शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

अंकिता भार्गव की कहानी - संरक्षित

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संरक्षित

बस अड्‌डे पर रूकी, काफी भीड़ थी। मैं बस से उतर कर किसी तरह रास्‍ता बनाते हुए रिक्‍शा की तरफ चल दिया। रिक्‍शा वाले को अपने घर का पता दिया और बैठ गया। रिक्‍शा आहिस्‍ता आहिस्‍ता जानी पहचानी गलियों से होते हुए चला जा रहा था पर मेरे मन की गति उसके पहियों से तेज थी। काफी समय बाद अपने घर आया था मैं, जल्‍द से जल्‍द घर पहुंच कर अम्‍मां को चौंका देना चाहता था। मुझे देख कर अम्‍मा के चेहरे पर जो रौनक आएगी उसकी कल्‍पना ही मुझे रोमांचित किए दे रही थी।

अम्‍मां को हमेशा मुझसे शिकायत रहती है कि मैं उनसे मिलने नहीं आता, जानता हूं इस शिकायत के पीछे उनका मेरे प्रति प्‍यार ही छिपा होता है, अतः इस बार मैं उनकी शिकायत दूर करने आया हूं, पूरे तीन दिन उनके साथ रहूंगा। काम की भागदौड़ से दूर सिर्फ और सिर्फ अम्‍मा के साथ वक्‍त बिताऊंगा, उनसे खूब बातें करूंगा। वैसे मेरा इरादा तो अम्‍मा बाबूजी को कुछ दिन के लिए अपने साथ ले जाने का है पर जानता हूं वो नहीं जाएंगे। इस घर से दूर वो रह ही नहीं सकते।

रिक्‍शा मेरे मोहल्‍ले में आ पहुंचा था। यहां तक आते आते जाने कितनी ही यादें ताजा हो गईं मेरे घर की ओर मुड़ते ही मुझे मेरे बचपन का एक मित्र खड़ा दिखाई दिया। मेरे मित्र ने भी मेरा खुले दिल से मेरा स्‍वागत किया। वह मुझे पहचान गया था यह जान कर मैं हर्षित हो गया।

रिक्‍शा घर के सामने रूकवा कर मैं अभी पैसे दे ही रहा था कि, “अम्‍मां ताऊजी आए हैं,” की आवाज ने मुझे चौंका दिया। यह मेरा भतीजा था जो मुझे देख अपनी दादी को सूचित करने के लिए चिल्‍लाता हुआ तेजी गली से घर के अंदर दौड़ गया। मैं तो अभी तक अपना सामान भी नहीं समेट पाया था कि अम्‍मा अपने जोड़ों के दर्द की परवाह ना करते हुए बाहर चली आईं। वह बाहें फैला कर कुछ इस तरह मेरी ओर बढीं कि मैं खुद पर काबू नहीं रख पाया और उनकी बाहों में समा गया। तब तक बाबूजी भी आ गए। मैंने आगे बढ कर उनके पैर छुए तो उन्‍होंने तीन होले होले मेरा कंधा थपथपा दिया। जानता हूं बाबूजी का सारा स्‍नेह इन्‍हीं तीन थपकियों में समाया है।

घर के सभी लोग मुझे घेर कर बैठ गए और बातें करने लगे। मैने अपना सूटकेस खोल कर सबके तोहफे निकालने शुरू किए। मेरे भतीजा भतीजी अपने अपने खिलौने देख कर खुशी से उछल पड़े और उसी समय अपने दोस्‍तों को दिखाने निकल पड़े। अम्‍मा-बाबूजी के लिए मैं साड़ी व कुर्ता पायजामा लाया था जिसे उन्‍होंने आशीर्वाद के साथ लिया। मेरे छोटे भाई व उसकी पत्‍नी ने भी अपने तोहफे एक शर्मिली सी मुस्‍कान के साथ स्‍वीकार किए।

बातों ही बातों में सोने का वक्‍त कब हो गया पता ही नहीं चला। खाना भी मैंने कुछ ज्‍यादा ही खा लिया था। एक तो खाना बना ही स्‍वादिष्‍ट था उस पर अम्‍मा इतने प्‍यार से परोसा रही कि मैं खाता ही चला गया। मेरे सोने का इंतजाम छत चौबारे में किया गया था। यहां सभी को जल्‍दी सोने की आदत है लेकिन मुझे अभी नींद नहीं आ रही थी इसलिए मैं बालकनी में चला आया और कुर्सी खींच कर वहीं बैठ गया।

रात के अंधेरे में मेरी नजर फिर से मेरे मित्र से टकरा गई। वह हमेशा की तरह अपनी जगह खड़ा अपने कर्तव्‍य का पालन कर रहा था। उसे निहारते निहारते कब मैं अपने बचपन की स्‍मृतियों में खो गया मुझे पता ही नहीं चला।

