गुरुवार, 21 अगस्त 2014

रजनीश कान्त का कविता संग्रह

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जब सपने बनते हैं  मार्गदर्शक

बिना संसाधन और मार्गदर्शन के
कामयाबी पाने
वालों को समर्पित,
अपने
सपनों को जो बनाते
हैं
कामयाबी पाने
का रास्ता
जब सपने
बन जाते
हैं मार्गदर्शक
  5

प्रस्तावना
मैनें कविता लिखने  की शुरुआत किसी योजना के तहत या फिर
बहुत सोच-विचारकर नहीं की थी और आज भी मैं जो कुछ
लिखता हूं बहुत सोच-विचारकर नहीं लिखता हूं। मन में किसी विचार से
इसकी शुरुआत होती है जो शब्दों ढलता चला जाता है।

सोचकर या गढ़कर कविता लिखने  की इच्छा नहीं होती। भीतर बनती हुई
कविता जब विवश कर देती है तभी कविता लिखी जाती है। कविता लिखने
में मुझे किसी मानसिक परशेानी का सामना नहीं करना पड़ता है।
जिदंगी के पथ पर कई संघर्ष  देखे  और जिये हैं। सो मन में कविताओं का
अनायास फूटना उतना ही स्वाभाविक है , जितना की बादलों से पानी बरसना।

रजनीश कान्त

जब सपने
बनते
हैं मार्गदर्शक

विषय-वस्तु

अध्याय 1- सपने
अध्याय 2- चुनौती को चुनौती दो  
अध्याय 3- समय की मांग  
अध्याय 4- जब सपन बन जाते हैं मार्गदर्शक  
अध्याय 5- भाग्य का इतजार
अध्याय 6 -वर्तमान हमारा साथी  
अध्याय 7- गरीबों को दो जीने का अधिकार  
अध्याय 8 -ग्रामीण महिला शिक्षा  
अध्याय 9 -कामयाबी मिलके रहेगी
अध्याय 10 - विद्यार्थी जीवन  
अध्याय 11 - क्या हो गए हम  
अध्याय 12- ऊंची हैसियत वाली वाली प्रेमिका
अध्याय 13- मुझे संघर्ष करने दे  
अध्याय 14- संकल्प  
अध्याय 15 - चलेंगे  तुम्हारे संग
अध्याय 16 - आओ पैसा-पैसा खेलें
अध्याय 17- बदकिस्मत मां  
अध्याय -18 - ऐ मेर जीवनसाथी
अध्याय- 19 -कॉल लेटर  
अध्याय -20 -सफल होंगे
अध्याय -21 -संघर्ष हमारा साथी
अध्याय -22- सड़क छाप जिदंगी  
अध्याय- 23- चुनौतियां स्वीकारें निर्भय होकर  
अध्याय -24 भारत का संयम  
अध्याय- 25- तुम्हारी चाहत  
अध्याय -26 -बारिश की तरह आती है खुशियां
अध्याय -27 -मां, रोशनी तो देख लेने देती   
अध्याय -28- उठो, हिम्मत करो  
अध्याय -29- तरस खाओ ऐसे दोस्तों पर  

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अध्याय 1
सपने

ठिकाना मिले
ना मिले
मजिं ल पाऊं या ना पाऊं
कामयाबी पाऊं या ना पाऊं
सपने देखना मैं नहीं छोड़ूंगा
कठिनाइयों का चाहे हो सामना
कांटे भरे रास्तों पर चाहे हो चलना
कल्पना ही है मेरी प्रेरणा
सपने देखना नहीं छोडूंगा
दूरी भले ही कितना भी हो तय करना
पैरवी का भले न मिले सहारा
अपनी पौरुषता को दौलत बनाऊंगा
सपने देखना नहीं छोडूंगा
घबराऊं न मैं असफल होने पर
हताश न होऊं
बांछित परिणाम न आने
पर
सकारात्मक सोच के सहारे
खद को आनंदित करता रहूंगा
सपने देखना मैं नहीं छोडूंगा
मौकों का चाहे हो अकाल
या हो चुनौतियों का अम्बार
जीवन पथ पर आगे
बढ़ता जाऊं गा
सपने
देखना मैं नहीं छोडूंगा
राही हूं मैं घने वन का
काली रात है
मेरे प्रकाश का साधन
चांद, तारे, और अंतर्मन का लेकर सहारा
बुलंदियों का मैं फतह करूंगा
सपने देखना मैं नहीं छोडूंगा

 

