शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

शैलेन्द्र नाथ कौल की कहानी - ढलती शाम के साये

ढलती शाम के साये

 

(उत्तर प्रदेश, हिन्दी संस्थान की त्रैमासिक पत्रिका ''साहित्य भारती''

के जुलाई-सितम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)

शैलेन्द्र नाथ कौल

 

आज चौथे दिन का शान्ति हवन था । माहौल में एक अजीब सी सुगबुगाहट थी । लगता नहीं था कि मधुसूदन मरा है अपनी मौत । दुर्घटना ऐसी नहीं होती । छब्बीस के दिल वाला बासठ साल का मेरे भाई जैसा दोस्त मधुसूदन क्या इतना मूर्ख हो सकता है कि टेन की पटरी पर प्रातः भ्रमण करेगा और लोगों के लाख चिल्लाने पर भी नहीं हटेगा ? जो लोग वहाँ थे और जिन्होने उसे पटरी पर जाते, फिर टुकड़ों  में बदलते देखा उनका कहना यही है कि टेन ने कई बार सीटी भी दी थी । इसीलिए ऐसा लगता है कि वह जान बूझ कर पटरी से नहीं हटा । नहीं कभी नहीं मधुसूदन ऐसा स्वयं नहीं कर सकता । जरुर उससे ऐसा करवाया गया था  मानसिक दबाव बनाकर । क्षत-विक्षत शरीर को सीधे अस्पताल से क्रियाकर्म के लिए विद्युत शवदाह ग्रह ले जाया गया था । अधिकांश लोगों में साहस ही नहीं था कि वह उसका चेहरा देखने का प्रयास करते । ढके शरीर पर फूल चढ़ा दिये । मैंने देखा हिम्मत करके । होंठ बन्द थे लेकिन कह रहे हों जैसे - ''मुझे माफ़ करना  रघुनन्दन मैं  तुम्हारा साथ छोड़ रहा हूँ ।'' मुझे ऐसा क्यों लगा मुझसे कुछ छुपाया था उसने ?  अनेक सवाल हैं जो तैर रहे हैं कुछ घर की हवाओं में कुछ मेरे दिमाग़ में ।

 

छः महीने पहले ही तो राधा, उसकी पत्नी, कैंसर झेल कर गयी थी और अब यह चल दिया । उसका डाक्टर बेटा विवेक कहीं से हिला हुआ नहीं दिख रहा था । ठीक है कि डॉक्टरों का दिल बीमार मरीज़ों को तड़पते और अक्सर मरते देखते कड़ा हो जाता है । भावनायें जड़ हो जाती हैं । लेकिन मधुसूदन न बीमार था, न उसका मरीज़ । उसका अपना बाप था । उसकी रग-रग में उसका लहू दौड़ रहा था । लेकिन उसका चेहरा इतना सपाट कि लाख चाहने पर भी आप दुख की रेखा नहीं ढूँढ सकते थे । आँखों में अवसाद के स्थान पर एक बेचैनी अवश्य मुखर होती थी छुपने के प्रयास के बावजूद । और रागिनी उसकी पत्नी तो ऐसे मशीनी प्रक्रिया से लोगों को विदा कर रही थी जैसे कन्वेयर बेल्ट से डिब्बे ढकेले जा रहे हों ।

 

मौन अभिवादन के बाद औरों के साथ मैं भी बाहर आ गया परन्तु एक पग भी आगे बढ़ाना कठिन लग रहा था । मैं क्या करुँ ? पुलिस ने इतनी सरलता से आत्महत्या का मामला क्यों मान लिया ? आत्महत्या का कारण जानने का प्रयास इन चार दिनों में क्यों नहीं किया गया ? इसके बावजूद कि कोई सुसाइड नोट उसके पास से नहीं मिला था ।

 

पुलिस भी किसी हद तक मजबूर है और शायद पोस्टमार्टम करने वाला डाक्टर भी । दुर्घटना के बाद वायुयान का ब्लैक बॉक्स तो डीकोड करने पर अनेकों जानकारियाँ देता है और बता देता है कि कॉकपिट में क्या घट रहा था हज़ारों फ़िट की उँचाई पर जिससे भविष्य में आवश्यक सावधानियाँ बरती जा सकें । परन्तु मनुष्य के शरीर का ब्लैक बाक्स यानि उसका मस्तिष्क, मधुसूदन जैसी दुर्घटनाओं के बाद, डीकोड किया जा सके अभी विज्ञान ने इतनी उन्नति नहीं की है । मुझे सच पता लगाना ही चाहिए इसी विचार के साथ वापस लौटना आवश्यक सा लगा । दरवाज़ा खुला ही था और अन्दर लॉबी में नौकर गद्दे और चादरें जो हवन में लोगों के बैठने के लिए बिछाई गयीं थीं उठा रहे थे ।

