शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

महावीर सरन जैन का आलेख : द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् विदेशों में हिन्दी साहित्य सृजन एवं साहित्य समीक्षा

द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् विदेशों में हिन्दी साहित्य सृजन एवं साहित्य समीक्षा

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

हिन्दी साहित्य सृजन

संसार के अनेक देशों में आप्रवासी भारतीयों के द्वारा विपुल मात्रा में हिन्दी साहित्य का सृजन किया जा रहा है। इस दिशा में अनेक विद्वानों ने कार्य किया है। इस आलेख में विदेशी हिन्दी साहित्यकारों के अतिरिक्त मारीशस, फीजी, सूरीनाम आदि देशों के भारतीय मूल के नागरिकों के द्वारा रचित हिन्दी साहित्य के सम्बंध में ही विचार किया जाएगा।इस आलेख में अमेरिका, कनाडा, इंगलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, डेनमार्क, नार्वे, जापान आदि देशों में भारत में जन्में तथा अब उन देशों में बसे हुए अथवा निवास करने वाले आप्रवासी/ अनिवासी भारतीयों के द्वारा सर्जित हिन्दी साहित्य के सम्बन्ध में विचार नहीं किया जाएगा। इन देशों में विशेष रूप से अमेरिका एवं इंग्लैण्ड में बहुत बड़ी मात्रा में हिन्दी साहित्य की रचना हुई है। मगर मारीशस, फीजी, सूरीनाम आदि देशों में हिंदी के रचनाकारों की स्थिति में तथा अमेरिका एवं इंगलैण्ड आदि देशों के हिन्दी साहित्यकारों की स्थिति में अन्तर है। जो पाठक एवं अध्येता इन देशों के हिन्दी साहित्य के बारे में जानना चाहते हैं वे निम्नलिखित संदर्भ ग्रंथों का अध्ययन कर सकते हैं।

1. विश्व हिन्‍दी रचना, भारतीय सांस्‍कृतिक सम्बंध परिषद, 2003

2. चेतना का आत्‍मसंघर्ष- हिन्‍दी की इक्‍कीसवीं सदी, संपादक- श्री कन्‍हैयालाल नन्‍दन, 2007।

3. स्‍मारिका, सातवाँ विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन, सूरीनाम, 2003।

4. विश्‍व हिन्‍दी पत्रिका, विश्‍व हिन्‍दी सचिवालय, 2009, 2010, 2011, 2012, 2013 ।

5. प्रवासी संसार, संपादक श्री राकेश पांडेय, विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन विशेषांक, 2007।

6. ब्रिटेन में हिन्‍दी, श्रीमती उषा राजे सक्‍सेना, 2005।

7. हिन्‍दी की विश्‍व यात्रा, प्रो सुरेश ऋतुपर्ण, 2005।

उपर्युक्त सभी संदर्भ ग्रंथों में विदेशों में हिन्दी का अध्ययन, अध्यापन, साहित्य रचनाओं के प्रकाशन आदि की उपयोगी सामग्री समाहित है। मुझे इनमें सबसे अधिक महत्व का ग्रंथ ‘विश्व हिन्दी रचना’ लगा। इसमें डॉ. कमल किशोर गोयनका ने बहुत परिश्रम करके सर्जित साहित्य की सामग्री के बारे में सूचनाएँ एकत्र की हैं। मैं विशेष रूप से इसको पढ़ने की अनुशंसा करता हूँ।

मॉरीशस, फीजी, सूरीनाम आदि देशों में हिंदी के रचनाकारों की संख्या भी सैकड़ों में है। इस लेख में सभी रचनाकारों के नाम देना संभव नहीं है। यहाँ हिन्दी के प्रमुख रचनाकारों का परिचय एवं उन प्रसिद्ध ग्रंथों का उल्लेख किया जाएगा जिनमें रचनाकारों की रचनाएं संकलित हैं अथवा जिनमें रचनाकारों का परिचय प्रस्तुत है:-

