बुधवार, 17 सितंबर 2014

दिनेश चौहान के 2 लघु आलेख

भारत माता की बेटी हम चलतीं सीना तान के

लैंगिक भेदभाव हमारे संस्कार में समाया हुआ है। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के एक टी वी विज्ञापन पर अपनी याददाश्त की सुई को केंद्रित करें-नवविवाहिता वघू को सासू मां बलिहारी जाते हुए कह रहीं हैं-''पुत्रवती भव''। क्या नई पीढ़ी की सासें 'पुत्रीवती भव' कहने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो सकतीं? पिछले दिनों अखबार में एक समाचार प्रकाशित हुआ था जिसके मुताबिक दिल्ली की एक मशहूर चार्ट प्रकाशक द्वारा प्रकाशित एक चार्ट में भारत के विभिन्न हिस्सों और प्रान्तों के बच्चों के चित्र हैं जिसमें सभी चित्र लड़कों के हैं। पूरे चार्ट में एक भी लड़की का चित्र शामिल नहीं है। पहली बार गर्भवती हुई एक परिचिता को घर आमंत्रित करने पर जवाब आया-'जरूर आऊंगी, पर कुछ दिनों बाद, बेटा लेकर। आज हमारे देश में 0-6 वर्ष के बच्चों का लिंगानुपात 918 है जिसका अर्थ है प्रति 1000 लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या 918 है जिसे किसी भी दशा में संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। देखने पर ये बहुत छोटी-छोटी बातें लगेंगी पर क्या ऐसा नहीं है कि लैंगिक भेदभाव की शुरूआत इन्हीं छोटी-छोटी बातों से होती हैं। इन छोटी-छोटी बातों के प्रति जागरुकता की पहल हमारे स्कूलों में की जा सकती है। चार्ट-चित्र और पाठ्य वस्तु स्कूलों के अभिन्न अंग होते हैं। ऐसे में यह देखना सरकार की जिम्मेदारी है कि लैंगिक भेदभाव प्रदर्शित करने वाली सामग्री स्कूलों तक न पहुंचने पाए। शिक्षकों की भी जिम्मेदारी बनती है कि जहां भी ऐसा भेदभाव दृष्टिगोचर हो उसे दूर करने का प्रयास करे। देश की कन्या शालाएं ऐसी पहल के लिए सबसे उपयुक्त जगह हो सकती है। हमारे शिक्षकवृंद ऐसा करके तो देखें। देखिए, कितना मजा आता है।

कक्षा 6वीं की भारती पुस्तक में पहला पाठ है-'अभियान गीत'। मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन का गीत है। पहली पंक्ति है-

'भारत माता के बेटे हम चलते सीना तान के।'

इस पंक्ति की पूरी कविता में छः बार आवृत्ति हुई है।

कन्या शाला में यह पाठ अप्रासंगिक जैसा लगता है और लैंगिक भेदभाव को अंजाने में बढ़ावा देने वाला भी। हम वीरांगना महिलाओं के आदर्श के रूप में रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, रानी अवंती बाई और इंदिरा गांधी का उदाहरण देते हैं तो लडकियों को पढ़ाते समय इस कविता को थोड़ा बदल क्यों नहीं सकते? जरूर बदल सकते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार की बातें बहुत होती हैं इसी के तहत जब कन्या शाला में इस कविता को बदलकर पढ़ाया गया तो लड़कियों की खुशी का पारावार न रहा। कविता की उक्त पंक्ति जो बेटों को ध्यान में रखकर रची गई है उसे बेटियों के लिए इस तरह किया गया-

'भारत माता की बेटी हम चलतीं सीना तान के।'

सीना तानना मुहावरा भी है जिसका अर्थ गर्व और निर्भीकता प्रकट करना होता है जो सिर्फ लड़कों का ही नहीं हर लड़की का भी अधिकार है। आज बच्चन जी यदि जीवित होते तो निश्चित ही इस नवाचार से प्रसन्न होते और सोचते काश उनकी एक बेटी भी होती। कदाचित वे अपनी कविता में लैंगिक पूर्वाग्रह का निवारण भी करते।

पर जिम्मेदारी अब वर्तमान पीढ़ी की है कि वह लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध हर छोटी-बड़ी बातों के प्रति जागरुक हों और इस असमानता की खाई को पाटने में अपना योगदान दे

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विश्व गुरु से विश्व चेला की राह पर

भारत कभी विश्व गुरु था क्योंकि तब पूरा विश्व भारतीय आदर्शों का अनुकरण करता था। पर आज पश्चिम के अंधानुकरण को ही भारत अपना आदर्श मानने को लालायित दिखता है। ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां भारत ने पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण न किया हो। अभी ताजा तैयारी के मुताबिक बाल अधिकारों के नाम पर बच्चों को डांटने-फटकारने वाले माता-पिता और गुरु के लिए पांच साल की जेल जैसे कानून बनाने की बात हो रही है। माता-पिता या गुरु बच्चों को उनकी भलाई के लिए डांटते-फटकारते हैं इसलिए नहीं कि बच्चों के प्रति उनके मन में द्वेष या बैर-भाव होता है। देश के खांटी संत कबीर ने इसीलिए कहा है-

''गुरु कुम्हार सिस कुंभ है, गढ़-गढ़ काढ़ै खोट।

अंदर हाथ सहार दै, बाहर मारै चोट।।

ऐसे कानून बनाने की तैयारी पूरी तरह पश्चिमी सोच का असर है जो भारत की रही-सही संस्कृति को भी मटियामेट कर के छोड़ेगी। ये हमारे देश के कर्णधारों की वैचारिक दरिद्रता का सबूत है कि उन्हें भारतीय उच्च आदर्श की जगह विदेशी तौर-तरीका ही सुहाते हैं। ये पश्चिम के अंधभक्त संसद औा विधान सभाओं में गाली-गलौच और जूतम-पैजार करने वालों के खिलाफ पांच साल की सजा का कानून क्यों नहीं बनाते।

जो बच्चों पर अनावश्यक अत्याचार करते हैं उसे सजा मिलने पर किसी को क्या ऐतराज हो सकता है लेकिन बच्चों के मन से अनुशासनहीनता के बाद भी सजा का भय खत्म करना उसे उच्श्रृंखल बनाने को न्योता देना है। ऐसे कानून लागू करने वाले सभी देशों में बाल अपराधों की संख्या में वृद्धि होना इसका प्रमाण है। इसलिए ऐसे कानून लाने के पहले अच्छी तरह सोच-विचार की जरूरत है। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब भारत विश्व चेला कहलाने लग जाए।

दिनांक : 07.08.2014

दिनेश चौहान,

छत्तीसगढ़ी ठीहा, नवापारा-राजिम,

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