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September 2014
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कहानी दलित-हरिजन पैकेज

विधानसभा चुनाव सर पर आ गया था․ नेताओं को अपने-अपने पार्टी हाईकमानों से गाँव दौरा का निर्देश मिल चुका था जिसमें शामिल था ‘दलित-हरिजन पैकेज'․

चुनाव के समय ही गाँवों के दिन फिरते है जब नेता लोग गाँव की रूख करते है वरना तो गाँव आधारित फिल्‍मों और धरावाहिकों के सीडी से ही नेता लोग काम चला लेते हैं․ खैर फिलहाल तो पवन पांडेय उर्फ पीपी को अपने विधानसभा क्षेत्र के गाँवों में जाकर दलित-हरिजन पैकेज पर काम करना था․ पीपी वैसे हैं तो छुटभैया नेता पर अपने को तोप से कम नहीं समझते हालांकि बीस सालों से पार्टी के बड़े नेताओं की चापलूसी करते आ रहे है पर विधायक या सांसद का टिकट तो दूर की बात है, नगरपालिका चुनाव के लिए भी टिकट हासिल करने में सफल नहीं हो सके हैं․ इस बार का विधानसभा चुनाव में अपने खालीश चापलूसी की पूंछ हिलाते-हिलाते टिकट तो हासिल कर लिया पीपी ने लेकिन दलित-हरिजन पैकेज पर गाँव जाकर कार्य करना अग्‍निपरीक्षा की तरह लग रहा था उसे․

बहरहाल पीपी अपने प्रिय चमचा दामोदर रजक उर्फ डीआर को लेकर विधानसभा क्षेत्रा के सभी गाँवों में जाने की योजना बना लिये थे․ डीआर पिछले पांच सालों से राजनीति के अखाड़े में दंड पेल रहा था और पीपी को तेल लगा रहा था․ डीआर शहर, गाँव से ही आया था लेकिन पांच सालों में उसे शहर की वो हवा लगी कि गाँव के प्रति घनघोर वितृष्‍णा रखता था․ पीपी की गाँव जाने की योजना सुनकर डीआर कहने लगा था कि मुझे समझ में नहीं आता पीपी भैया कि इंटरनेट ने जमाने को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया, लोग चाँद और मंगल पर घर बनाने की कवायद कर रहे हैं और हमारी पार्टी है कि दलित-हरिजन पैकेज बना रही है․

अरे डीआर जितना भेजा है उतना ही इस्‍तेमाल कर, हमरा तो गाँव तभीए छुट गया था जब हम पार्टी जोन (ज्‍वाइन) किए थे․ अब पार्टी का पैकेज है तो उसपर तो काम करना ही पड़ेगा․तुमको पता भी है डीआर कि संसद भले दिल्‍ली में हो पर वहाँ तक पहुँचने का कच्‍चा रास्‍ता गाँव-देहात होकर ही जाता है इसलिए कल भोर तुम्‍हारे गाँव ‘फुसरीटांड़' चलेंगे वहीं से दलित-हरिजन पैकेज पर कार्य शुरू किया जायेगा․ हाँ साथ में लैपटॉपवा लेना नहीं भूलना, गाँव के अनपढ़वेन को लैपटॉपवा दिखा-दिखा कर और माउसुआ घुमा-घुमा कर चमकावेंगे, तभीए देहतीअन को पता चलेगा कि बेज्ञान, (विज्ञान) कहाँ से कहाँ पहुँच गया है․ जी, ठीक है पीपी भैया․

भोर में दोनों मारूती भान से ‘फुसरीटांड़' गाँव के लिए रवाना हो गए और जब वे गाँव पहुँचे तो फुसरीटांड़ निवासी मारूती भान के चारो तरफ भीड़ लगा दिए․ गाँव का मुखिया धरनी साव डीआर को पहचानने की कोशिश करता रहा, डीआर ने पूछा, काहे हमको घूर रहे हो भाई ? मुखिया अब डीआर को पहचान गया था, अरे भाईयों, ये तो हमरे गाँव की फेकनी धोबिन का बेटवा है रे, काया ही पलट गया है इसका, चार-पांच साल शहर में क्‍या रहा, पूरे शहरी हो गया है․ डीआर कभी पीपी को देखता रहा कभी मुखिया ध्‍रनी साव को․ पीपी भी मुँह खोले डीआर का वंशावली सुन रहा था और भीतर से खुश भी हो रहा था कि अब इस गाँव में दलित-हरिजन पैकेज पर कार्य करना आसान हो जाएगा जिससे पैकेज का अपना हिस्‍सा आसानी से गटका जा सकता है․ हाथ पकड़ कर पीपी ने मुखिया से पूछा था कि यहाँ दास जाति के कितने घर हैं ? मुखिया थोड़ी देर चुप रहा फिर तपाक से बोला लगभग पच्‍चीस घर होगा, नेताजी․ चलिए ले चलिए मुझे दास बस्‍ती में, पीपी ने मुखिया को लगभग आदेश सा दिया था․

डीआर अंदर ही अंदर सुलगते हुए कहा कि काहे पीपी भैया, हमारी धोबी जाति दास से कहीं उपर है, दास लोग हरिजन है जबकि हमलोग दलित, तो दलित-हरिजन पैकेज हमारे यहाँ से काहे नहीं शुरू करते ?

अरे डीआर इसिलिए हम कहते है न कि तुम अभी तक नेता नहीं बन सका है, रहेगा साला चमचा का चमचा ही․ तुमको समझ में नहीं आता है डीआर हम नेता लोग जात-पात से उपर उठे हुए लोग हैं․ हमारे लिए क्‍या दास और क्‍या रजक, लेकिन तुम तो हमें उंची-नीची जाति बतलाने लगा रे․ खैर इसमें कोई मुसीबत नहीं है, चलो तुम्‍हारे यहाँ से ही पैकेज की शुरूआत किए देते है․

पीपी-डीआर आगे-आगे और पीछे-पीछे गाँव की भीड़․ डीआर एक घर के सामने ठीठका, कई सालों बाद आने के कारण उसे फूस का अपना घर पहचान में ही नहीं आ रहा था, सामने बरामदा जहाँ एक खटिया पड़ा था जिसपर लाश की तरह एक गेंदरा पड़ा था․ गेंदरा को डीआर जल्‍दी से हटाकर पीपी को बैठने का कहा, भैया यहीं पर बैठो․ डीआर की माँ फेकनी धेबिन अपने उम्र से कहीं ज्‍यादा उम्रदराज, गरीबी ने अपना काम फेंकनी पर कर दिया था, हो-हल्‍ला सुनकर बाहर आयी और देखकर हतप्रभ रह गयी, बोली अरे दमोदरा किसे साथ लेकर आ गया है रे ?

अगे माइ, ये पीपी साहेब है, बहुत बड़े नेता, तुमसे मिलने और कुछ बात करने आएं हैं, चुनाव आने वाले हैं न, बोट इन्‍हें ही देना․

तब तक पीपी तैयार हो चुके थे पैकेज की बात करने के लिए․ पीपी ने कहा माँ जी हम समझाते है आपको विस्‍तार से․ देखिए माँ जी हमरी पार्टी है न, उसके मन में दलित और हरिजन लोगों के लिए बड़ा हमदर्दी और दया भरा हुआ है, तभीए तो हमलोग शहर से आप सभी का हाल-चाल पूछने चले आयें हैं․

लेकिन बेटवा, फेंकनी ने कहा, याद तो हमरी इलेक्‍शनवे के समय आयी न ? इतने में डीआर की पत्‍नी बासमतीया भी अपने बिछुड़े पति से मिलने बाहर चली आयी․ डीआर अपनी पत्‍नी को गाँव में ही छोड़कर शहर गया था क्‍योंकि उसे शहर में रखने में काफी खर्च होता इसलिए उसे गाँव में ही छोड़ गया था․ खर्च तो बहाना था, शहर में डीआर बेचलर की तरह ही रहना चाहता था जिससे इधर-उधर मुँह मारने में कोई रोकने-टोकने वाला न हो․ खैर डीआर की पत्‍नी का जैसा नाम वैसा रूपरंग था बिल्‍कुल बासमती चावल की तरह इकहरी वदन की, साँवला रंग रूप, कपड़ा धेते रहने के कारण पैर और हाथ की उंगलियों में पानी लग गया था पर कोई भी देखकर बासमतीया को साँवली खुबसूरत औरत ही कहेगा․ पीपी बसमतीया को पोस्‍टमार्टमी नजर से देख रहा था, साँवला इकहरा गठा वदन और भरी-भरी छातियाँ․ पीपी से रहा नहीं गया, अरे डीआर, उसने कहा, तोहरी पत्‍नी तो बालीउड की अच्‍छी-अच्‍छी हिरोइन को मात देने वाली है, रे․․․․हा, हा, हा कर पान से सनी लाल दांतों को दिखाता हुआ, बसमतीया की तरफ मुखातिब हुआ था․ पहली बार डीआर को एहसास हुआ कि पत्‍नी पर बुरी नजर डालने से पति को कैसी तिलमिलाहट होती है․ डीआर अपनी पत्‍नी को कहा काहे वास्‍ते भकलोल की तरह मुँह उठाए खड़ी हो, जा जाकर नेताजी के लिए चाय-नाश्‍ता लाओ․ बसमतीया नजरें नीचे झुकाए अंदर चली गयी थी․ हाँ तो माँ जी बताइए आपलोगों को क्‍या-क्‍या तकलीफ है ? पीपी ने बात शुरू की․ बस हुजूर, फेंकनी ने कहा, दो टेम का दाल-रोटी और किरासन तेल का इंतजाम हो जाता तो हम सब निहाल हो जाते․

अरे डीआर, चुपचाप काहे खड़ा है रे, तुमरा घर है तो क्‍या, पैकेज तो देना है, नोट कर माँ जी की बात को लैपटॉपवा के दलित पैकेज फाइल में․

डीआर सोच रहा था कि रास्‍ते में पीपी ने लैपटॉपवा पर जो डिरामा करने की बात कही थी अब वह अपनी माँ और पत्‍नी को उल्‍लू कैसे बनाए․ इसलिए डीआर ने सचमुच का दलित पैकेज फाइल में अपनी माँ की शिकायत नोट कर लिया था․

