शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

राजीव आनंद का आलेख - स्‍मृति शेष : मधुकर सिंह नहीं रहे

स्‍मृति शेष मधुकर सिंह नहीं रहे

मधुकर सिंह जनता के लिए लिखते थे․ उन्‍होंने मजदूरों, किसानों, भूमिहीनों, गरीबों, औरतों, दलित-वंचितों के लिए न सिर्फ लिखा बल्‍कि उनमें प्रतिरोध करने की क्षमता को भी अपनी लेखनी से विकसित किया․ बाबू जगजीवन राम को नायक बनाते हुए उन्‍होंने ‘दुश्‍मन' नामक कहानी लिखा था जो पिछड़ों द्वारा झेले जा रहे त्रासदी का मर्मस्‍पर्शी आख्‍यान है तथा समानान्‍तर कहानियों में मील का पत्‍थर है․ मधुकर सिंह का मानना था कि इतिहास में वही बना रहेगा जो जनता के लिए लिखेगा․

1970 के दशक में कमलेश्‍वर के साथ मधुकर सिंह ने ‘समानान्‍तर कहानी आंदोलन' चलाया था․ उन्‍होंने हिन्‍दी कहानी में ‘भोजपूर स्‍कूल' का निर्माण किया और आरा को बिहार की सांस्‍कृतिक राजधानी का दर्जा दिलवाया․ किसानों, मजदूरों, स्‍त्रियों, गरीबों, भूमिहीनों, दलित वंचितों पर मधुकर सिंह ने कहानियों का विपुल साहित्‍य रचा जो उनकी सत्रह कहानी संग्रहों में प्रकाशित हुआ․ माइकल जैक्‍सन की टोपी, लहू पुकारे आदमी, कालचक्र कथा, मराठी दलित कहानियाँ, पहली मुक्‍ति, सोनभद्र की सीता आदि उनकी कहानी संग्रह है․ उनके उपन्‍यासों में जिसकी सबसे ज्‍यादा चर्चा हुई वह है ‘बाजत अनहद ढोल' जिसमें रोमन साम्राज्‍य का भारतीय महाद्वीप पर पड़ने वाले प्रभाव का सूक्ष्‍म वर्णन लेखक ने किया है․ यह उपन्‍यास साहित्‍यिक दृष्‍टिकोण से तो महत्‍वपूर्ण है ही ऐतिहासिक दृष्‍टिकोण से भी उतना ही महत्‍वपूर्ण है․ इसके अतिरिक्‍त उन्‍होंने एक दर्जन उपन्‍यास जैसे ‘कथा कहो कुंती माय', मेरे गाँव के लोग, अर्जुन जिंदा है, बेनीमाधो तिवारी की पुतोह आदि लिखा․ मधुकर सिंह की कहानियों में ग्राम्‍यजीवन की आत्‍मीयता अपने पूर्ण भाषायी परिवेश के साथ उजागर हो उठती है․ उनकी भाषा सरल, सहज, प्रभावमयी, रोचक, आचंलिक परिवेश को आत्‍मसात किये हुए है․ अपने बिहार अंचल के परिपेक्ष्‍य में मधुकर सिंह का नाम बाबा नागार्जुन, फणीश्‍वर नाथ रेणु के बाद निसंदेह सर्वश्रेष्‍ठ माना जायेगा․ मधुकर सिंह के साहित्‍य में रेणु की तरह भारत के ग्रामीण जीवन, विशेषतः बिहार तथा उसके आसपास की सजीव झांकी दिखाई पड़ती है․ उनकी साहित्‍य सेवा के लिए जननायक कर्पुरी ठाकुर साहित्‍य पुरूस्‍कार, उदयराज पुरूस्‍कार, सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से उन्‍हें जवाजा गया था․

सामाजिक कार्यकर्ता रहे मधुकर सिंह ने जो साहित्‍य रचा वह यथार्थ धरातल पर मनुष्‍य जीवन की सच्‍चाई से अवगत कराता है, जीवन क विविधताओं का वर्णन समग्र रूप में करते हुए समाज को उचित मार्ग दर्शन और एक नयी दिशा प्रदान करता है․ उनकी रचनाओं में सहज मानवीय जीवन के प्रति आस्‍था का स्‍वर विद्यमान है․ समाज में व्‍याप्‍त विसंगतियों और विकृतियों पर वे प्रतीकात्‍मक रूप से सभी का घ्‍यान आकर्षित करने में सफल रहे है․ उनकी भाषा आम आदमी की भाषा होते हुए भी गहराई तक प्रभाव छोड़ने में समर्थ सिद्ध हुई है․ मधुकर सिंह के लेखन की सबसे बड़ी विशेषताः यह है कि इन्‍होंने जीवनानुभवों को अपने लेखन में उतारा है․ जीवन अनुभवों तथा उसके अन्‍तर्विरोधों के सूत्रों को इन्‍होंने बड़ी बारीकी से पकड़ा है․ इनकी चेतना अपनी सारी उलझनों, कुण्‍ठाओं और तकलीफों के साथ बड़ी यथार्थता से लेखन में उतरती चलती है․ उनका साहित्‍य आत्‍मीयता, ईमानदारी और गहराई का अनुभव कराता है․ उनकी कहानी की विकास यात्रा में जीवन के विविध बोध, आयाम दिखाई देते हैं․

रामविलास शर्मा ने कहा था कि ‘‘साहित्‍यकार को साहित्‍य की रचना करते समय यह घ्‍यान रखना चाहिए कि वह सर्वहारा वर्ग का सहयोगी साहित्‍य निर्मित करे․'' इस दृष्‍टिकोण से मधुकर सिंह ने सर्वहारा वर्ग का सहयोगी साहित्‍य ही निर्मित किया जो साहित्‍य जगत में अमर रहेगा․

लंबी बीमारी से जूझते मधुकर सिंह 17 जुलाई को हमलोगों को छोड़ गए․ उनकी स्‍मृति को नमन․

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंडा, गिरिडीह-815301

झारखंड़, मो-9471765417

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