 

विवेक के सामने पड़ते ही मैंने शान्त स्वर में इच्छा ज़ाहिर की - ''मैं कुछ देर अपने दोस्त के कमरे में बैठना चाहता हूँ, अकेले ।''

 

चौंक से पड़े दोनों और आश्चर्य से निगाहों का आदान प्रदान भी किया । शायद इन्कार का कोई कारण समझ में न आने के कारण ही विवेक को कहना पड़ा - ''श्योर'' । विवेक ने इशारा किया उन सीढ़ियों की ओर जो लॉबी से उपर कमरे की ओर जाती थीें ।

 

मैं सीढ़ियाँ चढ़ता हूँ और दरवाज़ा खोल कर कमरे में आ जाता हूँ । मधुसूदन का कमरा मेरे लिए कोई नया नहीं था । कमरे में कोई आया हो या किसी वस्तु को पिछले चार दिनों में किसी ने छुआ हो ऐसा लग नहीं रहा था । सब कुछ वैसा ही था जैसा उस दर्दनाक दिन के ठीक दो दिन पहले मैं छोड़ कर गया था । मधुसूदन के ठहाकों की आवाज़ें परदों के पीछे छुपती सी प्रतीत हो रही थीं । उसके दिलफेंक रंगीन विचारों और सपनों के बादल उन पुस्तकों की पक्तिंयों के पीछे से झांक रहे थे जो उसकी सहचरी थीं । जो विचित्र था वह यह कि मेज़ पर राइटिंग पैड समतल नहीं कुछ उठा हुआ दिख रहा था जैसे किसी चीज़ पर टिका हो । उसे उठाते ही एक नीले रंग की डायरी दिखी जिसके कारण राइटिंग पैड को उँचाई मिल रही थी । मधुसूदन डायरी लिखता है यह बात उसने कभी नहीं कही ? पुलिस ने कमरे की कोई छान बीन क्यों नहीं की ? या करने ही नहीं दी गयी ? अगर छान बीन होती तो क्या यह डायरी यहाँ होती ? सवाल फिर दौड़ने लगे ।

 

एक बार तो हिम्मत नहीं हुई उसे छूने की । फिर दिल कड़ा कर डायरी उठा ली  जल्दी से । पैंट में पीछे की तरफ़ खोंस ली और कोट ठीक किया । चेहरा हाथों में लिए डायरी के पन्नों में क्या हो सकता है इसका अनुमान लगाने का असफल प्रयास करने लगता हूँ । कुछ समझ में नहीं आता । कुछ देर शान्त बैठने के पश्चात नीचे आता हूँ और एक बार फिर विवेक से बिदा ले चल देता हूँ । क़दम उस पार्क की ओर यकायक बढ़ जाते हैं जहाँ दुर्घटना के एक दिन पूर्व सायंकाल हम दोनों बेंच पर बैठे थे ।

 

सर्दियों में रात जल्दी घिरती है अतः शाम की सैर भी जल्दी ही निपटानी पड़ती आज कल के मौसम में । मौसम कोई हो हम दोनों के पार्क पहुँचने में एक दो मिनट का ही अन्तर हुआ करता । कभी मैं पहले कभी मधुसूदन पहले । यह तय था कि गेट पर ही इन्तज़ार करेंगे एक दूसरे का और अन्दर साथ ही चलेंगे । निगाहें मिलते ही कि उसका ठहाका लगता एक हल्की सी ताली के साथ - ''अरे भाई वाह, क्या ख़ूब मिले ।'' आज मधुसूदन नहीं है यह संदेश पैरों को अभी मस्तिष्क से नहीं मिला था या आदत के वशीभूत ठिठक गए गेट पर । पैरों ने अपनी भूल सुधारी और हौले से आगे बढ़े । होंठ भी हिले बे आवाज़ - ''मिलते क्यों नहीं, मिलना तो तय कर चुके हम लोग एक बार ही नहीं कई बार ।''