ठीक है माँ जी, पीपी ने डीआर की माँ को कहते हुए उठ खड़ा हुआ था, खटिया के चिंचियाने से पीपी चौंका था, डीआर खिसियानी हँसी हँसते हुए कहा था, ससुरी पूरानी हो गई है, अबकी बार आयेंगे तो नयी कॉट लेते आयेंगे․ दोनों हँसते हुए घर से बाहर निकल गये, पीपी एक पूरानी फिल्‍मी धुन ‘दिल ले गयी रे धोबिनिया रामा कैसा जादू डाल के' गुनगुनाते हुए बाहर आ गये थे․ फुसरीटांड़ निवासी फिर उन दोनों के पीछे हो लिए․ अब दास टोला चलना है, डीआर, किधर है बताओ, पीपी ने पूछा था․

डीआर थोड़ा गर्व से बता रहा था, भैया फुसरीटांड़ में कोई दास टोला नहीं है यहाँ तो डोमटोली' है, जिसका प्रधान गुही तूरी है, चलिए गुही तूरी से मिलते हैपीपी और डीआर गुही तूरी के घर पहॅुंचे, गुही अपने मिट्‌टी के घर की चारदीवारी पर बैठा बाँसूरी पर एक पूरानी फिल्‍मी धुन बोले रे पपीहा रे' बजा रहा थाडीआर को देखते ही गुही बाँसुरी बजाना छोड़ खड़ा हो गया था, डीआर ने पीपी को बताया कि यही गुही तूरी हैकैसे हो गुही भाई, लपकर पीपी ने उसे गले लगाना चाहा, गुही नेताओं के गिरगिटिया रंग को समझते हुए अनमने ढ़ंग से गले लगा, तब तक जिज्ञासावश गुही की पत्‍नी शिलवा भी वहाँ आ गयी थीघुटने तक की साड़ी पहनी भरे-भरे वदन की शिलवा की तरफ नमस्‍ते करते हुए पीपी ज्‍यों ही बढ़ा था कि उसने नमस्‍ते का बिना जबाव दिए ही वहाँ से ऐसे भाग खड़ी हुई मानो उसने कोई शिकारी कुत्‍ते को देख लिया हो

हाँ तो गुही भाई, क्‍या-कया समस्‍याएं है डोमटोली में, हमको विस्‍तार से बतलाओ क्‍योंकि हम सब पार्टी की ओर से दलित-हरिजन पैकेज पर काम कर रहें हैं․

गुही खखारते हुए कहा, नेताजी एक ठो समस्‍या रहे तो न, यहाँ तो समस्‍या ही समस्‍या है․

मनरेगा में काम नहीं मिलता ? पीपी ने पूछा था․

काम नहीए के बराबर मिलता है, ज्‍यादातर काम कागजे पर होता है․ गुही हाथ के इशारे से पीपी को दिखाया, वो देखिए नेताजी वहाँ जो गडढ़ा दिख रहा है न, वह मनरेगा का पोखर है जिसमें तनको पानी नहीं रहता है․ पूरा धांधली है नेताजी․ उपर से नीचे तक सब बंदरबांट करते हैं․

डीआर लैपटॉपवा में हरिजन पैकेज फाइल में गुही तूरी की शिकायत और समस्‍या नोट करो․

तब तक शिलवा मट्‌टी से मल-मल कर नहा-धेआ कर बढि़या पीला रंग का साड़ी पहन कर फिर आ गयी थी․ पीपी की पोस्‍टमार्टमी नजर शिलवा पर टिक गयी थी, वह धीरे से डीआर को बोला, अरे डीआर, यहाँ समस्‍या ही समस्‍या है पर डोमटोली की औरतें इतनी तंदरूस्‍त कैसे लगती है रे ? गदराया बदन, भरी-भरी छातियाँ, एक रूपए किलो चावल खा-खा कर बना है न, सरकार तो महिलाओं के लिए बरदान साबित हुई है रे डीआर․

डीआर गाँव के बारे में बताते हुए कहा कि उ बात नहीं है नेताजी, खाने को जो भी कोदो, मडुवा मिलता है, उसे खाकर दिनभर काम करती है ये औरतें, इसलिए बदन में चर्बी नहीं चढ़ता․

ठीक है ठीक है, डीआर, अब चलो, पीपी ने उक्‍ता कर कहा, शहर जाकर बीडियो, सीडी भी बनवाना है और आज के आज ही हाईकमान को दलित-हरिजन पैकेज का रिपोर्ट भी भेजना है। कल फिर किसी दूसरे गाँव का दौरा करेंगे․

‘फुसरीटांड़ दौरा' का वीडियो सीडी बनवा कर तथा अखबार-पत्रिकाओं में रिपोर्ट छपवाकर पार्टी हाईकामन को पीपी ने भेज दिया था․ किरासन तेल और दो-वक्‍त के भोजन के लिए पार्टी ने सरकारी मद से करोड़ो मुहैया करा दिये थे और निर्देश भी दिया था कि दलित-हरिजन लोगों को चावल, दाल और किरासन तेल वितरित करवा दिया जाएं․ पीपी और डीआर ने मिलकर कागजों पर चावल, दाल और किरासन तेल का वितरण फुसरीटांड़ में करवा दिया था․

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंडा

गिरिडीह-815301

झारखंड

ताड़पत्र लेखन से श्रुत लेखन तक हिंदी की विकास-यात्रा

 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

हमारी जनशक्ति देश की और हमारी हिन्दी की भी ताकत है। बहुत साल नहीं हुए जब हम अपनी विशाल आबादी को अभिशाप मानते थे। आज यह हमारी कर्मशक्ति मानी जाती है। भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सही कहा है: ‘अधिक आबादी अपने आप में कोई समस्या नहीं है, समस्या है उस की ज़रूरियात को पूरा न कर पाना। अधिक आबादी का मतलब है अधिक सामान की, उत्पाद की माँग। अगर लोगों के पास क्रय क्षमता है तो हर चीज़ की माँग बढ़ती है।’ आज हमारे समृद्ध मध्य वर्ग की संख्या अमरीका की कुल आबादी जितनी है। पिछले दिनोँ के विश्वव्यापी आर्थिक संकट को भारत हँसते खेलते झेल गया तो उस का एक से बड़ा कारण यही था कि हमारे उद्योगोँ के उत्पाद मात्र निर्यात पर आधारित नहीँ हैँ। हमारी अपनी खपत उन्हें ताक़त देती है और बढ़ाती है।

इंग्लिश-हिन्दी थिसारस द्वारा भारत में कोशकारिता को नया आयाम देने वाले अरविंदकुमार का मानना है कि इसे हिंदी भाषियोँ की और विकसित देशोँ की जनसंख्या के अनुपातोँ के साथ-साथ सामाजिक रुझानोँ को देखते हुए समझना होगा। दुनिया की कुल आबादी मेँ से हिंदुस्तान और चीन के पास 60 प्रतिशत लोग हैँ। कुल यूरोप की आबादी है 73-74 करोड़, उत्तर अमरीका की आबादी है 50 करोड़ के आसपास। सन 2050 तक दुनिया की आबादी 4 से 9 अरब से भी ऊपर हो जाने की संभावना है। इसमेँ से यूरोप और अमरीका जैसे विकसित देशों की आबादी बूढ़ी होती जा रही है। (आबादी बूढ़े होने का मतलब है किसी देश की कुल जनसंख्या मेँ बूढे लोगोँ का अनुपात अधिक हो जाना।) चुनावी नारे के तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा कुछ भी कहें, बुढाती आबादी के कारण उन्हेँ अपने यहाँ या अपने लिए काम करने वालोँ को विवश हो कर, मजबूरन या तो बाहर वालोँ को आयात करना होगा या अपना काम विदेशों में करवाना होगा।

 

युवा भारत से बढ़तीं आशाएँ

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इस संदर्भ मेँ संसार की सब से बड़ी साफ़्टवेअर कंपनी इनफ़ोसिस के एक संस्थापक नीलकेणी की राय विचारणीय है। तथ्यों के आधार पर उनका कहना है कि ‘किसी देश में युवाओँ की संख्या जितनी ज़्यादा होती है, उस देश में उतने ही अधिक काम करने वाले होते हैँ और उतने ही अधिक नए विचार पनपते हैं। तथ्य यह है कि किसी ज़माने का बूढ़ा भारत आज संसार में सबसे अधिक युवा जनसंख्या वाला देश बन गया है। इस का फ़ायदा हमें 2050 तक मिलता रहेगा। स्वयं भारत के भीतर जनसंख्या आकलन के आधार पर 2025 मेँ हिंदी पट्टी की उम्र औसतन 26 वर्ष होगी और दक्षिण की 34 साल।’

अब आप भाषा के संदर्भ में इस का मतलब लगाइए। इन जवानों में से अधिकांश हिंदी पट्टी के छोटे शहरोँ और गाँवोँ में होंगे। उन की मानसिकता मुंबई, दिल्ली, गुड़गाँव के लोगोँ से कुछ भिन्न होगी। उनके पास अपनी स्थानीय जीवन शैली और बोली होगी।

 

तकनीकी दुनिया के साँचे और हिन्दी

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नई पहलों के चलते हमारे तीव्र विकास के जो रास्ते खुल रहे हैँ (जैसे सबके लिए शिक्षा का अभियान), उनका परिणाम होगा असली भारत को, हमारे गाँवोँ को, सशक्त कर के देश को आगे बढ़ाना। आगे बढ़ने के लिए हिंदी वालोँ के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है अपने को नई तकनीकी दुनिया के साँचे मेँ ढालना, सूचना प्रौद्योगिकी में समर्थ बनना।तकनीकी विश्व में हिंदी की बहार दिखाई देती है- सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग में। इनमें से पहला माध्यम चढ़ाव पर तो दूसरे में ठहराव है। जिस अंदाज में हिंदी विश्व ने फेसबुक को अपनाया है, वह अद्भुत है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों को भूल जाइए, लखनऊ, पटना और जयपुर जैसी राजधानियों को भी भूल जाइए, छोटे-छोटे गाँवों और कस्बों तक के युवा, बुजुर्ग, बच्चे फेसबुक पर आ जमे हैं और खूब सारी बातें कर रहे हैं- हिंदी में। 

डॉ. वेदप्रताप वैदिक ठीक कहते हैं कि हिन्दी और संस्कृत मिलकर संपूर्ण कम्प्यूटर-विश्व पर राज कर सकती हैं। वे इक्कीसवीं सदी की विश्वभाषा बन सकती हैं। जो भाषा कम से कम पिछले एक हजार साल से करोड़ों-अरबों लोगों द्वारा बोली जा रही है और जिसका उपयोग फिजी से सूरिनाम तक फैले हुए विशाल विश्व में हो रहा है, उस पर शब्दों की निर्धनता का आरोप लगाना शुद्ध अज्ञान का परिचायक है। 

 

