शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

वीरेंद्र ‘सरल’ का व्यंग्य - मूर्तियों की पीड़ा

मूर्तियों की पीड़ा


वीरेन्द्र 'सरल'
    शहर के विभिन्न चौक-चौराहों पर स्थापित मूर्तियों की एक दिन अपातकालीन मीटिंग हुई। रात का समय था, चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। वे जिस हाल में बैठकर मीटिंग कर रहे थे वह रौशनी से जगमगा रहा था पर सबके चेहरे बुझे हुये थे। एक मूर्ति के होंठों पर मुस्कुराहट के हल्के ट्यूबलाइट जल रहे थे जिसे देख दूसरी मूर्ति ने गुस्से में कहा-''आपकी तो आदत ही है हर बात को मजाक में लेना, कभी तो गंभीर होकर कुछ सोचा कीजिये। आज जब हम संकट में हैं, हमें अपनी जगह से बेदखल करने की साजिश चल रही है और हम इस गंभीर मुद्दे पर चर्चा करने के लिये यहाँ बैठक कर रहे हैं तब भी मुस्कुराना निहायत बेवकूफी नहीं तो क्या है?
    मुस्कुराती हुई मूर्ति ने अपने आदत के अनुसार मुस्कुराते हुये ही जवाब दिया-''मैं आपकी छटपछाहट समझ रहा हूँ। अभी कुछ दिन पहले अखबार में एक समाचार छपा था कि चौक-चौराहों पर स्थापित मूर्तियों के कारण सड़क दुर्घटना में इजाफा हो रहा है अतः उन मूर्तियों को वहाँ से हटाकर कहीं कोने में स्थापित करना चाहिये। ये सब पढ़कर अध्यक्ष होने के नाते आपने तुरन्त यह मीटिंग बुला ली, है ना? फिर उसने गंभीर होते हुये कहा-''भई! जब आप किसी के राह में रोड़ा बनेंगें तो लोग आपको रास्ते से हटायेंगे ही, इसमें दुखी होने जैसी कौन सी नई बात है? अभी आप मेरी जरा सी मुस्कुराहट पर क्रुद्ध हो रहे थे। आप ये क्यों नहीं सोचते कि हम सब चौक-चौराहों पर  स्थापित रहकर रात-दिन मुस्कुराते रहते हैं तो लोगों को क्या अच्छा लगता होगा? अरे! देश की दशा देखकर हम तो वहाँ रो भी नहीं सकते। दिल में दर्द छिपाकर मुस्कुराना पड़ता है। इससे से तो अच्छा है हटाने दो हमें, किसी कोने में स्थापित होकर कम-से-कम जी भरकर रो तो सकेंगे। अब हमारे पास रोने के सिवाय बचा ही क्या है? करने दो सबको मनमानी।
अध्यक्ष मूर्ति ने व्यंग्य से मुस्कुराते हुये कहा-''अच्छा! यही दिन देखने के लिये हमने सीने पर गोलियाँ खाई थी। फाँसी के फंदे पर हँसते-हँसते झूले थे, अपना खून-पसीना बहाया था और अपने जीवन की कुर्बानी दी थी कि अपने ही देश में हमें स्थापित रहने के लिये जगह भी ना मिले। क्या सड़क दुर्घटनायें केवल हमारे स्थापित होने के कारण ही होती है। लोग नशे में, मोबाइल पर बात करते हुये लापरवाहीपूर्वक, ओव्हरलोडिंग गाड़ियां चलाते हैं, ये सब दुर्घटना के कारण नहीं हैं? जब हमें वहाँ स्थापित किया गया था तब वहाँ कितनी खाली जगह थी। सुरम्य वातावरण था। हरे-भरे पेड़ थे। कितने लोग आज वहाँ अवैध कब्जा करके बैठे हैं। उन्हें क्यों नहीं हटाया जाता। क्या इसलिये कि वे रसूखदार हैं, उनकी ऊँची पहुँच है, वे मालदार हैं? बेचारे निरीह पेड़ काटकर फेक दिये गये और अब हमारी बारी आ गई। मगर हम अपनी जगह से हटने वाले नहीं हैं। हम लड़ेंगे अपने अधिकारों के लिये, समझे आप?
    मुस्कुराने वाली मूर्ति ने उसे समझाने वाले अंदाज में कहा-''आप बार-बार स्थापित होने की बात कहकर अपने आप को झूठी तसल्ली दे रहे हैं। जरा ठंडे दिमाग से सोचिये कि आप आखिर कहाँ स्थापित हैं? कहाँ है आपकी नीतियाँ, आपके आदर्श, आपके विचार, आपके स्वप्न  आपके लक्ष्य और आपके सिद्धांत जिसके लिये आप बलिदान हुये थे। ये लोग तो बहुत पहले से ही हमें अपने रास्ते से हटा चुके हैं। हमारी तस्वीरों को फ्रेम में मढ़वाकर टांग दिये है अपने कार्यालयों के दीवारों पर, रखवा दिये है हमारी मूर्ति बनवाकर चौक-चौराहों पर। कितने लोगों का ध्यान जाता है मूर्तियों के आस-पास की गंदगी पर। बहुत हुआ तो करवा दिये सफाई जयंती के दिन या साल में एकआध बार और। पहना दिये एक-दो फूलों की माला। जोड़ लिये हाथ दुनिया को दिखाने के लिये, झुका दिये क्षण भर के लिये सिर हमें खुश करने के लिये। इन बातों को आखिर आप लोग कब समझेंगें? यदि इनकी श्रद्धा हम पर सचमुच इतनी ही होती तो इतने घोटाले नहीं होते देश में, इतनी असमानता नहीं होती समाज में। अरे! इतनी पीड़ा तो फाँसी के फंदे पर लटकते समय भी नहीं हुई जितनी पीड़ा आज इनके कार्यालयों के दीवार पर लटकने से होती है। चौक-चौराहो पर खडे होकर देश के हालात देखने पर इतनी पीड़ा होती है जितनी फिरंगियों के तोपों के मुहाने के सामने खड़े होने पर नहीं हुई थी। हमारे आदर्श और सिद्धांत आज सलीबों पर लटके हुये छटापटा रहे हैं और हम बस आँसू बहाने के सिवा कुछ नहीं कर पा रहें हैं। क्या कोई कभी हमारे दर्द को महसूस कर पायेगा ?

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वीरेन्द्र'सरल'
बोड़रा (मगरलोड़)
पोस्ट-भोथीडीह
जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

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