गुरुवार, 11 सितंबर 2014

कालीपद प्रसाद की कविताएँ

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1    खुदा कहाँ है ?

मन जब चंचल होता है ,भटकता है यहाँ वहां
ढूंढा तुझको हर जगह ,नहीं पता तू छुपा है कहाँ !
इन्सानों में तो नफरत भरा है ,नफरत में तू कहाँ
कुछ एहसास हुआ मुझको ,दिलों में है प्यार जहां !
पर्वत में ढूंढा ,जंगल में ढूंढा ,ढूंढा बाग़ बगीचे जहाँ
दिल को कुछ सुकून मिला ,फूलों में ताज़गी जहाँ !
प्रेमी चालाक ,प्रेमिका चतुर ,प्रेम में वह वफ़ा कहाँ
तेरा एहसास होता है वहां ,प्यार में सादगी जहाँ !
पूछा तुम्हारा पता हर प्राणी ,हर खुदाई से यहाँ
पता न मिला कोई ,एहसास हुआ नव पल्लव जहाँ !
निश्छल हसीं बच्चों में ,फूलों की खुशबू में
दर्शन नहीं हुआ तुम्हारा ,पर तुम मिले मुझसे वहां !
तुम हो यहीं कहीं मेरे आस पास ,मानते हैं सारे जहाँ
दीदार को दिल दीवाना है ,एहसास है पर तेरा दीदार कहाँ ?

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२.    रहने दो मुझे समाधि में !

खोजता  हूँ तुझे यहाँ वहां
भटका हूँ तेरे लिए न जाने कहाँ कहाँ !

थक कर बैठ जाता हूँ आँख मूंदकर
बन्ध आँखों में आता है तु प्रकाशपुंज बनकर !
सहस्र कोटि सूर्य सम वह तेज
कर देता है मेरी आखों को निस्तेज !
मेरी आँख की रश्मि खो जाती है रश्मिपुंज में
भूलकर अस्तित्व ,मैं खो जाता हूँ उस ज्योतिपुंज में !
उस प्रकाश पुंज  में तुझे ढूंढ़ता हूँ
अहसास होता है ,देख नहीं पाता,मैं सूरदास हूँ |
निर्बाध विचरण करता हूँ प्रकाशपुंज में यहाँ-वहां
जैसे महा सागर में विचरती हैं मछलियाँ !
मुग्ध हूँ ,तेरे खुशबू से ,सब खुशबू से जुदा है
संविलीन हूँ आनंद में ,जिसके लिए जग पागल है !
मुझसे ना छीनो इस आनंद को
महसूस करने दो मुझे इस परमानंद को !
रहने दो मुझे इस  महा समाधि में
तुम तो नहीं मिलते हो किसी और राह में !

*******

३.    प्रार्थना

हे निरंजन ,हे निर्गुण  निराकार
बड़ी देर से बैठा हूँ मैं तेरे द्वार
इस आशा और दृढ विश्वास के साथ
मुझे पास बुलाओगे पकड़ मेरा हाथ |
मेरा विश्वास को टूटने न देना
भाव सागर को पार कर देना
डगमग डगमग दोल रहा है नाव मेरा
नहीं पार जायगा बिन तेरा सहारा |
सागर किनारे खडा  हैं भक्त तेरा
तैरना नहीं आता कौन बनेगा मेरा सहारा ?
शिला जो तैरे पानी में ,उसका पुल बना दे
या नाविक बनकर ,तू मुझको पार लगा दे !

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४.   पाखी !

आँधी चली बिजली चमकी ,बादल हुआ अनुदार
घोंसला उड़ा शावक गिरा ,बिखरा पाखी का परिवार |
तिनका तिनका जोड़कर पाखी ,बनायी थी आशियाना
हर संकट से शावक को अपना,चाहती थी  बचाना |
किन्तु निष्ठुर नियति का यह विनाशकारी अभियान
पतित पेड़ के नीचे छुपकर बचायी अपना प्राण !
मौसम का क्रोध जब शमित हुआ,पवन भी हुआ शांत
आतुरता से खोजने लगी ,कहाँ है उसकी संतान !
भीग कर शावक पड़ा था अचेत, उसी पेड़ के नीचे
चोंच में उठाकर रखा गोद में ,अपनी छाती के नीचे !
माँ के तन की उष्मा पाकर सचेत हुआ बच्चा
माँ के प्यार में सुरक्षित है दुनिया का हर बच्चा !