अंतरजाल पर हिन्दी का जाल

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यही है हमारी नई दिशा। कंप्यूटर और इंटरनेट ने पिछ्ले वर्षों मेँ विश्व मेँ सूचना क्रांति ला दी है। आज कोई भी भाषा कंप्यूटर तथा अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रह कर पनप नहीं सकती। नई तकनीक में महारत किसी भी काल में देशोँ को सर्वोच्च शक्ति प्रदान करती है। इसमेँ हम पीछे हैँ भी नहीँ… भारत और हिंदी वाले इस क्षेत्र मेँ अपना सिक्का जमा चुके हैँ। इस समय हिंदी में वैबसाइटेँ, चिट्ठे, ईमेल, चैट, खोज, एसएमएस तथा अन्य हिंदी सामग्री उपलब्ध हैं। नित नए कम्प्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं। इनके बारे में जानकारी दे कर लोगों मेँ  जागरूकता पैदा करने की ज़रूरत है ताकि अधिकाधिक लोग कंप्यूटर पर हिंदी का प्रयोग करते हुए अपना, देश का, हिंदी का और समाज का विकास करें।

हमेँ यह सोच कर नहीँ चलना चाहिए कि गाँव का आदमी नई तकनीक अपनाना नहीं चाहता। ताज़ा आँकड़ोँ से यह बात सिद्ध हो जाती है। गाँवोँ मेँ रोज़गार के नए से नए अवसर खुल रहे हैँ। शहर अपना माल गाँवोँ में बेचने को उतावला है। गाँव अब ई-विलेज हो चला है। तेरह प्रतिशत लोग इंटरनेट का उपयोग खेती की नई जानकारी जानने के लिए करते हैँ। यह तथ्य है कि गाँवोँ में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालोँ का आंकड़ा 54 लाख पर पहुँच जाएगा।

 

मोबाइल और हिन्दी कुंजी पटल

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इसी प्रकार मोबाइल फ़ोन दूरदराज़ इलाक़ोँ के लिए वरदान हो कर आया है। उस ने कामगारोँ कारीगरोँ को दलालोँ से मुक्त कर दिया है। यह उनका चलता फिरता दफ़्तर बन गया है और शिक्षा का माध्यम। हर माह करोड़ों नए मोबाइल ग्राहक बन रहे हैं। अब सेल फोन का इस्तेमाल कृषि काल सैंटरों से नि:शुल्‍क  जानकारी पाने के लिए, उपज के नवीनतम भाव जानने के लिए किया जाता है। यह जानकारी पाने वाले लोगोँ में हिंदी भाषी प्रमुख हैँ। उनकी सहायता के लिए अब मोबाइलों पर इंग्लिश के कुंजी पटल की ही तरह हिंदी का कुंजी पटल भी उपलब्ध हो गया है।

हिंदी वालोँ और गाँवोँ की बढ़ती क्रय शक्ति का ही फल है जो टीवी संचालक कंपनियाँ इंग्लिश कार्यक्रमोँ पर अपनी नैया खेना चाहती थीँ, वे पूरी तरह भारतीय भाषाओँ को समर्पित हैँ। सरकारी कामकाज की बात करेँ तो पुणेँ में प्रख्यात सरकारी संस्थान सी-डैक कंप्यूटर पर हिंदी के उपयोग के लिए तरह तरह के उपकरण और प्रोग्राम विकसित करने मेँ रत है। अनेक सरकारी विभागोँ की निजी तकनीकी शब्दावली को समो कर उन मंत्रालयोँ के अधिकारियोँ की सहायता के लिए मशीनी अनुवाद के उपकरण तैयार हो चुके हैँ। अभी हाल सी-डैक ने ‘श्रुतलेखन’ नाम की नई विधि विकसित की है जिस के सहारे बोली गई हिंदी को लिपि में परिवर्तित करना संभव हो गया है। जो सरकारी अधिकारी देवनागरी लिखने या टाइप करने में अक्षम हैं, अब वे इसकी सहायता से अपनी टिप्पणियाँ या आदेश हिंदी में लिख सकेंगे। यही नहीं इस की सहायता से हिंदी में लिखित कंप्यूटर सामग्री तथा एसएमएस आदि को सुना भी जा सकेगा।

निस्संदेह हिन्दी के विकास में सम्पूर्ण क्रांति की नई लहर-सी चल पड़ी है। वह नए भारत का प्रतीक  बनती जा रही है।

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प्राध्यापक,हिन्दी विभाग

दिग्विजय कालेज,राजनांदगांव

डॉ.चन्द्रकुमार जैन

की

पांच प्रेरक कविताएँ

 

हौसला

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काँटों से डरने वाले

फूल-फल पा नहीं सकते

तूफां से डरने वाले

साहिल पा नहीं सकते

स्वयं चूमती चरण मुसीबत

जांबाजों की इस दुनिया में

सफ़र से डरने वाले

मंज़िल पा नहीं सकते। 

 

सुबह

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दो रातों के बीच सुबह है

दोष न उसको देना साथी

दो सुबहों के बीच रात भी

एक ही जीवन में है आती !

आगत का स्वागत करना है

विगत क्लेश की करें विदाई,

शाम बिखरकर, सुबह जो खिलीं

कलियाँ कुछ कहतीं मुस्कातीं !

 

पूजा

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किसी के काम आ जाएँ

अगर ये हाथ तो पूजा हुई !

किसी के दर्द में दो पल हुए

गर साथ तो पूजा हुई !

माना कि प्रार्थना में होंठ

रोज़ खुलते हैं मगर,

आहत दिलों से हो गई

कुछ बात तो पूजा हुई !

 

ख्वाहिश

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क्यों यहाँ हर शख्स औरों में

किसी की खोज में है ?

ख़बर अपनी ही नहीं उसको

न ही वह होश में है !

पाँव के नीचे ज़मीं

चाहे न हो पर देखिए तो

आसमां की बुलंदी छूने की

ख़्वाहिश जोश में है !

 

ज़िंदगी

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मिली हुई दुनिया की दौलत

भूल न जाना माटी है !

हाथ न आई है जो अब तक

दौलत वही लुभाती है !

लेकिन इस खोने-पाने की

होड़-दौड़ भी अद्भुत है,

भूल गए हम जीना भी है

श्वांस भी आती-जाती है !

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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी कालेज,

राजनांदगांव।

चिंतन

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टीस उसे उठती है जिसका भाग्य खुलता है !

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

घटना है वर्ष १९६० की. स्थान था यूरोप का भव्य ऐतिहासिक नगर तथा इटली की राजधानी रोम। सारे विश्व की निगाहें २५ अगस्त से ११ सितंबर तक होने वाले ओलंपिक खेलों पर टिकी हुई थीं। इन्हीं ओलंपिक खेलों में एक बीस वर्षीय अश्वेत बालिका भी भाग ले रही थी. वह इतनी तेज़ दौड़ी, इतनी तेज़ दौड़ी कि १९६० के ओलंपिक मुक़ाबलों में तीन स्वर्ण पदक जीत कर दुनिया की सबसे तेज़ धाविका बन गई.

रोम ओलंपिक में लोग ८३ देशों के ५३४६ खिलाड़ियों में इस बीस वर्षीय बालिका का असाधारण पराक्रम देखने के लिए इसलिए उत्सुक नहीं थे कि विल्मा रुडोल्फ नामक यह बालिका अश्वेत थी अपितु यह वह बालिका थी जिसे चार वर्ष की आयु में डबल निमोनिया और काला बुखार होने से पोलियो हो गया और फलस्वरूप उसे पैरों में ब्रेस पहननी पड़ी। विल्मा रुडोल्फ़ ग्यारह वर्ष की उम्र तक चल-फिर भी नहीं सकती थी लेकिन उसने एक सपना पाल रखा था कि उसे दुनिया की सबसे तेज़ धाविका बनना है। उस सपने को यथार्थ में परिवर्तित होता देखने वे लिए ही इतने उत्सुक थे पूरी दुनिया वे लोग और खेल-प्रेमी.

डॉक्टर के मना करने के बावजूद विल्मा रुडोल्फ़ ने अपने पैरों की ब्रेस उतार फेंकी और स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर अभ्यास में जुट गई. अपने सपने को मन में प्रगाढ़ किए हुए वह निरंतर अभ्यास करती रही. उसने अपने आत्मविश्वास को इतना ऊँचा कर लिया कि असंभव-सी बात पूरी कर दिखलाई. एक साथ तीन स्वर्ण पदक हासिल कर दिखाए। सच यदि व्यक्ति में पूर्ण आत्मविश्वास है तो शारीरिक विकलांगता भी उसकी राह में बाधा नहीं बन सकती.

लेखक सीताराम गुप्ता ने सच्ची घटना पर आधारित इस लघु कथा में वैसे तो हौसले की जीत की एक प्रचलित सी चित्रकारी की है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसा साहस, ऐसा जीवट, कभी घुटने नहीं टेकने वाली ऎसी लगन इस दुनिया में कोई आम बात भी नहीं है. कोई बड़े दिल का व्यक्ति ही परमात्मा का ऋण चुकाने के लिए, अपनी सारी सीमाओं, समस्त अभावों को ताक पर रखकर इस तरह प्रदर्शन कर दिखाता है जैसा रुडोल्फ ने किया. वरना प्रकृति की मार या किसी दुर्घटना का शिकार होने के बाद तो अक्सर यही देखने में आता है कि इंसान खुद को दुनिया वालों से बिलकुल खपा सा जीने लगता है. दरअसल ज़िन्दगी में, अगर गहराई में जाकर समझने की कोशिश करें तो दर्द सचमुच बड़े नसीब वालों के हिस्से में आता है. इसे राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने इस ख़याल को बड़ी सुन्दर अभिव्यक्ति दी हैं. उनकी पंक्तियाँ एक बार पढ़िए तो सही -

ह्रदय अगर छोटा हो


तो दुःख उसमें नहीं समाएगा


और दर्द,


दस्तक दिए बिना ही लौट जाएगा.


टीस उसे उठती है


जिसका भाग्य खुलता है,


वेदना गोद में उठाकर


सबको निहाल नहीं करती


जिसका पुण्य प्रबल होता है


वही अपने आँसुओं से धुलता है.

तो है न यह पते कि बात ? वास्तव में इस दुनिया में हौसले की हार कभी नहीं होती. सबसे बड़ी बात है जो जैसा है, जहाँ पर है, जिस हालात में भी है, वहाँ से एक कदम आगे बढ़ने, कुछ नया, कुछ अलग कर दिखाने के लिए वह तैयार है या नहीं ? शिकस्त कोशिश की कभी नहीं होती. हर अगर होती भी है तो इंसान की इस सोच के कारण कि वह चुक गया है. जबकि देखा जाये तो बुरे से बुरे दिन गुज़ार रहे आदमी के लिए भी कुछ न कुछ अच्छा कर दिखाने की संभावना हमेशा जीवित रहती है. 

