यशवंत कोठारी का व्यंग्य - योजना हीन आयोग

व्यंग्य

योजना हीन    आयोग

यशवंत कोठारी

नई  सरकार ने योजना आयोग रुपी शो रूम के शटर डाउन  करने की घोषणा   कर दी है।  वैसे भी योजना  आयोग  नॉन प्लान  में घुस गया था, उसका बंद होना जरूरी हो गया था , जैसा की सरकार ने फ़रमाया - कभी कभी पुराने मकान की मरम्मत करवाने के बजाय  नया मकान  बनवाना सस्ता पड़ता है।  सरकार के इस फरमान से  में परम प्रसन्न  हूं.  वैसे  भी एक पूर्व प्रधान मंत्री ने योजना आयोग को जोकरों  का समूह कहा था, और उस समय  योजना आयोग के मुखिया एक निवर्तमान  प्रधान मंत्री   थे।

ऐसे अवसरों पर  दुःख भरी साँस  लेने की परम्परा  है  मैंने भी दुःख भरी एक साँस  ले  ली है.  योजना आयोग  में वैसे भी  बड़े बूढ़े नेता , भूत पूर्व  अफसर  और अभूतपूर्व  विशेषज्ञों   का  जमावड़ा  रहता है. जो एक टॉयलेट खुद के लिए बनवाने के लिए लाखों रूपये  खरच  कर   देते  थे  मगर  जनता के लिए टॉयलेट की योजना  में हज़ार आक्षेप  लगा ते थे

योजना आयोग  का भट्टा बिठाने में कई  सरकारी संस्थाए पहले से ही लगी हुई थी  आधार वाले  नीलकेनिजी ने अपनी दुकान वही लगाई  थी  ये अलग  बात है की नीलकेनिजी  को जनता ने   बाहर  का रास्ता दिखा दिया  भ्रस्टाचार  का खुला आकाश  योजना आयोग में भी था।

हालत  ऐसी थी की योजना  आयोग  में  योजनाओं पर बहस  कम होती थी  कमरों और बाथ रूमों के लिए  लड़ाईया  ज्यादा होती थी।  वे   ऐसी  कमरों में बैठ  कर  सिगार  फूंकते  हुए गरीब , गरीबी  पर बहस करते थे, हर बार वे गरीबी पर एक नया आंकड़ा देते और उस गलत  सलत आंकड़े को सही साबित करने   के लिए  विदेश चले  जाते थे  विदेश से आकर योजना आयोग के लोग  प्रधान मंत्री की जी हजूरी में   लग जाते , वहाँ  से वे आंकड़ों की जुगाली करते  वापस अपने अपने दफ्तर में  आकर  अपने लिए नए  टॉयलेट की संभावना ढूंढने  लग जाते.

एक समय ऐसा आया की हर राज्य का मुख्यमंत्री   आयोग के उपाध्यक्ष की सेवा में हाजिर  होने   लगा , पैसे के लिए गिड़गिड़ाने  लगा . आयोग  में राजनीति घुस गयी ,विपक्षी सरकार को कम पैसा  अपनी सरकार को पैसा ही पैसा  राज्य सरकार  आयोग की चमचागिरी करने लगी। विचार हीनता हावी होने लगी   योजना आयोग की कृपा  पर भ्रस्टाचार  के महल खड़े होने लगे।

पांच वर्षीय योजनाओ के नाम पर दुकानें खुल गयी.   , प्रगति के बजाय जडहीनता हावी  होने लगी.  आयोग रुपी  कुए  में भांग पड गयी   जो भी जाता  कुंए का पानी  पीकर बौरा जाता  . काम क्या था , क्या हो गयागए थे हरी भजन को ओटन  लगे कपास।

गरीबी का मज़ाक  उड़ाना भी एक बड़ा  काम हो गया गरीबी के मानक तय करने में अरबों रूपये खरच हो गये.

योजना आयोग ने गरीबी, भुखमरी  बेरोजगारी  के खिलाफ आवाजे   उठाई , योजनायें बनाई  और योजना  आयोग  हर गया   योजना आयोग के बंद होने पर आंसू बहाना भी कोई नहीं चाहता.     

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यशवंत कोठारी  ८६ , लक्ष्मी नगर , ब्रह्मपुरी बहार, जयपुर-२ 

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