बुधवार, 10 सितंबर 2014

मनोज “आजिज़” तथा विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' की लघुकथाएँ

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स्मिता की शादी

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-- मनोज 'आजिज़'

स्मिता को आज लड़के वाले देखने आएंगे । लड़के का नाम अरुण । नाम सुनते ही स्मिता का हृदय अरुण आभा से भर गया । वह कल्पना लोक में विचरण करने लगी । सुन्दर, युवा, वलिष्ठ और सुपुरुष समझकर अरुण को स्मिता पति मान बैठी ।

अरुण का भाई वरुण स्मिता को देखने आया । स्मिता छुपकर वरुण को देख लिया -- मन ही मन बोली-- 'मेरा देवर' और सकुचा गयी ।

लड़के वालों ने लड़की पसंद की | स्मिता बहुत खुश हुयी । अब रात भार सपने देखने लगी ।

पर, शादी नही हो पाई । दहेज़ की बात नहीं बन पाई ।

फिर कुछ दिन बाद एक नया परिवार स्मिता को देखने आये । इस बार लड़का खुद आया । नाम समर । इस बार भी स्मिता छुपकर देखी तो शांत, सुन्दर, सुशील समर को देख स्मिता का मन इस नवीन आगंतुक पर लगता गया । कितना कुछ सोचने लगी । इस बार दहेज़ की बात बन गई पर लड़की पसंद नहीं आयी ।

अंत में लड़की भी पसंद आई, दहेज़ की समस्या भी नहीं रही और शादी भी हुयी । दूल्हा-- विश्वनाथ । मोटा, काला, गोल-मटोल, हृष्ट-पुष्ट सज्जन-- बी ए पास,रेवेन्यू ऑफिस में सेवारत ।

शादी के बाद जब स्मिता पहली बार विश्वनाथ से मिली, तब न जाने कैसे  मुग्ध हुयी ।

स्मिता सुख से ही जी रही है

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'अन्धविश्वास '

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र '

कलावती ने आज 'श्री कृष्ण जन्माष्टमी'का उपवास रखा था। वह सायं पूजा घर को सजाने-सँवारने में लगी हुई थी, तब ही उनकी बहू शान्ति ने आकर कहा- सासु जी,
मेरे पेट में कुछ हल्का -हल्का दर्द हो रहा है। बहू की बात सुनकर कलावती का चेहरा फूल की भाँति खिल गया और वो 'कृष्ण की प्रतिमा'के समक्ष हाथ जोड़ कर पोता बन कर पधारने की मौन -प्रार्थना करने लगी। जल्दी- जल्दी पूजा घर को व्यवस्थित कर, वो शान्ति को अस्पताल ले गई । महिला डांक्टर ने चैकअप कर , नर्स से कहा-शान्ति को अंदर पहुँचाओ बाल-बच्चा जल्दी ही होने को है। कलावती ने जब ये सुना ,उस समय घड़ी में दस बज रहे थे । कलावती ने हाथ जोड़ कर डांक्टर से कहा - डॉक्टर,  क्या ये बच्चा ठीक बारह बजे नहीं हो सकता? इसके लिये चाहे कुछ भी करो, पर ये बच्चा ठीक बारह बजे ही होना चाहिए ।
        डॉक्टर ने कहा- अम्मा जी, ये कैसे सम्भव है आपकी बहू के दर्द बढते ही जा रहे हैं और ये बच् अगले दस या पन्द्रह मिनट में होना चाहता है। मुझे मेरा काम करने दो । लेकिन कलावती ने बहू को अंदर ना जाने दिया, बहू तड़फती रही । आखिर डाक्टर ने कलावती की हठ के आगे अपने को असहाय समझ शान्ति को दर्द कम करने का इन्जेक्शन लगा दिया । पौने बारह
बजे कलावती ने फिर डाक्टर से  कहा- डॉक्टर, अब ठीक बारह बजे बच्चा होना चाहिए ,चाहे आप कितनी ही फीस ले लेना।
ठीक बारह बजे अंदर से बच्चे के रोने की आवाज आई । नर्स ने बाहर आकर कहा-
"बेटी हुई है" । ये सुनकर कलावती सन्न रह गई उसे तो पोते रूप में'कृष्ण' के पधारने का अंदेशा थी। कलावती के चेहरे की सभी कलाएं मंद पड़ चुकी थी । परन्तु बहू  शान्ति अंदर, कृष्ण ना सही , कृष्णा के आने पर भगवान को बार - बार धन्यवाद दे रही थी । लेकिन कलावती का उपवास नवमी-दसवीं तक भी जारी  रहा...

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मास्टर जी

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र '

सड़क के दोनों ओर पेड़ों की कतारें थी ।पेड़ों की कतारों से सड़क की शोभा को चार चाँद लगे हुए थे सैकड़ों की संख्या में हर आयु वर्ग के लोग प्रभात-भ्रमण हेतु उस ओर खिंचे चले आते थे । पिछले कुछ दिनों से एक शिक्षक भी हमारे संग घूमने आने लगे थे वो अभी अभी स्थानान्तरित होकर इस शहर में आए थे । अचानक, एक सुवह हमसब को रोक कर शिक्षक बोले- "आप सब इन नीमों को देख क्या सोचते हो ? जरा बताइये ।" हम में से एक बोले - 'सोचना क्या ? हम सब घूमने आते हैं और रोज इनसे दातुन तोड़ कर दातुन करते हैं, बताया भी गया है कि नीम की दातुन स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती है ।'
      क्या आपने अन्य पेड़ों की तुलना में इन नीम के पेड़ों की दशा पर भी ध्यान दिया, शिक्षक ने कहा , ये नीम के पेड़ , कक्षा में कुपोषण के शिकार बच्चों की भाँति सबसे अलग अलग से दिखाई नहीं दे रहे , इनकी इस दशा के दायी क्या हम सब  नहीं ! बताइये , आधे शहर की दातुन की जिम्मेदारी क्या ये निभा पायेंगे !! हमसब उनकी बात सुनकर चकित रह गए ।हम में से एक बुजुर्ग ने कहा - मास्टर जी, इस तरह तो हमने सोचा ही नहीं, लेकिन' देर आयद दुरस्त आयद' अब हम दातुन नहीं तोडेंगे साथ ही अन्य को भी समझायेंगे । कुछ दिनों बाद गर्मियों की छुट्टियां बिताने मास्टर जी अपने गाँव चले गए ।
           आज एक जुलाई है। मास्टरजी, अपने गाँव से छुट्टियां बिताकर सुवह वाली बस में बैठ कर शहर आ रहे हैं । जैसे -जैसे शहर  करीब आने लगा , उनकी आंखें कुछ अधीर होने लगी । अचानक बस की खिड़की से क्या देखते हैं कि उन नीमों की डालियों पर नव- कोंपलें हिल-हिल कर आने- जाने वालों का अभिवादन कर रही थी , अब वो कुपोषित बच्चों जैसे नहीं लग रहे थे । ये दृश्य देखकर मास्टर जी के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई। इस रहस्य कौ बस में, अन्य कोई भी नहीं समझ पाया ।
        


              -विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र '
       कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी,          स. मा. , (राज.)322201

3 blogger-facebook:

  1. तीनों कहाँनिया बहुत उम्दा हैं ।

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  2. बहुत खुबसुरत कहानियां ....

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  3. अतिसुन्दर सार्थक हृदयस्पर्शी कहानियाँ दोनों ही
    लेखक सराहना के पात्र हैं हमारी बधाई और
    शुभकामना

    उत्तर देंहटाएं

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