आइये, कुछ पल के लिए यदि आप खुद को सुखी या समर्थ नहीं मानते हैं तो कुछ ऐसे हालातों की कल्पना करें जिन्हें आप अक्सर नज़रंदाज़ कर दिया करते हैं. उदाहरण के लिए

अगर बारिश में आपको घर से निकलने में डर लग रहा हो तो उस व्यक्ति के विषय में आप क्या कहना चाहेंगे जो मात्र दो वर्ष के अपने कलेजे के टुकड़े को भारी बाढ़ के बीच खुद लगभग गले तक नदी के पानी में डूबे रहकर भी उसे अपने सिर पर एक टोकरी में रखे हुए किनारे तक पहुँचने की हरसंभव कोशिश कर रहा हो ? इसी तरह जब कभी आपको लगे की आपकी तनख्वाह कम है या आमदनी पर्याप्त नहीं है तब पल भर के लिए उस गरीब बच्चे के बारे में सोचें जिसे उसके माँ-बाप का अता-पता नहीं है और जो अपने पावों से लाचार भी है, उस पर भी वह पूरी हिम्मत से घिसट-घिसट कर ही सही, लेकिन मदद की गुहार लेकर आप जैसे कई कई भाग्यवान लोगों तक पहुँचने से नहीं कतराता. 

ठहरिये, एक और सीन देखिये. फ़र्ज़ कीजिए कि आप किन्हीं कारणों से जिंदगी की जंग अब और लड़ने के लिए तैयार नहीं है यानी मैदान छोड़ देने में ही भलाई समझ रहे हैं. यदि भगवान न करे फिर भी अगर हालात ऐसे ही बन पड़े हैं तो पल भर रूककर एक ऐसे पिता की कल्पाना कीजिए जो बैसाखी के सहारे मुश्किल से एक ही जख्मी पाँव से चल पाता हो. फिर भी मात्र छह वर्ष के अपने लाडले की रनिंग सायकिल के कैरियर को थामे हुए मीलों का सफ़र तय करने की खातिर तैयार हो. 

सच ही कहा गया है कि अगर हम गौर करें हो ऊपर वाले ने हर हाल में हमें इतनी नेमत बख्सी है कि हम चाहें तो उसे सौभाग्य में बदल सकते हैं. जरूरत इस बात की है कि हम शिकायत करना छोड़कर समाधान की राह पर चलना शुरू कर दें. 

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राजनांदगांव,छत्तीसगढ़

लघुकथा

अनवर चाचू

काम का जैसे जुनून सवार रहता अनवर पर, बस आप काम बोलिए, वह करने को तत्‍पर। आलस तो उससे कोसों दूर भागती। अनवर गरीब जरूर था लेकिन उसे रूपए-पैसे से मोह नहीं था। वह रईस दिलजान अहमद के किराना स्‍टोर में काम करता था। मालिक जब उसे तनख्‍वाह देता तो देने के पहले कई बार थूक लगा-लगा कर गिनता पर अनवर के हाथ में आते ही वह बिना गिने रूपए रख लेता और या तो काम में लग जाता या घर जाने के लिए निकल पड़ता।

दिलजान अहमद जब अकेले होते तो सोचते कि जितनी तनख्‍वाह वह अनवर को देते, उससे दुगनी रकम के वे अनवर के कर्जदार हो जाते। जितना काम अनवर करता है उसे तय तनख्‍वाह से अधिक मिलना ही चाहिए लेकिन यह दिलजान अहमद के सोच तक ही रही कभी हकीकत न बन पायी।

अनवर न सिर्फ दुकान का काम करता बल्‍कि फल-सब्‍जी वगैरह भी ला देता, बच्‍चों को स्‍कूल भी ले जाता और ले आता। दिलजान का दिल होता था कि वह अनवर से उसके बाल-बच्‍चों के बारे में भी पूछे लेकिन दिलजान की दिल की बात दिल में ही रह जाती। दुकान चलाने में इतनी व्‍यस्‍तता होती कि वह अनवर से कभी यह नहीं पूछ पाया कि उसके बाल-बच्‍चे स्‍कूल भी जाते है या नहीं ?

अनवर जब मालिक के बच्‍चों को स्‍कूल पहुंचाने और स्‍कूल से लाने जाता तो बच्‍चे कभी चॉकलेट, कभी मिठाई, कभी कोई खिलौना लेने की जिद करते, उसे अनवर खरीद देता था। कभी जब बच्‍चे अपने अब्‍बू दिलजान से कोई चीज लाने की जिद करते और दिलजान उसे टाल देता तो बच्‍चे अपने अब्‍बू को कह देते कि अनवर चाचू से बोलकर मंगवा लेगा। दिलजान मन ही मन सोचता कि अनवर इतना कुछ मेरे बच्‍चो, परिवार के लिए करता है, इस बार ईद में अगर नयी नहीं तो पुरानी कमीज, पजामा, पतलून उसे जरूर देगा। हालांकि ईद के कुछ दिन पहले से ही अपने कीमती मोबाइल फोन पर एलर्ट सूचना में अनवर को पुराने कपड़े दिए जाने की बात दिलजान ने डाल दिया था लेकिन इस बार भी ईद में अपनी बीवी, दो बेटों और दो बेटियों और हां खुद के नये कपड़े खरीदने में इतना व्‍यस्‍त रहा कि पुराने कपड़े अनवर को देने भी है, उसके दिमाग से उतर गया।

चाँद रात को दिलजान को बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई जब उसने देखा कि अनवर दिलजान के बच्‍चों के लिए उनके फरमाइश के नये-नये जीन्‍स और झालर वाला लंहगा लाकर बच्‍चेां को देकर उनके साथ खेल रहा है और खुश भी हो रहा है।

दिलजान ने झेंपते हुए कहा कि इसकी क्‍या जरूरत थी अनवर, मैंने तो बच्‍चों के लिए नये कपड़े खरीद दिये थे। खैर तुम्‍हें कितने रूपए दूं बच्‍चों के नये कपड़े लाने के लिए। अनवर मुस्‍करा दिया, छोड़िए न मालिक आपके बच्‍चे मुझे चाचू कहते है तो ईद में उन्‍हें नये कपड़े देने का मुझे भी तो हक है और ईद की बेइंतहा खुशी को समेटे अनवर अपने बच्‍चों के साथ ईद मनाने घर की ओर चल पड़ा था।

दिलजान के बच्‍चे अपने अनवर चाचू को अलविदा कहते हुए हाथ हिला रहे थे

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लघुकथा

मातमी कौन ?

शर्मा जी लंबी बीमारी के बाद आज नहीं रहे․ पत्‍नी पहले ही उन्‍हें छोड़ गयी थी․ तीन बेटों में से एक विदेश जा कर बस गया था, दो बेटों और उनका परिवार शर्माजी के साथ ही रहता था लेकिन न तो बहुओं को और नहीं बेटों को फुर्सत थी शर्माजी की तीमारदारी की․ दो बेटियाँ अपने-अपने ससुराल से फोन पर बीमार पिता का हाल-चाल पूछती रहती थी․ छोटे बेटे के ससुर फोन पर अपनी बेटी से पूछते रहते थे कि ‘‘कब तक शर्माजी बिस्‍तर पर पड़े रहेंगे ?'' जवाब में छोटी बहु बताया करती कि ‘‘अब सिकुड़ कर शर्माजी छोटे हो गये है, दवाई पर और कुछ दिन !''

चौदह वर्ष का कार्तिक ही था जो शर्माजी की सेवा-टहल किया करता था․ शुरू से अनुशासन में रहने की वजह से बीमारी में भी अनुशासित ही रहे शर्माजी․ कार्तिक समय का पाबंद था, शेविंग से लेकर नाश्‍ता, खाना, हार्लिक्‍स, लीकर चाय सब टे्र नेपकीन के साथ कार्तिक समय-समय पर शर्माजी को देता रहता․ समय कार्तिक रट गया था․ आठ बजे नाश्‍ता, दस बजे लीकर चाय, डेढ़ बजे सूप, दो बजे खाना, चार बजे लीकर चाय, सात बजे शाम हार्लिक्‍स, जरूरत पड़ने पर दौड़कर नाक में श्‍वास यंत्र लगाना, पैरों में दर्द होने पर हल्‍का मालिश․ शर्माजी के अपने बेटों को उन्‍हें देखने की भी फुर्सत नहीं थी लेकिन कार्तिक बड़े उत्‍साह और मुस्‍तैदी से शर्माजी की देखभाल करता․ शर्माजी ने उसे पढ़ना भी सीखा दिया था, अब कार्तिक सूबह का अखबार, शाम में साहित्‍यिक पत्रिका पढ़-पढ़ कर शर्माजी को घंटों सुनाया भी करता था․

शर्माजी के मरते ही मातम मनाने वालों का तांता लग गया था․ पास-पड़ोस के औरत-मर्द आते और शर्माजी के शव को दूर से ही पाँव छूने का दिखावा करते जाते․ कोई कहता, ‘जब तक जिंदा रहे, आप लोगों ने इलाज और देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ा․' कुछ औरतें तो इससे भी एक कदम आगे बढ़कर रोते हुए शर्माजी की बहुओं से पारी-पारी से चिपट रहीं थीं, कई तो आर्द्र स्‍वरों में विलाप कर उठतीं․ मातमपुर्सी से समय निकालकर कई औरतों ने कार्तिक को निकाल बाहर करने की सलाह देने से भी नहीं चुकी, बेकार के खर्च बढ़ाने से क्‍या फायदा ?

शर्माजी के बेटे-बहु सभी व्‍यस्‍त थे मातमपूर्सी के लिए आए मेहमानों की देखरेख में, नाश्‍ता-चाय का दौर चलवाने में, सिर्फ कार्तिक ही था जिसकी आँखें डबडबायी एकटक शर्माजी को देख रही थी, कार्तिक सोच रहा था दिन के डेढ़ बज रहे थे, ये शर्माजी के सूप पीने का वक्‍त था․

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंडा

गिरिडीह-815301

झारखंड

 

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गीता दुबे

कहानी -

आतिफ हुसैन से अखिलेश साहू

 

“हलो तिवारी जी, जमशेदपुर से हरीश शुक्ला बोल रहा हूँ।”

‘हाँ सर कहिए, क्या सेवा कर सकता हूँ’---- उधर से तिवारी जी ने जवाब में कहा।

“कल स्टील एक्सप्रेस से हावड़ा पहुँच रहा हूँ, गाड़ी चाहिए थी।”

‘ठीक है,मिल जाएगी,कौन सी गाड़ी लेंगे?’