बात तब की है जब हमारी यह कालोनी शहर की पॉश कालोनी ना हो कर एक अविकसित मोहल्‍ला थी। वह स्‍थित भी शहर से काफी दूर थी। कुल जमा सात घर हुआ करते थे यहां जब हम यहां रहने आए थे। सुविधाओं के नाम पर यहां केवल एक स्‍ट्रीट लाइट ही थी जो कि वहीे रहने वाले एक इंजीनियर साहब ने अपने रसूख से लगवाई थी।

मुझे यहां आ कर बिल्‍कुल अच्‍छा नहीं लगा। अच्‍छा तो बाबूजी को भी नहीं लगा पर क्‍या करते मकान मालिक ने बार बार किराया बढा कर परेशान कर दिया और अच्‍छी जगह घर खरीदना उनके लिए आसान नहीं था। लेकिन तमाम असुविधाओं और परेशानियों के बावजूद अम्‍मा यहां आकर काफी खुश थीं और इस उजाड़ में अपनी गृहस्‍थी संवारने में जुट गईं थीं। यह मेरे लिए किसी आश्‍चर्य से कम नहीं था।

खैर परिवार के साथ मजबूरी में मैं यहां आ तो गया था मगर मैं अंदर से बेहद दुखी था क्‍योंकि उम्र में छोटा होने के कारण ना तो मैं बाबूजी की मजबूरी समझने की स्‍थिति में था और ना ही अम्‍मा की अपने घर की खुशी वाली भावना मुझे समझ आई। हां अपने मित्रगणोें का साथ छूटने का गम जरूर था। इस गम ने मेरे अंदर एक आक्रोश पैदा कर दिया था जो कि मैं उस स्‍ट्रीट लाइट के खम्‍भे़ व उसके साथ ही खड़े पीपल के पेड़ पर पत्‍थर मार कर निकाला करता था। एक दिन मुझे ऐसा करते हुए देख लिया और कान पकड़ कर मुझे खींचते हुए बाबूजी के पास ले गए। उनकी शिकायत की प्रतिक्रिया स्‍वरूप उस दिन बाबूजी की उंगलियों के निशान अपने गाल पर लिए मैं जाने कितनी देर ही तक आंसू बहाता रहा।

इसका बदला मैंने उस खम्‍भे पर और भी बड़ा पत्‍थर मार कर लिया, मगर गड़़बड़़ हो गई उस दिन पहली बार मेरा निशाना चूक गया और पत्‍थर खम्‍भे की बजाय बल्‍ब को लग गया और इंजीनियर साहब व बाबूजी की आशंका सच हो गई। छनाक की आवाज के साथ पत्‍थर बल्‍ब को तोड़ता हुआ निकल गया और अपने पीछे घुप्‍प अंधेरा छोड़ गया। मैं डर कर घर की ओर भागा किन्‍तु ज्‍यादा दूर नहीं जा पाया, जमीन पर फैले कांच का एक टुकड़ा मेरे पैर में गहरे तक गड़़ गया। उस दिन मेरा स्‍कूल का सबसे अच्‍छा निशानेबाज होने का गर्व मेरे पैर से टपकते खून और आंसुओं के साथ बह गया।

बाबूजी और इंजीनियर साहब ने तब मुझे इस पीपल के पेड़ के चबूतरे पर बैठा कर टार्च की रोशनी में किसी तरह वह कांच का टुकड़ा मेरे पैर से निकाला। मेरी उम्‍मीद के ठीक विपरीत बाबूजी ने मुझे कुछ नहीं कहा मगर वह कमी डाक्‍टर की कड़वी दवाओं और इंजैक्‍शन ने पूरी कर दी।

उस दिन के बाद मैनें उस खम्‍भे और पेड़ पर कभी पत्‍थर नहीं मारा बल्‍कि पेड़ से तो मैने दोस्‍ती कर ली। पेड़ ने ना केवल खुले दिल से मेरा स्‍वागत किया बल्‍कि मेरी जिन्‍दगी में दोस्‍तों की कमी भी पूरी कर दी। अब मेरी हर शाम उस पेड़ के नीचे बीतने लगी। जब अम्‍मा छोटे को संभालने में व्‍यस्‍त होती तो मैं पेड़ पर चढा कोई नया खेल खेल रहा होता।