अध्याय 2
चुनौती को चुनौती दो
कभी ऊपर उठती है
कभी दीवारों से
टकराती है
समुद्र की लहरें
कोई मौका नहीं छोड़ती है
लोगों को डराने
का
हर तरह की चुनौतियां पैदा कर
लोगों को डराती है लहरें
कुछ लोग उन चुनौतियों से
ठिठक जाते  हैं
ठहर जाते  हैं
किनारों पर
इंतजार करते
हैं
लहरों के शांत होने का
लहरों को
डराने  में आता है मजा
डरते हुए लोगों को देखकर
मुस्कराती है लहरें
ऊं ची....और ऊं ची
उठती है लहरें
खौफनाक...और खौफनाक
होती जाती है लहरें
दीवारों और किनारों से
टकराती है लहरें
लेकिन,
कुछ लोग होते
हैं हिम्मती
खौफनाक लग रही लहरों को
जो देते हैं चुनौती
ऊंची उठ रही लहरों
में लगा देते
हैं छलांग
लहरों को ललकारते हैं
दम हो तो
हरा के दिखाओ
लहरें भी उनको हराने
का करती है हरसंभव कोशिश
लेकिन जांबाजों के आगे
पस्त हो जाती है
हार जाती है
आत्मसमर्पण कर देती है
खौफनाक और
मौत की लहरें
लगा लेती है
हिम्मती को गले
और हो जाती है शांत

 

अध्याय 3
समय की मांग
जो न बना क्लर्क
हुआ उसका बेडा गर्क
जो भी किया केवल
एमए, बीएड, एमफिल
हुआ उसका जीना मुश्किल
पाना है जरूरी है आज
पहले  कोई भी सरकारी नौकरी
वरना, मिल नहीं पाएगी
दाल, भात और तरकारी
मोटी-मोटी किताबें पढ़कर
ऊं ची-ऊं ची डिग्रियां ले
कर क्या पा लेंगे
आप और हम
इज्जत, प्रतिष्ठा, रोटी पा सकेंगे
जब बनेंगे
सरकार का हमदम
इसलिए समय की मांग है
बन जाओ पहले
कोई क्लर्क
हो जाए कोई सरकारी बाबू
तब लोगों की निगाहें
जाकर टिकेगी तुम्हारे ऊपर
मोटी-मोटी किताबें तब पढ़ते रहना
ऊंची-ऊंची डिग्रियां तब लेते रहना
तब नहीं आएगी कोई आर्थिक समस्या
समाज भी तब बंद कर देगा आपकी आलोचना
जो जीता वही सिकंदर
योग्यता की आज यही पहचान
ज्ञान कितना है किसके पास
लोग इसका कर देते हैं  नजरअंदाज


अध्याय 4
जब सपने बन जाते हैं मार्गदर्शक

गांव का रहने वाला हूं
खेती था पेशा मेरा
सोचा था किसी तरह
प्राइमरी स्कूल का शिक्षक बन जाऊं
तो, चल निकलेगी
जिदंगी की गाड़ी
तभी पता चला
डॉक्टर, इंजीनियर भी
बनते हैं लोग
मंत्री, आईएएस, आईपीएस
की कुर्सी पर बैठते है लोग
पत्रकारों और उद्योगपतियों
के पास भी होती है ताकत
इंजीनियर, आईएएस बनने
की कोशिश की भरपूर
लेकिन, मिली अधूरी कामयाबी
मनमुताबिक कामयाबी भले
न मिली,
लेकिन ख्वाब देखना नहीं छोड़ा मैंने
पत्रकारिता कोर्स मेंलिया दाखिला
पत्रकार बना भी
परन्तु, ब्रांडेड फिर भी न बना
अब बढ़ चला
उद्योगपति बनने
की राह पर
मदद के लिए आगे
आए कई हाथ
लेकिन, सपने
को बनाया मैंने अपना मार्गदर्शक
मुश्किलों के सामने
न कभी रुका
न कभी झुका
बस, आगे
बढ़ता गया
एक सपना टूटता
बुन लेता दूसरा सपना
और बढ़ता रहा निरंतर


अध्याय 5
भाग्य का इंतजार

सुख-दुख रहते
हैं पास-पास
ठीक उसी तरह जिस तरह
गुलाब में रहते  हैं
फूल और कांटे
लेकिन हम जो चाहते
वही हैं पाते
भाग्यवादी रोना रोते
फूल नहीं, मिले हैं कांटे
विजेताओं ने भाग्य पर
नहीं किया भरोसा
फूल पाया कांटे को नाशा
जिदंगी जीने वालों
कांटे मिलेंगे हजार
हटा दो उन कांटों को
बिना किए भाग्य का इंतजार
हरदम कर्म का लो सहारा
फूल खोजने  की रखो प्रवृति
कांटों को करो किनारा

अध्याय 6
वर्तमान हमारा साथी

अतीत जिया है
घृणा पर केंद्रित रहकर
थोड़े से लोगों ने  ऐश किया
लाखों लोगों का शोषण कर
शोषितों को सांत्वना दे दी
उनके पूर्वजन्म को याद दिलाकर
पूर्वजन्म के कुकर्मों ने
शोषितों को भाग्यवादी बनाया
लेकिन लोगों का खून चुसकर
खुद कुकामों को सुकर्म बताया
भविष्य जो अभी है आनेवाला
शोषित तुम हो इनाम पाने वाला
कष्ट भोगते रहो तुम
संचित पापों का परिणाम समझकर
क्रान्तिकारी कदम उठाते नहीं
तुम लाख चाहकर
शोषकों ने  समाज का
खींचा है ऐसा ढांचा
शोषण करने के लिए
बन गया जो अच्छा सांचा
अतीत बीत गया
भविष्य है आने वाला
वर्तमान को क्यों छोड़ुं
जो है हमारा साथ वाला