“इस बार बड़ी गाड़ी इनोवा दीजीएगा, हम छह लोग हैं”

‘ठीक है सर, लेकिन आप हावड़ा उतरने के बजाए पहले वाली स्टेशन ‘संतरागाछी’ उतर जाइयेगा, वहीँ से हमारा ड्राइवर आपको पिक कर लेगा। हावड़ा में गाड़ी को लाइन पर आते-आते काफी समय लग जाता है। मैं इनोवा का नंबर और ड्राइवर का मोबाईल नंबर SMS कर देता हूँ’ कहकर तिवारी जी ने फोन रख दिया।

कोलकाता में तिवारी जी की करीब एक दर्जन गाड़ियाँ चलतीं हैं। मिर्जापुर से रोजगार की तलाश में तिवारी जी कोलकाता आये थे। रोजगार न मिलने पर उन्होंने मारुती800 खरीदी और खुद ही ड्राइवर बन कोलकाता में गाड़ी चलाने का काम करने लगे। और आज पैंतीस वर्ष बाद तिवारी जी के पास सभी तरह की गाड़ियाँ इनोवा, इंडिका, ऐम्बेसडर, टवेरा, इंडिगो....... करीब एक दर्जन से भी ज्यादा गाड़ियाँ हैं, ड्राइवर हैं। बासठ वर्षीय तिवारी जी अब घर पर ही रहते हैं और फोन से ही अपना कारोबार सँभालते हैं। हरीश जब भी कोलकाता आते हैं तिवारी जी की ही गाड़ी लेते हैं। हरीश शुक्ला घूमने के शौक़ीन हैं। यात्रा के दौरान भांति-भांति के लोगों से मिलना, भांति-भांति की संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान के बारे में जानना वे पसंद करते हैं। पति-पत्नी दोनों कमाऊ हैं, अच्छी-खासी आमदनी है। आमदनी का कुछ भाग वे अपनी शौक पूरा करने में खर्च करते हैं और साल में एक बार कहीं न कहीं यात्रा पर परिवार सहित निकल ही जाते हैं। लेकिन इस छुट्टी में उन्होंने सोचा कि माँ-बाबूजी की अब उम्र हो चली है, पता नहीं कब......क्यूँ न इन्हें तीर्थ करवा दूँ! और उन्होंने परिवार सहित गंगा-सागर जाने का प्लान बना डाला।

अगली सुबह निर्धारित समय पर ट्रेन ‘सान्तारागाछी’ पहुँच गई और बड़ी आसानी से शुक्ला जी ने ‘इनोवा’ और ‘ड्राइवर’ दोनों ढूंढ लिया। होटल पहुँच कर उन्होंने ड्राइवर को अगली सुबह भोर चार बजे गंगा-सागर के लिए बुला लिया। हरीश शुक्ला जी चार बजे भोर में  अपने माता-पिता, पत्नी और दोनों बच्चों के साथ इनोवा पर सवार होकर गंगा सागर के लिए निकल पड़े। खुद ड्राइवर की बगलवाली सीट पर इतमीनान होकर बैठ गये और लगे ड्राइवर से बतियाने,

‘तब कितने दिनों से कोलकाता में गाड़ी चला रहे हो’?

“बहुत दिन हो गये साहब, बीस साल से ज्यादा हो गये होंगे।”

‘कहाँ के रहने वाले हो?’

“गिरीडीह” साहब

‘अरे तो तुम तो अपने ही तरफ के निकले झारखंडी, हम जमशेदपुर से हैं’ और फिर दोनों हंसने लगे। साथ- साथ पीछे बैठे हरीश शुक्ला के माँ, बाबूजी, पत्नी और दोनों बच्चे भी मुस्कुराने लगे। शुक्ला जी फिर शुरू हो गये।

‘तब घर में कौन-कौन है?’

‘सभी हैं साहब, माँ, बाप, भाई, बच्चे और घरवाली लेकिन....

‘लेकिन क्या?’ शुक्ला जी ने उत्सुकता वश पूछा।

‘सब गिरिडीह में रहते हैं’

‘क्यों यहाँ परिवार क्यों नहीं लाये’

‘नहीं साहब हमारा काम ही ऐसा है। कभी-कभी हफ्ता-हफ्ता गाड़ी लेकर बाहर रहना पड़ता है। ऐसे में परिवार को कौन देखेगा... ठीक है गाँव पर माँ-बाप हैं, देखने के लिए।

‘तब तो गिरिडीह हमेशा जाते होगे’

‘हाँ साहब’...........

इसी तरह शुक्ला जी और ड्राइवर के बीच बातें होतीं रहीं, पीछे बैठे सभी लोग भी उनकी बातों का आनंद लेते रहे और रास्ते का पता ही नहीं चला, गंगा-सागर घाट आ गया। सभी गाड़ी से उतरने लगे। शुक्ला जी की माता को घुटने में हमेशा दर्द रहता  है। वह काफी संभल-संभल कर उतर रहीं थीं लेकिन फिर भी उनका पैर मुचक गया और वह जैसे ही गिरने को हुईं ड्राइवर जो कि वहीँ खड़ा था, लपका और उन्हें सहारा देकर गिरने से बचा लिया। ड्राइवर को पैसे देते वक्त शुक्ला जी ने उससे कहा-----‘चलो अच्छा लगा तुमसे बातें कर... अरे लेकिन मैंने तो अभी तक तुमसे तुम्हारा नाम नहीं पूछा, क्या नाम है तुम्हारा?

“आतिफ हुसैन” साहब

शुक्ला जी की माता ने जैसे ही उसके नाम सुने शुक्ला जी पर बिगड़ गईं,जोर जोर से कहने लगीं---‘ अरे बबुआ हम त अशुद्ध हो गईनी... उ मुसलमनवा हमरा के छू देलस..... उ काहे के छुअलस ह....., उ कुजात ....( मुझे उस मुस्लमान ने छू दिया, अब मैं तो अशुध्द हो गई)

शुक्ला जी अपनी माता पर खीजते हुए बोले ----‘ये क्या बक रही हो माँ, उसने तो तुम्हे बचाया नहीं, तुम बड़ी जोर से गिर पड़ती, पैर टूट जाते तुम्हारे’ लेकिन उनकी माता सुनने वाली न थीं, वह बोले जा रहीं थीं।

फिर शुक्ला जी ने कहा---‘गंगा जी में डुबकी लगा लेने पर सब-कुछ शुद्ध हो जाता है।

‘काहे के बबुआ, अबकी त हम ना डुबकी लगाइब, गंगा मईया खिसिया जाईहें। घरे जाईब सतनारायण जी के पूजा करवाईब तब ही गंगा मईया मनीहें।’ (इस बार मैं गंगाजी में डूबकी नहीं लगाउंगी गंगा माँ नाराज हो जाएँगी, घर जाकर सत्यनारायण जी का पूजा करवाऊंगी तब ही गंगा माता खुश होंगीं।)

ड्राइवर आतिफ हुसैन ने जैसे ही यह सब सुना वहाँ से ओझल हो गया।

इस घटना को हुए पूरे छह साल बीत चुके थे। इस बार शुक्ला जी अपने दोनों बच्चो और पत्नी के साथ केरल घूमने जा रहे थे। जमशेदपुर से कोलकाता, फिर कोलकाता से बैंगलोर की उनकी फ्लाईट थी। उन्होंने तिवारी जी से फोन कर हावड़ा इंडिका गाड़ी भेज देने के लिए कह दिया था। शुक्ला जी के कहेनुसार तिवारी जी ने इंडिका गाड़ी हावड़ा भेज दी थी। हावड़ा पहुंचकर शुक्ला जी इंडिका में बैठ चुके थे। खुद आदतन ड्राइवर की बगलवाली सीट पर जा बैठे और पत्नी एवं दोनों बच्चे पीछे वाली सीट पर। इंडिका कार अब ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हवाई अड्डा’ की तरफ बढ़ रही थी। ड्राइवर ने तो शुक्ला जी को पहचान लिया, शुक्ला जी ड्राइवर को पहचान पाए कि नहीं पता नहीं। शुक्ला जी ने फिर ड्राइवर से बतियाना शुरू किया।

‘क्यों तुम्हारा क्या ख्याल है, नरेंद्र मोदी के आने से क्या सचमुच हमारे अच्छे दिन आने वाले है?’

ड्राइवर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया -----‘क्यों नहीं साहब, अच्छे दिन तो अवश्य आयेंगे। कमल खिल चुका है।’

शुक्ला जी ने भी मुस्कुराते हुए कहा---‘अच्छा तो तुम भी मोदी सपोर्टर निकले।’

कुछ ही देर में वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस कोलकाता एअरपोर्ट पहुँच चुके थे। शुक्ला जी ने ड्राइवर को पैसे देते हुए कहा----‘अरे भाई हमने तुमसे इतनी बातें कीं लेकिन तुम्हारा नाम नहीं पूछा। ‘क्या नाम है तुम्हारा’?

‘अखिलेश साहू’ साहब। कुछ रूककर फिर उसने पूछा ‘माँ जी इस बार साथ नहीं आई?’