 

प्रतिदिन की इस औपचारिकता के बाद दोनों पार्क में प्रवेश करते, बतियाते, टहलते फिर बैठते फिर टहलते फिर बैठते । बतकही चलती रहती । लगभग एक घन्टे से अधिक का यह कार्यक्रम ताज़ा समाचारों से ज़्यादा पुराने किस्सों से भरा होता । पक्का रोमान्टिक था मधुसूदन और रोज़ कोई न कोई चटखा़रे दार किस्सा निकाल ही लाता । आज कोई औपचारिकता नहीं निभी न उसके ठहाके की न मेरे उत्तर की । निर्जीव बेंच मधुसूदन के बैठते ही सजीव और गर्म सी हो उठती थी । आज निर्जीव और ठन्डी ही रही एक मौन शोक में घिरी । चार दिन बाद अकेला बैठा हूँ मैं उसी बेंच पर । हाथों से दोनों ओर बेंच छूता हूँ - ''अकेले ही बैठना पड़ेगा अब तो ।'' मैं चौंक कर उठ जाता हूँ और कोट में पीछे खुंसी डायरी निकाल कर बैंच पर इस एहसास के साथ रखता हूँ कि डायरी नहीं बल्कि मधसूदन है मेरे पास ।

 

मुझ से कुछ ही महीने बड़ा होगा । उसने राधा के गिरते स्वास्थ्य के कारण साठ पूरा होने से दो साल पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी और मैं पूरा साठ होने ही पर मुक्त हुआ ।

 

उस आख़िरी मुलाक़ात में मधुसूदन ने यकायक पूछा - ''यार रघ्धू तुम सपने देखते हो ?''

 

रघुनाथ की जगह अगर वह मुझे रघ्धू कह रहा है और वह भी सपनों की बात करते हुए इसका मतलब मामला कुछ ज़्यादा रोमांटिक है जो अवश्य इस वय में ज़िन्दगी कुछ ज़्यादा साल चला सकता है वरना मन को अगर बुढ़ापे ने घेरा तो शरीर हिचकोले लेने लगता है । जैसा हम लोेगों के पास हुआ करता था अपने माँ-बाप के लिए वैसा समय अब बच्चों के पास तो है नहीं सो शरीर की गाड़ी को मेकैनिक के पास ले जाते ले जाते उनके पसीने छूटने लगते हैं और अल्टीमेटली वह सोंचने लगते हैं, आप लोग भी कितना परेशान करते हो । मतलब यही होता है - आप का काम ख़तम हो गया है अब उपर जाओ तो हम चैन से रहें ।

 

मैंने कोई जवाब नहीं दिया तो छड़ी की मूठ कमर में लगाते हुए बोला - ''क्या सोंचने लगे भाई ?''

 

मैंने भी उसके नाम को छोटा करते हुए कहा - ''मधु तुमने जो सपने की बात कही तो भई जवानी याद आ गयी और मैं वह सोंचने लगा जो पहले सोंचा करता था उसके बारे में ।''

 

''किसके बारे में ?'' मधु मुस्कुराये एक भेदी मुस्कान ।

 

''यार तुम्हारे दिमाग़ इधर उधर की ख़ुराफ़ात जल्दी आती है । मैं तो अपनी बीबी के बारे में सोंचने लगा था कि जब हम दोनों जवान थे ।''

 

''धत्, जवानी की सोचोगे और वह भी बीबी के बारे में तो यह भी कोई सपना हुआ ? सोचो तो कुछ रंगीन सोचो, कुछ रंगीन अरमान सपनों में ही पूरे करो ।''

 

''अच्छा तो तुम बताओ तो तुमने कौन सा सपना देखा ?''

 

''सपना नहीं हक़ीक़त यार । एक अरमान जो सपने में हुआ करता था और सचमुच हक़ीक़त में बदल गया ।'' मैं समझ रहा था कि मधुसूदन कोई पुरानी स्टोरी सुनाने के लिए माहौल बना कर मेरी उत्सुकता बढ़ाना चाहता है।

 

''अच्छा, तो क्या था वह अरमान या सपना जो सच हुआ और आज उसकी याद क्यों आ रही है ?''

