा' और ल्याऊं ?

    म्हूं बोल्यौ- और ! पैली चा कणां पी ?

बौ हांस'र बोल्यौ- पैली चा तो थे टेसण माथै पी होसी। किंयां.... चा ल्याऊं ?

    'ठीक है.... लिया। कै'र म्हूं अपणै आपनै बोल्यौ- जोशी, दिखावै री इण दुनिया मांय तूं कठै फंसग्यौ यार। फेर सोच्यौ- चलौ, इत्ती दूर आयौ हूं तो कीं देख'र ई जाऊं। अठै के उमर काढणी है। आध-पूण घण्टै पछै बरफ सी चा आयगी। पी'र काळजौ ठण्डौ होग्यौ। चा पींवतांईं म्हूं राकेश स्यूं कै'यौ- राकेश बेटा, लाम्बै सफर स्यूं डील टूटै। न्हावण सारू थोड़ो गरम पाणी है के ?

    पाणी! अजकालै पाणी रौ तो भौत तोड़ौ है अंकल। लारलै अेक पखवाड़ै स्यूं कोई कोनी न्हायौ। बापूजी भी अजकालै दफ्तर मांय ई न्हावै।

    'तो ईंयां कर, अेक गिलासियो पाणी तो ले आ। कम स्यूं कम मुंडौ तो धो ल्यूं।' म्हूं बोल्यौ।

    हाथ-मुंडौ धो'र म्हूं गाभा बदळ्या। जणां वर्मा जी रौ छोटियौ छोरौ बिनोद आयौ, अर नमस्ते कर'र बोल्यौ- अंकल, बापूजी कैयौ है कै म्है थानै सै'र दिखा ल्यांवां।'

    'ठीक है, आपां जीमतांईं चालस्यां।' म्हूं कैयौ। बिनोद बोल्यौ- अंकल, छोडो नीं, जीमणौ-जूठणौ आपां और कठैई कर ल्यांगा। अंकल, चालौ नीं.... फेर आपां नै पिक्चर भी तो देखणी है।

    भायलै रा दोनूं लाडेसर राकेश-बिनोद अर म्हूं.... म्है तीनूं बजार कानी टुरग्या। जणांईं अेक दुकान कानी सेन करतौ राकेश बोल्यौ- 'अंकल, ईं दुकान री मिठाई भौत मसू'र है। खाओगा..... तो मर्यां पछै भी याद रैवैगी। जी...तो कोनी करै हो... पण टाबरां सारू जी नै मनावणौ पड़्यौ।

    मिठाई खा'र थोड़सीक दूर चाल्या कै बिनोद अेक बडै सारै होटल कानी आंगळी उठांवतौ बोल्यौ- ईं होटल री कचौरी। वाह् के कैणौ। मसालौ इत्तौ मजेदार है कै अेक जाड़ खावै तो दूजी तरसै। 

    वर्मा जी रा दोनूं लाडला मिठाई अर कचौरी रै चक्कर मांय अेक सौ पैंतीस रिपियां रौ भड़तू बांध दियौ। फेर बै दोनूं मन्नै अेक सिनेमा घर कनै लेग्या। म्हूं कणांईं बां कानी देखूं तो कणांईं मेरी जेब कानी। जणां बिनोद बोल्यौ- अंकल, थारै होंवतां थकां म्है बिना पिक्चर देख्यांई जा स्यां ? टाबर री मनवार आगै झुकणौ पड़्यौ। पछै टिकट अर नास्तै सारू अेक सौ साठ रिपिया और लागग्या।

    'क्यूं अंकल, पिक्चर खेखी लागी नीं ?' राकेश पूछ्यौ।

    म्हूं बोल्यौ- पिक्चर तो चोखी ही। पण म्हूं अबै थकेलौ मैसूस करूं। घरां जा'र आराम करस्यां। बाकी चीजां आथणगै देखांगा। 

    मेरौ थकेलौ देख'र बां फटदणी किरायै री टैक्सी कर ली। म्हनै तो तीस रिपिया ई देणां पड़्या हा। थोड़सी ताळ मांय घरां पूगग्या।

    जणां बिनोद पूछ्यौ- किंयां अंकल, भूख है के ?