1.मॉरीशस

· मॉरीशस की पहली प्रकाशित रचना पंडित लक्ष्‍मीनारायण चतुर्वेदी कृत ‘रसपुंज कुंडलियाँ’ है जिसका प्रकाशन सन् 1923 में हुआ था। चतुर्वेदी जी की ही दूसरी कृति ‘शताब्‍दी सरोज’ का प्रकाशन सन् 1934 में हुआ। इस प्रकार पंडित लक्ष्‍मी नारायण चतुर्वेदी को मॉरीशस का आदि कवि कहा जा सकता है। सन् 1971 में प्रकाशित ‘प्रवासी स्वर’ में मॉरीशस के 11 कवियों की कविताएँ संकलित हैं। प्रमुख कवि हैं - बृजेन्द्र भगत, सोमदत्त बखौरी तथा अभिमन्यु अनत। कहानीकारों में प्रमुख हैं - श्रीमती भानुमती नागदान, हरिनारायण महावीर, रामदेव धुरन्दर, ईश्वर जागा सिंह। डॉ. कामता कमलेश द्वारा संकलित ‘मारीशस की हिंदी कहानियाँ’ शीर्षक ग्रंथ में मॉरीशस के हिंदी कहानीकारों की 23 कहानियाँ संग्रहीत हैं। गगनांचल के मॉरीशस अंक में 8 हिंदी रचनाकारों की साहित्यिक कृतियों का तथा 10 हिंदी लेखकों के लेखों का समावेश है। रचनाकार हैं - सिद्धहस्त एकांकीकार, कथाकार एवं लेखक अभिमन्यु अनत तथा गंगादीन; कथाकार हैं - पूजानंद नेमा तथा सोनालाल नेमधारी तथा कवि हैं - परमेश्वर तिवारी, हरि नारायण सीता, बृजेन्द्र भगत मधुकर एवं इन्द्रदेव भोला। लेखक हैं - 1. जी बन्धु 2. अनिरुद्ध द्वारका 3. धर्मवीर धूरा शास्त्री 4. पुलस्त्य रुद्रमन 5. खे. लीला 6. धनदेव बहादुर 7. अजामिल माताबदल 8. राजवन्ती अजोध्या 9. सत्यदेव प्रीतम 10. मुनीश्वर लाल चिंतामणि।

मॉरीशस की हिंदी प्रचारिणी सभा ने हीरक महोत्सव के अवसर पर ‘काव्य परिचय’ शीर्षक पुस्तक का प्रकाशन किया जिसमें स्व0 सूर्यप्रसाद भगत, जयरूप दोसिया, सोमदत्त बखौरी जैसे श्रेष्ठ साहित्यकारों की रचनाओं के साथ-साथ वर्तमान स्थापित कवियों - हरिनारायण सीता, जनार्दन कालीचरण, सचिदानंद शर्मा, परमेश्वर बिहारी ‘शिवरत्न, डॉ. वीरसेना जागा सिंह, डॉय मुनीश्वर लाल चिंतामणि, हेमराज सुन्दर, राजवन्ती अजोध्या ‘नेहा’, जयवन्ती रंगू ‘शोभा’ की कृतियाँ संकलित हैं। श्री विष्णु प्रभाकर ने अपने एक लेख में मॉरीशस के अनेक रचनाकारों का उल्लेख किया है। मॉरीशस के सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाकार हैं – 1.सोमदत्त बखौरी 2. अभिमन्यु अनत 3. पं0 वासुदेव विष्णु दयाल 4. प्रहलादरामशरण 5. रामदेव धुरन्धर

1. श्री सोमदत्त बखौरी - इन्होंने काव्य कृतियों तथा यात्रा वृतान्तों का प्रणयन किया है। काव्य कृतियों में ‘मुझे कुछ कहना’ है (1967) तथा ‘बीच में बहती धारा’ (1971) तथा यात्रा वृतान्तों में ‘गंगा की पुकार’ (1972) विशेष चर्चित हैं। भारत सरकार द्वारा इन्हें 1979 में ‘विश्व हिन्दी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