 

''नहीं रघ्घू बात तो पुरानी है नौकरी के ज़माने की लेकिन न जाने क्यों कल रात टुकड़ों-टुकड़ों में सपने में आ गयी । कुछ झुरझुरी सी आयी अपने बेतुके अरमान पर । फिर उसके सच होने को लेकर बनने वाली परिस्थितियाँ फिर से सिहरा गईं । तक़दीर अच्छी थी कि फ़ज़ीहत नहीं हुई ।''

 

मुझे कुछ उलझन होने लगी थी इस रहस्यभरी कथा पर जो शुरु नहीं हो रही थी और परदे ऐसे उठा रही थी जैसे कोई बड़ा जादू होने जा रहा हो ।  कॉलोनी के अन्य लोग जो टहलना समाप्त कर जाने की सोंच रहे थे हम दोनों को देखकर हंसते निकल गए बिना डिस्टर्ब किए ।  उन लोगों की हम दोनों से अधिक ट्यूनिंग नहीं थी सो अलग ही रहते थे ।

 

''कुछ बोलोगे भी कि बस सस्पैंस में खींचते चले जा रहे हो ।''

 

''खींच नहीं रहा हूँ मैं तो उन लमहों को फिर से जी रहा हूँ जिन से मैं उन तीन दिनों में गुज़रा । गुज़र तो गया लेकिन कान पकड़े और तौबा की कि ऐसा अरमान कभी न पालूंगा ।''

 

''क्यों ?''

 

''कयों कि अरमान सच होने पर बहुत ख़तरनाक भी हो सकता था राधा की वजह से ।''

 

''अब यह राधा भाभी बीच में कहाँ से आ गयीं ?''

 

''राधा भाभी बीच में नहीं आयीं । बीच में तो वह आयी अरमानों वाली ।''

 

''तुम अपनी बात खुल कर कहो वरना मैं चला ।''

 

''अरे ऐसी भी क्या जल्दी है । अगर तुमसे नहीं खुलूँगा तो मुझे चैन कैसे आएगा ।''

 

''अच्छा, चलो सुनाओ ।''

 

''हाँ, यह हुई न कोई बात । तो सुनो । '' वह सुना रहा था और मैं सुन रहा था । सिर्फ़ चार दिन पुराने शब्द बटोर रहा हूँ - ''मेरा एक सपना हुआ करता था कि .... तुम इसे अरमान भी कह सकते हो कि मेरी भी एक ख़ूबसूरत सी बॉस हो । जो करीने से साड़ी पहन कर लम्बा पल्ला हिलाती हुई, हाथ में पर्स और होठों पर हल्की लिपिस्टिक के साथ मन्द मुस्कान लिए आफ़िस आए और अपने कमरे में जाते हुए मेरी ओर देखते हुए कहे - मधुसूदन जी ज़रा कमरे में आयें। और मैं पहले ही इस निमन्त्रण के लिए तैयार जल्दी से कहूँ - जी मैडम अभी आया । फिर कमरे में मैं और वह दोनों अकेले बैठ कर सुबह की चाय पीयें । चाय तो बस बहाना हो बस वह मुझे देखे, देखती रहे और  कहे - मधुसूदन जी आप जैसा सिंिन्सयर और लैबोरियस मैंने नहीं देखा । सरकारी ऑफिस में तो लोग काम ही नहीं करना चाहते हैं और आप सिर्फ़ अपने काम में लगे रहते हैं । इस तारीफ़ के जवाब में मेरे शब्द खो जायें । बस मैं मुस्कुराउँ और धीमे से कहूँ - '' थैंक्यू मैडम ।''

 

''तो क्या तुम वास्तव में सिन्सियर और लैबोरियस हुआ करते थे ?'' - मैंने चुटकी ली थी तो मधुसूदन बिफर पड़ा था - ''अजीब मज़ाक है मैं आपको सपनों के बादलों पर सैर करा रहा हूँ और आप हैं कि उसमें छेद किये दे रहे हैं ।''

 

मैं ठहाका लगा कर हँसा तो मधुसूदन और पिनक गया - ''जाइए मुझे कोई बात नहीं करनी । चलिए घर चलिए, सपना मेरा था आया मेरे दिमाग़ में तो भला आपको क्यों दिलचस्पी होने लगी ? आप बस छेद ढूंढिये कि कैसे मधु को गिराया जाए ।''

 