    नां, म्हनै भूख कोनी। म्हूं थोड़सीक ताळ अराम करणौ चावूं।

    ठीक है, थे अराम कर ल्यौ। इत्तै म्है दोनूं भाई रोटड़ी मांजल्यां। बिनोद इत्तौ कै'र चल्यौ ग्यौ।

    मेरी आंख भी नीं लागी कै राकेस आयौ अर बोल्यौ- अंकल।

    बोल बेटा।

    अबै बारै घूमण चालां।

    थे दोनूं जीम तो ल्यौ।

    थे जीमण री बात करो। म्है तो चा भी पी ली।

    चा.... मनै तो कोनी प्याई। म्हूं पूछ्यौ।

    थे अराम करा हा नीं। मा कैयौ कै थारै अंकल नै नां उठाई.... बिच्यारा थकेड़ा है।

    राकेस, म्हूं बारै कोनी जाऊं बेटा, म्हारौ जीसौरौ कोनी। म्हूं कैयो। सुण'र राकेस चुपचाप भीतर चल्यौ गयौ।

    म्हूं माची माथै आडौ होग्यौ। पड़्यै-पड़्यै नै घर री ओळ्यूं आवण लागी। सोचतां सोचतां सिंझ्या रा सात बजग्या। जणां अचाणचकाई वर्मा जी पधार्या अर बोल्या- यार जोशी, माफ करी यार। देर होयगी। म्हूं सीधौ ई दफ्तर निसरग्यौ। ईंयां किंयां पाधरौ होर्यौ है... आसंग कोनी के ?

    म्हूं कसाई आळौ बकरै दांईं आंख्यां मूंद'र 'हां' मांय नाड़ नांख दी।

    बै बोल्या- कोई बात नीं। उदास क्यूं होवै। औ थारौ ई घर हे। कोई अबखाई होवै तो संकौ नां करी। अर रैयी सै'र दिखाणै री बात। टाबर थानै के सै'र दिखावैगा। म्हूं अेक भायलै स्यूं कार मांग ली है। सै'र तो म्हैं घुमास्यूं। अभी थोड़ो अराम करल्यौ। थारी तबियत ठीक कोनी दिसै। रात नै थारी भोजन भी ठीक नीं रैसी। थारी भाभी नै कै' देस्यूं कै बा बिना छमकै री दाळ अर अेक खांखरौ बना देसी। ठीक है नीं ?

    'ठीक है वर्मा जी।' म्हूं सिसकारौ नाखतौ बोल्यौ।

    अर पछै रात नै साढे नौ बज्यां टी.वी. सीरियल खतम होंवतांईं राकेश हाजर होयौ। बोल्यौ- अंकल, जीमल्यौ। जीमण रौ नांव सुण'र मेरी ज्यान मांय ज्यान आई। म्हूं फटदणी उठ्यौ अर देख्यौ कै- अेक बाटकड़ी मांय तोळौ अेक हळदी-मूंग रौ पीळौ पाणी अर आधौ काचौ अर आधौ बळ्योड़ौ चांद सो खांखरौ लियां.... राकेश खड़्यौ है।

    भूख रै कारण पेट मगरां स्यूं भरत मिलाप करै हो। जियां भी हो..... संतोष कर्यौ। रात नै घणी तकड़ी भूख लागी। सुण्यौ है कै भूख मोटां-मोटां रा ईमान डिगा देवै..... पण म्हूं तो घड़ी देखतै-देखतै अर छात रा गाडर-बत्ता गिणतै-गिणतै छाती राखी अर रात काट दी।

    दिन उर्ग वर्मा जी रौ छोटियौ छोरौ बिनोद हाजर होयौ। बोल्यौ- अंकल, चा पील्यौ।

    म्हैं चा रौ रंग देख'र बोल्यौ- 'बेटा बिनोद, म्हनै लागै थारी मा चा मांय दूध घालणौ भूलगी।'

    'दूध घालणौ कोनी भूली अंकल। आ लाल चा है। इण मांय दूध कोनी घाल्या करै।' बिनोद कैयौ।

    म्हूं चा री घूंट ली तो जमा फीकी! 'क्यूं बेटा, खाण्ड कम है नीं, चा मांय।'

    'अंकल, म्है दिनुगै-दिनुगै इसी ई चा पीवां।'

    लाल चा पी'र म्हूं रिपत होयौ। जणां'ई वर्मा जी कार ले'र आग्या। म्हूं भौत राजी होयौ। पछै म्है दोनूं कार मांय बैठ'र घूमण नै निसर्या। कार वर्माजी चलावै हा। म्हूं बां'रै कन्नै बैठ्यौ हो। बातां-बातां मांय वर्मा जी बतायौ कै कार आपां नै तेल रै बदळै मिली है। कार भायलै री अर तेल आपणौ। इण कारण थोड़सो तेल घलवा ल्यां।

    अबै कार पेट्रोल पम्प माथै खड़ी ही। पेट्रोल घालतांईं वर्मा जी बोल्या- अरे यार जोशी, सौ रिपिया देई दिखाण। म्हूं बटुऔ घरां ई भूलग्यौ यार।

