गुरुवार, 21 अगस्त 2014

सुशील यादव का व्यंग्य - हम नहीं सुधरेंगे…

हम नहीं सुधरेंगे .....

बचपन की पढ़ी हुई एक कविता याद आ रही है ,जिसमें नटखट कन्हैय्या को माता यशोदा, पेड़ की ऊँची डाली से उतरने का मनुहार कर रही हैं। सुश्री सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर कलम से कुछ यूँ लिखी गई थी

नीचे उठाओ मेरे भइय्या

तुम्हें मिठाई दूंगी ,

नए खिलौने ,माखन मिश्री

दूध मलाई दूगी .......

इस दृश्य का नटखट हाथ कब लगा पता नहीं?

हमारे 7x7 दिनों वाले साहब ने,झाड़ू ले के गजब का साहस किया। समूचे इन्द्रप्रस्थ में फिरा दिया। वाह-वाह लायक सफाई हुई।

वे मुगालता पालने लगे।

जहां इतनी कम तैय्यारी में यूँ बड़ा काम हो सकता है तो क्यों न पूरे देश के कचरे से निपटा जावे ?

भाई लोग स्वच्छ टोपी पहन के कचरे -गंदगी की तलाश में चारों तरफ फैल गए।

कुछ डस्ट से एलर्जी रखने वाले लोगों ने उनसे कहा, हम लोग डस्ट वाली हवा में सांस नहीं ले पाते हैं, अगर आप सफाई पर आमादा ही हैं तो पानी का छींटा मार ज़रा दबा कर झाड़ू फेरिये ,जिससे डस्ट न उड़े ?

स्वच्छ टोपी की नोक वाले अपने में मस्त किसकी परवाह करते ?

उनको सफाई का तजुर्बा इस कदर मिल गया रहा कि, वे अपने –आप को फाइव-स्टार होटल सफाई के ठेके के हकदार जैसा समझाने लगे।

इनकी जमात के ‘ओव्हर कांफिडेनसी’ ने बिना वैतरणी गंगा में डुबकी लगा ली ।

अब गंगा मैय्या सब को थोड़े ही पार लगवाती है। इन्हें किनारे वोटिंग लिस्ट की तरफ धकेल दिया।

भाई साहब को गंगा मैय्या के आस-पास ,मान-माफिक चारों ओर कचरा ही कचरा ज्यादा फैला मिला। वे सफाई उत्साहित बहुत खुश हुए। मेरी पीठ अब जोरों से ठोंकी जायेगी।

जनता की ‘गणित’ में , हर बार दो और दो मिल कर चार नहीं होते। उन्होंने जबरदस्त ठोंक दी कि कमर तक असर आन पहुंचा।

कभी ये गणित ,अलग परिणाम दे जाते हैं। भाई साहब उबर नहीं पाए या यूँ कहें ,यहाँ फेल हो गए।

कहते हैं ,करिश्मा,अजूबा और चमत्कार एक बार होता है।

काठ की हांडी एक बार चढती है चाहे जो पका लो। हाँ खिचडी जबरदस्त बनती है। खाने का लुफ्त आ जाता है और हाजमा भी दुरुस्त रहता है।

ये भी कहते हैं ,लाइफ में लक्ष्मी,सरस्वती ,दुर्गा,शान्ति जैसी देवियाँ, तरीके से एक बार ही आपका ‘दर’ खटखटाती है।

समय रहते आपने ‘दर’ खोल लिया, उनका अच्छे से स्वागत किया, तो वे देर तक आपका साथ निभा जाती हैं।

अगर आपका छत फटा नहीं है तो ये शक्तियाँ कहती हैं ,अपना छप्पर पहाड़ लो हमें आपको कुछ देना है। आप में समझ हो तो आप छप्पर भरी बरसात में तो न फाड़ेंगे ?

‘वेट’ करना, के मायने जो डिक्शनरी में है उसे जिन्दगी के व्याकरण में जरुर शामिल करना चाहिए। वक्त जरूरत यही तजुरबा के साथ-साथ दुनियादारी भी सिखाता है।

जल्दबाजी में, इन देवियों को एक साथ रखने या पाने का आपका प्लान अगर आप बनाते हैं तो कहीं न कहीं फेल होना लाजिमी है। शास्त्र –पुराण कहते हैं इनका मेल एक साथ कदाचित नहीं होता।

किस्मत के ‘जबरदस्त धनी’ होने में आप की गिनती यदा-कदा ही हो सकती है ?

आप जबरदस्ती अपने आप को ‘धनी’ गिनवाने का लालच रखें , ये अलग बात है।

इन्द्रप्रस्थ वाली जनता का कितना मनुहार था, कि भइय्या, नीचे हो लो।

जितनी है उतने में चलाओ।

ज्यादा की उम्मीदें मत पालो।

हमें धीरे-धीरे,हमसे किये वादों का, हिसाब लेना आता है । हमें जल्दी नहीं है हिसाब-किताब के उबाऊ लफड़े में फसने की।थोड़ा बहुत जो हो सकता है कर देखो।

हमारे उम्मीदों की ये मेले- ठेले को जाने वाली ‘मेट्रो’ नहीं है जो दुबारा नहीं मिलेगी ?

हम इन्द्रप्रस्थियों को इन्तिजार में मजा आता है ,कल देखेंगे.कल हो जाएगा ,अभी क्या जल्दी है ?

आप अपनी पूरी तैय्यारी के साथ ,पूरी प्लानिग के साथ ,मजबूती लिए आयें ,तब तक ,हम फिर से किसी अनहोनी छलावे के लिए अपने को तैयार किये लेते हैं ?

 

सुशील यादव

२०२,श्रीम सृष्ठि.अटलादरा

वडोदरा (गुज) ३९००१२

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