वक्‍त अपनी गति से गुजरता रहा और उसके साथ ही मैं बड़ा होता गया। अब मेरी प्राथमिकताएं बदल गई थी। खेल के बजाय मेरे जीवन में पढाई ज्‍यादा अहम हो गई थी। केवल मैं ही नहीं मेरा परिवार, यहां तक कि हमारा मोहल्‍ला भी बदल गया था। अब हमारा मोहल्‍ला धीरे धीरे विकसित होता जा रहा था। इस बदलाव के बावजूद यदि कुछ नहीं बदला था तो वह था मेरे मित्र के साथ मेरा रिश्‍ता। हालांकि अब मैं उसका इकलौता मित्र नहीं रह गया था उसने और भी कई छोटे छोटे दोस्‍त बना लिए थे पर फिर भी मैं जब भी उसके पास गया उसने खुले दिल से मेरा स्‍वागत किया।

जाने कितनी ही यादें जुड़ी हैं मेरी उसके साथ। चाहे से पेड़ की आड़ में घरवालों से छुप कर सिगरेट पीना हो या फिर दोस्‍तों के साथ ताश की महफिल जमाना हो, मेरा दोस्‍त मेरी इन सभी बातों में मेरा राजदार रहा। सुबह के समय हम भाई बहन इस पेड़ के नीचे बैठ कर अपना पाठ याद किया करते थे। सच कहूं तो पढाई के समय जैसी एकाग्रता तब बनती थी वैसी मुझे आज तक महसूस नहीं हुई।

अपनी पढाई खत्‍म कर जब मैं नौकरी के लिए दिल्‍ली जा रहा था तो घर वालों के साथ साथ अपने इस मित्र से बिछड़ने का गम भी था मुझे। विदाई के समय एक बार तो मन किया कि उससे लिपट कर जी भर रो लूं पर मैं ऐसा नहीं कर पाया। अब बड़ा जो हो गया था, ऐसा बचपना कैसे कर सकता था। दिल्‍ली में रहते भी मेरे मन में अपने मित्र की याद सदा ताजा रही। अगर सच कहूं तो वहां उसकी जरूरत ज्‍यादा महसूस होती है। उस महानगर की प्रदूषण भरी हवा में सांस लेते हुए अपने मित्र की गोद में बैठ कर खाई ताजा हवा की याद अक्‍सर आ जाती है। भला ऐसी स्‍वच्‍छ हवा जो व्‍यक्‍ति को कुछ ही पलों में तरोताजा कर दे दिल्‍ली जैसे महानगर में कहां मिलती है।

सुबह के समय चिडि़यों की चहचहाट ने मुझे समय से कुछ पहले ही उठा दिया। मैं छत पर टहलने लगा। मेरी नजर फिर उस पेड़ पर जा टिकी कुछ बच्‍चे उसके आसपास खेल रहे थे। यह नजारा देख कर मुझे आनंद आ रहा था। लेकिन अनायास ही मेरा मन उदास हो गया कि शायद यह मेरी अपने मित्र से आखिरी मुलाकात हैं मेरा भाई बता रहा था कि एक बिल्‍डर उस खाली प्‍लाट को खरीद कर वहां एक बहुमंजिला शापिंग कॉम्‍प्‍लेक्‍स और नाइट क्‍लब बनाना चाहता है।

मेरा भाई खुश था कि अब अपना छोटा सा शहर भी महानगरों की तर्ज पर विकास कर रहा है। शायद और लोग भी खुश होंगे पर मैं नहीं हूं। क्‍यों भूल जाते है लोग कि हर विकास कीमत चाहता है। और मैं विकास के नाम पर अपने इस मूक दोस्‍त की बली चढाने को तैयार नहीं था। पहले तो लोग हरे भरे पेड़ों को काट कर अपने आसपास कंक्रीट का जंगल उगा लेते हैं फिर पर्यावरण बचाने के नाम पर होटलों में गोष्‍ठिया करते है। मुझे विकास की यह आधुनिक परिभाषा बड़ी अजीब लगती है।

मैं पुरातनपंथी नहीं हूं पर ऐसे तथकथित विकास का समर्थक भी नहीं हूं। मेरे ख्‍याल से तो मोहल्‍ले में किसी शापिंग कॉम्‍पलेक्‍स या नाइट क्‍लब की नहीं अपितु एक पार्क की आवश्‍यकता है जहां बच्‍चे खुली जगह और ताजा हवा में खेल सकें और बड़े सैर कर सकें। शापिंग कॉम्‍पेक्‍स और नाइट क्‍लब तो शहर में कहीं और भी बनाया जा सकता है।

किससे कहूं अपने दिल की बात, ऐसा क्‍या करूं कि मेरे दोस्‍त की जान बच जाए। मैं विचार कर ही रहा था कि मेरी पत्‍नी गरिमा का फोन आ गया। मेरी आवाज सुन कर वह जान गई कि मैं उदास हूं। उसके पूछने पर मैने बिना किसी हील हुज्‍ज्‍त के उसे सारी बात बता दी। जानता था वह भी मेरी तरह प्रकृति प्रेमी है। वह मेरा दर्द जरूर समझेगी। मैं सही था। गरिमा ने ना केवल मेरी बात को शांति से सुना अपितु मेरी समस्‍या का एक हल भी सुझा दिया। मैं नहा धो कर घर से निकल पड़ा। शाम ढले लौटा तो सफलता की मुस्‍कान मेरे अधरों पर खिली हुई थी।