2. अभिमन्यु अनत - आपका सर्जनात्मक व्यक्तित्व बहुआयामी है। आपने उपन्यास, कहानी, नाटक तथा कविता इन सभी विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इन्होंने 25 उपन्यासों की रचना की हैं जिनमें ‘और नदी बहती रही’, ‘एक बीघा प्यार’, ‘गांधी जी बोले थे’, ‘मुडि़या पहाड़ बोल उठा’, तथा ‘लाल पसीना’ विशेष रूप से चर्चित हैं। ‘एक बीघा प्यार’ के प्रकाशन के बाद अभिमन्यु को साहित्य संसार में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। ‘और नदी बहती रही’ तथा ‘गांधी जी बोले थे’ इन दोनों उपन्यासों में आपने भारतीय मूल के मजदूरों की दर्दभरी कहानियों का तथा जमीन मालिकों के अत्याचारों का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। ‘मुडि़या पहाड़ बोल उठा’ का कथानक देश की एक प्रसिद्ध लोककथा पर आधारित है। ‘लाल पसीना’ अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासनकाल में प्रताड़ित एवं संतप्त भारतीय मूल के कुली मजदूरों की दर्दभरी गाथा है। उपन्यास में भारतीय मजदूरों का अपार श्रम, उनकी कार्य के प्रति निष्ठा, कठोर यातनाओं के बावजूद उनका धीरज तथा समस्याओं का साहसपूर्वक सामना करने का उनका दृढ़ संकल्प आदि की सशक्त एवं मार्मिक अभिव्यंजना हुई है।

3. पं0 वासुदेव विष्णु दयाल - बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न आप हिंदी के प्रसार-प्रचार के पुरोधा हैं। अनेक भाषाओं में आपकी लगभग 50 पुस्तकें प्रकाशित हैं। आपकी रचनावली भी प्रकाशित हो चुकी है।

4. प्रह्लाद रामशरण - इतिहासकार, बाल साहित्य के प्रणेता, लोक साहित्य के विद्वान, कथाकार, निबंधकार प्रह्लाद रामशरण मारीशस के नवलेखकों में सर्वाधिक उभरकर सामने आए हैं। आपकी लगभग 25 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

5. रामदेव धुरन्धर - चेहरों का आदमी, सहमे हुए लोग, पराजय बोध, बड़ी मछली छोटी मछली आदि कथाकृतियाँ चर्चित हैं।

इनके अलावा ब्रजेन्द्र भगत मधुकर, डॉ मुनीश्‍वरलाल चिंतामणि, इन्‍द्रनाथ भोला बेणीमाधव रामखिलावन, महेश रामजियावन,के. हजारीसिंह और हेम राज सुन्दर आदि का योगदान भी कम नहीं है।

मॉरीशस में न केवल सैकड़ों काव्‍य और कहानी संकलनों का प्रकाशन हुआ है बल्‍कि वहाँ साहित्य की प्रत्येक विधा में रचनाएँ हुई हैं । इन अलग अलग विधाओं में प्रकाशित रचनाओं का उल्लेख करना सम्भव नहीं है। यहाँ हम विधागत प्रकाशित रचनाओं की अब तक प्राप्त संख्या गिना रहे है जिससे मॉरीशस में सर्जित विपुल हिन्दी साहित्य का अनुमान लगाया जा सके।