********

५.    सुनो बादल ! (जापानी विधा –तांका )
सुनो बादल !
मेरा यह कहना
बयार संग
नाचते नचवाते
उड़ती आना ,
तपती धरती को
ठंडा करना |
वैशाख चला गया
आषाढ़ माह
जोर से बरसना
ध्यान रखना
रिमझिम सावन
नाचता मन
मिलना है साजन |

जल्दी है तुझे
जाना है पर देश
जानती हूँ मैं|
सुनो विनती मेरी
मान जाओ ना
रुक जाओ ना यहाँ
आयेंगे सैंया
मेरे,तब तू जाना
मानो मेरा कहना |
 
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६.   इश्क १ !

ये बेरुखी ,ये रुस्वाइयां तुम से
मैंने कभी उम्मीद न की थी |
तुम्हें पढ़ाना चाह था इश्क का सबक
तम्हें तो इश्क से नफरत थी |
लाख कोशिश की, कि पढ़ लूँ तुम्हारा मन
जान लूँ कौन सी जिंदगी ,तुम्हें पसंद थी|
जिंदगी जो जी रही हो या जो जीना चाहती हो
मेरी जिंदगी से क्या उसका कोई मेल नहीं थी ?
चाहत अनन्त है ,हर चाहत पूरी नहीं होती
मिलती है ठोकर इश्क के राह पर,मुझे इल्म नहीं थी !

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7.   इश्क (२)

चाहता हूँ ,तुझे मना लूँ प्यार से
लेकिन डर लगता है तेरी गुस्से से !
घर मेरा तारिक के आगोश में है
रोशन हो जायगा तेरी बर्के-हुस्न से !
इन्तजार रहेगा तेरा क़यामत तक
नहीं डर कोई गमे–फ़िराक से !
मालूम है कुल्फ़ते बे-शुमार हैं रस्ते में
इश्क–ए–आतिश काटेगा वक्त इज़्तिराब से !
हुस्न तेरी बना दिया है मुझे बे-जुबान
बताऊंगा सब कुछ ,तश्ना–ए–तकरीर से |

शब्दार्थ : तारिक=अन्धकार ,अँधेरा ; बर्के हुस्न=बिजली जैसी चमकीला सौन्दौर्य : गमे –फ़िराक=विरह का दुःख : इश्क –ए –आतिश =प्यार का आग : इज़्तिराब से=व्याकुलता से : तश्ना –ए – तकरीर=प्यासे होंठो से

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८.  इश्क (३)
तमन्ना है मुस्कुराता चेहरा का दीदार करूँ
देख तनी भृकुटी, होश उड़ जाता मेरा |
गर थोडा हँसकर बोल दे,क्या बिगड़ेगा तेरा
बहार आएगी ,गुल खिलेगा चमन में मेरा !
नकली ही सही,दो लफ्ज मीठे बोलकर देखो
तुम पर जिंदगी कुर्बान , यकीं करो मेरा !
एकबार हाथ, मेरे हाथ में देकर तो देखो
नहीं छूटेगा जिंदगी भर ,यह वादा है मेरा !
छोड़ संकोच,नाराजी तुम, कदम बढ़ा के देखो
एक दिन तुम मेरी दुल्हन बनोगी,यकीं है मेरा |

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९   प्रेम ! 
किताबें बहुत पढ़ी डिग्रियां हासिल की अनेक
ढाई अक्षर प्रेम का अर्थ क्या है समझ नहीं पाया |
कसमें बहुत खाई ,वादे बहुत किया  ( ख़्वाब में )
ख्वाब टूटी,सब भूल गए,वादा निभा नहीं पाया !
तुझे ढूंढ़ता रहा, कभी यहाँ कभी वहाँ
दुनियाँ भूल भुलैया है ,तुझे ढूंढ़ न पाया !
भ्रमित हूँ ,भटकता हूँ पागल की तरह
हर चीज़ में तुम्हें नहीं,तुम्हारी अक्स पाया,!
आँखों में अश्क की कमी है “प्रसाद “
अश्क-बारी भी नसीब नहीं हो पाया !