जब मैं घर पहुंचा तो देखा कि सभी बड़ी ही बेचैनी से मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अम्‍मा उस समय मेरे लिए परेशान थी कि मैं आज पूरा दिन बिना कुछ भी खाए पीए कहां भटकता रहा तो बाबूजी और भाई यह जानने को आतुर थे कि मैनें वह पीपल के पेड़ वाला प्‍लाट क्‍यों खरीद लिया। सभी अपनी जिज्ञासा के चलते मुझसे तरह तरह के सवाल पूछ रहे थे पर मैं उन्‍हें कोई भी जवाब देने के बजाय बड़े ही इत्‍मीनान से कुर्सी पर पसर कर बैठा हुआ था, मैं किसी के भी सवाल का जवाब देने के मूड में नहीं था। असल में मैं किसी इंतजार कर रहा था।

कुछ ही समय गरिमा कुछ लोगों के साथ आ पहुंची। ये लोग उस संस्‍था के प्रतिनिधि थे जिनके लिए मैंने जमीन का वह टुकड़ा खरीदा था। यह संस्‍था देश भर में पेड़ों के संरक्षण के लिए कार्य कर रही थी। इन लोगों ने उस प्‍लाट पर पार्क बनाने का हमारा प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लिया था। जब हमने यह योजना घर में सबको बताई तो सभी ने हमारा समर्थन किया।

अगले कुछ दिन सच में भाग दौड़ भरे रहे। प्‍लाट के पंजीकरण की औपचारिकताएं पूरी होते ही हमने प्‍लाट की चारदिवारी बनवाने व पौधरोण का काम शुरू करवा दिया। पार्क में बच्‍चों के लिए कुछ झूले व सीसॉ भी रखवाए गए जिन्‍हें देख कर मेरे भाई के बच्‍चों के साथ साथ मोहल्ले के अन्‍य बच्‍चों के चेहरों पर भी खुशी झलक आई। अब बारी थी पार्क के नामकरण की जो सबने सर्वसम्‍मति से रखा। पार्क का नाम था 'हरियाली‘ जो कि उस संस्‍था का नाम था और उसका मूल उद्देश्‍य भी।

आखिर मेरे वापस जाने का दिन आ गया। आया था दो दिन के लिए पर दस दिन रह कर जा रहा था। फिर भी मन में एक अफसोस था कि अम्‍मा के साथ समय इस बार भी नहीं बिता सका। अम्‍मा को इस बात से कोई शिकायत नहीं थी बल्‍कि उन्‍हें इस बात की खुशी थी कि उनके बेटा बहू ने एक सार्थक काम किया। लेकिन फिर भी अम्‍मा को कोई ना कोई शिकायत तो होनी ही है और इस बार उन्‍हें पोता पोती के नहीं आने से शिकायत थी। यदि परीक्षा नहीं होती तो बच्‍चे भी जरूर आते यह बात वह जानती थीं अतः इसके लिए उन्‍होंने मुझे और गरिमा को माफ कर दिया मगर इस शर्त पर कि अगली बार हम जल्‍दी आएंगे और बच्‍चों को अपने साथ अवश्‍य लाएंगे।

सबसे विदा ले कर मैं कार में बैठ ही रहा था कि मेरी नजर मेरे मित्र पर पड़ी। उस पल उसकी पत्‍तियां हवा में कुछ अंदाज में लहराईं कि मुझे लगा मानों वह इसी का इंतजार कर रहा था, वह शायद जीवन दान के लिए हमारा शुक्रिया अदा कर रहा था। मन भर आया मेरा, मैं खुद को उसे सहलाने से रोक नहीं पाया। एक पल को लगा शायद सब मेरी इस हरकत के लिए मेरा मजाक बनाएंगे, मगर आश्‍चर्य! ऐसा कुछ नहीं हुआ। शायद अब वो लोग भी हमारे रिश्‍ते की गहराई को समझ चुके थे। खैर कार में बैठ कर मैं चल पड़ा अपनी मंजिल की ओर मन में यह तसल्‍ली लिए कि अब मेरे मित्र के जीवन पर कभी कोई संकट नहीं आएगा, अब वह पूरी तरह से संरक्षित है।

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लेखिका परिचय

नाम -- अंकिता भार्गव

पिता का नाम -- वीएलभार्गव

शिक्षा -- एम․ (लोक प्रशासन)

रूचियां -- अध्‍ययन एवं लेखन

विशेष -- अस्‍थि रोग ग्रस्‍त

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