मैंने तुरन्त आत्मसर्मपण कर दिया था - ''मेरा यह मतलब नहीं था । आई एम रिअली सॉरी । मैं पूरा सीरियस होता हूँ । आप अपनी पूरी बात सुनायें । मैं पूरे ध्यान से सुनूंगा और कोई मज़ाक नहीं करुँगा । यह मेरा वादा है, पक्का ।''

 

वह थोड़ा शान्त हुआ था और मुस्कुराया । फिर तीन चार साल पुरानी घटनाओं को पूरे रोमान्टिक मूड में सुनाने लगा । कैसे दिल्ली से उसकी एक टिपटाप लेडी ऑफिसर तीन दिन के लिए टूर पर लखनउ आई थी । और वह सपनों वाली से कुछ ज्यादा ही सुन्दर और स्मार्ट थी । ऑफ़िस के काम के बाद उसने उसे शहर भी घुमाया और शापिंग भी करायी जो औरतों की कमज़ोरी मानी जाती है । परेशानी का सबब यह कि उसने कहा कि वह ऐतिहासिक इमारतें देखना चाहती है और उसे लेकर वह कई जगहों पर घूमा डरते-डरते । डरते इसलिए क्यों कि अभी अपना शहर इतना माडर्न नहीं हुआ है जो एक सीधे से दिखने वाले अधेड़ को एक स्मार्ट लेडी के साथ रेज़ीडेन्सी के लान पर टहलते बिना हिचकी लिए हज़म करले । जब राधा तक उसकी इस तीन दिवसीय रोमान्टिक भ्रमण कहानी का विवरण कई महीने तक नहीं पहुँचा और कोई प्रश्न नहीं पूछे गए तो उसने निश्चिन्तिता की सांस ली । यह प्रण भी किया कि अब कभी ऐसा सपना नहीं देखूँगा जिसके सच होने पर पारिवारिक उथल पुथल की लेशमात्र भी आशंका हो ।

 

नीली डायरी पास में बेंच पर है । मैं डायरी की ओर देखता हूँ - ''यह क्या कर दिया तुमने मधुसूदन ? कुछ तो इशारा किया होता कि क्या गुज़र रही है तुम्हारे उपर ? क्या चल रहा है तुम्हारे अन्दर ? भनक भी न लगने दी तूफ़ान की । कमी शायद मेरी ही थी । मैं ही दिल के तारों को जोड़ने में नाकाम रहा शायद । कहते हैं कि प्यार ताक़त भी है और कमज़ोरी भी । तुमने तो जी भर प्यार किया फिर क्यों कमज़ोर हो गए ?''

 

डायरी उठा कर फिर पैंट में पीछे खोंस कर कोट के नीचे पूरी तरह छुपा बाज़ार की तरफ़ निकलता हूँ । रौशनियों में बहुत अंधेरा है आज । कंधों पर अधिक बोझ उठाने से भूख लगती है और दिमाग़ पर अधिक बोझ उठाने से भूख मर जाती है । आज मेरी भूख भी मर गयी है ।

 

मालती अपने बीमार भाई को देखने झांसी गई हुई है । मैं अकेला ही हूँ और चार दिनों से यह अकेला पन मालती के न होने से अधिक कचोट रहा है । घर का ताला खोला और बिना लाइट जलाए ही कुर्सी पर बैठने की कोशिश में गिर सा पड़ता हूँ । कब आँख लगी पता ही नहीं चला । जब आँख खुली तो सुबह की ठंडक से कंपकंपी सी लगी और पलंग से कम्बल घसीट लिया हाथ बढ़ा कर । एक और झपकी के बाद जब चिड़ियों और कौओं की आवाज़ों से आँख खुली तो आठ बज रहे थे । सेवानिवृत्त निठल्लों के लिए हर समय सबेरा हर समय रात । पेट में कुछ कमी महसूस हुई तो ध्यान आया कि रात में मैंने कुछ खाया नहीं था । मालती झगड़ती है फिर भी खाने को तो पूछती ही है । अगर वह होती तो मैं बिना कुछ खाए नहीं सोता ।  मधुसूदन से झगड़ने वाली और खाना पूछने वाली चली गयी थी इसीलिए वह अकेला हो गया था ।

 

चाय और ब्रेड का नाश्ता करने के बाद नीली डायरी की ओर देखता हूँ जो पास ही पलंग पर बड़ी लापरवाही से डाल दी गई थी रात में । उसे उठा माथे से लगा अपने दोस्त से क्षमा मांगता हूँ ।