विधा का नाम

प्रकाशित रचनाओं की संख्या

उपन्यास

56

नाटक, एकांकी, अनुदित नाटक

29

निबंध संग्रह, जीवनियाँ, व्यंग संग्रह

29

बाल साहित्य

02

हिन्दी साहित्य का इतिहास

06

हिन्दी में शोध कार्य

04

इतिहास

07

धर्म, दर्शन एवं संस्कृति

19

यात्रा वृतांत, संस्मरण एवं लोक साहित्य

11

विविध रचनाएँ

13

(2) फीज़ी - ‘हिन्‍दी बाल पोथी’ (कुल छ भाग) में से पाँच भागों के लेखक पंडित अमीचन्‍द शर्मा को फीज़ी के पहले उल्लेखनीय लेखक की मान्यता प्राप्त है। श्री जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी ने अपने ‘हिंदी: घर से बाहर’ शीर्षक लेख में फीज़ी के अनेक साहित्यकारों का उल्लेख किया है। इन साहित्यकारों में जोगिन्दर सिंह ‘कंवल’ का नाम प्रसिद्ध है जिन्होंने छह उपन्यासों का प्रणयन किया है। आपको उत्तर प्रदेश शासन द्वारा ‘सबेरा’ उपन्यास पर 1978 में पुरस्कृत किया जा चुका है। इनकी धर्मपत्नी श्रीमती अमरजीत ‘कंवल’ के गीत भी प्रशान्त द्वीपीय देशों में प्रसिद्ध हैं। सन् 1969 में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के छात्र डॉ. विवेकानन्द शर्मा की भी अनेक कृतियाँ प्रकाशित हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. विजयेन्द्र स्नातक का पत्र लेकर ये हमारे पास जबलपुर में शोध कार्य के लिए आए थे। इनका पी-एच. डी. उपाधि के लिए ‘फीज़ी की हिन्दी का भाषावैज्ञानिक अध्ययन’ विषय पर पंजीयन भी हो गया था। वहाँ जाकर राजनेता बन जाने के कारण शोध कार्य पूरा नहीं कर सके। इनसे हमें फीज़ी में हिन्दी के व्यवहार को समझने में सहायता मिली। फीज़ी के अन्य हिन्दी कवियों में पंडित कमला प्रसाद मिश्र, महावीर मित्र, काशीराम कुमुद, ज्ञानी दास,अनुभवानंद आनंद के नाम भी प्रसिद्ध हैं। फीज़ी के गद्य लेखकों में महेन्‍द्र चन्‍द्र शर्मा, प्रो. सुब्रमणी, गुरुदयाल शर्मा, भारत बी मौरिस के नाम उल्लेखनीय हैं।

(3) सूरीनाम - सूरीनाम में व्‍यवस्‍थित हिन्‍दी शिक्षण के जनक बाबू महातम सिंह हैं। इनके काम को आगे बढ़ाते हुए पचास से अधिक स्‍वयंसेवी हिन्‍दी शिक्षक लगभग 600 विद्यार्थियों को हिन्‍दी की शिक्षा दे रहे हैं ।

पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों में स्व0 श्री रहमान खान का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने ‘दोहावली’ एवं ‘ज्ञान प्रकाश’ का प्रणयन किया। इनके बाद सूरीनाम के रचनाकारों में पंडित लक्ष्‍मी प्रसाद बलदेव (बग्‍गा), श्री मंगल प्रसाद, बाबू चंद्रमोहन, रणजीत सिंह, महादेव खुखुन, पंडित हरिदेव सहतू, रामनारायण झाव, जनसुरजनराइन सिंह सुभाग, प्रेमानन्‍द भोंदू के नाम लिए जाते हैं। वर्तमान पीढ़ी के रचनाकारों में अमर सिंह रमण, श्री निवासी, जीत नारायण, पं0 सूर्य प्रसाद वीरे शूरवीर, सुरजन परोही, सूरज, रामदेव रघुवीर के नाम उल्लेखनीय हैं। नए हस्ताक्षरों में अमित अयोध्‍या, वीना अयोध्‍या, विकास समोधी, डॉ कारमेन जगलाल, कृष्‍णा कुमारी भिखारी, संध्‍या लल्‍कू, तारावती बद्री, लीलावती कल्‍लू और सुमित्रादेवी बलदेव के नाम चर्चित हैं। श्री उमाशंकर सतीश ने सूरीनाम के लगभग 15 कवियों की कविताओं की चर्चा की है।

(4) नेपाल - श्री सूर्यनाथ गोप ने ‘नेपाल में हिंदी’ शीर्षक निबंध में नेपाल के हिंदी साहित्य तथा हिंदी के रचनाकारों की जानकारी प्रस्तुत की है। नेपाल के लेखकों में बुन्नीलाल, केदार ‘व्यथित’ एवं धूस्वा सायमि की अनेक कृतियां हिन्दी में मूल अथवा अनुवादित रूप में प्रकाशित हैं। नेपाल साहित्य के ख्यातिप्राप्त वरिष्ठ कवि केदार ‘व्यथित’ की हिंदी की दो काव्य कृतियाँ विशेष चर्चित हैं - 1. हमारा देश: हमारा स्वप्न 2. अग्नि श्रृंगार। लोकप्रिय उपन्यासकार एवं कहानीकार श्री बुन्नीलाल ने अनेक रचनाओं का प्रणयन किया है। इनके ‘नयन कहर दरियाव’ शीर्षक उपन्यास में नेपाल के पूर्वांचल का जीवन सशक्त रूप में चित्रित है।

(5) चेक गणराज्य - विश्व के धरातल पर हिंदी के विदेशी रचनाकारों में चेक के कविवर डॉ. ओदोलेन स्मेकल महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। आपने हिन्दी में 12 से अधिक पुस्तकों की रचना की है। इनकी कविताओं में भारतीय चेतना सशक्त रूप से अभिव्यंजित हुई है। डॉ. स्मेकल ने बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में भारत में चेकोस्लॉविया के राजदूत के रूप में कार्य भी किया। आप उस दौरान केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के आगरा मुखालय में आए तथा मेरे घर पर मुझे अपनी कविताओं की निम्नलिखित कृतियाँ भेंट में दी –