हरीश शुक्ला की आखें उस ड्राइवर को बड़े गौर से देख रहीं थीं शायद उनकी आखें उस ड्राइवर को पहचानना चाह रहीं थीं

 

गीता दुबे, जमशेदपुर

झारखण्ड

पाँच साहित्यिक सुभाषित

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

 

लेखक चेतना जगाता है

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एम.टी.वासुदेवन नायर लिखते हैं - साहित्य साक्षी होता है मानवीय दुर्गति का,न्यायिक निषेध का। वह समस्त निष्ठुरताओं का गवाह तो है पर उसके पास कोई तैयार निदान या समाधान नहीं है। एक राजनीतिज्ञ कह सकता है - 'तुम मुझे वोट दो, मैं देश को स्वर्ग बना दूँगा।' एक धार्मिक व्यक्ति कह सकता है - 'मेरी राह चलो, निश्चित स्वर्ग मिलेगा।' परन्तु एक लेखक नहीं कह सकता की मेरी रचना पढो, तुम दूसरे ज़हां में पहुँच जाओगे या कि मैं सब कुछ ठीक कर दूँगा। इस विषय में लेखक कुछ भी नहीं कर सकता। वह तो मानवीय यातना की विस्तीर्ण धरती का एक मूक साक्षी है। वह तो केवल अपनी चिंताएँ बाँट सकता है, चेतना जगा सकता है कि देखो यह चीजें हैं जो व्यवस्था को खोखला कर रही हैं, इनसे सावधान रहो

 

हटाने की मानसिकता

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प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी का कहना है - पहले जहाँ लिखा था : 'बीवेर, नैरो ब्रिज अहेड',अब वहाँ आ गया है : 'सावधान, पुलिया संकीर्ण है।'उस पुल से गुजरने वाले बहुतेरे लोगों के लिए'सावधान, पुलिया संकीर्ण है' भी उतना ही अंग्रेजी जितना कि 'नैरो ब्रिज अहेड' था। अगर अंग्रेजी की ज़गह हिन्दी इसलिए लिखी गई कि लोग पुल सेगुज़रने के पहले जान लें कि वह संकरा है तो यह इरादा पूरा नहीं हुआ है। हिन्दी ने अंग्रेजी को सिर्फ़ हटाया है।हिन्दी के जन संचार की प्रभावी भाषा न बन पाने के पीछे सबसे बड़ा कारण हिन्दी और अंग्रेजी वालों की यह हटाने की मानसिकता है।

 

मन तो ताजा करने वाली यादें

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आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने क्या खूब लिखा है -प्रभावित होना और प्रभावित करना जीवंतता का लक्षण है। कुछ लोग हैं, जो प्रभावित होने को दुर्बलता मानते हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। जो महत् से, साधारण में छिपे असाधारण से प्रभावित नहीं होते, मैं उन्हें जड़ मानता हूँ। चेतन तो निकट सम्पर्क में आने वालों से भावात्मक आदान-प्रदान करता हुआ आगे बढ़ता जाता है। जिस व्यक्ति या परिवेश से अन्तर समृद्ध हुआ हो, उसे रह-रहकर मन याद करता ही है...करने के लिए विवश है। जब चारों तरफ़ के कुहरे से व्यक्ति अवसन्न होने लगता है  तब ऐसी यादें मन को ताजगी दे जाती हैं।

 

महावीर के मौन का रहस्य

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अमृता प्रीतम की लेखनी समझती है - दुनिया में एकमात्र रचना है, जो एक लम्बी खामोशी से तरंगित हुई थी.ओशो बताते हैं कि महावीर बरसों खामोश रहे। कोई सूत्र उन्होंने लिख-बोलकर नहीं बताया, पर उनके ग्यारह शिष्य हमेशा उनके क़रीब रहते थे। उन्होंने महावीर जी की खामोशी को तरंगित होते  हुए देखाऔर उसमें से जो अपने भीतर सुना,अकेले-अकेले वह एक जैसा था। ग्यारह शिष्यों ने जो सुना वह एक जैसा था। उन्होंने वही कलमबद्ध किया और उसी का नाम जैन सूत्र है।

 

मुगालते से कोसों दूर

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हिन्दी ग़ज़लों के बेताज बादशाह दुष्यंतकुमार अपने संग्रह साये में धूप में सचेत करते हैं -  ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है जब तकलीफ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है. उसमें फँस कर गमें जानां और गमें दौरां तक एक हो जाते हैं. मुझे अपने बारे में मुगालते नहीं रहे. मैं मानता हूँ मैं गालिब नहीं हूँ. उस प्रतिभा का शतांश भी मुझमें नहीं है. लेकिन मैं यह भी नहीं मानता कि मेरी तकलीफ गालिब से कम है या मैंने उसे कम शिद्दत से महसूस किया है. हो सकता है,अपनी-अपनी पीड़ा को लेकर हर आदमी को यह वहम होता है.लेकिन इतिहास मुझसे जुड़ी हुई मेरे समय की तकलीफ का गवाह ख़ुद है.बस अनुभूति की इसी जरा-सी पूंजी के सहारे मैं उस्तादों और महारथियों के अखाड़े में उतर पड़ा।

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प्राध्यापक, दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव

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भेड़िया आया

वो फफकती हुई अपने बॉस कमरे से निकली। बाहर इतनी देर से लगे कानों ने अपनी आँखो पर विशवास करने के लिए उसकी ओर देखा, उसने सुड़क-सुड़क के अपनी नाक साफ़ करके इधर-उधर देखा ओर रोती हुई भाग गई। सारे कान, आँख बनें एक दूसरे मिले फिर मुंह बनकर फुसफुसाने लगे। ये फुसफुसाहट पूरे ऑफिस में जल्दी ही चर्चा का विषय बन गई। बात फैल गई थी कि उस लड़की को उसके एक कलीग ने पन्द्रह दिन पहले रात के अंधेरे में सेक्सुएल हरेस करने की कोशिश की है। इस बात पर सब उससे सहानुभूति कर रहे थे।

अगले दिन की सुबह बहुत अजीब थी वो आदमी जब ऑफिस आया तो उसका चेहरा बहुत बीमार, उदास और रोया हुआ सा था। और वो लड़की एकदम फ्रेश, सिर उठाकर कोरिडोर में जा रही थी दोनों की नजरें मिलीं लड़की ने बहुत गर्व से यूँ देखा कि -

“देखो मैंने तुमसे अपना बदला ले लिया। सारा ऑफिस तुम पर थू-थू कर रहा है। अब देखो मैं तुम्हें कैसा मजा चखाती हूं”

वो आदमी सोच रहा था पता नहीं ये लड़की कब सुधरेगी मैंने उसे दिन उस लड़के साथ बाथरुम में डांट दिया था कि “तुम्हें शर्म नहीं आती कि तुम आदमियों के बाथरुम में इस लड़के साथ आ गई हो, जाओ यहां से वरना मैं तुम्हारी कम्पलेंट कर दूंगा”।

लड़के को तो उसने दूसरी जगह ट्रांसफर करवा दिया। बात आई-गई हो गई। उस आदमी को लगा चलो मैंने उस युवती को सुरक्षित कर दिया पर एक महीने बाद वो किसी ओर के साथ दिखी उसी तरह बाथरुम में। आदमी ने उस युवती और आदमी को फिर डांटा कि तुम जानते हो क्या कर रहे हो। इसकी तो नौकरी जाएगी ही साथ ही तुम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी। आदमी ने सोचा वो किसी का जीवन सुधार कर अच्छा कर रहा है। वो चुपचाप आया और अपना काम करने लगा। पर पता चला कि उसने अभी-अभी उसकी कलीग का रेप करने कि कोशिश की है। उसने चारों तरफ नजर घुमाई...और धीरे से साथ वाली महिला से कहा कि मैंने अभी किसी के साथ रेप करने की कोशिश की है....क्या? उसके इस मासूम से सवाल पर सारी महिलाएं हंस दी एक बोली

“अरे साब क्या कह रहे हो...आपने रेप करने की कोशिश की है”

पूरे सेक्शन में एक जोर का ठहाका लगा....काग़ज़ सब के हाथों में घूम गया किसी ने कहा

“देखो तो तारीख कहीं आज...अप्रैल फूल तो नहीं है...”

दूसरे ने कहा “अरे ये तो आपने पन्द्रह दिन पहले किया था पर इस लड़की को आज कैसे होश आ रहा है कि उसके साथ रेप हुआ है”

सब फिर हंसे तभी मदन ऑफिस के चपरासी ने आकर कहा कि

“साब आपको बड़े साब ने बुलाया है”।

आदमी उठा और बिना कुछ सोचे समझे घबराए बड़े साब के पास चला गया।

आज साब ने उसे अच्छी तरह से देखा उसने भी बड़े साब को देखा जो आते ही कहते थे कि

“इतनी तुम्हारी उम्र है नहीं, जितनी लगने लगी है। अरे निकलो इन फाइलों के बोझ से और जीवन में कुछ मौज-मस्ती भी करो वरना जब रिटायर हो जाओगे तो सोचोगे”।

आदमी मुस्कुरा देता और कहता काम बताइए...क्योंकि वो जानता था बड़े साब जब ज्यादा ही किसी बड़े काम फंस जाते थे तो बुलाते थे। और ये आराम से उस केस को सुलझा के अगले दिन उनके हाथ में रख देता था। साब कहते कि अरे कब किया तो वो मुस्कुरा देता था “रात को”

....और अपना सिर झुकाए कमरे बाहर निकल जाता। बड़े साहब सिर हिला के कहते

“पागल है...ये तो”

आज उन्हीं साहब ने उस आदमी को ऊपर से नीचे देखकर बोला,

“तुम रात को काम करने के लिए इसलिए रुकते हो कि लड़कियों को सेक्सुएल हरैस कर सको, मैंने तुम पर विशवास करके गलत किया”।

आदमी मुस्कुराया

“ मीमो तो मेरे पास रेप करने का आया है, और मुझ पर विशवास किया होता तो आप मुझसे सवाल ही नहीं करते। आप जो एक्शन लेना चाहते हैं तो ले लिजिए...अब रेप किया है तो, तो आपको एक्शन जरुर लेना चाहिए, मैं चलता हूं कुछ जरुरी काम निबटाने हैं अगर ससपेंड हो गया तो सारी फाइलें पड़ी रह जाएगीं।”

और वो साहब की टेबल पर पड़ी कुछ जरुरी फाइलों को उठा कर कमरे से बाहर निकल गया। बड़े साहब ने माथे पर अपना हाथ मारा

“पागल है ये तो”

बड़े साहब के केबिन से बाहर आते ही सारी आँखे फिर कान बन गईं वो उस आदमी के मुँह से कुछ सुनना चाहती थीं। आदमी कुछ बोला नहीं अपनी कुर्सी-टेबल पर बैठ कर काम करने लगा उन कानों नें अब मुंह बनकर बोलना शुरु किया...।

“क्या तुम पागल हो कि साब की सुन के आ गए”

“ये क्यों पागल है, साब को नहीं पता कि ये कैसा है”।

“आजकल लड़कियों को देखा है उनको कुछ करने की जरुरत है, वो तो खुद ही गोद में बैठ जाएं”

“अरे एक दो बार तो उसने मेरे से भी लिफ्ट लेने की कोशिश की थी अच्छा है मैंने मना कर दिया था वरना इनकी जगह मैं होता”...।

आदमी की निगाह उठीं उसने गुस्से से सामने वाले को देखा। पर लोगों को चर्चा का विषय मिल गया था वो उसमें मशगूल थे।

“मैंने तो सुना है कि ये उस लड़की का धंधा है, वो तो ऐसे ही लोगों को फंसाती है पैसे निकलवाती है”