 

कवर पलटते ही आश्चर्य हुआ कि नयेपन की चमक तो थी परन्तु डायरी थी सात वर्ष पुरानी किसी सीमा टेवेल ऐजेन्सी की । इसका सीधा अर्थ यह है कि मधुसूदन को डायरी किसी ने वर्षों पूर्व भेंट में दी और वह चूंकि डायरी लिखने का आदी नहीं था इसलिए कोरी ही पड़ी रही । इतने सालों बाद उसने इसका प्रयोग किया । दिनांक के अनुसार कहीं कुछ नहीं हो सकता था यह निश्चित ही था । प्रारम्भ के कुछ खाली पृष्ठों के बाद संख्या में एक लिख कर जो लिखा था उससे स्पष्ट हो रहा था कि डायरी का प्रयोग मधुसूदन ने अपनी पत्नी राधा की मृत्यु के कुछ दिनों पूर्व ही प्रारम्भ किया ।

 

''1. रिटायरमेन्ट की फेअरवेल में पाँच लोग थे जिनका आर्डर एक साथ आया था । काफ़ी भीड़ थी पार्टी में । जी0एम0 ने बड़ी चुभने वाली परन्तु वास्वविकता से भरी बात कही । मैंने भी उनकी सलाह मानते हुए रिटायरमेन्ट पर मिले सब पैसे अपने नाम पर जमा कराये और तुम्हे नॉमिनी बनाया था । दुर्भाग्य से तुम पहले जाती लगती हो । अब मैं क्या करुँ ? पैसे बचे भी बहुत कम हैं । और होते भी तो तुम्हारा कष्ट मुझे तुमसे ज़्यादा असहनीय लग रहा है । दिल कहता है तुम्हे कष्टों से राहत मिले । ऐसा मैं थक कर या परेशान होकर नहीं बल्कि प्यार वश कह रहा हूँ । हम जिसे प्यार करते हैं उसे कष्ट में नहीं देख सकते । उसके कष्ट निवारण के लिए वह सब करते और भगवान से मांगते हैं जो उसके भले का हो । भले अपने लिए कितना भी कष्टप्रद क्यों न हो । तुम्हारे जाने के बाद मेरी कौन सुनेगा ? मैं करुँगा भी क्या तुम्हारे बिना ? कोई काम ही नहीं रह जाएगा ।''

 

टूटन छः महीने पहले प्रारम्भ हो गयी थी और मुझे कोई आभास नहीं मिला । यह मधुसूदन के दिल की गहराई थी जहाँ उसने किसी को जाने नहीं दिया । वह निराश और अकेला था । डायरी बन्द कर देता हूँ । किस तरह लोग अकेले हो जाते हैं पता ही नहीं चलता ? सार्त्र ने कहा था - ''निराशा के अन्तिम कगार पर खड़े होकर आदमी फिर से जीना शुरु कर देता है ।'' मधुसूदन ने जीने से इन्कार क्यों कर दिया ? यह प्रश्न उद्वेलित करता है । जीने का मक़सद नहीं रह गया था उसके पास । डायरी फिर उठाता हूँ । दो-तीन पेज खाली हैं फिर उसी प्रकार संख्या में क्रमांक दो डाल कर जो लिखा है वह स्पष्ट रुप से घटनाक्रम को आगे बढ़ाता सा लगता है ।

 

''2. तुम चली गयीं । अच्छा ही हुआ । जहाँ हो चैन से तो हो । यहाँ ख़ाली है सब । जेब भी और दिल भी । विवेक कुछ समझना ही नहीं चाहता और तुम्हारी लाडली बहू उसके लिए मैं कुछ नहीं कह सकता । जब अपना सिक्का खोटा हो तो दूसरे को क्या कह सकते हैं ? उन्हे पैसे चाहिए अपना क्लीनिक रिनोवेट करने के लिए । मैं कहाँ से दूँ जब हैं ही नहीं । जब तब खींचा तानी चलती रहती है । रघू के साथ शाम को घूमने चला जाता हूँ । वह किस्मत वाला है कि मालती है उसके साथ है । वैसे मेरा बहुत साथ देता है । बस उसी का सहारा है ।''

 