 

अध्याय 7
गरीबों को दो जीने  का अधिकार
बंद करो
शोषण, जुल्म, अत्याचार
गरीबों को दो हक
और जीने का अधिकार
अगर हत्याएं होती रही
फर्जी मुठभेड़ दिखाकर
बदला अब ये भी लेंगे
प्रशासन से टकराकर
प्रशासन ने लूटा उनको
झूठे मुकदमों में फंसाकर
नैतिकता मेंगिरावट लाई
महिलाओं के साथ छेड़छाड़ कर
इज्जत और सम्मान
गरीबों को भी है स्वीकार 
प्रशासन-नेता-सामंत गठबंधन से
त्रस्त है उनका परिवार 
सरकार बदलती, योजनाएं बनती
लेकिन मिलता नहीं रोजगार
मजबूर होकर किया उन्होंने
हिंसा का रास्ता अख्तियार
अब ये बहुत आगे निकल चुके
रोकना उन्हें बेकार
स्वीकार करेंगें
अंहिसा वो भी
अगर मिले
उनको
ससम्मान जीने
का अधिकार


अध्याय 8
ग्रामीण महिला शिक्षा
बिन शिक्षा के गांव वाली
न बनवअ तू शहर वाली
रह जयवअ तू
सीधी-साधी घरवाली
पढ़-लिख के तनी तू
देख उनकर जिदं गी
कइसे दूर करलन
उ सब अपन बेचारेगी
पढ-लिखके तू जानवअ
का होत है इ दुनिया में
अपन के बदल लेव तू भी
सब हालात में
अनपढ़ रहके तू संकोचा ह
सबसे बात करे में
पढ़-लिख के तू रह न जइवअ
अपन समस्या दूर करावे में
महिला लोगवन तू तो ह
परिवार और समाज की धूरी
पढ़-लिख जइव तू तो
रह न जात परिवार, समाज अधूरी
बाल-बच्चा साथ रहेला
ज्यादा मां-बहिने संग
बढ़िया पढ़ाई-लिखाई बचपन से
मिलते  रहे
तो न होत रगं में भगं
तब बच्चा भी शुरू से जान जात
एबीसीडी, वनटूथ्री
तब ग्रामीण समाज भी हो जात
शोषण, अधं विश्वास, कुपमंडुकता से फ्री

अध्याय 9
कामयाबी मिलके रहेगी

बीते साल का जाना
नए साल का आना
मनचाहा खशिुयों से हो
तुम्हारा सामना
हर कदम हो तुम्हारा सफल
मेरी यही है कामना
नतीजा चाहे हो जैसा
आत्मविश्वास है तुम्हारा साथी
संभावनाओं के इस दौर में
महज परीक्षा देना होगा नाकाफी
परीक्षा यानी दूसरे की इच्छा
उसके अनुरूप खद को होगा ढालना 
मेहनत, धैर्यै पर ही हो हमें भरोसा
नाकामी से जब हो पीछा छुड़ाना
सफल होना ही है कामयाबी की पहचान
हर कीमत पर रखनी होगी
सफलता पाने के प्रति हमें रुझान

अध्याय 10
विद्यार्थी जीवन
खानाबदोश जिदं गी
कहीं ठिकाना नहीं मिलता
न किसी के दिल में
न किसी के घर में
कामयाबी और पैसा
पसंद है हरेक को
विद्यार्थी जीवन में रखा क्या है
संघर्ष, संघर्ष  और संघर्ष

शिक्षा जो कि है जरूरी
बीताते हैं उसमें वर्षों-वर्ष
कामयाबी पसंद है हरेक को
माता-पिता को, खुद को,
भाई-बहन को
पर थोड़े से हैं खुशनसीब
कामयाबी जिसको करती है नमन
आज विद्यार्थी का जीवन
ठीक है उसी तरह
रुखा-सुखा फूल से
सुसज्जिजत हो जैसे चमन

 

--.

पूरा संग्रह यहाँ है -

लिंक- http://pothi.com/pothi/preview?pFile=27654

                         रजनीश कान्त
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  1. रजनीश कान्त जी आपने जीवन की घटनाओं को कविता में उतारने का उत्तम प्रयत्न किया ,कामयाबी जिसको करती है नमन
    आज विद्यार्थी का जीवन और नतीजा चाहे हो जैसा
    आत्मविश्वास है तुम्हारा साथी
    संभावनाओं के इस दौर में
    महज परीक्षा देना होगा नाकाफी
    और -
    ठीक है उसी तरह
    रुखा-सुखा फूल से
    सुसज्जिजत हो जैसे चमन !
    आपका एक सराहनीय कदम है

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