1. तेरे दान किए गीत (1982) 2. मेरी प्रीत तेरे गीत (1982) 3. स्वाती बूंद (1983) 4. नमो नमो भारतमाता (1983) 5. अविराम (1984) 6. कलम को लेकर चल (1985) 7. मधुमिलन क्षेत्र (1988) 8. हमारा हरित नीम (श्रेष्ठ कविताएं खंड-1 एवं 2) (1984)

(6) चीन - श्रीमती याड. ई फड. की 1. चीन और भारत 2. चीन में भारत शीर्षक रचनाएँ प्रकाशित हैं।

विदेशों में हिंदी साहित्य समीक्षा (आलोचना एवं शोध)

हिंदी साहित्य का इतिहास तथा साहित्यिक कृतियों का उन्नीसवीं शताब्दी एवं बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में आलोचनात्मक अध्ययन करने वाले विदेशी विद्वानों में गार्सां द तासी, ग्रियर्सन एवं डॉ. एल0पी0 टेसीटॅरी के नाम सर्वविदित हैं। इनके सम्बंध में हम पुस्तक के बारहवें अध्याय में विचार कर चुके हैं।

समकालीन विद्वानों में रूस के ई0पी0 चेलीशेव का 1968 में लिटरेचुरा हिंदी (हिंदी साहित्य) तथा 1992 में नताल्या मिखाइलोना साजनोवा का मध्यकालीन अष्टछाप के प्रसिद्ध भक्त कवियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर ग्रंथ प्रकाशित हुए।

चीनी भाषा में प्रोफेसर ल्यू आन ऊ ने ‘भारतीय हिन्दीसाहित्य का इतिहास’ , ‘प्रेमचन्द और उनके उपन्यास एवं कहानियाँ’ तथा एसोसिएट प्रोफेसर च्याड. चुड. खुई ने ‘हिन्दी नाटक एवं एकांकी का इतिहास‘ शीर्षक ग्रन्थों का प्रणयन किया।

जापान के विद्वान प्रो0 तानाका ने आधुनिक हिंदी साहित्यकारों एवं विद्वानों पर मौलिक रूप से विस्तृत शोध कार्य किया है। साहित्य का इतिहास, मध्यकालीन हिंदी साहित्य तथा आधुनिक हिंदी साहित्य के क्षेत्र में आलोचनात्मक अध्ययन करने वाले जापानी विद्वानों का विवरण प्रो0 कात्सुरो कोगा ने अपने एक लेख में प्रस्तुत किया है। प्रोफेसर आकिरा ताकाहाशि के मिथिलेश्वर की कहानियों एवं मुल्ला वजही कृत सबरस की दक्खिनी हिन्दी पर किए गए कार्यों के अतिरिक्त दिल्ली विश्वविद्यालय से सन् 1999 में पी-एच०डी० के लिए स्वीकृत शोध प्रबन्ध भी उल्लेखनीय है । इनके शोध प्रबन्ध का शीर्षक है - ‘ नवें दशक के हिन्दी उपन्यासों में नैतिकता बोध ’। प्रोफेसर तेइजि़ साकाता के जापानी में हिन्दी साहित्य का इतिहास तथा सूरसागर पर लिखे गए शोध-निबन्धों का उल्लेख करना आवश्यक है।प्रोफेसर ताइगेर्न हाषिमोतो ने सन्त साहित्य तथा विषेशत: कबीरदास की विचारधारा एवं भाषा पर कार्य किया है।

इंग्लैंड के डॉ. रूपर्ट स्नेल ने राधा वल्लभ सम्प्रदाय पर अनुसंधान किया है।

इस समय विदेशों के 12 से अधिक विश्वविद्यालयों में डॉक्टरेट (पी-एच. डी.) की उपाधि के लिए हिन्दी विभिन्न विषयों पर शोध छात्र शोध कार्य कर रहे हैं।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर – 203 001

855 DE ANZA COURT

MILPITAS

C A 95035 – 4504

(U. S. A.)

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