    म्हारौ हाथ सीधौ जेब मांय गयौ अर सौ रौ आखरी नोट वर्मा जी रै हाथां मांय थमा दियौ। वर्मा जी बोल्या- थोड़सो नास्तो करल्यां। ईंयां दिनुगै-दिनुगै निरणै काळजै घूमण रौ मजोई नीं आवै।

    'जियां थारी इच्छ्या।' म्हूं होळै सी कैयौ।

    नास्तै रै पछै जेब मांय पच्चीस पइसा बंच्या। सौच्यौ कै वर्मा जी स्यूं किरायै सारू कीं उधार ले'र गांव रौ परस्थान लेस्यूं। 

    कार चाल पड़ी। जूनागढ़ कनै पूगण स्यूं पैलांईं कार झटकौ खायौ। इनै कार रुकी अर इनै म्हारी सांस। 

    वर्मा जी स्टेयरिंग संभाळ राख्यौ अर म्हूं कार नै धक्कौ देवै हो। धक्कौ देवतां-देवतां कार भौत दो'रो घर लियौ। पाळा मांय भी सगळा गाभा पसीनै स्यूं गचपच होग्या।

    घरां पूगतांईं वर्मा जी कार स्यूं उतरता बोल्या- चोखौ होयौ, इण भानै दिनुगै-दिनुगै थारी कसरत भी होयगी।

    अबै के बताऊं.... वर्मा जी नै तिनखा नीं मिलणै स्यूं बै बिच्यारा मनै किरायौ खरची उधार नीं दे सक्या। म्हूं आपरै घरां कियां पूग्यौ..... थानै होळै सी बताद्यूं..... कै सासरै आळी घड़ी अेक भाई जी नै भेंट चढा दी। जिका म्हनै म्हारै गांव तांईं पूगण मांय म्हारी मदद करी।

    भायलां रा कागद अबै भी आवै कै कदी आवौ तो सेवा रौ मौकौ जरूर देया। पण म्हैं तो आगै सारू हाथ जोड़ दिया है कै धाप्या ईं बटाऊपणै स्यूं।

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-दीनदयाल शर्मा

 

जलम : सन् 1956 में माता श्रीमती महादेवी अर पिताश्री प्रयागचंद जोशी रै घरां गांव जसाना (हनुमानगढ़, राजस्थान, भारत) में जलम।

रचनावां : सन् 1975  सूं लेखन। मूळ नाम रै साथै-साथै कई उपनामां  सूं लेखन। कविता, कहानी, व्यंग्य, नाटक अर बाल साहित्य में हिन्दी अर राजस्थानी री तीन दर्जन पोथ्यां। दो पोथ्यां अंगे्रजी अर पंजाबी में अर अनेक रचनावां दूजी भारतीय भाषावां में अनुदित।  'डॉ.प्रभाकर माचवे:सौ दृष्टिकोण' समेत 200 रै नेड़ै-तेडै़ पोथ्यां में रचनावां संकलित। पन्द्रै रेडियो नाटक आकाशवाणी  सूं प्रसारित। 

पुरस्कार अर सम्मान : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली सूं राजस्थानी निबंध पोथी  'बाळपणै री बातां' माथै राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार (2012), राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर  सूं हिन्दी बाल कथा पोथी 'चिण्टू-पिण्टू की सूझ' माथै डॉ.शम्भूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार (1988), राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर  सूं राजस्थानी नाटक पोथी 'शंखेसर रा सींग' माथै पं.जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य पुरस्कार (1998)। इणा रै अलावा कानपुर, देहरादून, इलाहाबाद, दिल्ली, कोलकाता, भीलवाड़ा, चित्तौडग़ढ़, जयपुर, पाली, चूरू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, रावतसर अर नोहर री साहित्यिक संस्थावां सूं सम्मानित अर पुरस्कृत।

नेट जगत : बीकानेर संभाग रै पैलै ब्लॉग रो गौरव मिल्यौ। आखी दुनिया रै 109 देशां  सूं जुड़ाव।

सेवा: सन् 1983  सूं  शिक्षा विभाग राजस्थान में सेवारत। सन् 2003  सूं  टाबरां रो अखबार 'टाबर टोल़ी' रा मानद साहित्य संपादक। मंच रा हास्य कवि

 

ठिकाणो : 

'टाबर टोल़ी', 

10/22 आर.एच.बी., हनुमानगढ़ जं. 

पिन कोड- 335512, राजस्थान, भारत।

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