आप इज़राइल समर्थक हैं या फ़लस्तीन समर्थक?

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आप या तो इज़राइल के समर्थक होंगे या फ़लस्तीन के.

 

परंतु आपने अपने समर्थन के बारे में गहराई से सोचा है?

 

 

 

 

 

 

(अली रिजवी)

आप “इसराइल समर्थक” हैं या “फ़लस्तीन समर्थक”? आज अभी दोपहर भी नहीं हुई है और मुझ पर दोनों होने के आरोप लग चुके हैं।

इस तरह के लेबल मुझे बहुत परेशान करते हैं क्योंकि वे सीधे इसराइल फ़लस्तीनी संघर्ष की हठधर्मी कबीलावादी प्रकृति की ओर इशारा करते हैं। अन्य देशों के बारे में तो इस तरह से बात नहीं की जाती। फिर इन्हीं देशों के बारे में क्यों? इसराइल और फ़लस्तीन दोनों के मुद्दे जटिल हैं, दोनों के इतिहास और संस्कृतियाँ विविधता से भरी हैं, और दोनों के मज़हबों में बहुत सी समानताएँ हैं, भले ही ग़ज़ब के विभाजन हों। इस मुद्दे पर दोनों में से एक पक्ष का समर्थन करना मुझे तर्कसंगत नहीं लगता।

ग़ौरतलब है कि विश्व भर में अधिकतर मुसलमान फ़लस्तीनियों का समर्थन करते हैं, और अधिकतर यहूदी इसराइल का। यूँ तो यह बात कुदरती है — पर इसमें एक समस्या भी है। इसका अर्थ यह हुआ कि मुद्दा यह नहीं है कि कौन सही है और कौन ग़लत, बल्कि यह कि आप की वफादारी किस कबीले या देश की ओर है। यानी जो फ़लस्तीनी समर्थक है वह यदि इसराइली या यहूदी परिवार में जन्मा होता तो इतनी ही शिद्दत से इसराइल का समर्थन करता, और उसके उलट भी ऐसा ही होता। मतलब, जिन सिद्धांतों के आधार पर लोग इस झगड़े पर अपनी राय बनाते हैं वे सिद्धांत अधिकतर जन्म के संयोग पर आधारित हैं। और हम मध्य पूर्व के इस पचड़े के विभिन्न पहलुओं पर कितना भी दिमाग़ लगाएँ, कितना भी विश्लेषण करें, आखिरकार यह एक मूलतः कबाइली संघर्ष ही रहेगा।

पारिभाषिक रूप से, कबाइली संघर्ष तभी फलते फूलते हैं जब लोग पक्ष या पाले चुनते हैं। लोगों का पाले चुनना इस तरह के झगड़ों में आग में घी की तरह काम करता है और ध्रुवीकरण को और गहरा करता है। सब से बुरी बात यह है कि आप के पाले चुनने से आपके हाथ खून में रंग जाते हैं।

इसलिए इसराइल-फ़लस्तीन के इस नवीनतम संघर्ष में पाला चुनने से पहले इन सात प्रश्नों पर ध्यान दीजिए :

 

मध्य पूर्व के तनाज़े में पाला चुनने से पहले 7 सवाल (हिंदी अनुवाद पूरा पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

मूल अंग्रेज़ी लेख7 Things to Consider Before Choosing Sides in the Middle East Conflict
लेखकअली अमजद रिज़वी, अनुवादक – रमण कौल


[इसराइल-फ़लस्तीन मुद्दे पर हम सभी अपना अपना पाला चुनते हैं। इस मुद्दे पर संतुलित विचार बहुत कम मिलते हैं। अली रिज़वी, जो एक पाकिस्तानी मूल के कनैडियन लेखक-डॉक्टर-संगीतज्ञ हैं, का यह लेख इस कमी को बहुत हद तक पूरा करता है। लेखक की अनुमति से  रमण कौन ने मूल लेख को यहाँ अनूदित किया है।]

 

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