आदमी अब चुप न रह सका वो एक दम गुस्से में चिल्लाया

“ऐ तुम पागल हो क्या, और ये धंधा क्या होता है, मुझसे सहानुभूति जताने की कोशिश करने की जरुरत नहीं है, वो झूठ नहीं बोल रही है मैंने उसका रेप किया है”

ये सुनकर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया वो आदमी उठा और बड़े साब के केबिन में चला गया।

सारी आँखे उसका इंतजार कर रहीं थी, वो काफी देर बाद आया। सारे कान पूरी कहानी सुनना चाह रहे थे उसने सबके मन की अवस्था को समझते हुए कहा मैंने रिजायन दे दिया है मुझे से कुछ गलती हुई हो तो आप लोग भी मुझे माफ किजिएगा...।

सारे मन जैसे कुछ सेंकण्ड को धड़कना बंद हो गए हों ऐसी चुप्पी पूरे माहोल मे छा गई थी और वो आदमी बाहर चला गया....।

लड़की के पंख लग गए थे। वो खुश थी कि उसने ये लड़ाई ज्यादा कुछ किए बिना ही जीत ली थी लोगों के दिमाग सोच कुछ और रहे थे और सच्चाई कुछ और थी। बड़े साहब उस लड़की से डरते थे, सारे ऑफिस के लोग उससे डरने लगे थे। कुछ ऐसे लोग जो उस लड़की को खिलाते-पिलाते घूमाते थे वो भी उस लड़की के इस कदम से बहुत खुश थे और अब चौड़े होकर घूमते थे ऑफिस में कि किसी ने कुछ कहने की कोशिश की तो वो सेक्सुएल हेरेस के आरोप में उसे भी फंसवा देगें। ये तो बहुत आसान है। क्योंकि इसके लिए शायद कोई सबूत नहीं माँगता रेप के लिए सबूत देना पड़ता है तो सेक्सुएल हरेस किया है, ये आसान आरोप है।

बड़े साहब को उस आदमी की कमी बहुत खल रही थी इतने सारे केस पड़े थे जिन्हें वो आदमी आराम से निबटा लेता था पर अब कौन करेगा, सब को काम दिया गया पर सबने फाइल पढ़ने में ही महीनों लगा दिए थे काम धीमी गति में आ गया था। आदमी को जाए हुए भी महीना हो गया था। उसके फंड और सारी ऑफिस औपचारिकताएं भी पूरी हो चुकी थीं बड़े साहब ने सोचा कि वो खुद जाकर उससे मिल भी आएं और ये चेक भी दें आएं।

बड़े साहब, उसके घर पहुंचे साफ-सुथरा साधारण से घर में जब घुसे तो उन्होंने एक बहुत सुंदर सी महिला देखी जो 40-42 साल की होगी ये भी तो 45 साल का ही था पर रहता ऐसे था कि न जाने की कितना बूढ़ा हो गया हो। आदमी ने हंसकर स्वागत किया अपनी पत्नी से मिलवाते हुए कहा

“हमारे बड़े साब हैं”। उस सुशील सी महिला ने नमस्ते किया और किचन की ओर चली गई...आईं तो पानी और मीठा था। बड़े साब पूरा घर देख रहे थे उन्हें इस घर में आकर बहुत सूकुन महसूस हो रहा था। सामने एक कोने में किताबों का रैक था इको ऑनर्स की बहुत सी किताबें रखीं थीं। साहब ने पानी का गिलास टेबल पर रखते हुए कहा

“अरे तुमने कभी जिक्र ही नहीं किया तुम्हारे बच्चे भी हैं”।

दोनों पति-पत्नी की नजरें मिली उन्होंने मुस्कुरा के देखा फिर चुप हो गए। बड़े साब रैक की ओर बढ़ गए एक बहुत ही सुंदर सी लड़की की फोटो देखकर बोले,

“अरे भई, ये तुम्हारी बेटी है, ये तो बहुत ही प्यारी है, बिल्कुल तुम पर नहीं गई भगवान का शुक्र है”

उनकी हंसी पूरे घर में गूंज गई, हल्की सी हंसी उन दोनों की भी सुनाई दी

“अच्छा तो ये कर रही है इको ऑनर्स भई कभी मिलवाओ”

आदमी धीरे से बोला “अब ये इस दुनिया में नहीं है”

बड़े साहब की आँखे फैल गईं “क्या कह रहे हो, तुमने कभी बताया ही नहीं क्या हुआ था इसे”

आदमी ने कहा “इसको इसके ऑफिस में सेक्सुएल हेरेसमेंट किया गया था पर ये किसी को बता नहीं पाई, हमें भी नहीं और एक महीना बीस दिन पहले इसने अपनी जान लेके सोचा मैंने सारी समस्या का अंत कर दिया काश ये कहने की हिम्मत कर पाती”

बड़े साहब उस आदमी से नज़रे नहीं मिला पा रहे थे। “चाय ठंडी हो रही है” पत्नी की आवाज ने चौंकाया बड़े साहब ने उस आदमी से कहा कि

“पर तुमने उस लड़की की उलजलूल कंपलेंट पर क्यों रिजाइन किया। जबकि पूरा ऑफिस जानता है आप ऐसा नहीं कर सकते”

“जिससे हमारे ऑफिस में वास्तव में ऐसा हो, तो वो कहने की हिम्मत न कर पाए कि हां ऐसी बातों पर एक्शन लिया जाता है और उसका साथ पूरा ऑफिस देता है। तो फिर कोई लड़की परेशान होकर आत्महत्या नहीं करेगी”।

2

व्यंग्य

दिशा मैदान और तीर कमान
उमेश कुमार गुप्ता

    हमारे देश में दिशा मैदान और तीर कमान का चोली दामन का साथ है। जब भी पेट दर्द करे तो पहले तीर चलाये उसके बाद जहाॅ पर तीर गिरे वहाॅ गड्ढा खोदें। अपना वजन कम करें उसके बाद गड्ढे में मिट्टी  घास फूंस डालकर उसे हाइजैनिक तरीके से ढककर आ जायें । 
        ऐसा करने से आपके पूर्वज खुश हो जाएंगे। हजारों साल पुरानी पौराणिक शौच कर्म काण्ड की कथा पूर्ण हो जायेगी और आपको प्रत्येक दिन ऐसा करने से इस जन्म के बाद मोक्ष प्राप्त होगा। 

        भले ही आप खुले में शौच करने से जीते जी डायरिया मलेरिया, टायफाइड, डेंगू से मर जाये लेकिन मोक्ष के चक्कर में अपने घर में न तो शौचालय बनवाये न ही शौंच करने जाये । 

    हमारे देश में 50प्रतिशत से अधिक आबादी इसी पौराणिक क्रियाकर्म पर चल रही है। देश को आजाद हुये 67 साल से ज्यादा का समय हो गया है । लेकिन उसके बाद ही उतने ही प्रतिशत लोग खुले में शौच का आनंद ले रहे हैं।

     देश के गांव में तो शत-प्रतिशत आबादी खुली हवा में जानवरों की तरह मलमूत्र त्यागने की आदी है ही, लेकिन शहरी बाबू भी इनसे कम नहीं हैं । सुबह-सुबह प्रभाकर के पर्दापण के साथ ही वे भी आसपास की नदी नाले पोखर को शुद्ध कर आते हैं।  

    हम निर्मल भारत नहीं बनाना चाहते। लाखों का मकान गांव में बनवाएंगे, करोंड़ो के स्कूल, अस्पताल, काॅलेज, शहर में बनवाएंगे, लेकिन अलग से कभी भी पर्याप्त संख्या मंें शौचालय नहीं बनवाएंगे और यदि दो-चार बना भी दिये जाते हैं तो, अलग से एक भी महिला शौचालय नहीं बनाया जाता है। 

    हमारे देश में स्त्री को अपने परिवार की इज्जत, नाक, मूंछ माना जाता है। लेकिन उसके शौच की कोई व्यवस्था घर में नहीं की जाती है। उसकी इज्जत के लिये खून बहा दिया जायेगा, लेकिन घर में शौचालय नहीं बनवाएंगे। उसके विवाह में लाखों का दहेज देने की योजना पैदा होते ही बना लेंगे, लेकिन उसके शौचालय की व्यवस्था घर में नहीं करते हैं। 

        यही कारण है कि हमारी इस पुरातनी व्यवस्था के कारण घर की इज्जत के साथ खुले में शौंच करने के कारण बलात्कार छेड़छाड़ की घटनायें घटित होती है। लेकिन इसके बाद भी इन घटनाओं से सीख लेकर अपनी नाक नहीं संभालते हैं और घर में निर्मल शौंच की व्यवस्था नहीं करते हैं। 

        यही कारण है कि आज भारत में 70 प्रतिशत खुले में शौंच  जाने वाली महिलाए यौन हमले, प्रताड़ना की शिकार होती हैं । जिनमें से 24 प्रतिशत महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी अमानवीय घटना घटित होती हैं । जिनमें से अधिकांश कम उम्र की नाबालिग, नासमझ बच्चियों की संख्या अधिक है। 

    हम नारी की अस्मिता को घूंघट से नापते हैं और उसे खुले में शौंच की छूट देकर भारतीय समाज में व्याप्त धार्मिकता से जुड़ी दोहरी उस मानसिकता का परिचय देते हैं।  जिसमें राधा को प्रेमिका के रूप में पूजा जाता है। लेकिन उसके द्वारा प्रेम विवाह करने पर उसे खाप पंचायत की बली चढ़ा दी जाती है। 

        हम शहर हो या गांव सब जगह स्वच्छता कार्यक्रम की जिम्मेदारी वोट देने के बाद सरकारी संस्थाओं और सदस्यों पार्षद, सरपंच, सचिव, विधायक, सांसद आदि जनप्रतिनिधियों पर छोड़ देते हैं और उनकी जिम्मेदारी बढ़ाने अपने घर के अन्दर का कचड़ा घर के सामने फेंककर उनकी अग्निपरीक्षा लेते हैं। 

        यही कारण है कि आज हम आजादी के 67-68 साल बाद भी घर के बाहर शौच कर रहे हैं और इस मानसिकता में जी रहे हैं कि सरकार इसके विरूद्ध व्यवस्था करेंगी जबकि यह कार्य घर परिवार की अन्दरूनी जिम्मेदारी से जुड़ा कार्य है । इस समस्या का हमें खुद ही हल घर में शौचालय बनाकर निकालना चाहिये।