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10. आईना
कभी किसी से कुछ नहीं कहता आईना
चुप रहकर भी सबकुछ कह देता है आईना !
बुरा हो या अच्छा हो ,सूरत या सीरत
उसका हूबहू तस्वीर दिखा देता है आईना !
आईना से कभी नहीं छुपता है कोई झूठ
चेहरे की रंगत देख,तस्वीर खींच देता है आईना !
गिरगिट सा हरघडी,कितना भी रंग बदले मन
चेहरे पर हर रंग का अक्स देख लेता है आईना !
भ्रम के चौराहे,भटकता मन देखता है जब आईना
मन को सही रास्ता दिखा देता है आईना |
घबराओ नहीं “प्रसाद” गर दिल तुम्हारा सच्चा है
तस्वीर भी खूबसूरत दिखा देता है आईना !
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कालीपद “प्रसाद”
साईं सृष्टि ,बी ५०२,जेनसर के पास ,खराडी, पुणे =४११०१४

 

परिचय -

कालीपद “प्रसाद”

जन्म ८ जुलाई १९४७ ,स्थान खुलना (बंगला देश)

शिक्षा –शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ,धर्मजयगड ,कालेज (स्नातक ) –क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल

एम .एस .सी (गणित )– जबलपुर विश्वविद्यालय

एम ए (अर्थ शास्त्र ) – गडवाल विश्वविद्यालय .श्रीनगर

कार्यक्षेत्र - राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कालेज ( आर .आई .एम ,सी ) देहरादून में अध्यापन | तत पश्चात केन्द्रीय विद्यालय संगठन में प्राचार्य के रूप में 18 वर्ष तक सेवारत रहा |व्यक्तिगत कारणों से पदोन्नति को स्वीकार नहीं किया और प्राचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुए | शैक्षणिक लेख केंद्रीय विद्यालय संगठन के पत्रिका में प्रकाशित हुए | “ Value Based Education” नाम से पुस्तक २००० में प्रकाशित |

अपने स्कूल के दिनों से मुझे पढने , लिखने और अध्यापन में रूचि थी. मैं सेवानिवृत्त के अंतिम| दिन तक पूर्ण रूप से आनंद का अनुभव किया| किशोर एवं युवा बच्चों के साथ रहकर मैंने हमेशा युवा एवं उर्जावान महसूस किया है. सेवानिवृत्त के बाद लिखने | पढने ,आध्यात्मिक कार्य एवं योगाभ्यास में अपने समय के सबसे अधिक भाग व्यतीत करते हैं | मैं ‘स्वांत सुखाय’ लिखता हूँ , लेकिन हाल ही में ब्लॉग में अच्छे अच्छे कवियों एवं लेखकों की रचनाएँ मुझे देखने को मिली | उनकी कृतियों का प्रकाशन देखकर मूझे अपने कृतियों का प्रकाशन कर भारत के बौद्धिक एवं संवेदनशील वर्ग से साझा करने की प्रेरणा मिली | तब मैंने अप्रैल २०१२ में अपना ब्लॉग ‘मेरे विचार मेरी अनुभूति". के नाम से शुरू किया .मेरा दूसरा ब्लॉग है “अनुभूति “|

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  1. काली प्रसाद जी की कवितायेँ चूँकि दिल से
    निकलती है अतः सीधे दिल में पहुँचती हैं
    बिना किसी बनावट के या दिखावे के इसे ही
    विशुद्ध कविता कहते हैं बहुत बहुत बधाई
    काली पद प्रसाद' जी

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