तुम जो यह आँसू लाये हो मेरी आँखों में उन्हे रोकेगा कौन ? ऐसे अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की कमी नहीं है जो बिना ग्लिीसरीन के भावनात्मक दृश्यों में आँसुओं से लबालब भरी आँखों से नक़ली सीन करते हैं । मेरे आँसू भी असली हैं और यह ज़िन्दगी का सीन भी असली है। धोखा तुमने दिया, मैंने नहीं । साथ तुमने छोड़ा, मैंने नहीं । कमज़ोर तुम हुए, मैं नहीं । अपना अकेलापन दूर करने के लिए दूसरों को अकेला छोड़ना कायरता है । तुमने कायरता का रास्ता चुना । लेकिन नहीं सारा दोष मेरा है कि तुम कितने अकेले हो यह मैं समझ नहीं सका । मैं ज़ोर-ज़ोर से बोलने नहीं बल्कि बड़बड़ाने लगता हूँ ।

 

मैं दार्शनिक हो जाता हूँ थोड़ी देर के लिए । दार्शनिक शब्द अगर भारी भरकम लगता हो तो आप मुझे एक डरपोक बुज़दिल मान लीजिए अपनी संतुष्टि के लिए । लेकिन मेरे प्रश्न का उत्तर ढूंढे पूरे दायित्व के साथ ।

 

व्यक्ति को परिवार में ही अकेला बनाने के लिए जो तलवारें खचाखच चल रही हैं उनकी मार से बिखरी लाशों को कौन उठायेगा ? यह प्रश्न मैं उठा रहा हूँ पूरे होशो हवास में क्यों कि मैं अकेला होने से डरता हूँ और मधुसूदन नहीं बनना चाहता ।

 

क्रमांक तीन पर जो लिखा है वह अन्तिम है । इति है । एक, दो, तीन पर दौड़ शुरु नहीं समाप्त हो गयी । मधुसूदन की दौड़ । उसकी ज़िन्दगी की दौड़ ।

 

''3. राधा कल ज़्यादा ही हाय-हाय हो गई । सहन किसके लिए करुँ ? जीने का कोई मक़सद तो हो ? जल्दी ही तुम्हारे पास पहुँच जाउँगा तब बैठ कर बातें कर लेंगे । लिख इसलिए रहा हूँ कि अगर रघू को पता चले तो वह शायद कुछ कर सकता है । शायद इसलिए कि अगर उसे पता चले तब ही तो । वह उतना भोंदू है नहीं जितना मैं उसे समझता हूँ । वैसे भी हम कितना समझ पाते हैं एक दूसरे को ।''

 

मन तो कर रहा है कि गाली दूँ तुझे जी भर, पर दूँगा नहीं क्यों कि तू सुनने के लिए है जो नहीं । ख़ुशी है तो बस इस बात की कि भोंदू तुने मुझे भोंदू नहीं माना । तू यह जानता था कि मैं तेरी मौत को दुर्घटना नहीं मानूंगा । तू यह जानता था कि मैं तेरे जिन्दगी के प्रति लगाव को जानता हूँ । तू यह जानता था कि मैं जानता हूँ कि तू मरना नहीं चाहता । तू यह जानता था कि तू उन्हे सीख देना चाहता है जिन्हे तू बेहद प्यार करता है । तू यह जानता था कि तेरा यह काम मैं ही कर सकता हूँ । तेरा शुक्रिया कि तूने मुझ पर विश्वास किया । तेरे विश्वास का आदर तो करना ही होगा । तेरा दिया काम तो पूरा करना ही होगा । मगर सीख देने का ढंग तूने ग़लत चुना ।

 

गुनहगार अगर दिल से, मन से पश्चाताप करले तो गुनाह माफ़ हो जाता है । ऐसा कहते हैं लोग और कहते हैं तो ठीक ही होगा । क्रमांक तीन पर लिखे वाक्यों को लाल पेन से अंडरलाइन करके डायरी विवेक को वापस कर दी है । पिता की लिखावट को पहचानने में किसी भी पुत्र को कठिनाई नहीं होनी चाहिए ।

 

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(शैलेन्द्र नाथ कौल)

11,बसन्त विहार

(निकट सेन्ट मेरी इन्टर कालेज)

सेक्टर-14, इन्दिरा नगर, लखनउ-226016

2 blogger-facebook:

  1. बहुत ही उम्दा कहानी , लेकिन किसी भी गुनाह की सज़ा आत्महत्या तो कतई नही ..

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