        देश की जनता की गाढ़ी कमाई निर्मल भारत अभियान में बर्बाद नहीं होना चाहिये बल्कि खुद सोच बदलकर घर परिवार निर्मल करना चाहिये। यह अवश्य है कि खुले में शौंच करना हमारी धर्म-संस्कृति से जुड़ी समस्या है। इसलिये इस धार्मिक कुरीति को दूर करने के लिये एक सामाजिक क्रांति और धार्मिक परिवर्तन की आवश्यकता है। 

        हमें परिवार की लड़कियों का विवाह उन घरों में नहीं करना चाहिये जिन घरों में शौचालय नहीं हैं। जिस गांव में शौचालय नहीं उस गांव में विवाह नहीं का सूत्र अपनाना चाहिये। 

        हमारे देश में यह भी देखने में आया है कि घर अथवा आसपास शौचालय होने के बाद भी लोग खुले में शौंच जाना अधिक स्वास्थ्यप्रद और सुविधाजनक समझते हैं।  इससे उन्हें गन्दी प्रदूषित वायु मिल जाती है । बीड़ी सिगरेट तम्बाखू, ड््रग्स पीने मिल जाता है। इसलिये ऐसे लोग खुले में शौंच को प्राथमिकता प्रदान करते हैं। 

     स्वच्छता, स्वास्थ्य और इसके प्रति लोगों की सोच में परिवर्तन तथा जागरूकता एक ही पांसे के चार पहलू हैं। इस पांसे को फेंककर ही   एक साथ इस समस्या का निपटारा किया जा सकता है । जब तक इन चार बिन्दुओं पर एक साथ कार्य नहीं किया जायेगा, तब तक निर्मल भारत की कल्पना हम नहीं कर सकते हैं। 
              

        भारत में जो शौचालय हैं उन्हें भी हम जंगल का मैदान बना देते हैं । शौंच निवृत्ति के बाद हम पानी डालना भूल जाते हैं । यही कारण है कि जितने शौचालय बनाये गये हैं । वे भी कुछ दिनों के बाद गंदगी का ढेर बनकर बीमारियों का पिटारा समेटकर किसी काम के नहीं रह जाते हैं। हमें इस मानसिकता को भी बदलना पड़ेगा। 

        हमें सुलभ शौचालय में पैसा देने में हमारी जान निकलती है। जो काम हम निःशुल्क खुली हवा करते हैं । उसके लिये हमें पैसा देना अखरता है। हमें इस धारणा को भी बदलना होगा। जब स्वच्छ पानी की बोतल पैसे से खरीद सकते हैं तो स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिये पैसा देने में पीछे नहीं रहना चाहिये। 

        इसके अलावा हमें अपनी पांच हजार साल पुरानी, पुरातनी, पंडिताई सोच को भी बदलना होगा कि घर में शौंचालय नहीं होना चाहिये । यदि शौंचालय होगा तो इससे छुआछूत गंदगी बढ़ेगी और ऐसे लोगों का प्रवेश होगा जिनकी छाया देखना भी उस समय पाप समझा जाता था। लेकिन आज इक्कीसवीं सदी जी रहे हैं । जहाॅ पर गांव गांव बिजली पानी सड़क उपलब्ध हैं। वहाॅ पर हम घर-घर शौचालय भी उपलब्ध करा सकते हैं। इसलिये हमें इस पुरातनी सोच, मानसिकता, धार्मिकता को सामाजिक क्रांति लाकर बदलने की आवश्यकता है। 
                    ---

        हमारे देश के सार्वजनिक शौचालय हमारे स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति हमारी सोच व मानसिकता को दर्शाते हैं। गंदगी से भरे, बीमारियों के ढेर, बुरी तरह बसाते, मक्खियो मच्छरों से सने, बज-बजाते, शौचालय हमारे अस्वस्थ मानसिकता को दर्शाते हैंऔर यह प्रदर्शित करते हैं कि खुले में शैाच करना हमारी वंशानुगत बीमारी है । जिससे हमें निजात पाना होगा। 

        यही कारण है कि अपने पूर्वजों को याद करते हुये कहीं भी खड़े होकर अपनी लघुशंका मिटा लेते हैं और जहाॅ पानी देखते हैं वहाॅ अपनी बड़ी शंका का समाधान कर लेते हैं। हमें किसी भी सार्वजनिक स्थान पर जब खुले आम लघु शंका करने में दिक्कत नहीं होती है तोगांव देहात में दिशा मैदान जाना फेशन है। घर में सुविधा होते हुये भी लोग नहीं जाते हैं और यही कारण है कि धन-धान्य से सम्पन्न होने के बावजूद भी अपने घरों को इसके लायक नहीं बनाते। 

        यदि सरकार के द्वारा यह सुविधा कहीं यदि उपलब्ध कराई जाती है तो उसे भी गन्दा कर नष्ट कर देते हैं और अच्छा काम न करेंगे और न करने देंगे वाले भले मानस की तरह कार्य करते हैं। इसी कारण इस देश की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी खुले में शौंच का आनंद ले रही है जिसे अपने धार्मिक अंधविश्वासों से जोड़कर इस प्रथा को और बढ़ावा दिया जा रहा है। 

        हजारों साल पुरानी यह परम्परागत प्रथा उस समय थी जब  घनी आबादी नहीं थी । लोग जंगलों में रहा करते थे। गांव देहात में पानी की व्यवस्था नहीथी। अधिकांश गांव की आबादी नदी तालाब नाले से पानी लेने जाती थी और वहीं पर कपड़े धाने नहाने आदि पानी सम्बन्धी कार्य के साथ इस कार्य को भी किया जाता था। 

        लेकिन आज परिस्थिति बदल गई है। घर घर गांव-गांव पानी बिजली उपलब्ध है। गांव की घनी आबादी हो गई है।  जंगल कटकर समाप्त हो गये हैं। ऐसे माहौल में पुरानी व्यवस्था के अनुसार खुले में शौच करना अपराध को जन्म दे रहा है और इसी कारण 70 प्रतिशत महिलाओं के साथ यौन हमले सम्बन्धी अपराध घटित हो रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी हम अपनी पुरानी व्यवस्था में परिवर्तन करने तैयार नहीं है। 

        सरकार के द्वारा निर्मल भारत अभियान एवं ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के अन्तर्गत करोड़ों रूपये इस व्यवस्था को समाप्त करने में खर्च किये जा चुके हैं लेकिन हमारे द्वारा इस व्यवस्था को जानबूझकर नहींअपनाया जा रहा है और शासकीय कार्य में असहयोग प्रदान कर निर्मल भारत योजना को असफल किया जा रहा है। 

1

माफ़ी
सुरभि सक्सेना

"ज़रूर मेरे ही प्रेम में कोई कमी रह गयी होगी तभी न इतनी वफ़ा और प्यार समर्पित करने के बाद भी तुमने दी तो बस बेवफाई, झूठ और दुःख .... जाओ देव जाओ .... एक बार और मैं तुम्हें माफ़ करती हूँ पर याद रखना की इस बार के बाद न तो तुम मुझे दोबारा देख पाओगे न सुन पाओगे न महसूस कर पाओगे !!! हाँ मैं ही ग़लत हूँ, क्योंकि मैंने ही एक ग़लत इंसान से ... हर बार ग़लत उम्मीदें लगाईं हैं - यह सारी बातें याद करते करते देव की आँखें छलक पड़ी !! अचानक, माँ की आहट पाते ही जल्दी जल्दी अपनी नम आँखों को साफ़ करते हुए देव ने कहाँ - ना जाने मेरी आँख में ये क्या पड़ गया .. उफ़ मैं अभी आया माँ !!
इतना कह कर देव कमरे से निकल कर खुले आँगन में निकल आया - जहाँ बैठ कर घंटों वो शुभी के साथ बातें, किया करता था और बातों बातों में जब लड़ाई हो जाती तो गुस्सा करके फ़ोन भी काट देता था, टेबल पर एक विस्की की बोतल और हाथ में गिलास ... ये कौन सा पैग था देव को याद ही नहीं ... याद है तो बस शुभी की.... देव को न जाने क्या हो गया था उसे अब शुभी की इतनी याद क्यों आ रही थी - उसकी बातें इतनी याद आती हैं जब वो साथ नहीं सामने नहीं पास नहीं !! ..

अरे तुम इतनी गलतियां करते ही क्यू हो , करने के बाद माफ़ी मांगने बैठ जाते हो देखो देव ये सब मुझे दुःख देता है अच्छा बाबा आज की बार माफ़ कर दो, फिर कभी नहीं होगा .... हाँ कभी नहीं होगा बस ये रोज़ रोज़ के तुम्हारे बहाने हैं .. देव कभी मुझे भी तो मौका दो ग़लती करने का, और मैं भी तो देखूं तुम्हारा दिल कितना बड़ा है ये कहकर खिलखिलाकर हंस देती शुभी और देव को भी हंसा देती, शुभी के चेहरे पर खिली भरपूर मुस्कान के साथ जैसे कोई बिजली चमकी तो यादो के भवंर से निकल कर देव ने देखा तो उसे मोबाइल की बजती रिंग सुनाई दी .... पर ये शुभी का फ़ोन नहीं था ... होता भी कैसे देव ने एक बार फिर शुभी को धोखा जो दिया था ...

देव ने हर बार की तरह इस बार भी शुभी के वापस आने का बहुत इंतज़ार किया मगर वो वापस नहीं आई ... शुभी जाते जाते बस इतना ही कह गयी देव आख़िर मैंने तुम्हे क्या नहीं दिया ... मैंने तुमसे इतना प्यार किया उसकी कीमत ये धोखा .... शराब जुआ और ये लड़कियों का शौक तुमको कहीं का नहीं छोड़ेगा देव .. तुम मेरे नहीं अपने साथ ग़लत कर रहे हो ... सुन रहे हो तुम देव मैं तुम्हारी हर ज्यादती बर्दास्त कर रही हूँ और भी कर सकती हूँ ... पर तुम जो ये धोखा बार बार देते हो ये अब और नहीं ... हाँ ये सब मेरे शौक है शुभी पर मैं प्यार तो बस तुमसे करता हूँ -- देव तो तुम अपना प्यार भी अपने शौक के साथ रखो और इतना कह कर शुभी चली गयी हमेशा के लिए !!!

देव फिर अपनी उसी बेमतलब, बेपरवाह ज़िन्दगी में उलझ गया ... जैसे मकड़ी के जाल में कोई मक्खी फंस गयी हो .... देव के पास न तो अब माफ़ी मांगने के लिए कोई था न माफ़ी देने के लिए ... थी तो बस एक घुटन भरी तनहा ज़िन्दगी जिसे देव ने अपने लिए खुद चुना था !!!! #Surabhi

#Surabhi Saxena

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